पार्थ - युगेश्वर Parth - Hindi book by - Yugeshwar
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पार्थ

युगेश्वर

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2627
आईएसबीएन :81-8582764-8

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श्रीकृष्ण और अर्जुन पर आधारित उपन्यास....

Parth

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महाभारत के विशाल फलक को समेटे ‘पार्थ’ एक पुरा कथा है। श्री कृष्ण जय और अर्जुन विजय हैं। इसी आधार पर महाभारत का मूल नाम जय कथा है। पृथा (कुंती) और इंद्र से उत्पन्न अर्जुन पार्थ हैं।

अर्जुन आचार्य द्रोण का प्रधान और प्रिय शिष्य है। युग का महान योद्धा है। गुरुदेव द्रोण द्वारा ली गई अनेक परीक्षाओं में प्रथम स्थान पाने वाले अर्जुन के लिए ही आचार्य ने एकलव्य का अँगूठा माँगा था। किंतु अपने लिए युद्ध में अर्जुन से मृत्यु माँगी थी। भविष्य ने युग के महान योद्धा को एक वर्ष नपुंसक बनाया था।

द्रौपदी को अर्जुन ने जीता था; किंतु वह पाँचों भाईयों की पत्नी बनी। बड़े भाई युधिष्ठिर के साथ द्रोपदी का एकांत देखने के दंडस्वरूप अर्जुन को वनवास भोगना पड़ा था। किंतु इस वनवास से राष्ट्रीय एकता के महान तत्त्वों का संग्रह हुआ।
महाभारत में अर्जुन का मुख्य प्रतिद्वन्दी कर्ण है। अर्जुन कर्ण पर सदा बीस रहा। फिर भी कर्णवध नीत्योल्लंघन से ही संम्भव हो सका। अर्जुन जितना वीर है, उतना ही गुरुजनों का भक्त भी। अनुजों को प्यार करने वाला भी। कृष्ण का तो यह एक साथ ही शिष्य, सखा, संबंधी है। युद्ध में अर्जुन के मुख्य तीन ही सहायक हैं-श्रीकृष्ण, हनुमान और शिव। सब कुछ होने के बावजूद अर्जुन कृष्ण कर्म का निमित्त मात्र है।

पुराण पुरा हैं। ण नया हैं। सनातन हैं। यहाँ पार्थ-कथा भी जितनी पुरानी है, उतनी ही नई है।  
गंभीरता और रोचकता दोनों के संगम वाला यह उपन्यास अत्यंत आकर्षक है।

1

स्नान भी एक विश्राम है। शरीर धोने का अर्थ है, देह और मन पर जमे मैल को धो देना; जल-प्रवाह में रगड़कर बहा देना।
अर्जुन ने यही किया। यात्रा की थकान मिटाने के लिए जल में प्रविष्ट हुए। बड़ी देर तक देह मल-मलकर स्नान करते रहे। इतना स्नान किया कि उन्हें धीरे-धीरे शीतलता की अनुभूति होने लगी।
उन्होंने पानी से निकलने का निश्चय किया। किंतु यह क्या ? फिर वही बात। क्या हरिद्वार की घटना पुनः दुहरानी होगी ?
किंतु नहीं। यह हरिद्वार नहीं है। यह तो है दक्षिण का सौभद्र तीर्थ। यहाँ पाँच तीर्थ हैं-अगस्त्य तीर्थ, सौभद्र तीर्थ, पौलोम तीर्थ, कारंधम तीर्थ, और भारद्वाज तीर्थ।

इन तीर्थों को देख अर्जुन को आश्चर्य हुआ था। तीर्थों की ऐसी अनुभूति अर्जुन के लिए प्रथम थी। ये सभी मुनियों से शून्य थे। कोई मुनि यहाँ नहीं आता था। आना तो दूर, मुनियों ने अर्जुन को भी इन तीर्थों में जाने से मना कर दिया था।
मना करने का कारण था-इन तीर्थों में पाँच भयानक मगर रहते हैं। उन्होंने इन तीर्थों को घेर लिया है। उनके भय से कोई भी व्यक्ति इनके सेवन का साहस नहीं करता है।
किंतु अर्जुन को मुनियों का मना करना कायरता लगी। अर्जुन कायर नहीं हैं। वे मगर से अधिक शक्तिशाली हैं। वे मगरों को पानी में ही मार डालेंगे।

किंतु यह निश्चय तो हो कि मगर ही रहते हैं। कहीं हरिद्वार जैसी स्थिति न हो। मगर से कठिन है, नारी का बंधन। पैर पकड़े नारी से अपने को छुड़ा लेना किसी भी पुरुष के लिए कठिन है। हरिद्वार में यही हुआ था। एक नारी ने उनके पैर पकड़ लिये थे।
अर्जुन को बोध हो गया। यह बंधन स्त्री का नहीं है। इसकी कठोरता बताती है कि यह मगर या कोई दूसरा जलजंतु है। कोई मछली भी हो सकती है।

अर्जुन ने जोर का झटका दिया। पैर जलजंतु की पकड़ से छूटता-सा लगा। किंतु तुरंत पुनः कस गया।
अर्जुन परेशान होने लगे। उन्हें पानी से निकलने की जल्दी भी थी। अभी आगे भी जाना है। पाँचों तीर्थों में स्नान भी करना है। यह भी एक भिन्न अनुभव होगा-जहाँ कोई नहीं जाता है, वहाँ अर्जुन गए। इन तीर्थों में बिखरे शून्य का आनंद लिया। किंतु शून्य में लहराते जलजंतु यों ही भयंकर लगते हैं। मनुष्य तो क्या, पशु भी यहाँ आने से भय खाते हैं।
अर्जुन को ऋषियों की बात याद है। उन्होंने इन तीर्थों में स्नान के लिए मना किया था किंतु अर्जुन केवल अधर्म से डरते हैं, असत्य से डरते हैं। अन्य किसी से डरना उनका स्वभाव नहीं।
उधर अर्जुन और जलजंतु में द्वंद्व मचा था।

अर्जुन अपना पैर आगे खींचते, जलजंतु उन्हें पीछे ले जाता। पानी की शक्ति भी दूसरी होती है। पानी का छोटा जीव भी बाहर के मनुष्य से बलवान् होता है। बड़े-से-बड़े योद्धा पानी में परास्त हो जाते हैं। एक बार एक ग्राह ने हाथी को पकड़ लिया। पानी के बाहर हाथी के सामने ग्राह की कोई शक्ति नहीं थी। किंतु पानी में ग्राह ने हाथी को लाचार कर दिया। लाख कोशिश करने पर भी हाथी नहीं छूटा। उसे लगा कि ग्राह उसे गहरे पानी में खींच ले जाएगा। जैसे-जैसे हाथी प्रवाह की गहराई में खिंचा जा रहा था, वैसे-वैसे हाथी कमजोर और ग्राह शक्तिशाली हो रहा था। हाथी पानी में तैर तो लेता है, किंतु अत्यंत गहरे में उसकी भी साँस उखड़ने लगती है। सूखे का पहलवान पानी में एक छोटे से ग्राह से हार गया। अब तो हाथी के प्राणों पर आ बनी।

वही हुआ, जो सामान्यतः होता है। संकट में मनुष्य भगवान् पुकारता है, क्योंकि प्रत्येक जीव के सबसे अधिक निकट भगवान् हैं; केवल भगवान् हैं। मनुष्य क्योंकि भगवान का अंश है, इसीलिए संकट आते ही वह भगवान् को पुकारता है। जैसे संकट में फँसा बालक माँ को पुकारता है; क्योंकि बालक माता का अंश है। संकट में अपनी अपूर्णता और माता-पिता की पूर्णता का, शक्ति का बोध होता है। इसी से वह अपनी पूर्ण शक्ति से प्रार्थना करता है। उसे यह भी विश्वास होता है कि माता-पिता दयालु हैं, उसकी अवश्य रक्षा करेंगे। छुटकारे के लिए हाथी ने पूरी शक्ति लगा दी। अंतिम और अनादि शक्ति भगवान को पुकारा।
भगवान् ने हाथी की सहायता की।
हाथी ग्राह के चंगुल से छूट गया।
अर्जुन को पूरा विश्वास था, वे भी छूटेंगे।

किंतु उनकी अनुभूति सामान्य से भिन्न थी- जलजंतु की पकड़ में जितनी शक्ति है, उतनी ही कोमलता भी। उन्हें फिर याद आया। यह कोमलता प्रायः वैसी ही है, जैसी हरिद्वार के गंगाजल में थी। किंतु दाँतों और नखों के चिन्ह भी स्पष्ट हैं। हरिद्वार में उनके पैर हाथ से बँधे थे। यहाँ हाथ नहीं, दाँत और नख हैं।
कोमलता इस अर्थ में कि इन दाँतों और नखों के भारी दबाव से अर्जुन को रक्तरंजित हो जाना चाहिए था। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। पीड़ा के स्थान पर अर्जुन एक कोमल स्पर्श की अनुभूति कर रहे हैं।
आचार्य द्रोण को भी एक ग्राह ने पकड़ा था। वे पीड़ा से छटपटाने लगे थे। उन्होंने सहायता के लिए अपने शिष्यों को पुकारा।

कोई भी शिष्य भयवश पानी में जाने का साहस नहीं कर सका। जाने क्या है ? कौन-सा जानवर है ? योद्धा द्रोण को बेबस कर देनेवाला जंतु कितना भयानक होगा ! आचार्य के सारे शिष्य किंकर्तव्यविमूढ नदी के किनारे खड़े ग्राहलीला देख रहे थे।
देखते-ही-देखते आचार्य मूर्छित होने लगे। लगा, वे पानी में ही गिर जाएँगे। उनकी आर्तवाणी धीरे-धीरे बैठ रही थी। दूसरी ओर नदी का पानी लाल हो रहा था। यह और कुछ नहीं, आचार्य के शरीर का रक्त था। जलजंतु आचार्य के पैरों को खाने लगा था।

आचार्य पीड़ा से छटपटा रहे थे।
अर्जुन आचार्य के सबसे प्रिय शिष्य थे। उनसे आचार्य की पीड़ा देखी नहीं गई। किंतु करें क्या ?
अर्जुन पानी में कूद गए। उन्होंने आचार्य को जोर से पकड़ लिया। मन में निश्चय किया, ग्राह पकडे़गा तो आचार्य के साथ ही मैं भी प्राण दे दूँगा।
अर्जुन ने जोर लगाकर आचार्य को खींचा। वे ऐसे मुक्त हो गए जैसे हुआ ही नहीं था।
सचमुच में कुछ हुआ ही नहीं था। स्वयं आचार्य ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने का यह उपक्रम किया था। इस परीक्षा में अर्जुन को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। अन्य सारे शिष्य बुरी तरह विफल हो रहे।
आचार्य द्रोण ने अर्जुन को गले लगाकर उनका सिर सूँघा। आशीर्वाद दिया- मैं अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर देखना चाहता हूँ। मेरी विद्या में ऐसा कुछ नहीं है, जो मैं अर्जुन को न दूँ। प्रत्येक गुरु एक कला अपने लिए बचाकर रखता है। आचार्य द्रोण यह नहीं करेंगे। वे अपनी संपूर्ण विद्या-कला अर्जुन को देंगे-योग्य शिष्य को योग्यदान।
समर्पित शिष्य ही गुरु-ज्ञान का अधिकारी है। जैसे योग्य शिष्य में गुरु से ज्ञान-प्राप्ति की लालसा होती है, वैसे ही योग्य गुरु योग्य शिष्य का संधान करता है। गुरु अपने को देना चाहता है। वह लेने योग्य पात्र खोजता है।

आचार्य द्रोण अपने भाग्य को सराहते हैं –उन्हें अर्जुन जैसा योग्य शिष्य प्राप्त हुआ है।
उस दिन अर्जुन निस्सीम प्रसन्नता में थे। आचार्य  ने उन्हें संसार की सर्वश्रेष्ठ निधी दी थी। गुरु का कृपापात्र होना किसी भी शिष्य के लिए अत्यंत गौरव की बात है। अरे, ओ कौरवों ! देखो, अर्जुन को देखो। विश्वप्रसिद्ध योद्धा, गुरु आचार्य द्रोण के आशीर्वाद पर ध्यान दो। मन से दिया गया सिद्ध गुरु का आशीर्वाद फलीभूत होता है फलता है। अर्जुन यों ही कम न था अब आचार्य की कृपा भी। आशीर्वाद भी।
अर्जुन के कानों में आचार्य के वाक्य गूँज रहे थे। आचार्य ने कहा था-‘‘मैं अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर देखना चाहता हूँ।’’

गुरु शिष्य में शक्तिपात करता है। शिष्य की सुप्त शक्ति का जागरण करता है। कोई भी शक्ति बाहर से नहीं आती है। सबके भीतर अंतरंग के निभृत में विश्वव्यापी विजयिनी शक्ति स्थित है। प्रमादवश हम उसकी उपेक्षा करते हैं। कृपालु गुरु शिष्य के भीतर की उस विजयिनी शक्ति को जगा देता है। शिष्य की शक्ति से अपनी शक्ति का अद्वैत कर उसे वृहत् करता है। स्वयं भी वृहत्तर हो जाता है।
अर्जुन की आँखों में आचार्य द्रोण की मूर्ति साकार हो उठी। उन्हें लगा कि आचार्य सागर के किनारे खड़े हैं। उन्हें ललकार रहे हैं। मेरे प्रिय शिष्य अर्जुन, यह क्या ? क्या मेरी शिक्षा का यही फलितार्थ है-? एक सामान जलजंतु के सामने अशक्त हो गए ? अभी तो  तुम्हें जाने कितने युद्घ करने हैं। कितने ही ग्राहों का वध करना है। यह तो तुम्हारी सामान्य परीक्षा है।

अर्जुन और देखने सुनने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने मन-ही-मन आचार्य गुरु को प्रणाम किया।
जोर की छलांग लगाई।
अब अर्जुन जल से बाहर थे।
उनके जल से बाहर आते ही एक स्त्री उनके पैर से छिटककर दूर जा गिरी। स्त्री को देख अर्जुन को आश्चर्य हुआ। पूर्वानुमान भी कुछ-कुछ सच निकला।
सहानुभूति के स्वर में पूछा, ‘‘क्षमा करना देवी ! मेरा अनुमान असत्य निकला। मैं समझ रहा था, किसी ग्राह ने मुझे पकड़ रखा है। आपको चोट तो नहीं लगी ?’’
स्त्री ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा, ‘‘चोट ? कैसी चोट, मेरे देवता ? आपके द्वारा क्षत होने के लिए ही तो इतने दिनों से तपस्या कर रही थी। अर्जुन जैसे पुरुष द्वारा क्षत होना किसी भी स्त्री का सौभाग्य है।’’
 
अर्जुन को स्त्री की बातें रहस्यात्मक लगीं। यह स्त्री क्या मेरे लिए तपस्या कर रही थी ? तो क्या यह अब मुझे पकडे़गी ? कोई जलपरी तो नहीं है ? सुना है, आकाश के समान समुद्र में भी परियाँ होती हैं। वे परियाँ अनजान मनुष्य को पकड़कर जल में रख लेती हैं। इन परियों के मोह में फँसा व्यक्ति कभी जल से बाहर नहीं आ पाता है।
ये जलपरियाँ भयानक कामासक्त हैं। काम के अतिरिक्त वे और कुछ जानती ही नहीं। वे धृत पुरुष से भी वैसे ही काम की आशा करती हैं।

परी मंत्रमुग्ध भाव से अर्जुन को देख रही थी।
अर्जुन ने कहा, ‘‘अब तुम जा सकती हो, देवि ! मेरी ओर देखना बंद कर दो। कोई भी जलपरी मुझे कामासक्त नहीं कर सकती है। मैं जलपरियों के प्रलोभन में आने वाला नहीं हूँ।’’
स्त्री ने अपना मुख ऊपर उठाकर कहा, ‘‘भ्रम न करें, देव ! जलपरी और अप्सरा में अतंर होता है। जलपरी माया है, कल्पना है। अप्सरा सत्य है जलपरी नहीं, अप्सरा हूँ। मेरा नाम वर्गा है।
‘‘मैं आपको जानती हूँ। आपके नव विवाहों से भी परिचित हूँ । आपकी प्रिय पत्नी उलूपी मेरी सखी है। उस दिन जब उसने आपका पैर पकड़ा था, मैं वहीं थी। बड़ा अद्भुद दृश्य था !

‘‘उलूपी आपको पकड़े थी और आप अपने को छुड़ा रहे थे। मैं प्रसन्न थी। जानती थी, जल में पौरुष पराजित हो जाता है। आप उलूपी से पराजित हो गए। आप ही क्यों, कोई भी पुरुष, यहाँ तक कि साक्षात् परमात्मा भी चरण पकड़े हुए स्त्री से पराजित हो जाता  है। इसी समुद्र के और गहरे में जाइए। आपको महालक्ष्मी का निवास दीखेगा। वे भगवान विष्णु के पैर दबा रही होंगी। शेष की शय्या पर लेटे विष्णु  उठने का नाम नहीं लेते। बिना किसी भय के निर्भय सोते हैं। सच तो यह है कि लक्ष्मी को विष्णु के पैर दबाते देख विष भी पता नहीं है कहाँ चला गया है !’’

अर्जुन ने अप्सरा को बीच में रोका, ‘‘रुको देवि ! उलूपी के व्याज से तुम जो जानती हो, मैं समझ गया हूँ। इतना अबोध नहीं हूँ। तुम जिस प्रकार मेरे ऊपर दृष्टि-निक्षेप कर रही हो, वह मेरे लिए अज्ञात नहीं है। स्त्री की दृष्टि में तुम पता नहीं कौन-सा जल होता है ? उसी जल से वह पुरुष को बाँध लेती है। तुम चाहो तो उसे जल-रश्मियाँ कहो। पुरुष की देह ही नहीं, मन भी उन रश्मियों से बँध जाता है। तुम स्वयं कह चुकी हो, तुम अप्सरा हो। भूलो मत। उलूपी तुम्हारी सखी अवश्य है, किंतु वह अप्सरा नहीं है।’’

वर्गा ने अर्जुन को बीच में ही रोककर कहा, ‘‘अप्सरा नहीं हुई तो क्या, है तो स्त्री ही। स्त्री चाहे कोई भी हो, कैसी भी हो, कैसी ही क्यों न हो, क्या, क्या वह स्त्री से भिन्न होगी ? भिन्नता का भाव पुरुष में होता है। वह वर्ण, वर्ग और जाति देखता है। स्त्री तो केवल स्त्री देखती है। इसी प्रकार वह पुरुष को केवल पुरुष देखती है। किंतु इस समय तो हमारी समस्याएँ  दूसरी हैं। मेरी....’’
अर्जुन अब ऊब रहे थे। वे अधिक बोलने की स्थिति में नहीं थे, भय था स्त्री की माया को जानते थे। कहीं वर्गा उन्हें अपनी माया में पाशबद्ध न कर ले ! उन्होंने वर्गा से कहा, ‘‘रुको देवि, अपनी सखी की बात तुम पूरी तरह नहीं जानतीं। तुम वहाँ शायद नहीं पहुँच सकीं, जहाँ मेरा उलूपी से संग हुआ था। उलूपी ने मुझे हरिद्वार की गंगा में पकड़ा था। उस समय कामोत्तेजना से उसकी मानसिक स्थति ठीक नहीं थी। मैंने देखा, मैं उसे अस्वीकार कर भारी अपराध करूँगा। मेरी अस्वीकृति पा, वह प्राण दे देगी।
 
‘‘मैं बड़ी दुविधा में था। एक तरफ थी मेरी प्रतिज्ञा, दूसरी ओर थे उलूपी के प्राण। तुम्हें ज्ञात होगा, मैं हरिद्वार क्यों गया था ? यहाँ दक्षिणी समुद्र में क्यों आया हूँ ? यह यात्रा मेरी स्वेच्छा नहीं, प्रतिज्ञावश है। तुम्हें यह भी ज्ञात होगा कि हम लोग पाँच भाई हैं।  पाँचों पांडु के पुत्र होने के कारण पांडव कहलाते हैं पांचाली हम पाँचों भाइयों की सम्मिलित पत्नी है। पांचाली को पाँचों भाइयों की पत्नी बनाते समय अनुबंध हुआ था कि पांचाली क्रम से एक-एक वर्ष हम पाँचों भाइयों की पत्नी रहेगी। इस क्रम का कभी उल्लंघन नहीं होगा। एक वर्ष के बीच कोई दूसरा भाई जो क्रम में नहीं है, पांचाली और क्रमवाले भाई के प्रकोष्ठ में प्रवेश नहीं होगा, बारह वर्षों का वनवास। यह वनवास पूर्ण ब्रह्मचर्य का होगा। अंतिम बात,  ब्रह्मचर्यवाली बात अनुबंध का अंश न थी। यह हमारा मानस-संकल्प था।
‘‘तुम पूछ सकती हो, यह बात अनुबंध का अंश क्यों नहीं थी ? इसका उत्तर स्पष्ट है। इस अनुबंध से हमारी यात्राएँ निरापद होतीं, इसमें संदेह है। एक उदाहरण लो।

‘‘वारणावत के लाक्षागृह से निकलकर हम पाँचो भाई माता कुंती के साथ वन-वन भटक रहे थे। एक दिन देवी हिडिंबा ने भैया भीमसेन को पक़ड़ लिया। हिडिंबा राक्षसराज हिडिंब की प्रिय भगिनी हैं। देवी हिडिंबा ने हम लोगों को राक्षसराज हिडिंब का भय दिखाया।  किंतु भय का कोई प्रश्न हमारे सामने न था। पांडुपुत्र काल का भी सामना करने की क्षमता रखते हैं। हिडिंब को हम क्या समझते ! उधर देवी हिडिंबा प्रार्थना भी कर रही थीं और स्त्रीयोचित हाव-भाव भी व्यक्त कर रही थीं। बात माता कुंती के पास पहुँची। तुम जानती हो, मेरे पिता बहुत पहले ही स्वर्गवासी हो गए थे। पिता की अनुपस्थिति में माता कुंती ही हमारी माता होने के साथ-साथ पिता भी थीं। देवी हिडिंबा को जल्दी थी। भैया जैसा युवक उन्हें कहाँ मिलता ! भैया जितने सुंदर हैं, उतने ही स्वस्थ भी। किसी भी स्त्री को और क्या चाहिए ? किन्हीं बलिष्ठ भुजाओं में बँधना युवा स्त्री की सबसे बड़ी कामना है। हिडिंबा भी युवा थीं। भैया भीम तो जैसे चतुष्कपथ के नंदी थे।
‘‘भैया भीम ने यद्यपि देवी हिडिंबा को अस्वीकार कर दिया था, किंतु देवी हिडिंबा उनकी अस्वीकृति से आश्वास्त न थीं। स्त्री हो या पुरुष, प्रेम का आरंभ प्रायः अस्वीकृति से होता है।

‘‘माता कुंती के सामने तीन प्रश्न एक साथ खड़े हो गए-क्या किसी नारी के रत्याग्रह का पूर्णतः अस्वीकार उचित है ? रत्याग्रह में यदि केवल चंचलता न हो तो वह अत्यंत उपेक्ष्य नहीं है। एक स्त्री के नाते भी माता कुंती ने देखा, देवी हिडिंबा के रत्याग्रह में सत्याग्रह है। माँ होने के नाते उन्हें भैया भीम का भी ध्यान था-क्या कहेंगे भीम ? विशेषकर जब उनके छोटे और बड़े, दोनों ही वहाँ उपस्थित हों। तीसरा पक्ष था; देवी हिडिंबा को पूर्णतः अस्वीकार करने का परिणाम। संभव है, देवी हिडिंबा प्राण दे दें। संभव है, देवी हिडिंबा और उनका भाई हिडिंब युद्ध के लिए उद्यत हो जाएँ। यह सच है कि वे दोनों भाई-बहिन मिलकर भी पांडवों को पराजित करने में असमर्थ थे। किंतु क्या विजयवाला युद्ध सदा अच्छा ही होता है ? मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक जय-पराजय, दोनों प्रकार के युद्धों से अलग रहना चाहिए। विजित युद्ध भी एक प्रकार की पराजय है। हिडिंबा देवी का प्राण-त्याग तो युद्ध से भी दुःखद है। भीम को कहीं स्त्रीवध का दोष न लगे।
‘‘माता ने इन सारी बातों पर गंभीरता से विचार किया। बड़े भैया युधिष्ठिर की भी सलाह ली।

‘‘सबकी सहमति से माता ने भैया भीम को देवी हिडिंबा से संपर्क की अनुमति दे दी। अनुमति क्या, आदेश कहना उचित है। भैया भीम ने माता से प्रार्थना तो की नहीं थी। वे बार-बार देवी हिडिंबा को अस्वीकार कर रहे थे। देवी हिडिंबा उनकी ओर से निराश हो गई थीं। तभी उन्हें माता से प्रार्थना करनी पड़ी।
‘‘किंतु माता कुंती ने एक शर्त लगा दी। उन्होंने देवी हिडिंबा को आदेश दिया, ‘‘देखो हिडिंबे, मैं तुम्हारे ऊपर कृपाकर अपने बलवान पुत्र भीम को तुम्हें सौंपती हूँ। किंतु एक शर्त है। यह दिन-भर तुम्हारे साथ रहेगा, किंतु संध्या होते ही तुम इसे हमारे पास पहुँचा दोगी। यह क्रम तब तक चलेगा, जब तक तुम गर्भवती न हो जाओ। गर्भवती होते ही भीम तुम्हें छोड़ देगा और हम लोग दूसरे स्थान के लिए प्रस्थान करेंगे। अपना कार्य पूर्ण होने की सूचना तुम हमको दोगी।’
‘‘अरण्य में भटकते-भटकते हम लोग अत्यंत क्लांत हो गए थे। हमें विश्राम की आवश्यकता थी। माता के उस प्रस्ताव में हमें दो लाभ हुए-हमने पूर्ण विश्राम किया और भैया भीम को हिडिंबा देवी से एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इसी बालक का नाम घटोत्कच था। यह हम भाइयों के बालकों में सबसे ज्येष्ठ था।

‘‘वन से निकलकर हम लोग द्रुपद नगर पहुँचे। वहाँ की कथा शायद तुम्हें ज्ञात हो। यहाँ मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि किसी भी राजा या राज परिवार के विवाह भी सापेक्ष होते हैं।
‘‘उलूपी के सामने मैं अकेला था। मैं अनुबंध तोड़ भी सकता था। और अनुबंध का अंतिम भाग टूटा भी। मैंने उलूपी का संग किया। मैं चाहता तो उलूपी से गांधर्व विवाह कर सकता था। किंतु गांधर्व विवाह को न उलूपी चाहती थी, न मैं; क्योंकि गांधर्व विवाह मूलतः वासना मूलक है। अत्यंत तीव्र कामोत्तेजना गांधर्व विवाह का मूल है। यह विवाह समाज-निरपेक्ष होता है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य के न होने के कारण  इसमें संकट की संभावना रहती है। तुम्हें याद होगा, हमारे ही एक पूर्वज, देवी शकुन्तला और दुष्यंत ने गांधर्व विवाह किया था। किंतु इस विवाह के कारण देवी शकुंतला को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। समाज की उपस्थिति के बिना होनेवाले इस विवाह में यदि वर छल कर जाय तो कन्या का जीवन दूभर हो जाता है। देवी शकुंतला के साथ यही हुआ। राजा दुष्यंत भूल गए कि उन्होंने देवी शकुंतला से कभी विवाह किया था। तुम स्वयं स्त्री हो। सोचो, देवी शंकुतला पर उस समय क्या बीता होगा ? कहाँ तो वे अपने वीर पुत्र को लेकर पतिगृह आई थीं, कहाँ उन्हें निराश और अपमानित होकर पतिगृह के द्वार से लौटना पड़ा। अकेली नहीं, एक लांछना के साथ लौटीं। उस समय उनके पितृकुल के परिजनों ने भी उनका साथ छोड़ दिया।

.‘‘उलूपी भी और मैं भी इस कथा से परिचित थे। अतः मैं उलूपी को साथ लेकर उसके पिता नागराज के यहाँ उपस्थित हुआ। उनकी स्वीकृति पाकर हमारा विधिवत् विवाह हुआ। इरावान् हमारे उसी विवाह का पुत्र है।
‘‘मैं जिस अनुबंध का उल्लेख कर रहा हूँ, उस अनुबंध के प्रस्तोता स्वयं ऋषि-प्रवर नारद थे। एक स्त्री को लेकर हम पाँचों भाइयों में संघर्ष न हो, इसलिए उन्होंने कृपाकर यह अनुबंध तैयार कराया था।
‘‘विधाता की लीला देखो ! इस अनुबंध का प्रथम और अंतिम दंडभोक्ता मैं ही हुआ। वह भी बहुत दिनों के बाद नहीं, अनुबंध बनने के कुछ ही दिनों बाद। भाइयों में मेरा स्थान तीसरा था। प्रथम और द्वितीय धर्मराज और भैया भीम हैं। मेरे बड़े भाई युधिष्ठिर द्रौपदी के प्रथम अधिकारी बने। वे द्रौपदी को लेकर अलग प्रकोष्ठ में रहने लगे। वहाँ अन्य भाइयों का जाना वर्जित था। हम चाहते थे कि अनुबंध का पूर्ण पालन हो।

‘‘किंतु विधाता तो और ही कुछ सोच रहा था। उसी ने मुझे द्रौपदी प्राप्त कराई। द्रुपद भी मुझे ही चाहते थे। यद्यपि मैं उनका अपराधी था किंतु उनकी प्रबल इच्छा थी मैं ही उनका जामाता बनूँ।’’
अर्जुन के अंतिम वाक्य को सुनकर वर्गा को आश्चर्य हुआ -‘‘आपने राजा द्रुपद के प्रति कैसे अपराध किया ? उस सज्जन, उदार नृपति के द्वारा आपकी कौन सी हानि हुई थी ? मैं तो उन्हें जानती हूँ। उन्होंने जीवन में कभी किसी का अपमान नहीं किया था। फिर आपने अभी कहा कि उसकी लालसा थी कि वे आपको अपनी कन्या द्रोपदी प्रदान करें। ऐसे में आपके द्वारा द्रुपद की अवमानना समझ में नहीं आती है।’’

‘‘हाँ देवी, आश्चर्य होना स्वाभाविक है। तुम्हें ही नहीं, किसी को भी आश्चर्य होगा। हुआ यह कि राजा द्रुपत मेरे गुरु आचार्य द्रोण के सतीर्थ थे। दोनों एक साथ ही, एक ही गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सतीर्थ होने के नाते दोनों में बड़ी घनिष्ठता थी, किंतु दोनों अपने भावी भाग्य से परिचित थे-गुरुकुल से निकलने के बाद द्रुपद को राजा होना है और ब्राह्मण द्रोण को राजसेवक आचार्य। इसी बात को ध्यान में रखकर सहपाठी द्रुपद ने अपने सतीर्थ से कहा, ‘‘द्रोण, मैं राजा बनने के बाद तुम्हारी सहायता करना चाहता हूँ। तुम्हें जब भी किसी वस्तु की आवश्यकता हो, निस्संकोच माँगना। मैं अवश्य उसकी पूर्ति करूँगा। एक तो तुम ब्राह्मण, दूसरे मेरे सहाध्यायी हो।’ द्रुपद  के इस आश्वासन ने आचार्य द्रोण के हृयय में आशा जगाई। वे सदा उस आशा के अंकुर को पालते रहे।   



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