चाबीबन्द सन्दूक - आशापूर्णा देवी Chabiband Sandook - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चाबीबन्द सन्दूक

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भूमिका प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2550
आईएसबीएन :81-901686-9-X

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इसमें एक बन्द सन्दूक के भीतर छिपे रहस्य पर प्रकाश डाला गया है....

चाबी बन्द सन्दूख गाँव का घर। दो प्रौढ़ अपने पूर्वजों के विशाल खाली पड़े मकान में आकर सहसा विस्मृत स्मृति को पुनः सामने ले आते हैं। उस मकान में अब केवल पड़ा हुआ है एक विशाल लकड़ी का सन्दूख। वह इतना भारी है कि सारा सामान उठाकर ले जाने वाला भी उसे अपनी जगह से हिला-डुला तक नहीं सका था। अब इस बन्द सन्दूख के भीतर छिपे रहस्य के इर्द गिर्द घूमने लगती है कहानी। इन प्रौड़ मे बहू सर्वोत्तमा इस गाँव में आकर ऐसा व्यवहार करने लगती है जैसे वह पिछले जन्म में इसी घर में बहू बनकर आई थी। लोग सोच रहे थे उस सन्दूख में न जाने क्या-क्या होगा-जवाहरात पुराने कागजात और भी जाने क्या-क्या परन्तु उसमें से निकली लम्बे बालों की एक कटी वेणी। श्रीमती आशा पूर्णा देवी की लेखनी की तुलना नहीं होती है। यह उनका एक अनूठा उपन्यास है।


धूल के कार्पेट से ढके, मकड़ी के जाल की मसहरी के नीचे लेटे वृहत विशाल लकड़ी के सन्दूक को देखकर छप्पन और अट्ठावन के दोनों भाई मानो विस्मृत स्मृति के धक्के से छह और आठ साल के बालक हो गए।
हां, छह और आठ। उसी उम्र के साथ जुड़ा है वह सन्दूक। फिलहाल धूल की परत भेदकर उसके ढक्कन के ऊपर चौकोर कटावदार जो नक्काशी बनी है, वह नहीं दिखाई पड़ रही है। लेकिन वे दोनों लड़के उसे देख रहे थे और देखकर मन से गृहस्थ दोनों प्रौढ़ों को क्या ‘नस्टालजिया’ हो गया है ?
‘‘भइया।’’
‘‘नीलू।’’
‘‘वही सन्दूक।’’
‘‘ऐसा ही तो जान पड़ रहा है।’’
‘‘जान पड़ने की क्या बात है भइया—वही है। यही तो दादाजी का कमरा था। हां, वह देखो खिड़की से धर्मेश्वरतला के शिव मन्दिर के ऊपर का शिकार दिखाई पड़ रहा है।’’
‘‘धर्मेश्वरतला। आश्चर्य की बात है। तुझे नाम याद था ?’’
‘‘नहीं था। अभी अचानक देखकर याद आ गया। उस दीवार के पास दादाजी की खाट थी।’’
‘‘वह तो दीख नहीं रही है ?’’
‘‘जहां जो कुछ था वह सब क्या तुझे दिखाई पड़ रहा है भइया ?’’ कहते ही चौंक उठे नीलकमल या नीलू। भइया को ‘तू कहा उन्होंने ? कितने साल बाद ?’’
लालकमल भी क्या चौंके ? कान के पर्दे को धक्का-सा लगा ? शायद हां। लेकिन क्या बुरा लगा ? क्या कभी बहुत पहले सुनी एक आवाज कानों के पर्दों से टकरा नहीं सकती है ? पर इसके लिए बाहर से कुछ अन्तर नहीं आया। तुरन्त भाई की बात का उत्तर दिया।

‘‘नहीं, वह तो नहीं दिखाई दे रहा है। विश्वस्त पास पड़ोसी लोग, मां जिनसे अनुरोध कर गई थीं कि जब तक मां फिर वापस न आएं तब तक घर और सामान का ध्यान रखें, शायद उन्हीं लोगों ने ध्यान कुछ ज्यादा ही रखा होगा। अब सन्दूक ले जाना सम्भव नहीं हुआ होगा—है भी कितना भारी।’’
नीलू हंसे, ‘‘इस मामले में ‘हल्का भारी’ का प्रश्न नहीं उठता है भइया। शायद चक्षुलज्जावश ही सम्भव नहीं हुआ है। बर्तन-भाड़ा, बक्स-बिस्तर, खाट-पलंग, अलगण्डी आल्मारी, ड्रेसिंग टेबिल सभी तो रहता है घरों में। ‘मेरी है’ कहकर आराम से चलाया जा सकता है। लेकिन ऐसी एक चीज को अपना कहकर ‘चला’ पाना मुश्किल होता है। केयर टेकर पड़ोसी के ऊपर चौकीदार पड़ोसी भी तो रहता है।’’

लालकमल घोषाल, जो व्यक्ति पिछले ही महीने रिटायर हुआ है और जिसे फेयरवेल में गरद का शॉल, चांदी की मूठ वाली छड़ और एक सोने के पानी से नाम लिखी टीका सहित गीता उपहार में प्राप्त हुई है, वह व्यक्ति बिल्कुल बच्चों की तरह ही बोल उठा, ‘‘इस सन्दूक से हम कितना डरते थे—है न ? तुझे याद आता है नीलू ?’’
‘‘खूब याद आता है। यहां आकर तो सभी कुछ याद आ रहा है। जबकि मन के कोने तक में, कहीं कोई छाया तक नहीं थी। दादाजी कहते थे, ‘‘उसके भीतर एक डाइन रहती है। छोटे बच्चे उसके पास जाते हैं या उसे छूते हैं तो ढक्कन खोलकर हाथ बढ़ाकर झट पकड़कर भीतर खींच लेती है और बाद में चबा-चबा कर खाती है।’’ इस कमरे में आकर उस सन्दूक पर नजर पड़ते ही सारे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते थे।’’

‘‘तुझे ऐसा होता था ? मुझे भी ऐसा ही होता था।’’
‘‘अच्छा भइया ! हमारे दादाजी बुढ़ऊ ऐसा निष्ठुर क्यों था बता तो सही। मां बाप मरे दो छोटे-छोटे पोते, उनके साथ ऐसा बुरा व्यवहार क्यों करते थे ?’’
‘‘उन दिनों के बुड्ढे शायद ऐसे ही माया ममताहीन होते थे रे नीलू। याद कर, हमारी मां के साथ ही कैसा दुर्व्यवहार करते थे—मुंह चिढ़ाए वगैर बात ही नहीं करते थे। याद है न तुझे ? उस उम्र में ही गुस्से से मेरा मिजाज गरम हो जाता था।’’
‘‘मुझे भी गुस्सा आता था। मुझे लगता था दादाजी अगर आंगन के कीचड़ पर फिसल जाएं और उनका पैर टूट जाए तो बहुत अच्छा हो। या फिर तालाब में नहाते वक्त डूब जाएं। उस वक्त यह नहीं सोचते थे कि इसका परिणाम क्या होगा।’’
सुनकर लालू हंसे, ‘‘तुझे ऐसा लगता था ? पर कभी कहता तो नहीं था।’’

नीलू जोर से हंसने लगे, ‘‘कहता कैसे ? तू तो घर भेदी विभीषण जो था। बताऊं और तू मां से कह दे...कौन जाने। इस बात का डर था। तू कितना बड़ा चुगलखोर था...बाबा।’’ लालू भी दिल खोलकर हंसने लगा, ‘‘अच्छा, ऐसा था मैं ?’’
‘‘और नहीं तो क्या ? था ही। मां और दादाजी के सामने ऐसा हावभाव बनाता था कि सब सोचते थे कितना अच्छा लड़का है और कहने लग जाता था, ‘‘जानती हो मां, नीलू ना...बस फौरन मां के दरबार में नीलू की पेशी हो जाती।’’
‘‘अच्छा। मां तो हमेशा ससुर बुड्ढे से गालियां खाती थीं, बहुत कड़ाई बरतता था बूड्ढा फिर भी मां उसे इतनी श्रद्धाभक्ति क्यों करती थी ?’’
‘‘भक्ति कहां ? कहो भय भक्ति।’’
‘‘नहीं भइय़ा, सचमुच भक्ति करती थीं। दादाजी के लिए पूजा की तैयारी करते समय, उनका जलपान रिकाबी में सजाते समय, खाना परोसते समय देखकर लगता था, भगवान की सेवा कर रही हैं।’’
‘‘देखता तो मैं भी था, लालू बोले, ‘‘पर मुझे लगता था डर के मारे कर रही हैं।’’

‘‘डर वाला चेहरा दूसरा होता है भइया और फिर जब दादाजी मर गए ? याद है न मां का रोना ? रो-रोकर आंख मुंह लाल हो गया था, चेहरा सूज गया था। सारे दिन काम करते-करते रोया करती थीं।’’
‘‘लालू बोले, ‘‘ये सारी बातें तुझे इतनी साफ-साफ याद हैं ये मैं कभी नहीं जान पाया।’’
‘‘नीलू हंसे, ‘‘मैं भी नहीं जानता था। यहां आते ही जैसे अचानक उसी अतीत में लौट गया हूं। आंखों के सामने दिखाई पड़ रहा है, यहां से जाते वक्त मां दादाजी की एक जोड़ी खड़ाऊ नामावली के कपड़े लपेटकर ट्रंक में रख रही हैं।’’
लालू पूछ बैठे, ‘‘दादाजी का ? मां के पूजागृह में जो रहता था, वही क्या ?’’
‘‘हो सकता है वही हो। मां तो तुम्हारे पास ही थीं, तुमने देखा है। मैं मां के पूजागृह में गया ही कितनी बार हूं ? दो एक दिन के लिए तो आता था।’’

लालू ने कहा, ‘‘देखकर मैं सोचता था वह हमारे परलोक सिधारे पिता का है। उनके पिता का है—यह नहीं सोचा था।’’
‘‘हमारे पिता ? भइया मेरे, भाभी बिल्कुल ठीक कहती है। तुम में साधारण ज्ञान की बेहद कमी है। हमारे पिताजी की किस उम्र में मृत्यु हुई थी, इसका ध्यान है कुछ ? बड़े मामा एक दिन पिताजी की छोटी-सी तस्वीर को एनलार्ज करवा कर ले आए थे और कहा था, ‘‘यह है तुम्हारे पिताजी की तस्वीर। बर्फी साइज की जिस तस्वीर की तेरी मां पूजागृह में रखकर पूजा करती थी, वह फेडेड हो गई थी। इसीलिए सोचा कि अगर जल्दी ही एनालार्ज नहीं किया तो...’’. खैर उस तस्वीर के नीचे लिखी जन्मतिथि और मृत्युतिथि को पढ़कर लगता है मात्र सत्ताईस साल की उम्र में बेचारे बीवी बच्चों और सगे सम्बन्धियों की माया से मुक्त होकर चले गए थे। उस उम्र में कौन खड़ाऊ पहनता है ? और फिर पिताजी दादाजी की तरह नहीं थे। सुना था, दो-दो पास थे। रेल की नौकरी....’’

लालू बोले, ‘‘तो मां अपने ससुर महाशय की पादुका पूजती थीं। ताज्जुब है। दुनिया में कितनी ऐसी बातें हुआ करती हैं। बचपन की यादें बड़े होने पर और पैनी हुई थीं। दादाजी का ध्यान आते ही एक गुस्सैल, कटुभाषी, सदा रूखा निर्दयी निष्ठुर बूढ़ा आंखों के सामने आ जाता। कभी किसी के लिए माया ममता स्नेह देखा था ? माया ममता बरसता था गौशाला के गायों पर। उनकी पीठ पर हाथ फेरते, हरी-हरी दूब खिलाते और मैंने तो उन्हें शाल पत्ते में लपेटकर जलेबी ले जाकर खिलाते देखा था। ये चीज हमारे लिए दुर्लभ थी। मैं तो सोच भी नहीं सकता हूं कि मां उस आदमी को कैसे भक्ति श्रद्धा करती थीं।’’
नीलू धीरे से बोला, ‘‘असल में ये है उस जमाने की शिक्षा और रग-रग में बसे संस्कार का फल। उनके लिए शिक्षा संस्कार था कि गुरुजन जो हो, जैसा भी हो वह पूज्यनीय है, आदर सम्मान का हकदार है। इसीलिए....’’

कहते-कहते नीलू चुप हो गए। ‘इसलिए’ जो ‘क्या’ है ये बात पहले ही कह चुके हैं। स्वर्गीय स्वसुर महाशय की कोई फोटो नहीं नहीं थी, यहां तक कि मृत्यु के बाद बूढ़े के पैरों के छाप भी नहीं लिए गए थे इसलिए वही खड़ाऊ प्रतिनिधि स्वरूप...
लालू बोले, ‘‘इसे तू अच्छा कहता है ?’’
‘‘शायद मैं नहीं कहता हूं पर मेरे कहने न कहने से कुछ जाता आता नहीं है। पर मां हमेशा ही अपने अविश्वास और मूलबोध को मानते हुए चली हैं।’’
अच्छा हाल ही में ‘स्वर्गीया’ हो गई वही स्वर्णचम्पा देवी नामक महिला के बारे में उनके दोनों बेटों ने इससे पहले कभी सोचा था या विश्लेषण किया था ? कब, कहां ? ये बात ही किसे याद थी कि उनका नाम स्वर्णचम्पा है ? ‘गंगा मार्का’ पत्र छपवाते समय, ‘‘विगत अमुक तारीख को हमारी परम आराध्या मातृदेवी’ लिखने के थोड़ा ठहरकर फिर जोड़ा गया था ‘‘स्वर्णचम्पा देवी सज्ञान अमृतलोक यात्रा....’’इत्यादि।

उस पर भी नाम का उल्लेख किया था लालू के बड़े लड़के परमेश्वर की नवपरिणीता वधू सर्वोत्तमा ने। वह बोल उठी थी, ‘‘अरे ? सिर्फ हमारी मातृदेवी ? उनका एक नाम रहा होगा ? जो उस दिन दुनिया से पुछ गया है क्या आखिरी बार भी उसका उल्लेख नहीं करेंगे ? एक इतना सुन्दर नाम है।’’
सर्वोत्तमा कोई स्वर्णचम्पा के जमाने की बहू तो है नहीं कि ससुर के सामने घूंघट काढ़कर ‘हां’ ‘नहीं’ में इशारा करके काम चलाती ? ये तो जमकर ससुर चचिया ससुर के साथ गप्पें हांकती है। यहां तक कि बहस करने में भी पीछे नहीं रहती है।
अतएव परम आराध्या मातृदेवी के साथ नाम जोड़ दिया गया था। नीलू बोले, ‘‘बहूमां ठीक ही कह रही हैं भइया। नाम लिखो और इस पत्र के नीचे हमारे पूरे-पूरे नाम को लिखना भी तब तक बेकार होगा जब तक उसके आगे लालू और नीलू नहीं लिखा। कौन अच्छे नाम से पहचानेगा हमको ?’’

अतएव वंशधारा के नियमानुसार ‘भाग्यहीन’ के नीचे त्रैम्बकेश्वर घोषाल और त्रिगुनेश्वर घोषाल लिखा गया तो ब्रैकट में उन नामों के आगे लालू नीलू भी लिखा गया। इन लड़कों ने तो पिता त्रिलोकेश्वर और दादा त्रिभुवनेश्वर घोषाल के मरने पर निमन्त्रण पत्र (गंगा मार्का) तो छपवाया नहीं था। यही एक काम था जिसे वे कर रहे थे। इसीलिए स्वर्णचम्पा देवी के लिए ये पत्र सुन्दर ढंग से महंगा छापा गया था। श्राद्ध का काम भी बहुत अच्छी तरह से किया गया था।
और फिर करते कैसे नहीं ? ? दोनों बेटे ऊँचे पद पर थे। बड़े ने तो अभी-अभी ‘अवसर ग्रहण’ किया है इसलिए बड़ी नौकरानी का प्रभाव बना हुआ था। छोटे की भी अच्छी कमाई थी, अच्छा ओहदा था। उन लोगों के रिश्तेदारों के अलावा भी जान पहचानें, मित्रों का समाज, दोनों का ससुराल और हाल में नई बहू का नया-नया मायका...इन सबकी निगाहों में मान सम्मान बनाए रखना भी तो जरूरी था। जैसे तैसे करके मातृश्राद्ध करते कैसे ?
सामाजिक क्रियाकलाप द्वारा ही तो स्टेट्स जाना जा सकता है। अब वह चाहे मातृदाय हो चाहे पितृदाय अथवा कन्यादाय। पर आज के लोग अब पहले दो ‘दायों’ को महत्त्व देना व्यर्थ समझते हैं और किसी तरह से इन ‘दायों’ अथवा ‘दायित्वों’ से छुटकारा पा लेते हैं। सारा खर्च करते हैं तृतीय दाय के समय। खैर स्वर्णचम्पा के बेटों ने उनके श्राद्ध को श्रद्धापूर्वक ही निपटाया था। पर मां को लेकर सोचा-विचारा कब था ?

लड़का-बहू-पोते-पोती सभी की पक्की धारणा थी कि स्वर्ण चम्पा कुसंस्कार की डिपो हैं, गंवार हैं, जिद्दी हैं। नम्रता के आवरण से ढकी अनमनीय हैं। सादे शब्दों में भयंकर जिद्दी।
ये ही नीलू, जब कलकत्ते की नौकरी छोड़कर दुर्गापुर में एक बहुत अच्छी नौकरी पाकर चला गया तभी दोनों बेटों और दोनों बहुओं की सभा में तय हुआ था कि मां साल में छह-छह महीने करके एक-एक लड़के के पास रहेंगी।
क्यों नहीं ? कुछ भी कटु शब्दों में नहीं कहा गया था, कहा गया था रंगीन पन्नी में लपेटकर। पोते-पोती उनकी जान हैं—अतएव लगातार इन प्राण तुल्यों की विरह यातना भी नहीं सहनी होगी। एकदम कानूनी व्यवस्था।
इसे कानूनी व्यवस्था भी कहा जा सकता है।
लेकिन स्वर्ण चम्पा ने उस व्यवस्था को माना था ?

नीलू के पास जाने की बात उठते ही कहने लगीं, ‘‘मन तो खिंचता है। दोनों बच्चे भी, ‘दीदा-दीदा’ करते हुए पीछे लगे रहते हैं लेकिन उसका शहर तो गंगा-विहीन है। आस-पास कोई मन्दिर-वन्दिर भी नहीं है। चारों तरफ कैसा एक यान्त्रिक और म्लेच्छ, म्लेच्छ भाव है। वहां छह महीने के लिए जाकर जान से हाथ धो डालूं क्या ?’’
अर्थात् भाग्य में सद्गति की सम्भावना बिल्कुल नहीं। प्रेरक लालू और ग्राहक नीलू, दोनों बीच एक अलगाव भाव। प्रेरक सोचता ज्यादा जबरदस्ती करना अच्छा नहीं लगता और ग्राहक अन्तराल में एक विशेष उपस्थिति का अनुमान कर सोचता, ज्यादा निर्वेद करने का परिणाम सुखकर होगा या नहीं।
‘‘अगंगा का देश’ मन्दिर विहीनता’ वाली बातों के अलावा भी एक बात उनके मन में रहते हुए भी सब जानते थे कि बड़े बेटे से दूर रहीं तो मरने पर कहीं वह मुखाग्नि न कर सके ? जबकि छोटे बेटे के प्रति उनका खिंचाव कुछ कम नहीं था। बल्कि ज्यादा ही था लेकिन...

यही। यही सब है लालू नीलू की मां के हमेशा के संस्कार, विश्वास मूल्यबोध और नियमनिष्ठा।
और वही अच्छी-अच्छी बातें अब याद आ रही हैं। अचानक ही। जैसे याद आ गया—दो आठ और छह साल के बालकों का चेहरा और उनका बोलने का ढंग, सोचने का तरीका। कौन सोच सकता है उन दोनों लड़कों ने ये सारी बातें मन में पिरो रखी थीं।
जबकि अब तक सोचते आ रहे थे, ये सब मां का कुसंस्कार, गंवारों जैसी जिद्दी असल में है ‘सुविधावाद’। हां ऐसा बड़े लड़के ने मन ही मन तो सोचा ही था।
अन्तिम दिनों में कलकत्ते से कहीं न जाने की अनिच्छा पर नीलू की बहू मन ही मन कहती थी ‘अगंगा के देश में रहने के कारण मैं खूब बच गई हूं, पर मुंह से दुलार दिखाकर कहती, ‘‘मां तो हमसे प्यार ही नहीं करती। इसीलिए हमारे पास रहती नहीं हैं।’’

और बड़ी बहू मन ही मन कहती, ‘‘गंगा के देश में क्या कर रही है बड़ी बहू, चोरों की सजा भोग रही है और कुछ नहीं, यहां खाने सोने का जो आराम है वह छोटी बहू के फैन्सी क्वार्टर में कहां मिलेगा ? यहां तो बड़े बेटे के हाल ये हैं कि घर बनना शुरू हुआ नहीं मां के लिए पूजाघर बन गया। ये सब वहां कहां मिलेगा ? और मुंह से बोली—
‘‘असल में मां की आचार-विचार, छुआछूत वाली बात, छोटे बेटे के शौकीन मार्का कार्पेट बिछे घर में चल नहीं पाता है और उतना घड़ा भर-भर गंगाजल ही कहां से लाएंगे बेचारे ? मां को सुविधा यहीं है।’’

नियमानिष्ठा, स्वच्छता, छुआछूत जैसे शौकीन शब्द जैसे अचानक ही नावबगंज के पुराने सीलनभरे घर के प्लास्तर गिरते कमरे में खड़े होते ही, सम्भाल के रखी शब्दावली के पन्नों के साथ गिरकर बिखर गए।

दादाजी के कमरे के मकड़ी के जाल की मसहरी ओढ़े, सन्दूक की तरह, कहीं कोई एक बृहत सन्दूक क्या पड़ा था विस्मृति के सीलनदार कमरे में ? वही अचानक....
जबकि इस गांव वाले घर को लेकर मां के साथ कम बहस नहीं होती थी दोनों की। लड़के कहते, ‘‘रखकर होगा क्या ?’’ और मां का एक ही तर्क, ‘‘पति-ससुर का घर है। मेरे जीते जी न बेचना बेटा। मेरे मरने के बाद तुम लोगों का जो जी में आए करना।’’

लड़के कहते, ‘‘कुसंस्कार।’’ बहुएं कहतीं, ‘‘यही तो स्वभाव है। हर बात पर जिद्दी।’’ एकादशी के दिन जलस्पर्श नहीं करूंगी।’’ ऐसी अजीब बेसिर पैर की बात किसी ने सुनी है क्या ? क्योंकि, कब जाने किस जन्म में, छोटे बच्चे की मां गर्मी के मारे प्यास लगने पर, कुएं से पानी निकालकर अचानक ठण्डा पानी अंजुरी भरकर पी लिया था और वह दृश्य देख लिया था उस महापुरुष ससुर महाशय ने। तुरन्त वे बोल उठे थे, ‘‘छिः छिः बहूमां। छिः। यह तो असंयम है। पीयो तो दिखा कर पीयो।’’ तब से आज तक उस ‘छिः’ का धक्का झेलती चली आ रही है। कहा जाता है कि उस बूढ़े ने उस एक अंजुरी पानी पीने के दंडस्वरूप प्रायश्चित की जो व्यवस्था की थी, वह थी कि द्वादशी के दिन भी पूरा निर्जला रहना पड़ता था। ऐसी व्यवस्था वह भी अन्यायपूर्ण माननी होगी ? वह भी आजन्म ? यह नहीं देखेंगी कि उम्र क्या हो रही है ? कौन सुनता है किसकी बात ?
कभी-कभी दोनों देवरानी जिठानी में बड़ी एकता नजर आती है। छोटी कहती, ‘‘ये लोग कर भी लेती हैं।’’

बड़ी कहती, ‘‘जिद्द ही शक्ति जुटाती है। यही बलवर्धक टॉनिक है। मैं तो कहती हूं और कुछ नहीं सिर्फ जिद्द है। जिससे की यह जो भाव बढ़ा हुआ है वह न कम हो जाए।’’
लड़कों ने भी इस दलील पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। लेकिन अब अचानक यही ‘जिद्द’ शब्द बदलकर बन गया है ‘निष्ठा मूल्यबोध’। इसीलिए वही महिला उसी निर्मायिक बूढ़े का खड़ाऊ उठा ले आईं ? वहां के घर से चिर विदा लेते वक्त ? वह तो जिद्द नहीं, भावमूर्ति बनाए रखना नहीं था। वह थी निष्ठा, विश्वास, मूल्यबोध।
लेकिन स्वर्णचम्पा नाम की वह दुबली-दुबली महिला, माने विधवा बहू ने क्या तब सोचा था कि यहां से जीवनभर के लिए जा रही है ? वह तो जाना ही नहीं चाहती थी। कहा था मोहल्ले में नाते रिश्तेदार तो हैं, दोनों लड़कों के साथ रह लूंगी।’’
भाई ने कहा था, ‘‘रह लेगी ? अच्छी तरह से रह लेगी ? हो सकता है तू रह ले लेकिन तूने क्या लड़कों के भविष्य के बारे में सोचा है ? यहां पड़े रहे तो क्या वे इन्सान बन सकेंगे ? पांच मील के भीतर तो एक अच्छा स्कूल नहीं है और तेरे ससुर बुड्ढे के रहते तो रिश्तेदारों ने जैसा व्यवहार किया था क्या अब भी वैसा ही करेंगे ? फिर यह इतना बड़ा घर—इसमें तेरे जैसी एक निरीह लड़की का दो निहायत ही छोटे-छोटे बच्चों को लेकर अकेले रहना...कितनी तरह के प्राब्लम आ खड़े हो सकते हैं, क्या तूने सोचा है ? अच्छा, अभी तो चल। बाद में लड़के जब थोड़े बड़े हो जाएंगे तो देखेंगे। उनकी छुट्टियां होने पर, कभी-कभी दो दस दिन आकर रह जाया करना।’’

पर वह ‘‘कभी-कभी’ रह जाना इस जीवन में हो ही नहीं सका स्वर्णचम्पा का। कोई बड़ी बाधा थी क्या ? कुछ खास नहीं। केवल हुआ ही नहीं।
शायद इस पक्ष की मृदुता और उस पक्ष की उदासीनता ही एकमात्र कारण हो। लड़कों को भी तो नवाबगंज जाने के नाम पर उत्साहित होते नहीं देखा। वे अनायास ही कह देते थे, ‘‘धत् वहां कौन जाएगा ? धत् जाकर करेंगे क्या ?’’
यह बात भी परम सत्य थी।
जाकर क्या होगा ?
उधर पचास साल से स्वर्णचम्पा यही सोचती रही, अगर एक बार वहां जा सकती ?
हालांकि अगर भाई गृही होते तो क्या होता, कहना मुश्किल है। शायद गृहणी द्वारा धमकाए जाने पर भाई अपने आप ही कहते, देख री चम्पा, मैंने बहुत सोचकर देखा है। घर को इस तरह से लावारिस पड़े रहने देना ठीक नहीं। शायद देखने को मिले कि किसी ने कब्जा जमा लिया है। कभी-कभी कुछ दिनों के लिए न हो.,...’’
अवश्य ही वह ‘कुछ दिन’ चिरदिन हो जाता है।




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