भ्रमरानंद का पचड़ा - विद्यानिवास मिश्र Bhramranand ka Pachda - Hindi book by - Vidyanivas Mishra
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भ्रमरानंद का पचड़ा

विद्यानिवास मिश्र

प्रकाशक : ज्ञान गंगा प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :99
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2585
आईएसबीएन :81-88139-21-1

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प्रस्तुत है हास्य व्यंग्य...

Bhramranand ka Pachda a hindi book by Vidyanivas Mishra - भ्रमरानंद का पचड़ा - विद्यानिवास मिश्र

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

शंकरजी ने पल्ला झाड़ लिया कि धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा, हम अलग ही रह कर सरकार को समर्थन देगें। हमने तरह-तरह के लोगों को समर्थन दिया है। उससे कभी-कभी गड़बड़ भी हुई है। उस समर्थन से रावण वाणासुर फूले-फले हैं। मैं अपने गण आप को देता हूँ कि इन्हें अपनी सरकार में, पुलिस में भर्ती कर लें। चाहे तो सेना में भरती कर सकते हैं। ये बड़े समदर्शी हैं और इन्हें किसी का कोई लिहाज नहीं है। इन्हें देखते ही आतंक भी आतंकित रहता हैं।’ विष्णु भगवान ने कहा कि ‘साल में चार महीना सोते हैं, अब पाँच साल सो लेगें।

एक दिन जाएगें, केवल यह देखने सुनने के लिए कि सरकार के नक्शे कदम क्या है। ‘इन्द्र ने कहा कि मैं सेकुलर तो हो सकता हूँ, लेकिन जनतन्त्र में मेरी कोई आस्था नहीं हैं। कुछ समय तक जनतन्त्र चल जाए, तब मैं सरकार में शामिल होने की बात सोचूँगा। कुबेर ने कहा कि ‘मैंनें तो खजाना सँभाला है। पहले राजतन्त्र का संभालता था, अब जनतन्त्र का सँभालूँगा। मेरे गण दो प्रकार के हैं-यक्ष हैं, जो जगह-जगह निधियों की रक्षा करते हैं और चोरी करने वालों को तत्काल पकड़कर हाथ-पाँव तोड़ देते हैं; गंधर्व हैं, जो संस्कृति रीति के परिचालन करते हैं। इन्द्र के हुकूम से अब तक नाचते-गाते थे; अब जो नेता होगा, उसके हुकूम से नाचेंगे-गाएँगे।’
पवनदेव ने कहा कि ‘मैं सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हूँ। जनतन्त्र तो स्वयं अपने आप में हवा है, मुझे अनुकूल पड़ेगा। सेकुलर भी अंतरिक्षी व्यापार ही है। दोनों मुझे स्वीकार हैं। नेता तो नहीं बनूँगा, विदेश मंत्री का पद सँभाल सकता हूँ।’ अग्नि ने कहा, ‘सेकुलर सरकार में यह तो होंगे नहीं, हमारे लिए और बकरे के लिए खाने-पीने की पूरी व्वस्था हो जाए तो मैं किसी सरकार का साथ देने के लिए तैयार हूँ।’

भूमिका

पचड़े का पचड़ा

बहुत पहले कभी ‘भ्रमरानंद के पत्र’ नाम से एक संकलन आया था और वे एक तरह से लुप्त ही हो गए थे। इधर ‘हिंदुस्तान’ के साप्ताहिक संस्करण के काम देखनेवाले श्री शंभुनाथ सिंह के माध्यम से उसके संपादक ने अनुरोध किया, और मैंने उसके रविवासरीय अंक के लिए स्तंभ लिखना शुरू किया। मुझे तब अंदाज नहीं था कि भ्रमरानंद का पचड़ा इतना लंबा खिंचेगा कि पुस्तक बन जाएगा। पर लोगों की अभिरुचि का तगादा हुआ और पचड़ा फैलता गया। इस पचड़े को फैलाने में हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्क लेखक श्री गोपाल चतुर्वेदी की प्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान है। हास्य-व्यंग्य के बारे में कुछ विशेष न कहकर वर्षों पूर्व कविता लिखी थी, हँसी पर, वह मैं दुहरा देता हूँ-

हँसी उठ गई है
मेरे जीवन में हँसी उठ गई है
वैसे कोई दुर्दिन आया नहीं दिखता,
न कोई उदास होने की खास वजह दिखती है,
न कोई खतरा दिखता है, न खौफ
बस यों ही हँसना अर्थहीन हो गया है।
एक-दो बेतुकी बातें हों तो हँसी आती है
पर जब सारी-की-सारी बातें बेतुकी हो गई हों
बेतुकापन जिंदगी की पीठ तक
नाप चुका हो,
तब सिर नवाकर बेतुकेपन को नया अवतार मानना होता है
तब बेतुकेपन पर हँसा नहीं जाता,
तब हँसना ही कुछ बेतुका हो जाता है।
डरना, तड़पना, रूठना, मचलना, मनना, मनाना
मरना, मारना प्यार में या नफरत से
जाने कब से चले आ रहे हैं,
जानवर या वहशी था आदमी, तब से
पर हँसना किसी एक दिन यकायक उसने सीखा
शायद उसी दिन उसने बोलना सीखा
बात और हँसी बाँटे बिना नहीं चलता,
आज बाँटते-बाँटते आदमी इतना बँट गया है
कि चलता है बाँटने हँसी और बाँट देता है जहर
हँसी और जहर दोनों घुल-मिल गए हैं न,
और आदमी का ध्यान बँटा रहता है
कि चलता है पर्त खोलने कुछ बातों की
और चुप्पी की तह-की-तह उघड़ी जाती है।
शायद हँसना-बोलना
दोस्तों या दुश्मनों के बीच ही मुमकिन है, न दुश्मनी
जेठ की घूरती हुई सुबह की रोशनी
मन के आसमान से दोस्ती के उभार को
सपाट करने लगी है,
दुश्मनी की रेघारियों को पाटने लगी है
दोस्त कहीं हैं तो अदृश्य हैं
दुश्मन कहीं हैं तो आस-पास, छिपे हुए घात में।
ऐसे में क्या बात होगी,
क्या हथमिलौवर होगी
क्या हँसी-ठट्ठा होगा,
हँसी की कोर मर गई है,
क्योंकि दोस्ती और दुश्मनी का पानी मर गया है,
महज दँतनिपोरी रह गई है।
मुझे किसी से शिकवा-शिकायत नहीं
मेरी हँसी किसी ने चुराई नहीं
मेरी हँसी पर कोई डाका नहीं पड़ा
मैं झूठमूठ किस पर तोहमत लगाऊँ,
जमाने ही गरीब को क्यों कोसूँ
कितने तो मौके दे रहा हूँ हँसने को
हँसी न आए तो जमाना क्या करे।
मायूसी न होते हुए भी
एकदम खाते-पीते हँसी कहीं चली गई है,
हँसी नहीं आती
इस बात पर भी नहीं कि
आदमी हँसना भूल गया है।
नहीं-नहीं अंग्रेजी में एक जानवर है जो हँसता है
वह लकड़बग्घे की हँसी हँसना सीख गया है।
अकेले मैं हूँ जिसे कोई भी हँसी नहीं आती।

इस कविता से पाठक आतंकित न हों, न इसे गंभीरता से लें। आप भ्रमरानंद के पचड़े में तो न पड़ें, पर पचड़े का रस लें। निहायत ही उदास जमाने में भ्रमरानंद ही एक गनीमत हैं। उनके चाहक पाठक भी गनीमत हैं।

-विद्यानिवास मिश्र

दादुर वक्ता भए

बरसात का मौसम है। साल भर एकदम ब्रह्मचर्य धारण करने वाले मेढक बादल की गरज से उतने नहीं जितने बादल की प्रभूत वर्षा से भरते गड्ढ़ों से निकल-निकलकर उछलने लगते हैं। फिर उनका अजस्र पाठ शुरू होता है। रात-दिन वे कभी विराम नहीं लेते। एक तरह से वे पावस के वक्ता ही हैं। ‘प्रवक्ता’ शब्द का प्रयोग इस भय से नहीं कर रहा हूँ कि उसमें राजनीतिक दलों को बुरा लग सकता है। उनके यहाँ प्रवक्ता होते हैं, जो पार्टी की तरफ से बोलते रहते हैं। यह बात अलग है कि वे जो बोलते हैं उसमें व्यक्त करने की अपेक्षा अव्यक्त रखने का अभिप्राय ज्यादा होता है। रहस्य खोलने की अपेक्षा गोपन रखने का अभिप्राय ज्यादा होता है। मूंडकों के साथ यह बात नहीं है।

वे खुलकर बोलते हैं। वहाँ बोलने की प्रतिस्पर्धा होती है। एक से दूसरा बढ़-चढ़कर बोलता है। यह दृश्य भी देखने को मिलता है कि केवल मुहावरे में ही नहीं कि एक मेढ़क दूसरे पर चढ़ जाता है। एक तीसरा दूसरे पर, एक अलग से प्रोत्साहित करता है। सबसे ऊपरवाला बोलता है- ‘जोर-जोर से, जोर-शोर से’ अर्थात् हम सबसे उपरी मंजिल से बोल रहे हैं- क्या ठीक है। बीचवाला बोलता है- ‘तरे गुलगुल ऊपर गुलगुला’- यानी ऊपर भी गुलगुला गलीचा, नीचे भी गुलगुला गलीचा, क्या सुख है ! सबसे नीचे वाला चिल्लाता है- ‘गयों तो मैं गयों, गयों तो मैं गयों’- यानी मैं ही बड़ा घाटे में रहा। जो दूर से यह ऑरकेस्ट्रा बजवा रहा है, वह चिल्लाता है- ‘और बोलो, और बोलो।’.... मेढ़कों के इस सरगम में झींगुर भी, जिसे कवि लोग झिल्ली कहना अधिक पसंद करते हैं, अपना योगदान देता रहता है और अपनी नफीरी जो छेड़ता है तो वह कभी सम पर आती ही नहीं।
जब दादुर बोलना शुरू करते हैं तो कोयल मौन हो जाती है। कारण यह है कि दादुर शुद्ध यथार्थवादी है- वर्षा होती है तो बोलता है, नहीं होती तो नहीं बोलता। पहले प्राप्ति हो जाय, दक्षिणा सामने रख दी जाय, तब वह उचरेगा। केवल वादे पर नहीं उचरेगा। उसका नकद हिसाब है। केवल रोमैंटिक है, इसलिए इस जमाने में उसकी कद्र नहीं रह गई। इस जमाने की गरज-तरज में उनका कोई स्थान नहीं। उसी के भाईबंद हैं ‘पपीहा’, जो इस मंजिल में जरूर रोते रहते हैं। कोयल वसंत का आगम मनाती है, पर दुर्दिन में नहीं।

वह भयंकर शीत में वसंत की आशा पलवाती है। वर्ड्सवर्थ ने कविता लिखी है कि ब्रिटिश द्वीप समूह के सबसे उत्तर हेवेडीज द्वीप समूह है, बड़ा निर्जन सा। वह समुद्र के मौन को तोड़ने वाली पुकार वहाँ कोयल लगाती है। कोयल से वसंत के सुख के नाम पर आम का केवल कसैला बौर मिलता है। फल का आस्वाद उसके भाग्य में नहीं। फल में रस भरते-भरते वर्षा आ जाती है और वर्षा में केवल मौन धारण कर लेती है,

दादुर शुरू हो जाते हैं। दादुर का मूल शब्द ‘दुर्दर’ एक बाजा भी है। उसको बजानेवाला दुर्दरक होता है और जुए में कोई हारे या जीते, पर माल उठाने वाला भी दुर्दरक होता है। दुर्दर होने का अर्थ ही है हमेशा लाभ में रहना, नुकसान उठाने का कोई खतरा मोल नहीं लेना। वह सत्ता को भरपेट कोसकर भी उससे लाभ लेता है। उसके समवेत स्वर में कुछ ऐसा आतंक होता है कि सब लोग उससे भयभीत हो जाते हैं। चातक बिचारे बिलखने लगते हैं, चकोर बादलों की छत में दिखता ही नहीं। दादुर के दो संस्कृत नाम और हैं-

‘मंडूक’ और ‘भेक’। ‘मंडूक’ शब्द में दो अर्थ हैं। संज्ञा के रूप में इसका अर्थ ‘माँड़’ है क्रिया के रूप में इसका अर्थ ‘सजाना’ है। चावल सिंझाया जाता है तो माँड निकलता है। उसे पसाया जाता है। गरीब लोग उसे पीते हैं। ‘मंड’ सुरादार को भी कहते हैं। शायद इसीलिए फ्रांस के रईसों का वह सबसे स्वादिष्ट भोजन ही है। उसमें भी उसकी टाँग का महत्त्व अधिक है। मंडूक भी गड्ढ़ों-तालाबों का माँड़ ही है। एक तरह से वह स्वयं लिजलिजा होता हुआ भी जल को तरल और स्पर्श योग्य बना देता है। जहाँ तक सजने का प्रश्न है तो सजता तो है। चढ़ा-ऊपरी में जब उसकी बोली शुरू होता है तो सजता तो है, पर कभी-कभी मेढ़की अगर कमरे में फुदककर आती है तो आजकल की लड़कियाँ कूंदकर सोफे के ऊपर चढ़ जाती हैं। बड़े मेढ़क ऐसा कम करते हैं, पर छोटी मेढ़की ऐसे उछल-कूद करती है।



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