अब्बा की खाँसी - राष्ट्रबंधु Abba Ki Khansi - Hindi book by - Rashtrabandhu
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अब्बा की खाँसी

राष्ट्रबंधु

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :186
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2565
आईएसबीएन :81-88267-36-8

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प्रस्तुत है बाल शिक्षा उपयोगी नाटक.....

Abba Ki Khansi a hindi book by Rashtrabandhu - अब्बा की खाँसी - राष्ट्रबंधु

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बच्चे शैशव से ही अनुकरण माध्यम से अपने विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति करते हैं। वे अपने पूर्वजों का पहले और बाद में समवस्यक साथियों का अनुकरण करते हैं। अनुकरण से वे अपने विचारों में विकास खोजते हैं।
हिंदी बाल साहित्य में नाटक बाल सहज अनुकृति पर कम और बड़ों की अनुकृति पर अधिक संख्या में लिखे गए हैं। संरक्षक, अभिभावक और शिक्षक बालकों से आदर्श का अनुकरण कराने के लिए रामलीला एवं जीवनियों को नाटकों में परिवर्तित करने-कराने को प्रोत्साहन देते रहे हैं; लेकिन शिक्षा में मनोविज्ञान के प्रवेश ने बच्चों के नाटकों में इन्हें गौण बना दिया है। अब बच्चों की स्वाभाविक चेष्टाओं को नाटक में प्रस्तुत करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है तथा आधुनिक बोध में स्वाभाविक क्रियाओं की प्रस्तुति की जाती है।

विषय-वस्तु की दृष्टि से वर्तमान काल में हिंदी में बाल नाटक दो भागों में विभक्त किए जा सकते हैं-
1. लीला बाल नाटक।
2. बाल स्वाभाविक क्रियाओं के नाटक।

शैली की दृष्टि से इनके तीन भेद हैं-
1. रंगमंचीय बाल नाटक।
2. रेडियो बाल नाटक।
3. संगीत बाल नाटक।

हिंदी के बाल नाटकों में बड़े-बूढ़े, संतों, अवतारों, महापुरुषों के चरित्रों को ऐसी पुस्तकों से चुना जाता है, जिनमें सभी कुछ बालकेतर नाटकों का रहते हुए भी संवाद सुविधा रहे। इनकी भाषा में वाक्य छोटे, सहज और सरल हों, जिनका शाब्दिक उच्चारण कठिन न हो। इस माँग की पूर्ति के लिए ऐसे बाल नाटक लिखे गए हैं जिनमें कथा-वस्तु बड़ों की होती है, संवाद बड़ों के होते हैं। मंच व्यवस्था बड़ों के अनुसार होती है। जो कुछ रहता है, आरोपित होता है है-लादा गया। इनमें कई दृश्य होते हैं और पात्र संख्या भी अधिक रहती है। वर्षों से बाल नाटकों का यह स्वरूप दकियानूसी या पारंपरिक चल रहा है। लिखनेवाले भी बदलाव नहीं लाते और प्रस्तुतकर्ता कोई परिवर्तन करना नहीं चाहते।

लीला बाल नाटकों को संवाद कथाओं का पर्यायवाची कहा जा सकता है। इनमें रंगमंचीय अर्हताएँ नहीं रहतीं। सावधानियों के निर्देश नहीं दिए जाते। वर्तमान की अवहेलना की जाती है। ‘बाल रंगमंच’ (शालिग्राम व्यास), ‘दो प्यारे मित्र’ (विष्णुदत्त कविरत्न), ‘अंधों की आँख’ (व्यथित हृदय), ‘नवीन बाल रंगमंच’ और रंगमंच के खेल’ (गणेश दत्त इंद्र), ‘बाल नाटक माला’ (पं. नारायण प्रसाद द्विवेदी), ‘इतिहास के चार फूल’ (रामजन्म सिंह ’शिरीष’), ‘स्वर्ग परीक्षा’ (पवन कुमार) आदि पुस्तकें महत्त्वपूर्ण मानी गईं, क्योंकि इनकी बिक्री भी बड़ों की पसंद के कारण खूब हुई होगी-अंधों में काने राजा।

बाल नाटकों की ऐसी भी पुस्तकें हैं जिनमें बच्चों को अप्रैल फूल बनाया जाता है। नवीनता के नाम पर इनमें समसामयिकता रहती है। सिंचाई, प्रौढ़ शिक्षा, कृषि चर्चा और पात्रों में बच्चों का समावेश किया जाना बाल नाटक नहीं होता। भक्ति, देशभक्ति और बड़ों के प्रति भक्ति निरूपित करने में इतिहास का नाटकीकरण हो सकता है, लेकिन निर्वाह की प्रतिकूलता में उससे बालहित नहीं होता। महापुरुषों को बाल दृष्टि से देखे बिना ऐतिहासिक बाल नाटक अपना उद्देश्य पूरा नहीं करते। प्राय: प्रकाशक विक्रय लक्ष्य से बच्चों और नवसाक्षरों के लिए बाल नाटक पुस्तकें तैयार करते हैं। इनमें बाल मनोविज्ञान होता ही नहीं।

लीला बाल नाटकों में ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें सुधार देखा जा सकता है। वीर रस की प्रस्तुति में बच्चों की स्वाभाविक रुचि रहती है। करुण तथा हास्य के कथानकों को बाल नाटकों का विषय बनाने से दर्शक बालकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। बालकों को अभिनय कला प्रशिक्षण रंगमंच से परिचित कराने के लिए बाल नटाकों को शिक्षा विषय से जो़ड़ा गया। श्री पातीराम भट्ट ने स्त्री पात्र-विहीन बाल नाटकों की रचनाएँ कीं, जिसमें भी भेद किए गए, लड़कों के खेलने के लिए और लड़कियों के खेलने के लिए। सहशिक्षा के रहते इस तरह का भेदभाव उचित नहीं होता। डॉ.मस्तराम कपूर ने इनके बारे में लिखा-‘पातीराम भट्ट के स्त्री पात्रहीन ऐतिहासिक नाटक इस उद्देश्य से लिखे गए हैं कि स्कूलों के लड़के उन्हें स्टेज पर कर सकें। इनमें नाटक इस उद्देश्य से लिखे गए हैं कि वयस्क पात्र और वयस्कोपयोगी विषय होने के कारण इन्हें वयस्क नाटक कहना ही अधिक संगत होगा।’ (माधुरी, जुलाई-अगस्त 1997, पृष्ठ 111)

उमाकांत मालवीय कृत ‘सिंह का दूध’ भी इसी वर्ग की पुस्तक है। श्री भट्टजी का नाटक ‘महाप्रभु चैतन्य’ भक्ति रस से ओत-प्रोत है, जो कि प्रत्येक बालक को प्रभावित नहीं करता। ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ किशोरावस्था के बाद के लोगों की समस्याओं को तो रखता है, लेकिन न तो बालक उसमें विद्यमान होते हैं और न वे इसे आत्मसात् कर पाते हैं। हाँ, कुछ बच्चों को मनोराज्य में जाने का आनंद देता है, लेकिन दर्शक बालक इससे भी वंचित रहते हैं।
कुछ अन्य बाल लीला नाटक हैं-‘राह अनेक, मंजिल एक’ (राधे श्याम प्रगल्भ), ‘ये खट्टे बेर’ (चंद्रभाल ओझा), ‘नौ बाल एकांकी, (हनुमान प्रसाद ‘चकोर’), ‘आदर्श नगर’ (निरंजन नाथ), ‘आओ नाटक खेलें’ (शिवप्रसाद शुक्ल) आदि।
‘राह अनेक, मंजिल एक’ (राधेश्याम प्रगल्भ) में पाँच नाटक हैं, जो खासतौर से मंच को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। इन संकलित नाटकों के शीर्षक हैं-‘बोया पेड़ बबूल का’, ‘हारिए न हिम्मत’, ‘कसौटी जो कसे’,‘चंदन विष व्यापत नहीं’ और ‘राह अनेक, मंजिल एक’। सहज अभिनीत ये नाटक यदि एक साथ खेले या पढ़े जाएँ तो निश्चित ही पूरे नाटक का आनंद देते हैं। इनमें एकसूत्रता भी है।

श्रीकृष्ण और अंजलि ने बाल नाटिकाएँ लिखी हैं, जिनके शीर्षक हैं-‘खेल के पुस्तकालय में’। अपरिचितों से मिलते समय इनमें सामान्य शिष्टाचार की बातें सिखलाई गई हैं। अनिल और अंजलि दो भाई-बहन हैं, जो विनोद करते हैं और बाद में अपने चाचाजी से विवाद का फैसला कराते हैं। उनकी एक अन्य कृति है ‘तोताराम’। इसमें चार मजेदार हास्य नाटक हैं-‘हिरण्य कश्यप मर्डर केस’, ‘बैल’, ‘माँगपत्र’ और ‘तोताराम’। इनको कई बार बहुत से विद्यालयों में अभिनीत किया गया है।
महापुरुषों, सिद्धों और अवतारों के प्रसंगों में भी बालरुचि के अनुसार चयन करना युक्तिसंगत है। आदर्श थोपे नहीं जाने चाहिए। इनमें भी बाल समस्याएँ और उनके निदान सम्मिलित किए जा सकते हैं। डॉ.रामकुमार वर्मा का अभिमत है, ‘बड़ों के नाटक किसी दूसरे दृष्टिकोण से लिखे गए होते हैं और उनको हम फिट करना चाहते हैं, न बाल मनोविज्ञान के अनुरूप बात होती है और न नाटककार को ही संतोष हो सकता है और हमें इस स्थिति से ऊपर उठना चाहिए। (डॉ.हरिकृष्ण देवरसे: बाल साहित्य-एक अध्ययन, पृष्ठ 292)

स्वाभाविक बाल नाटकों की विशेषता है कि उनकी सहजता बच्चों को अधिक आकर्षित करती है। श्री योगेन्द्र कुमार ‘लल्ला’ और श्रीकृष्ण के संयुक्त संपादन में एक संकलन प्रस्तुत हुआ। ‘पराग’ बाल पत्रिका ने भी पुरस्कार योजना बनाकर बाल एकांकियों के लेखन और स्तर-निर्धारण में जो योगदान दिया है, सारा श्रेय उसकी नींव के पत्थर, अदृष्ट निदेशक श्री आनंद प्रकाश जैन को जाता है। श्री जैन के नेतृत्व में लिखनेवालों में सर्वश्री कमलेश्वर ‘पैसों का पेड़’, श्रीकृष्ण ‘नन्हे संकल्प’, ‘ईश्वर का मंदिर’, विष्णु प्रभाकर ‘माँ का बेटा’, प्रफुल्लचंद ओझा ‘मुक्त’ ‘बालकों के चार नाटक’, संत गोकुल चंद ‘बच्चों का मंच’, डॉ.मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’, ‘बच्चों के नाटक’, नर्मदा प्रसाद त्रिपाठी ‘आटे का बंदर’ जैसे कुछ नाम उभरे, जिन्होंने बाल स्वभाव पर आधारित नाटक लिखने के प्रयास में यह ध्यान रखा कि नाट्य लेखन शिक्षाप्रद होना ही चाहिए। पं. सीताराम चतुर्वेदी ने समसामयिक बाल नाटक लेखन को ध्यान में रखकर लिखा, ‘बच्चों के नाटकों का मुख्य उद्देश्य अवसर के अनुकूल आचरण दिखाना है। साथ ही नाटक मानव स्वभाव और मानव चरित्र का अध्ययन करना, भावों को व्यक्त करना, सम्यक् रीति से उच्चारण करना, बोलना और अभिनय करना भी सिखाते हैं।’ (पं.सीताराम चतुर्वेदी: भाषा की शिक्षा, पृष्ठ 183)
विज्ञान की उन्नति ने मंच, लेखन और मुद्रण को प्रभावित किया है। दृश्य, श्रव्य और दृश्य-श्रव्य युक्त बाल नाटकों का प्रादुर्भाव वैज्ञानिक उन्नति के कारण हुआ है, जिसने शैलीगत परिवर्तन किए हैं। ध्वनि संकलन के द्वारा अप्रस्तुत पशुओं, परिवेश आदि को प्रस्तुत किया जाता है। दूरदर्शन और आकाशवाणी केन्द्रों ने अपने मंचों से अधिक बाल नाटकों की प्रस्तुतियाँ की हैं। श्रव्य नाटकों में ध्वनियों का प्रस्तुतीकरण अधिक संभव है और इनका प्रभाव रस-निष्पत्ति को सरल बना देता है। आकाशवाणी केंद्रों से बाल नाटक प्रस्तुतियों के लिए सर्वश्री चिरंजीत, बालकराम है। नागर, सत्यदेव नारायण सिन्हा, चंद्रकिरण सोनरेक्सा, कमला सक्सेना, लक्ष्मी बाला, आशा मिश्रा आदि को भुलाया नहीं जा सकता।

देशभक्ति के विकास के लिए, बच्चों में राष्ट्रीय भावना उत्पन्न करने की दृष्टि से, बाल साहित्य के रचनाकारों के तदुनरूप नाटक लिखे और उनके संकलन भी प्रकाशित किए गए। राष्ट्रीय एकांकी (संपादक-योगेन्द्र कुमार लल्ला) में एकादश एकांकी नाटक हैं, जिसमें ख्यातिलब्ध सर्वश्री आनंदप्रकाश जैन, कणाद ऋषि भट्नागर, कमलेश्वर, चिरंजीत देवराज, ‘दिनेश’, मंगल सक्सेना, मनोहर वर्मा, विनोद रस्तोगी, राजेन्द्र कुमार शर्मा, विभा देवसरे, विष्णु प्रभाकर, सरस्वती कुमार ‘दीपक’ तथा श्रीकृष्ण के अच्छे नाटक प्रस्तुत हैं।
बाल नाटकों के तत्त्व भी सामान्य नाटकों की तरह वांछनीय हैं-

क.कथानक
हिंदी में ऐतिहासिक राजाओं, ऋषियों, स्थानों, नदियों को इंगित करनेवाले नाटक बच्चों के लिए प्राप्त हैं। धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करनेवाले नायक चयनित किए गए हैं। इनके अतिरिक्त सामाजिक, स्वाभाविक मनोविज्ञान के आधार पर वास्तविक परिवेश चित्रित करते नाटक लिखे और मंचित किए गए हैं।

वैज्ञानिकों और उनके सिद्धांतों को प्रतिपादित करके रूपक भी आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारित किए गए हैं। इन वास्तविक घटनाओं में विश्वसनीयता लाने के प्रयास किए गए हैं। इसका प्रभाव स्वाभाविक बनाने के उपक्रम विद्यमान हैं। परी कथाओं के नाटक केवल शिशुओं तक केंद्रित हैं और जादूगरी व तिलिस्म आदि का निष्कासन किया जाता है। काल्पनिक कथाओं को माध्यम बनाकर कुछ लेखकों की चर्चित पुस्तकें भी उपलब्ध हैं-‘गार्गी के बाल नाटक’ (परितोष गार्गी), ‘वे सपनों के देश से लौट आए’ (भानु मेहता), ‘बच्चों के रूपक’ (महेंद्र भटनागर), ‘आओ बच्चों, नाटक खेलें’, (अरविंद कुमार), ‘बच्चों का देश’, ‘बुद्धि के हीरे’, ‘वीर बालक’, ‘भारत माता’, (रघुवीर शरण मित्र), ‘कमलेश्वर के बाल नाटक- दो भागों में (कमलेश्वर), ‘बच्चों की सरकार’, (मोहन लाल गुप्त), ‘बाबूजी जिंदाबाद’ (केशवदेव वर्मा), ‘गधे’ (हबीब तनवीर), ‘भाई और बहिन’ (श्यामू संन्यासी) आदि।

‘बच्चों के रूपक’ (महेंद्र भटनागर) में ‘दो मित्र’ और ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ संकलित हैं। भटनागरजी ने रेडियो नाटक अधिक प्रस्तुत किए हैं। ‘बच्चों में चारित्रिक गुणों को विकसित करने में ये सहायक सिद्ध होंगे। मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्द्धन करना इनका उद्देश्य है। भाषा बोलचाल की और साफ-सुथरी है।’ (पराग, जुलाई 1962) ‘स्वर्ण स्पर्श’ बालकराम नागर की संगीत प्रस्तुति आकाशवाणी केंद्र, दिल्ली से प्रसारित हुई। यह काल्पनिक कथानक पर आधारित थी। हिंदुस्तानी थिएटर ने भी कल्पना-प्रधान कई कथानकों को प्रस्तुत किया। कुदसिया जैदी के बाल नाटकों में ‘ला मेरा चने का दाना’, ‘जंगल का शेर’, और ‘सितारा’ कल्पना पर आधारित कथानक हैं। चिल्ड्रन फिल्म थियटर के माध्यम से भी बच्चों के अनेक नाटक प्रस्तुत हुए हैं।
ख.रंगमंच
बड़ों के रंगमंच पर बच्चों के नाटकों का अभिनय भले ही किया जाए, लेकिन बच्चे अपने लिए अलग से बाल रंगमंच पसंद करते हैं। मनोवैज्ञानिक आधार पर बच्चों के लिए अलग थियटर होने चाहिए।
श्रीमती रेखा जैन ने ‘उमंग’ संस्था के माध्यम से ललित थियटर में अपने नाटक प्रस्तुत किए हैं, जिनको बहुत सराहा गया है। इंदौर में लिटिल थियटर महाराष्ट्रीय बाल नाटकों की प्रस्तुति करते हैं। कठपुतलियों को लेकर भी जयपुर, उदयपुर, लखनऊ और कोलकाता में लिटिल थियटर विकासमान हैं।
ग.संवाद
बाल नाटकों में संवाद की भाषा सहज, सरल और चुटीली होनी चाहिए। इनमें बोधगम्यता आवश्यक है। इन्हें याद करने में कठिनाई नहीं होती। संप्रेषणीयता भी रहती है। एतदर्थ वाक्य-रचना उलझावपूर्ण नहीं होनी चाहिए। लघु वाक्य प्रभावोत्पादक होते हैं।
घ.संगति त्रयी
समय, स्थान और क्रिया की संगति त्रयी का सम्यक् उपयोग बाल नाटकों को भी प्रभावी बनाता है। पात्रोचित वेशभूषा, पात्र चयन और उचित निर्देशन के अभाव में यह त्रयी टूट जाती है और देशकाल से विलग भी हो सकती है।
ऐतिहासिक नाटकों में संगति त्रयी की स्थिति बालकों के ज्ञानार्जन में सहयोग देती है। अत: इसपर बाल नाटक लेखकों को अधिक सचेष्ट रहकर निर्देश भी देने चाहिए। कल्पना-प्रधान कथानकों में संगति त्रयी की स्थिति वांछनीय है।
ङ.शैली
विज्ञान की प्रगति ने बाल नाटक क्षेत्र और इसके प्रस्तुतीकरण को नई शैलियाँ दी हैं। मंच की अपनी एक विधा है। आकाशवाणी से सर्वथा भिन्न। श्रव्य नाटक वर्णन प्रस्तुत करते चलते हैं। दृश्य-श्रव्य के एपीसोड, दूरदर्शन और मंच के लिए भी अलग शैलियों में प्रस्तुत होते हैं। एकालाप में एक पात्रीय नाटक मोनोलॉग भी प्रस्तुत किए जाने लगे हैं। संप्रति बाल नाटकों की दिशा में मस्तराम कपूर, बानो सरताज, काजी चक्रधर नलिन, शकुंतला सिरोठिया, जयप्रकाश भारती आदि सचेष्ट और क्रियाशील हैं। बाल नाटक शिक्षा की दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं। शैक्षिक पाठ्यक्रमों में इनका प्रवेश कलात्मकता, सरलता और रोचकता उत्पन्न करता है। बच्चे स्वयं रंगमंच तैयार करते हैं, संवाद लिखते-बोलते हैं। यत्किंचित् प्रेरणा देने की दिशा आवश्यक होती है। मेरा यह प्रस्तुतीकरण एक विनम्र प्रयास है। -डॉ.राष्ट्रबंधु
जन्मदिन
(रेडियो नाटक)
पात्र-परिचय
अंजू: शालिग्राम की बेटी
नीलम: अंजू की पड़ोसिन
राकेश: अंजू का अनुज
शालिग्राम: अंजू के पिता
यासीन: राकेश का पड़ोसी
राहुल: राकेश का मित्र
असलम: एक पड़ोसी
डॉक्टर साहब
[दरवाजे पर दस्तक होती है।]
डाकिया: पोस्टमैन ! अंजू का मनीऑर्डर है।
अंजू: लाइए।
डाकिया: एक सौ पचास रुपए। यहाँ हस्ताक्षर कीजिए।
अंजू: ठीक है। कहाँ करूँ ?
डाकिया: यहाँ। थोड़ा ऊपर कीजिए। ये लीजिए पचास-पचास के तीन नोट।
अंजू: ये दो रुपए रखिए।
डाकिया: धन्यवाद।
[गमन-पदचाप]
शालिग्राम: (आगमन-पदचाप) मनीऑर्डर कहाँ से आया है, अंजू ?
अंजू: आपका नहीं, मेरा है, डैडी ! ‘पर्यावरण संरक्षण’ पत्रिका से। इसमें मेरा लेख छपा है।
शालिग्राम: ‘पर्यावरण संरक्षण’ पत्रिका में लेख तो मेरा है, अलबत्ता नाम तुम्हारा है। श्रम मेरा तो पारिश्रमिक भी मेरा।
अंजू: कानूनी ढंग से इस लेख के नाम-दाम पर मेरा अधिकार है, पिताजी।
राकेश: किसी का नहीं। जब दो लड़ें तो फायदा तीसरे का होता है। इन रुपयों की आवश्यकता मुझे है। आज शाम को मेरी बर्थ-डे-पार्टी है। पार्टी में मेरे मित्र आएँगे। दावत होगी। हम पटाखे छुड़ाएँगे। लाओ इधर एक सौ पचास रुपए।
अंजू: इसमें दो रुपए कम हैं।
राकेश: दो रुपए कम सही। (रुपए छीनता हैं)
अंजू: रहने दो, ये रुपए मेरे हैं। मुझे इनकी जरूरत है।
राकेश: ये रुपए मेरी जरूरत पर आए हैं।
अंजू: पिताजी ! राकेश रुपए छीन ले गया।
राकेश: इन रुपयों का उपयोग करूँगा। देखना, कैसे-कैसे पटाखे होंगे। सुनना, धमाके की आवाज कितनी होगी।
[फ्लैश]
शालिग्राम: नहीं बेटे, ऐसे नहीं (प्लेटों की खट-पट, कुरसी-मेज सरकने की आवाजें, हैंपी बर्थ डे टू यू-गीत रिकॉर्ड पर)
शालिग्राम: आओ बेटे राहुल, बैठो। आने में देर क्यों हो गई ? क्या राकेश ने पार्टी का समय 9 बजे रात का बताया था ?
राहुल: चाचाजी ! कल मेरे घर के पास रात्रि जागरण का कार्यक्रम था। लाउड स्पीकर जोर-जोर से सारी रात बजता रहा। सभी लोग जागते रहे। सारा दिन सुस्ती में बीता। मैं दोपहर ऐसा सोया, ऐसा सोया कि नींद सिर्फ आधा घंटा पहले खुली। जल्दी-जल्दी तैयार होकर यहाँ अब आ सका।
शालिग्राम: कोई बात नहीं, पहले मुँह मीठा करो।
राकेश: बहुत देर कर दी तुमने, राहुल। खाना बाद में, पहले पटाखे छुड़ाओ। सभी साथी वहाँ हैं।
राहुल: पहले मिठाई।
राकेश: पहले पटाखे।
राहुल: पहले मिठाई।
राकेश: पहले पटाखे।
[पटाखों के चलने की आवाजें]
शालिग्राम: इसे ही रुपए फूँकना कहते हैं। (तभी नीलम वहाँ आती है) अरे आओ, बेटी नीलम ! आपको जल्दी आना था।
नीलम: अंकलजी, शहर में पानी की कमी अखरने लगी है। मैं नल से पानी भरने गई तो देखा, वहाँ पर बाल्टियाँ, डिब्बे, कनस्तर एक लंबी लाइन में लगे हैं। मेरा नंबर एक घंटे बाद आया। पानी भरने में लापरवाही की तो सारा दिन बिना पानी के रहना पड़ता है।
असलम: पानी की कमी ही गंदगी का कारण है। पानी की कमी से ही अशुद्धता है। गरीब लोग शुद्ध पानी के बारे में जानते हैं और चाहते भी हैं; लेकिन शुद्ध पानी सहज में मिल नहीं पाता। क्या करें ?
शालिग्राम: मिनरल वाटर खरीदनेवाले शुद्ध पानी का प्रचार करते हैं। इस पार्टी में तो नल का पानी भरवाया गया है। हम शुद्धता की गारंटी कैसे ले सकते हैं ?
असलम: क्या बात है, तुम तो बहुत घबराए हुए लगते हो ?
राहुल: लोग बताते हैं कि बाजार से खरीदा गया मीट खाने से यासीन को कालरा हुआ है।
अंजू: बाजार की चीजें खुली रहती हैं, उनपर मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। मैं तो घर की चीजें ही खाती हूँ।
नीलम: क्या इतना करने से सावधानी रह पाती है ? नल का पानी जो हमारे घरों में आता है, बीमारी का कारण बनता है। नल का गंदा पानी, जिसमें कॉकरोच तक निकलते हैं, हम पीते हैं। मजबूरी है।
राहुल: देर मत कीजिए। यासीन को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है। अंकलजी, चलिए।
अंजू: अब फिल्टर रखना जरूरी है। मैं अपना जेबखर्च घटाकर बचत करूँगी, लेकिन फिल्टर जरूर लूँगी।
राहुल: क्या हम अपने और अपने घर के बारे में ही बातें, करते रहेंगे। जल्दी कीजिए। सभी अपने-अपने कामों में लगे हैं। बीमारी बढ़ी और फैली तो यह आग की तरह शिकार करेगी। यह हिंदू-मुसलमान नहीं देखेगी, गरीब-अमीर नहीं देखेगी। उम्र का लिहाज भी नहीं करेगी। अंकलजी ! पार्टी छोड़िए, जल्दी से चलिए। अंजू: जाइए पिताजी। मैं भी चलती हूँ। पार्टी से पहले जाना है।
नीलम: अंजू ! मैं भी चलती हूँ।
राकेश: हम भी चलते हैं। मेरे पास अभी रुपए बचे हैं, यासीन की बीमारी में काम आ सकेंगे। पार्टी में खर्च करने से ज्यादा उपयोगी यह होगा।
राहुल: हम अब यासीन को अस्पताल ले चलते हैं।
[फ्लैश]
शालिग्राम: डॉक्टर साहब ! यासीन अब कैसा है ?
डॉक्टर साहब: खतरे से बाहर है। आप थोड़ी प्रतीक्षा कर लें। उसकी हालत में सुधार हुआ तो मैं उसे आपके साथ भेज दूँगा।
राहुल: ठीक है, डॉक्टर साहब।
राकेश: ग्लूकोज देने की व्यवस्था अथवा किसी आवश्यकता के लिए मेरे पास रुपए हैं। मैं आज अपने जन्मदिन पर उनका उपयोग करना चाहता हूँ।
डॉक्टर साहब: शाबाश ! तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
राकेश: मेरे जन्मदिन पर एक नया कार्यक्रम शुरू होना चाहिए-घर के आस-पास तथा गलियों की सफाई का। नालियों में चूना छिड़कना चाहिए।
अंजू: कर्मचारियों के भरोसे पर हम अपना स्वास्थ्य नहीं छोड़ सकते।
[खाँसी की आवाज]
राहुल: दादाजी ! आपको तो बहुत खाँसी आ रही है। क्या हुआ है आपको ?
असलम: धुएँ ने मुझे दमे का रोगी बना दिया है।
राहुल: धुएँ ने बहुत नुकसान किया है। वाहनों का धुआँ, घर के ईंधन का धुआँ फेफड़ों को प्रभावित करता है। इससे रोगियों की संख्या बराबर बढ़ रही है।
अंजू: चैकिंग का काम हम कर्मचारियों पर नहीं छोड़ सकते। हमें चाहिए कि हम बस्ती के अंदर धुआँ उगलते वाहनों को रोककर चेतावनी दें। बस्ती से चिमनियाँ हटवाएँ। कानून पालन करानेवालों को मजबूर करें कि वे रिश्वत लेकर अपराधियों को न छोड़ें। धुएँ का नुकसान रिश्वत लेनेवालों को भी हो सकता है।
नीलम: वाहनों की चैकिंग केवल धुएँ की ही नहीं, आवाज की भी होनी चाहिए।
असलम: तेज आवाज की वजह से मुझे बहुत परेशानी होती है। मैं ऊँचा सुनता हूँ।
अंजू: तेज आवाज की वजह से पढ़ाई नहीं हो पाती। मैं लाउड स्पीकर, टी.वी., रेडियो की आवाज पर कंट्रोल चाहती हूँ। मेरे पड़ोस में शर्माजी तो आवाज के हथौड़े मारते हैं। क्या करेंगे आप ? यहाँ के बाद सभी अपने-अपने घर चले जाएँगे और हमारे संकल्प धरे-के-धरे रह जाएँगे।
राहुल: हम टूटे हैंड पंपों का सुधार कराएँगे। अपने सामने फिटिंग कराएँगे। नल का पानी जिन श्रोतों से आता है उनकी सफाई कराएँगे या करेंगे।
राकेश: पत्थर के कोयले की अँगीठी बंद। स्कूटर, टैंपों, बसों से अगर धुआँ निकलता है तो हम उनका घेराव करेंगे और ठीक कराने की चेतावनी देंगे। पालन न करनेवालों की खटिया खड़ी कर देंगे।
राहुल: लेकिन इससे तो झगड़े खड़े होंगे।
शालिग्राम: पहले हमें समझना चाहिए कि समझाने का क्या असर पड़ रहा है, देखकर अगला कार्यक्रम बनाना चाहिए। कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए।
राकेश: कानून का पालन कराना चाहिए। वह देखिए, यासीन मियाँ तशरीफ ला रहे हैं।
यासीन: राकेश भैया, धन्यवाद ! अपने जन्मदिन पर तुमने मुझे नई जिंदगी दी है।
राकेश: धन्यवाद ! तुम तो मेरे भाई हो। अब तबीयत कैसी है ?
यासीन: ठीक है।
राहुल: लोग जैसा करते आए हैं, करेंगे, अपना रवैया नहीं बदलेंगे।
राकेश: तो हम भी उन्हें नहीं छोड़ेंगे। अमन-चैन और दूसरों की जान के दुश्मनों को कब तक सहन करेंगे ! और सहन ही क्यों करें इन देशद्रोहियों को ?
यासीन: चलिए, घर चलें। मुझे आराम की जरूरत है। ठीक होकर मैं पड़ोसियों की सेवा के लिए तुम सबका साथ दूँगा।
शालिग्राम: जन्मदिन की यह नई पद्धति सबके काम आएगी।
डॉक्टर साहब: आप लोग ध्वनि प्रदूषण मत कीजिए। काम ज्यादा, बातें कम।
[फ्लैश]
समूह गान: जन-जन का कल्याण, जन-जन का उत्थान।
एक नया अभियान।
पर्यावरण शुद्ध रखेंगे वृक्ष लगाएँगे।
दु:खद प्रदूषण दूर करेंगे कष्ट भगाएँगे।।
हमारा है संकल्प महान्।
हमारा एक नया अभियान ।।
नहीं किसी को हमसे दु:ख हो, बंद करेंगे शोर।
अंधकार का धुआँ हटाकर, हम लाएँगे भोर।।
बनेंगे खुद अपने दिनमान।
हमारा एक नया अभियान।।

अब्बा की खाँसी

भूमिका

बच्चे शैशव से ही अनुकरण माध्यम से अपने विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति करते हैं। वे अपने पूर्वजों का पहले और बाद में समवस्यक साथियों का अनुकरण करते हैं। अनुकरण से वे अपने विचारों में विकास खोजते हैं।
हिंदी बाल साहित्य में नाटक बाल सहज अनुकृति पर कम और बड़ों की अनुकृति पर अधिक संख्या में लिखे गए हैं। संरक्षक, अभिभावक और शिक्षक बालकों से आदर्श का अनुकरण कराने के लिए रामलीला एवं जीवनियों को नाटकों में परिवर्तित करने-कराने को प्रोत्साहन देते रहे हैं; लेकिन शिक्षा में मनोविज्ञान के प्रवेश ने बच्चों के नाटकों में इन्हें गौण बना दिया है। अब बच्चों की स्वाभाविक चेष्टाओं को नाटक में प्रस्तुत करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है तथा आधुनिक बोध में स्वाभाविक क्रियाओं की प्रस्तुति की जाती है।

विषय-वस्तु की दृष्टि से वर्तमान काल में हिंदी में बाल नाटक दो भागों में विभक्त किए जा सकते हैं-
1. लीला बाल नाटक।
2. बाल स्वाभाविक क्रियाओं के नाटक।

शैली की दृष्टि से इनके तीन भेद हैं-
1. रंगमंचीय बाल नाटक।
2. रेडियो बाल नाटक।
3. संगीत बाल नाटक।

हिंदी के बाल नाटकों में बड़े-बूढ़े, संतों, अवतारों, महापुरुषों के चरित्रों को ऐसी पुस्तकों से चुना जाता है, जिनमें सभी कुछ बालकेतर नाटकों का रहते हुए भी संवाद सुविधा रहे। इनकी भाषा में वाक्य छोटे, सहज और सरल हों, जिनका शाब्दिक उच्चारण कठिन न हो। इस माँग की पूर्ति के लिए ऐसे बाल नाटक लिखे गए हैं जिनमें कथा-वस्तु बड़ों की होती है, संवाद बड़ों के होते हैं। मंच व्यवस्था बड़ों के अनुसार होती है। जो कुछ रहता है, आरोपित होता है है-लादा गया। इनमें कई दृश्य होते हैं और पात्र संख्या भी अधिक रहती है। वर्षों से बाल नाटकों का यह स्वरूप दकियानूसी या पारंपरिक चल रहा है। लिखनेवाले भी बदलाव नहीं लाते और प्रस्तुतकर्ता कोई परिवर्तन करना नहीं चाहते।

लीला बाल नाटकों को संवाद कथाओं का पर्यायवाची कहा जा सकता है। इनमें रंगमंचीय अर्हताएँ नहीं रहतीं। सावधानियों के निर्देश नहीं दिए जाते। वर्तमान की अवहेलना की जाती है। ‘बाल रंगमंच’ (शालिग्राम व्यास), ‘दो प्यारे मित्र’ (विष्णुदत्त कविरत्न), ‘अंधों की आँख’ (व्यथित हृदय), ‘नवीन बाल रंगमंच’ और रंगमंच के खेल’ (गणेश दत्त इंद्र), ‘बाल नाटक माला’ (पं. नारायण प्रसाद द्विवेदी), ‘इतिहास के चार फूल’ (रामजन्म सिंह ’शिरीष’), ‘स्वर्ग परीक्षा’ (पवन कुमार) आदि पुस्तकें महत्त्वपूर्ण मानी गईं, क्योंकि इनकी बिक्री भी बड़ों की पसंद के कारण खूब हुई होगी-अंधों में काने राजा।

बाल नाटकों की ऐसी भी पुस्तकें हैं जिनमें बच्चों को अप्रैल फूल बनाया जाता है। नवीनता के नाम पर इनमें समसामयिकता रहती है। सिंचाई, प्रौढ़ शिक्षा, कृषि चर्चा और पात्रों में बच्चों का समावेश किया जाना बाल नाटक नहीं होता। भक्ति, देशभक्ति और बड़ों के प्रति भक्ति निरूपित करने में इतिहास का नाटकीकरण हो सकता है, लेकिन निर्वाह की प्रतिकूलता में उससे बालहित नहीं होता। महापुरुषों को बाल दृष्टि से देखे बिना ऐतिहासिक बाल नाटक अपना उद्देश्य पूरा नहीं करते। प्राय: प्रकाशक विक्रय लक्ष्य से बच्चों और नवसाक्षरों के लिए बाल नाटक पुस्तकें तैयार करते हैं। इनमें बाल मनोविज्ञान होता ही नहीं।

लीला बाल नाटकों में ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें सुधार देखा जा सकता है। वीर रस की प्रस्तुति में बच्चों की स्वाभाविक रुचि रहती है। करुण तथा हास्य के कथानकों को बाल नाटकों का विषय बनाने से दर्शक बालकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। बालकों को अभिनय कला प्रशिक्षण रंगमंच से परिचित कराने के लिए बाल नटाकों को शिक्षा विषय से जो़ड़ा गया। श्री पातीराम भट्ट ने स्त्री पात्र-विहीन बाल नाटकों की रचनाएँ कीं, जिसमें भी भेद किए गए, लड़कों के खेलने के लिए और लड़कियों के खेलने के लिए। सहशिक्षा के रहते इस तरह का भेदभाव उचित नहीं होता। डॉ.मस्तराम कपूर ने इनके बारे में लिखा-‘पातीराम भट्ट के स्त्री पात्रहीन ऐतिहासिक नाटक इस उद्देश्य से लिखे गए हैं कि स्कूलों के लड़के उन्हें स्टेज पर कर सकें। इनमें नाटक इस उद्देश्य से लिखे गए हैं कि वयस्क पात्र और वयस्कोपयोगी विषय होने के कारण इन्हें वयस्क नाटक कहना ही अधिक संगत होगा।’ (माधुरी, जुलाई-अगस्त 1997, पृष्ठ 111)

उमाकांत मालवीय कृत ‘सिंह का दूध’ भी इसी वर्ग की पुस्तक है। श्री भट्टजी का नाटक ‘महाप्रभु चैतन्य’ भक्ति रस से ओत-प्रोत है, जो कि प्रत्येक बालक को प्रभावित नहीं करता। ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ किशोरावस्था के बाद के लोगों की समस्याओं को तो रखता है, लेकिन न तो बालक उसमें विद्यमान होते हैं और न वे इसे आत्मसात् कर पाते हैं। हाँ, कुछ बच्चों को मनोराज्य में जाने का आनंद देता है, लेकिन दर्शक बालक इससे भी वंचित रहते हैं।
कुछ अन्य बाल लीला नाटक हैं-‘राह अनेक, मंजिल एक’ (राधे श्याम प्रगल्भ), ‘ये खट्टे बेर’ (चंद्रभाल ओझा), ‘नौ बाल एकांकी, (हनुमान प्रसाद ‘चकोर’), ‘आदर्श नगर’ (निरंजन नाथ), ‘आओ नाटक खेलें’ (शिवप्रसाद शुक्ल) आदि।
‘राह अनेक, मंजिल एक’ (राधेश्याम प्रगल्भ) में पाँच नाटक हैं, जो खासतौर से मंच को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। इन संकलित नाटकों के शीर्षक हैं-‘बोया पेड़ बबूल का’, ‘हारिए न हिम्मत’, ‘कसौटी जो कसे’,‘चंदन विष व्यापत नहीं’ और ‘राह अनेक, मंजिल एक’। सहज अभिनीत ये नाटक यदि एक साथ खेले या पढ़े जाएँ तो निश्चित ही पूरे नाटक का आनंद देते हैं। इनमें एकसूत्रता भी है।

श्रीकृष्ण और अंजलि ने बाल नाटिकाएँ लिखी हैं, जिनके शीर्षक हैं-‘खेल के पुस्तकालय में’। अपरिचितों से मिलते समय इनमें सामान्य शिष्टाचार की बातें सिखलाई गई हैं। अनिल और अंजलि दो भाई-बहन हैं, जो विनोद करते हैं और बाद में अपने चाचाजी से विवाद का फैसला कराते हैं। उनकी एक अन्य कृति है ‘तोताराम’। इसमें चार मजेदार हास्य नाटक हैं-‘हिरण्य कश्यप मर्डर केस’, ‘बैल’, ‘माँगपत्र’ और ‘तोताराम’। इनको कई बार बहुत से विद्यालयों में अभिनीत किया गया है।
महापुरुषों, सिद्धों और अवतारों के प्रसंगों में भी बालरुचि के अनुसार चयन करना युक्तिसंगत है। आदर्श थोपे नहीं जाने चाहिए। इनमें भी बाल समस्याएँ और उनके निदान सम्मिलित किए जा सकते हैं। डॉ.रामकुमार वर्मा का अभिमत है, ‘बड़ों के नाटक किसी दूसरे दृष्टिकोण से लिखे गए होते हैं और उनको हम फिट करना चाहते हैं, न बाल मनोविज्ञान के अनुरूप बात होती है और न नाटककार को ही संतोष हो सकता है और हमें इस स्थिति से ऊपर उठना चाहिए। (डॉ.हरिकृष्ण देवरसे: बाल साहित्य-एक अध्ययन, पृष्ठ 292)

स्वाभाविक बाल नाटकों की विशेषता है कि उनकी सहजता बच्चों को अधिक आकर्षित करती है। श्री योगेन्द्र कुमार ‘लल्ला’ और श्रीकृष्ण के संयुक्त संपादन में एक संकलन प्रस्तुत हुआ। ‘पराग’ बाल पत्रिका ने भी पुरस्कार योजना बनाकर बाल एकांकियों के लेखन और स्तर-निर्धारण में जो योगदान दिया है, सारा श्रेय उसकी नींव के पत्थर, अदृष्ट निदेशक श्री आनंद प्रकाश जैन को जाता है। श्री जैन के नेतृत्व में लिखनेवालों में सर्वश्री कमलेश्वर ‘पैसों का पेड़’, श्रीकृष्ण ‘नन्हे संकल्प’, ‘ईश्वर का मंदिर’, विष्णु प्रभाकर ‘माँ का बेटा’, प्रफुल्लचं


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