उड़ते चलो, उड़ते चलो - रामवृक्ष बेनीपुरी Udate Chalo Udate Chalo - Hindi book by - Ramvriksh Benipuri
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उड़ते चलो, उड़ते चलो

रामवृक्ष बेनीपुरी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2618
आईएसबीएन :9789352663934

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प्रस्तुत है यात्राओं का सूक्ष्म व सजीव वर्णन...

Udate Chalo Udate Chalo

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

बेनीपुरीजी ने अपनी इस पुस्तक में अपनी यात्राओं का ऐसा सूक्ष्म और सजीव वर्णन किया है कि पढ़कर ऐसा लगता है मानो वह सब हमारे ही देखे-सुने-भोगे का वर्णन हो। यात्रा के एक-एक पड़ाव का, एक-एक क्षण का ऐसा कलात्मक वर्णन बहुत कम पढ़ने को मिलता है। जहाँ गये वहाँ की संस्कृति, सभ्यता, परम्पराव रीति-रिवाजों का अत्यन्त आत्मीयतापूर्ण वर्णन-ऐसा, जो पाठकों के लिए निश्चय ही जानकीपरक सिद्ध होगा।

 

:1:

उड़ता जा रहा हूँ !
10.5.’52-एरोप्लेन पर
प्राचीन ऋषियों ने कहा था-चरैवेति, चरैवेति,-चलते चलो, चलते चलो।
आधुनिक मानव कहता है-उड़ते चलो, उड़ते चलो।
प्राचीन ऋषियों का कहना था-पृथ्वी चल रही है, चंद्रमा चल रहा है, सूर्य देवता चल रहे हैं, इसलिए तुम भी चलते चलो, चलते चलो।
आधुनिक मानव देखता है-पृथ्वी, चंद्रमा या सूर्य देवता की गति प्रति घंटा लाखों, करोड़ों, अरबों मील है। किंतु, उसके पैरों की गति अत्यंत परिमित, धीमी है। अतः वह कहता है-विज्ञान ने जो साधन दिए हैं, उनका सहारा लेकर कम-से-कम सौ से पाँच सौ मील प्रति घंटे के हिसाब से तो उड़ते चलो।
प्राचीन ऋषि की दुनिया छोटी थी, वह उसे पैदल चलकर भी पार कर सकते थे। आधुनिक मानव का संसार बहुत बड़ा, लंबा-चौड़ा हो गया है। वह कहाँ तक पैरों को घसीटता चले-वह उड़ेगा, वह उड़ रहा है !
मैं भी दूसरी बार उड़ रहा हूँ। चार्ट बताता है, बंबई से पेरिस पौने पाँच हजार मील है; फिर बीच में समुद्र हैं, पहाड़ हैं, मरुभूमि हैं, जंगल हैं। ऋषियों का वचन मानकर पैदल चला जाता तो कितने दिन लग जाते ! किंतु यह टाइम-टेबुल बताता है, अभी दोपहर को 1.40 बजे हम चल रहे हैं, कल सुबह-सुबह ठीक आठ बजे पेरिस की रंगीनियों में डूबते-उतराते होंगे !
सांताक्रूज से अभी एक झमाके के साथ हमारा यह जहाज उड़ा है। ऊपर से बंबई की पूरी झलक भी नहीं लेने पाया कि यह देखिए, नीचे समुद्र लहरा रहा है और ऊपर हम उड़े जा रहे हैं।

पथ-पुस्तिका में उन स्थानों के रंगीन चित्र देख रहा हूँ, जो हमारे नीचे आएँगे-तरह-तरह के द्वीप, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के जीव-जंतु ! अपने स्वाद से जीभ को पानी-पानी कर देनेवाली समुद्री मछलियाँ, अपने मोती से हमारे गलों को जगमगानेवाली सीपियाँ, अपने आँसू की लड़ियों से मुक्ताएँ बनानेवाली जलपरियाँ। वह द्वीप जहाँ कैदियों को गले में बड़ा तख्ता पहनाकर छोड़ दिया जाता था, वह द्वीप जहाँ जल-दस्युओं के अड्डे रहते थे। कालीनों का बदंरगाह मस्कट, मार्कोपोलो की प्रसिद्ध सराय हरमुज, संसार की सबसे गरम जगह रास मसंदम, खजूरों की भूमि नज्द। जिनमें सबसे पहले मक्खन तैयार हुआ बेदुइनों के वे चलते-फिरते घर, ऊँटों के कारवाँ, अरबी घोड़ों के झुंड ! जब हम ऊपर चले जा रहे हैं तब नीचे हम क्या-क्या न छोड़ते जाएँगे। निस्संदेह हम पैदल चलते तो इन सबको देखते; किंतु इनमें से कितनों को देख पाते !
नहीं-नहीं, उड़ते चलो, उड़ते चलो ! बंबई से काहिरा, काहिरा से पेरिस-सिर्फ दो हुदक्के और हम अपने गंतव्य को पा लेंगे।
अहा ! हम उड़ते जा रहते हैं, देखते जा रहे हैं और लिखते भी जा रहे हैं-यह सुख तो एरोप्लेन पर ही मिल सकता है।
पिछली बार की तरह इस बार की यह यूरोप यात्रा भी आकस्मिक ही रही। उस दिन पटना रेडियो स्टेशन पर संगीत सभा हो रही थी। रात में, वहीं जाने के लिए मैं तैयार हो रहा था कि एक तार मिला-
‘पेरिस में होनेवाली सांस्कृतिक स्वाधीनता कांग्रेस के साहित्यिक समारोह में सम्मलित होने के निमंत्रण पर क्या विचार कर सकोगे ?’
तार भेजनेवाले का नाम स्पष्ट नहीं था; किंतु स्थान का नाम बंबई स्पष्ट था। मैं सोचने लगा, यह अचानक निमंत्रण कैसा ? किससे ?

साथ में सियाराम था। मैंने उससे कहा-चलो, पेरिस चलें। पेरिस का मतलब उसने संगीत सभा समझ लिया। कोई बुरा तो नहीं समझा ! उसने ‘हाँ’ भर दी। मैं रेडियो स्टेशन की ओर तेजी से जा रहा था और दिमाग में आप-ही-आप ताना-बाना बुन रहा था।
चुनाव के बाद की थकान थी, कुछ अधूरे काम थे। सोचा था, कुछ दिनों घर पर ही रहकर उन कामों को पूरा कर लूँगा। पेरिस जाऊँ तो फिर वही दौड़-धूप; फिर काम अधूरे-के-अधूरे रह जाएँगे।
रेडियो स्टेशन पर एक-दो मित्रों को वह तार दिखलाया, फिर उसे जेब में रख दिया, सो तीन दिनों तक वह वहीं पड़ा रहा। मेरा मन असमंजस में था। किंतु धीरे-धीरे मित्रों को इसकी खबर होती जाती थी उन सबका आग्रह कि जरूर जाओ।
अंततः प्यारे गंगा ने सारे तर्क-वितर्क को शांत कर दिया-नहीं, तुम्हें जाना ही चाहिए। ये काम दो महीने बाद भी हो जाएँगे। और यूरोप की आबहवा में थकान भी भूल जाएगी।
और, प्रोफेसर कपिल ने अपने ही हाथों स्वीकृति का तार भाई मसानी के पास भेज दिया। तार के प्रेषक वही थे-दूसरे दिन, दिन की रोशनी में स्पष्ट हो गया था।
उधर मसानी के तार पर तार आने लगे, इधर बेमन की तैयारियाँ भी होने लगीं। किंतु बीच में एक ऐसा भी अवसर आया कि मैंने तय किया, अब जाना रोक ही देना है। किंतु फिर मित्रों ने कहा-जाइए ही, यहाँ हम सब सम्हाल लेंगे।
और, आज जा रहा हूँ। किंतु इन झंझटों का यह असर कि जा रहा हूँ, पर मेरे पास मेडिकल सर्टिफिकेट भी अधूरे ही हैं। कभी-कभी चिंता होती है, न जाने इसके चलते क्या हो ! किंतु चलते समय एयर इंडिया के मि. दस्तूर ने विश्वास दिलाया-चिंता न कीजिए, सब ठीक रहेगा।

हाँ, इस बार एयर इंडिया इंटरनेशनल के प्लेन पर जा रहा हूँ-अपने देश के प्लेन पर ! पिछली बार बी.ओ.ए.सी. के प्लेन पर गया था। प्लेन का रंग-रूप तो एक ही है; किंतु निस्संदेह ही इसके भीतर भारतीय वातावरण लगता है।
यह हमारे सामने के थैले में जो पंखा है, उसपर एक नृत्यशील भारतीय लड़की का चित्र है। भारतीय कला इससे छलकी पड़ती है। जो बैग हमें छोटे सामानों को रखने के लिए मिला है, उसपर भारतीय पग्गड़धारी चपरासी का -चित्र है, जो हमें सलाम करता-सा दीखता है। जो होस्टेस अभी रुई और पिपरमिंट की पुड़िया दे गई है वह एक पारसी लड़की है।
प्लेन में अधिकांश यात्री भारतीय हैं। कैसा संयोग, इसी प्लेन से पेरिस के भारतीय राजदूत मि. मल्लिक भी जा रहे हैं-दाढ़ी और पगड़ीवाले बूढ़े सज्जन !
यह कल्पना करके बार-बार पुलक होती है कि हम एक भारतीय हवाई जहाज बनाना कब तक शुरू करेंगे ? वह भी होकर रहेगा, शीघ्र ही होना चाहिए।
उड़ा जा रहा हूँ, किंतु अजीब सूना-सूना लग रहा है; यद्यपि पिछली बार की अपेक्षा इस बार की यात्रा निस्संदेह ही महत्त्वपूर्ण है। इस कांग्रेस की ओर से इस साहित्य समारोह के अतिरिक्त बीसवीं सदी के सर्वोत्तम कलाकृतियों का प्रदर्शन भी होने जा रहा है। एक साथ, एक ही जगह, यूरोप के संगीत, नृत्य, कला व साहित्य-सबकी बानगी देखने-सुनने का सुअवसर प्राप्त होगा।
इस बार के साथी भी अच्छे मिले हैं। मित्रवर मसानी के पिता सर रुस्तम मसानी हमारे दल के नेता हैं। सर रुस्तम बंबई के प्रसिद्ध शिक्षाप्रेमी ही नहीं हैं, एक उच्च कोटि के लेखक भी हैं। बंबई विश्वविद्यालय के वह वाइस चांसलर रह चुके हैं और उनकी लिखी दादा भाई नौरोजी की जीवनी उत्कृष्ट कोटि की जीवनी मानी जाती है। उनकी कुछ रचनाओं का अनुवाद फ्रेंच में भी हो चुका है।

अभी आए थे, मेरी बगल में बैठे और बड़े प्रेम से बातें कीं; जैसे कोई पिता अपने बच्चे की मिजाजपुरसी कर रहा हो।
पी.वाई. देशपांडे मेरे पुराने परिचितों में से हैं। जब सोशलिस्ट पार्टी का जन्म हुआ, वह भी शामिल थे। मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक, ‘नागपुर टाइम्स’ के संचालकों में। वह भी आकर इस बार की यूरोप यात्रा के खाके के बारे में बातें कर गए हैं। वह पहली ही बार यूरोप जा रहे हैं।
चौथे-पाँचवें सज्जन हैं फिलिप स्प्रैट और का.ना. सुब्रह्मण्यम् । फिलिप स्प्रैट-सुप्रसिद्ध ‘मेरठ षड्यंत्र’ के अभियुक्त। अँगरेज हैं, किंतु अब भारत को ही घर बना लिया है। एक भारतीय महिला से शादी की है। मैसूर से ‘मिस इंडिया’ नामक पत्रिका निकालते हैं। शांत चेहरा, मौन स्वभाव ! सुब्रह्मण्यम् मद्रासी हैं, तेलुगु के नामी लेखक, धड़ल्ले से बोले जा रहे हैं।
और मेरे सामने हैं मेरे दो आत्मीय-शिवाजी और उनकी पत्नी शीला। जब मुझे निमंत्रण मिला, शिवाजी ने भी साथ देने की इच्छा प्रकट की। मैंने मसानी को लिखा और वह भी प्रतिनिधि की हैसियत से जा रहे हैं। उनकी पत्नी शीला ने उनका साथ देकर बिलकुल घरेलू वातावरण बना दिया है।
प्लेन उड़ा जा रहा है। हम संध्या को चले हैं। नीचे समुद्र लहरा रहा है, ऊपर हम आगे बढ़े जा रहे हैं-अपनी मातृभूमि से दूर ! कितनी दूर ? अभी कप्तान का सूचना-पत्रक नहीं मिला है।
बंबई में दो दिन रहा, वहाँ के मित्रों के चेहरे और स्वागत-सत्कार के दृश्य आँखों के सामने घूम रहे हैं।

बंबई स्टेशन पर उतरतर जब बाहर हो रहा था, इस कांग्रेस की भारतीय शाखा के श्री बरखेदकर मिले। उन्होंने मेरी कोटवाली तसवीर देखी थी, अतः हिलकिचा रहे थे; किंतु मेरे मोटे चश्मे ने उनकी झिझक दूर की। उन्होंने मसानी को सलाम कहा; किंतु मैं तो पहले से ही तय कर चुका था, मैं पृथ्वीराजजी के साथ ठहरूँगा। अतः बरखेदकर से दुआ-सलाम कर सीधे पृथ्वीवाले के यहाँ माटूँगा जा पहुँचा।
पृथ्वीराजजी, उनकी धर्मपत्नी रमाजी, बेटे शमी और शशि और बेटी उमी के स्नेह से अब भी अभिभूत हो रहा हूँ। शमी ने अपने स्वाभाविक नाटकीय ढंग से कहा था-चाचाजी, वहाँ एक चपरासी भी लेते चलिए।
जब मसानी से उनके दफ्तर में मिला, हिंदी में ही बातें शुरू हुईं। हम लोग सदा हिंदी में ही बातें करते आए हैं, तब भी जब वह मुश्किल से हिंदी में बोल सकते थे।
हमारी विदाई के लिए जो समारोह हुआ था, उसमें अशोक और पुरुषोत्तम आए थे। पुरुषोत्तम ने उलहना दिया-मेरे यहाँ नहीं ठहरे ! और अशोक के सिर पर पूरी बंबई पार्टी की जिम्मेवारी; तो भी मेरे ही कारण वहाँ आए थे, ऐसा उन्होंने स्नेह से कहा।

देवेंद्र मेरे साथ गया था, पीछे वीरेंद्र भी आ गए थे। शीला को पहुँचाने बालाजी आए थे। शिशिर आजकल बंबई में ही हैं, कल से ही साथ में लगे हैं। देवघर का इंद्रनारायण सम्मेलन में काम करता था; अखबारों में आज भोर को मेरे जाने की सूचना पढ़ी थी। वह अपने साथ एक सज्जन को लेते आया था। उन्हीं सज्जन श्री मुकुंद गोस्वामी के मगही पान के बीड़े चाभता उड़ा जा रहा हूँ।
किंतु, यह पान कब तक चलेगा, कहाँ तक चलेगा ? ज्यादा-से-ज्यादा काहिरा तक। तो क्यों नहीं सिगरेट शुरू कर दूँ। पिछले छह-सात महीनों से सिगरेट छोड़ रखा था-और पान पर ही काटे जा रहा था। किंतु यूरोप में पान कहाँ ! अतः बंबई में ही दो टिन सिगरेट के खरीद लिये थे।
किंतु, यह क्या ? सिगरेट जलाता हूँ तो मुँह में अजीब स्वाद लगता है ! कुछ मजा नहीं आ रहा है। लेकिन आएगा, आएगा ! पुरानी चीज भी नया अभ्यास खोजती है न !
अंधकार फैल रहा है। प्लेन की बत्तियाँ जल रही हैं। एयर होस्टेस खाने के लिए हर सीट के सामने सँकरा टेबुल सजा रही है। चलो बेनीपुरी, हाथ-मुँह धोओ, खाओ-पीओ और सोओ। बहुत थके हो ! पेरिस घूँघट हटाए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही होगी; फिर वहाँ विश्राम कहाँ ! हाँ, श्रांति और क्लांति भी नहीं होगी वहाँ; किंतु उस रास-हास के लिए भी तो शक्ति-संचय आवश्यक है।

:2:
यह प्रभात: यह पेरिस

 


11.5.’52-(क) प्लेन पर
अभी नींद टूटी है और प्लेन की शीशे की खिड़की से बाहर नजरें डालते ही यह क्या पा रहा हूँ !
यह सुंदर प्रभात, मनोरम प्रभात, हृदयहारी प्रभात ! उधर, दूर क्षितिज पर, सूर्योदय की लालिमा फूल रही है और इधर, हमारे प्लेन के नीचे, बादलों के ढेर हैं ! ये बादल, भूरे बादल, एक पर एक लदे बादल रुई के समुद्र-से लग रहे। और,यह लालिमा क्षण-क्षण, पल-पल रंग बदल रही है ! क्या कोई कैमरा भी उसके इस परिवर्तनशील सौंदर्य को पकड़ सकता है-फिर कलम क्या करे ?
वह सामने बैठी लड़की अपना कैमरा सम्हाल रही है। कलम, तू भी चलती चल !
क्षितिज का रंग बदलता जाता है। जहाँ पहले उसमें लालिमा-ही-लालिमा थी-तुरत ब्याही गई लड़की की चूनर-सी दिपती हुई, बेदाग-वहाँ अब उसमें सुनहलापन आ रहा है ! किसी गोरे गाल पर दौड़ती शरम की लाली का ठीक उलटा !
बादलों के ऊपर एक चमक सी छा रही है। जगह-जगह बादल ऐसे उठे हैं कि वे पहाड़ की चोटियों-से लगते हैं। उन चोटियों की चोटियों पर चमक की हलकी लकीरें खिंच रही हैं।
बाईं और की खिड़की से देखता हूँ, चाँद औंधे मुँह लटका है। बादल उस ओर भी हैं, किंतु निष्प्रभ, निस्पंद। जीवन सूरज में है, चाँद तो सुलाना ही जानता है !

और, इतनी ही देर में, इधर, यह क्या हो गया ? सूरज देवता ने अपनी ज्योति-निर्झरी का जैसे ढक्कन खोल दिया हो ! मालूम होता है, असंख्य किरण-धाराएँ एक ही साथ फूल निकलीं ! चारों ओर चकमक, झलमल ! चारों ओर जैसे सोने का पानी फिर रहा है।
अब क्षितिज की छवि अद्भुद हो गई है। बादलों के पहाड़ के पीछे से यह सूरज देवता ने झाँका, फिर मुसकरा पड़े। भूरे बादलों की किनारी अब सुनहली चमकीली है, नीचे के बादल सपाट मैदान-से लग रहे हैं। ज्यों-ज्यों उजाला बढ़ता जाता है, उनका भूरा रंग दूर हो जाता है-देखिए, वे अब मक्खन-से लग रहे हैं, श्वेत, स्निग्ध ! भूखे नयन उन्हें देखकर अघा नहीं रहे।
यह लड़की कैसी चंचल हो रही है। क्या इसने मान लिया है कि कैमरा काम नहीं कर सकता ? कमबख्त, उन्हें नयनों में ही भर ले।

सूरज का पूरा गोला अब सामने है-चमकता, सुनहला गोला। सोने के थाल में कंचन का शालिग्राम ! बादलों की सुनहरी किनारी दिप रही है। बादलों के गाले में भी चमक है। अरे, सूरज की किरणें शीशे की खिड़की को छेदकर हमारे प्लेन के अंदर भी आ घुसीं-सारा प्लेन भक-सा बल उठा जैसे। अब सबकी आँखें सामने की खिड़कियों की ओर हैं।
लड़की की चंचलता बढ़ती जाती है। वह रह-रहकर अपने अलक जालों से मेरे सामने की खिड़की को ढक देती है।
सूरज ऊपर उठता जाता है, उसका तेज बढ़ता जाता है। वह लड़की हट गई है। अब यहाँ से वहाँ तक निर्द्वंद्व देख सकता हूँ; किंतु...क्या देखा जाता है ? एक अजीब जगमगाहट है। कभी-कभी खिड़की का शीशा इस तरह चमक उठता है जैसे वह भी सूरज का कोई टुकड़ा हो। आँखें चौंधिया जाती हैं।
नीचे के बादल अब दूध के फेन-से लग रहे हैं-फेन की ही तरह वे उबलते दीखते हैं।
कहा गया था, हम पेरिस छह बजे पहुँचेंगे। मेरी घड़ी में दस बज रहे हैं। बंबई और पेरिस के समय में लगभग पाँच घंटे का अंतर होना चाहिए। क्या अब हम पेरिस के निकट आ गए हैं ?

हम कहाँ हैं ? बंबई छोड़ी तो फिर काहिरा के ही दर्शन हुए। ऊँघते हुए हम प्लेन से नीचे आए थे। उन्मुक्त हवा के झोंकों ने हमें ठंडक दी थी। हवाई अड्डे के होटल में एक प्याली काफी पीकर हमने कुछ देर के लिए नींद दूर की थी। हबशी नौकरों के आबनूसी रंग और मोटे होंठों ने भी इसमें सहायता की थी। पासपोर्ट आदि की रस्सों के बाद फिर प्लेन में। रात-रात में न जाने कितने मैदान, समुद्र और पहाड़ हमने पार किए। बादलों के नीचे अब निश्चय ही फ्रांस की भूमि होगी।
फ्रांस की भूमि ! रुमानियों की भूमि, सैलानियों की भूमि ! तुम कहाँ हो ? जरा नीचे देखें-
अहा, फिर नयनाभिराम दृश्य। सूरज देवता काफी ऊपर उठ चुके हैं और उन्होंने सारे बादलों को विचित्र ढंग से चमका दिया है। ये बादल स्वयं ज्योति-पुंज बन रहे हों जैसे। चारों ओर चमक-ही-चमक। जो कभी काले थे, भूरे हुए, सुनहले बने, अब वे उजले-उजले हैं। स्वयं उजले हैं, उजलापन बिखेर रहे हैं।
एक धचके का अहसास। हमारा प्लेन नीचे उतर रहा है क्या ? सामने प्लेन की पट्टी पर वह चमक उठा-फासेन सीट बेल्ट ! कमर बाँधो, तैयार हो।
अरे, यह नीचे क्या है ? गहरी हरियाली में ये लाल, पीले, उजले मकान ! और वह, वह-ईफेल टावर ! हाँ, हाँ, हम पेरिस पहुँच चुके !

मन घबरा रहा है अधूरे हेल्थ सर्टिफिकेट को लेकर। किंतु यह गलत बात। जी कड़ा करो और उतरो, बेनीपुरी। देखो, पेरिस बाँहें पसारकर तुम्हारे स्वागत को खड़ी है ! वह खड़ी है, प्लेन भी नीचे उतरकर खड़ा हुआ, तुम भी उतरो।
सुंदरी होस्टेस कह रही है-बाई-बाई ! पेरिस इसी की तरह मुसकराकर कहेगी-फिर आ गए, स्वागत !

(ख) पेरिस में-
रंगीन, खूबसूरत बस पर सर-सर निकलता अब पेरिस में प्रवेश कर रहा हूँ !
एरोड्रोम पर कोई झंझट नहीं हुई। हम सम्माननीय अतिथि थे न-जरा सी गफलत के लिए क्या दंड पाता ! एयर इंडिया के पेरिस प्रतिनिधि मि. कौल अपने साथ उस लड़की के निकट ले गए। उसने हँसकर कागज पर मुँहर लगा दी।
सिर से बला टली और इधर पेरिस का सौंदर्य मन-प्राण को अभिभूत करने लगा।
हलका कुहासा छाया हुआ है। उस हलके कुहासे में सड़क के दोनों ओर के हरे-हरे पेड़ कितने सुंदर मालूम होते हैं। ये पेड़ कटे, छँटे, एक ही बल्ले पर खड़े हरे तंबू-से ! हरी-हरी पत्तियों के बीच हलके लाल रंग के फूल और गजब ढा रहे हैं।
फूलों की पँखुरियाँ सड़क पर छितराई हुई हैं, जिन्हें कुचलती हमारी बस भागी जा रही है।
यह सामने ईफेल टावर-अपने पूरे गौरव के साथ कह रहा है, तुम फिर आ गए !
और, अब सीन नदी पार कर रहा हूँ। सीन, यह छोटी सी नदी ! इसपर कितने बजड़ों ने बहारें लूटी हैं, कितनी लाशें इसकी तरंगों पर उतराई हैं !
और, यह पुल ! अलग से ही यह कहता था-हाँ, यह पेरिस है !

दोनों छोर पर दो-दो बड़े स्तंभ। स्तंभों के नीचे सुंदरतम मूर्तियाँ। हर स्तंभ के ऊपर एक-एक घोड़े की मूर्ति-घोड़े जैसे उड़ रहे हों। घोड़ों की चारों मूर्तियाँ सुनहली ! प्रातःकाल की सुनहली किरणों ने उनके सोने की चमक में कितना इजाफा कर दिया है !
और, यह सामने जो भवन है, उसका सुनहला कँगूरा ! भवन के बरामदे से लंबी-लंबी रंगीन पताकाएँ लटक रही हैं।
यह कौन स्थान है, आज कोई उत्सव है क्या ?
यह पहुँच गए एयर फ्रांस के दफ्तर में।
स्वागत समिति की ओर से एक लड़की मिली। हम होटल में ले जाए गए। जब जलपान करके बाहर निकले, पता चला, हम शाँ जलीजे में ही हैं। शाँ जलीजे-स्वर्गभूमि ! इसका यही अर्थ हमें बताया गया था। पिछली बार की यात्रा में एक रंगीन संध्या हमने यहीं बिताई थी।

ऊँची अट्टालिकाएँ दुलहन-सी सजी-सजाई रेस्तोराँ ! पेड़ों की पाँतें। लोगों में काफी उमंग ! दिन में यह समाँ ! ओहो, आज छुट्टी का दिन है, और पेरिस अपनी दो महान संतानों की जयंती मना रही है आज नेपोलियन की, जोन द आर्क की।
यह सामने नेपोलियन का विजय-तोरण। उसके नीचे जो ‘अज्ञात सैनिक’ की समाधि है, उसकी शान का आज क्या कहना। उसपर फलों के ढेर लगे हैं; स्मृति शिखा-रिमेंबरेंस फ्लेम-धधक रही है। हृदय में एक हूक उठती है-आह ! हम अपने शहीदों को याद करना कब सीखेंगे ? पटना सेक्रेटेरियट के शहीदों की याद आई-कहाँ फूल, कहाँ दीपक; अरे ! बेठिकाना उनका मजार है !
विजय तोरण पर चढ़कर उत्सवमग्न पेरिस की एक झाँकी ली। वह इनवैलिड, जहाँ नेपोलियन की हड्डी सेंट हेलना से लाकर दफनाई गई है ! पताकाएँ किस शान से लहरा रही हैं ! हाँ, थोड़ी देर पहले हम उसी के निकट से गुजरे थे न ! और वह पुल एलेक्जेंडर पुल होगा। जरा देवी जोन की मूर्ति को भी देख लें।
कुछ ऐसा उत्साह कि सामने खड़ी घोड़ागाड़ी पर चढ़कर हम उस ओर चले। पेरिस में घोड़ागाड़ी पर-अरे, हम रईसों के देश से आए हैं न !
यह कन्कर्द, यह त्विलरी। लेकिन, अभी इनके बारे में नहीं। मैं सीधे उस मूर्ति के सामने जा खड़ा हुआ-घोड़े पर सवार, नंगी तलवार लिये वह मूर्ति-देवी जोन की मूर्ति। सोने की मूर्ति जिसके चारों ओर फूलों के ढेर लगे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनापति उसके चरणों में अपनी-अपनी मालाएँ अर्पित कर गए हैं और पेरिस के दस हजार नौजवानों ने अभी-अभी उसके निकट श्रद्धांजलि अर्पित की है।
चारों ओर लोगों की भीड़। भीड़ को कतरियाते किसी तरह मूर्ति के निकट पहुँचा और बार-बार उस ग्रामीण बालिका को प्रणाम किया, जो देश के लिए लड़ी और अंत में जिंदा जला दी गई।
धन्य जोन ! धन्य पेरिस ! धन्य मैं, जो इस शुभ दिन को ही यहाँ पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त कर पाया।



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