वामपंथी कलुष-कथा - तरुण विजय Vampanthi Kalush Katha - Hindi book by - Tarun Vijay
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वामपंथी कलुष-कथा

तरुण विजय

प्रकाशक : ज्ञान गंगा प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2596
आईएसबीएन :81-88139-26-2

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इसमे वामपंथी बुद्धिजीवी के विचार प्रस्तुत किये गये है...

Vampanthi kalush katha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

11 मई, 1999 को हुए पोकरण-द्वितीय परीक्षण का तीव्र विरोध एवं हाल ही में पाठ्यक्रमों में नियमानुसार सरल, सहज परिवर्तनों पर ‘भगवाकरण’ के नाम पर प्रहार-अभियान में एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित किया कि भारतीय बौद्धिक संस्थानों और प्रचार माध्यमों पर एक ऐसा मस्तिष्क अब भी हावी है, जिसकी जड़े भारत की मिट्टी में नहीं, कहीं और हैं। गांधीजी के भारत छोड़ो आन्दोलन के विरूद्ध वह अंग्रेजों के साथ खड़ा था, नेताजी सुभास बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कह रहा था, मुस्लिम लीक की देश विभाजन की मांग की वकालत कर रहा था, भारत पर चीन के आक्रमण के समय उसकी भावना चीन के साथ थी। यह राष्ट्र विघातक मस्तिष्क ही ‘वामपंथ’ के नाम से कुख्यात है।
इस देश की राष्ट्रीय अस्मिता के परिचायक हिन्दुत्व के विरूद्ध उसने बौद्धिक जिहाद छेड़ दी है। भारतीय इतिहास और संस्कृति को विकृत करने पर वह वर्षों से जुटा हुआ है।

अंग्रेजों के समय से सत्ता में भागीदारी पाने के लिए इसने हर तरह के दाँव-पेंच चले। उसने यह दाँव–पेच केवल राजनीतिक उठा-पटक तक सीमित नहीं रहे, अपितु अपनी राष्ट्र विरोधी मानसिकता का विष इस देश के लोगों के स्नायुतन्त्र में घोलने का प्रयास भी किया। और अपने इस प्रयास में उसने बिना कोई अवसर गंवाए सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाना शुरू किया।

उसने समाज चेतना से जुड़े सत्ता प्रतिष्ठानों में इस प्रकार किलेबन्दी कर दी कि कोई उनमें सेंध भी न लगा सके। भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद्, भारतीय सांस्कृतिक अनुसंधान परिषद्, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों को इन्होंने किस प्रकार अपना गढ़ बनाया भारतीय संस्कृति, इतिहास को विकृत करने का कार्य किया, ‘वामपंथी कलुष कथा’ में इस रहस्य (चाल) की परतें उघाड़ रहे हैं देश के वशिष्ठ इतिहासकार, पुरातत्त्ववेता, साहित्यकार एवं पत्रकार। इनमें से कुछ मार्क्सवादी थे, किन्तु जल्दी ही उन्हें इस विचारधारा का खोखलापन नजर आने लगा और जब मार्क्सवाद से उसका मोहभंग हुआ तो उन्हें स्वयं वामपंथियों ने अपना शिकार बनाया। सत्ता के बौद्धिक प्रतिष्ठानों पर कुण्डली मारकार बैठे इन वामंपंथी बुद्धिजीवियों की सच्चाई क्या है और यहाँ तक पहुँचने के लिए इन्होंने क्या-क्या षड्यन्त्र रचे ? क्या अब बौद्धिक आकाश पर वामंपथी के अवसान के संकेत दिखाई दे रहे हैं ? इन्हीं कुछ प्रश्नों और उनसे जुड़े अन्य पहलुओं पर वरिष्ठ बुद्धिजीवियों के विचार प्रस्तुत ग्रंथ में संग्रहीत हैं।

प्रस्तावना


‘वामपंथी कलुष-कथा’ के प्रकाशन के लिए इस समय से बढ़कर शायद और कोई दूसरा समय नहीं हो सकता था। सन् 1986 और 1992 में निर्धारित राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अनुसरण करते हुए गत आठ वर्षों से सभी पाठ्य पुस्तकों के पुनरीक्षण की प्रतिक्रिया को चालू कर जब उनमें समयानुकूल और नवीनतम शोधों का समावेश करते हुए परिवर्तन सुझाए गए तो सारे वामपंथी वैसे ही भड़क गए जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड। अचानक ‘भगवाकरण’ का शोर मचाकर एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयत्न किया गया मानो देश में कोई भयंकर बात होने वाली है। पर संसद् के दोनों सदनों में जब विद्वत् संस्थानों में कुण्डली मारकर बैठे हुए इन तथाकथित विद्वानों के काले कारनामों व भूतकाल के इनके देशद्रोही चेहरे को उजागर किया गया तो उन लोगों के पास कोई उत्तर नहीं था।

ऐसे समय में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना याद आती है। एक विद्वान्, जो सभी सन्तों, स्वामियों व विद्वानों को शास्त्रार्थ-हेतु ललकार कर उन्हें पराजित किया करता था, दक्षिणेश्वर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस से शास्त्रार्थ करने पहुंचा। जब मन्दिर में उपस्थित हुआ तो उसने ऊंची आवाज में ‘ऊं’ का उद्घोष किया। स्वामी जी ने उससे भी ऊँची आवाज में ओंकार की ध्वनि की। आवाज चढ़ाने की स्पर्धा कुछ देर तक चली, पर जब शास्त्रार्थी और अधिक ऊँची आवाज नहीं चढ़ा सका तो वहां से खिसक गया। बाद में स्वामी जी ने कहा कि इस व्यक्ति में न साधना है, न वास्तविक ज्ञान। यह तो अपनी बुलंद आवाज ले लोगों को आतंकित कर उन्हें परास्त किया करता था।

वामपंथी आज तक यही करते रहे। दकियानूसी, प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी, साम्प्रदायिक, अमरीका के दलाल आदि गालियों द्वारा भिन्न मत रखनेवाले विद्वानों को दबाते रहे, क्योंकि पहले पं. नेहरू के रूस की ओर झुकाव व बाद में श्रीमती इंदिरागांधी की कम्युनिस्टों पर निर्भरता का लाभ उठाकर सारे विद्वत् संस्थानों एवं प्रचार माध्यमों पर उन्होंने कब्जा कर रखा था। आज भी अनेक अंग्रेजी अखबारों में उनके हस्तक बैठे हुए हैं और वर्तमान बहस को भी उन अखबारों ने इस ढंग से चित्रित करने का प्रयत्न किया मानो वामपंथियों के आक्रमण के आगे सत्ता रथ फीका पड़ा गया। पर इस बार उनसे भी ऊंची आवाज में बोलनेवाले लोग भाग आए और उन्होंने इन लोगों के बेनकाब करने में कोई कसर नहीं रखी।

प्रस्तुत पुस्तक में संसद् में हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी, विजय कुमार मल्होत्रा व डॉ. महेश चन्द्र शर्मा के भाषणों के द्वारा इन वामपंथियों को हुई तिमिलाहट को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है, जिनके पास बार-बार व्यवधान डालने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था।
बहुत पहले की बात है, कॉमरेड डांगे ने एक पुस्तक लिखी थी—‘From Primitive Communism to Slavery’, जिसमें वेद से लेकर महाभारत काल तक मार्क्स प्रणीत इतिहास की द्वन्द्वात्मक व्याख्या के अनुसार पांच चरणों में से प्रथम तीन चरण पूर्ण हो जाने की बात कही गई थी। भीष्म पितामह द्वारा समाज की सर्वोच्च अवस्था ब्राह्मी स्थिति का जो वर्णन—


‘न वै राज्यं न च राजासीत् न दण्डो, न च दाण्डिकः।
धर्मेणैव हि प्रजाः सर्वाः रक्षन्ति स्म परस्परम्।।


कहकर किया गया है उसे वेद पूर्व काल की मनुष्य की निम्नतम स्थिति बताकर ‘Primitive Communism’ कहा गया था। उसके बाद वेद में आए ‘गण’ शब्द का अर्थ कर्बला लगाकर वेदकालीन द्वितीय चरण को  कबीलाशाही बताया गया और महाभारत युद्ध को कबालीशाही व उसके बाद आने वाली नई व्यवस्था यानी राजशाही लाने की इच्छा रखनेवाले लोगों के बीच का युद्ध बताया गया। उसमें राजाओं को गुलामों का मालिक (Slave owners) और भगवान् श्रीकृष्ण को गुलामों के मालिकों का नेता (Leader of Slave owners)  चित्रित कर नई व्यवस्था में क्या स्थिति रहेगी, इसका वर्णन करने के लिए ‘गीता’ के प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्’ की व्याख्या की गई—Here the leader of slave owners Krishna says, ‘work but don’t demand wages’ अर्थात् काम करो, किन्तु मजदूरी मत मांगो।

जब पौर्वात्य और पाश्चात्य विचारधाराओं का तुलनात्मक अध्ययन करनेवाले प्रकाण्ड विद्वान बालशास्त्री हरदास ने कॉमरेड डांगे से भेंट होने पर उनसे पूछा कि ‘आपने  ‘गण’ को कबीला बताकर उसे राज्य-व्यवस्था की पूर्ण की स्थिति बताया है, किन्तु वेद में तो पूरी राज्य-व्यवस्था का वर्णन है और गण का अर्थ गणराज्य दिया गया है, तब सत्य क्या है ?’’ तो उन्होंने कहा कि ‘जो आपको ठीक लगे उसे आप चिल्लाएं, जो मुझे ठीक लगे मैं चिल्लाता हूं। जिसकी आवाज ऊंची होगी वह मान ली जाएगी।’

आज समय आ गया है कि भारत की धरती से गहराई से जुड़े विद्वानों को अपनी आवाज इन कालबाह्य वामपंथियों से अधिक ऊंची उठानी चाहिए। प्रस्तुत संकलन यदि राष्ट्रीय विदानों को इस दिशा में प्रेरित कर सका तो संकलनकर्ता का यह प्रयास सार्थक हो जाएगा।


-कुप्.सी. सुदर्शन

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11 मई, 1999 को हुए पोकरण-द्वितीय परीक्षण का तीव्र विरोध एवं हाल ही में पाठ्यक्रमों में नियमानुसार सरल, सहज परिवर्तनों पर ‘भगवाकरण’ के नाम पर प्रहार-अभियान में एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित किया कि भारतीय बौद्धिक संस्थानों और प्रचार माध्यमों पर एक ऐसा मस्तिष्क अब भी हावी है, जिसकी जड़े भारत की मिट्टी में नहीं, कहीं और हैं। गांधीजी के भारत छोड़ो आन्दोलन के विरूद्ध वह अंग्रेजों के साथ खड़ा था, नेताजी सुभास बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कह रहा था, मुस्लिम लीक की देश विभाजन की मांग की वकालत कर रहा था, भारत पर चीन के आक्रमण के समय उसकी भावना चीन के साथ थी। यह राष्ट्र विघातक मस्तिष्क ही ‘वामपंथ’ के नाम से कुख्यात है।
इस देश की राष्ट्रीय अस्मिता के परिचायक हिन्दुत्व के विरूद्ध उसने बौद्धिक जिहाद छेड़ दी है। भारतीय इतिहास और संस्कृति को विकृत करने पर वह वर्षों से जुटा हुआ है।

अंग्रेजों के समय से सत्ता में भागीदारी पाने के लिए इसने हर तरह के दाँव-पेंच चले। उसने यह दाँव–पेच केवल राजनीतिक उठा-पटक तक सीमित नहीं रहे, अपितु अपनी राष्ट्र विरोधी मानसिकता का विष इस देश के लोगों के स्नायुतन्त्र में घोलने का प्रयास भी किया। और अपने इस प्रयास में उसने बिना कोई अवसर गंवाए सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाना शुरू किया।

उसने समाज चेतना से जुड़े सत्ता प्रतिष्ठानों में इस प्रकार किलेबन्दी कर दी कि कोई उनमें सेंध भी न लगा सके। भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद्, भारतीय सांस्कृतिक अनुसंधान परिषद्, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों को इन्होंने किस प्रकार अपना गढ़ बनाया भारतीय संस्कृति, इतिहास को विकृत करने का कार्य किया, ‘वामपंथी कलुष कथा’ में इस रहस्य (चाल) की परतें उघाड़ रहे हैं देश के वशिष्ठ इतिहासकार, पुरातत्त्ववेता, साहित्यकार एवं पत्रकार। इनमें से कुछ मार्क्सवादी थे, किन्तु जल्दी ही उन्हें इस विचारधारा का खोखलापन नजर आने लगा और जब मार्क्सवाद से उसका मोहभंग हुआ तो उन्हें स्वयं वामपंथियों ने अपना शिकार बनाया।

 सत्ता के बौद्धिक प्रतिष्ठानों पर कुण्डली मारकार बैठे इन वामंपंथी बुद्धिजीवियों की सच्चाई क्या है और यहाँ तक पहुँचने के लिए इन्होंने क्या-क्या षड्यन्त्र रचे ? क्या अब बौद्धिक आकाश पर वामंपथी के अवसान के संकेत दिखाई दे रहे हैं ? इन्हीं कुछ प्रश्नों और उनसे जुड़े अन्य पहलुओं पर वरिष्ठ बुद्धिजीवियों के विचार ‘पाञ्चजन्य’ में प्रकाशित किए गए। इस कार्य को हमारी वरिष्ठ सहयोगी एवं प्रसिद्ध कवियित्री विनीता गुप्ता ने परिश्रमपूर्वक किया एवं लेखमाला को सार्थकता दी। पाठकों की मांग पर उनका संकलन प्रस्तुत करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता है। इसके साथ ही अन्य लेख या भाषण-सार भी अपनी सामयिक महत्ता एवं संकलन हेतु उपादेयता के कारण जोड़े गए हैं, आशा है, यह प्रस्तुति देश में वाममार्गी भ्रम तद्जन्य कलुष को साफ करने में सहायक सिद्ध होगी।

-तरुण विजय



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