अंक प्रतीक कोश - निशांतकेतु Ank Pratik Kosh - Hindi book by - Nishantketu
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अंक प्रतीक कोश

निशांतकेतु

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :480
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2644
आईएसबीएन :81-7315-347-7

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इसमें भारतीय अंक कोश से ज्ञान-परंपरा को अंक और संख्या में परंपरा-व्यवस्थित किया गया है...

Ank Prateek Kosh a hindi book by Nishantketu - अंक प्रतीक कोश - निशांतकेत

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ (गणित ज्ञानः संख्यात शास्त्र) अपने विषय का न केवल हिन्दी में वरन समस्त अट्ठारह भारतीय भाषाओं में पहला कोश है। पाँच सौ पृष्ठों वाला यह कोष प्रारूप और ज्ञान के संख्यात अनुशासन की प्रथम प्रस्तुति है। अपने में यह प्रथम प्राथमिकता और महत्व का विषय एवं ग्रन्थ है।

समस्त ज्ञान को अंक और संख्या में समझने की एक और सामाजिक परम्परा रही है। ज्ञान कैसा भी और कितना भी विशाल क्यों न हो, समाज जब उस संध्या के धरातल पर खड़ा कर देखता है, तब उसे समझने में स्मरण रखने में दुविधा होती है। जैसे-सूर्य एक, द्वंद्व दो, काल तीन, वेद चार, तत्व पाँच, वेदांग छह, माताएँ सात, दिशाएँ आठ, अंक-मूल नौ, महाविद्याएँ दस, रुद्र ग्यारह, ज्योतिर्लिंग बारह, महापापोदभव-रोग तेरह, चुंबन-प्रकार चौदह, अनर्थ पन्द्रह, चंद्रकलाएँ सेलह, ओषधि-प्रकार सत्रह, पुराण अट्ठारह, पूर्वरंग-अंग उन्नीस, उपरूपक बीस, नरक इक्कीस, आहुति-क्रम बाईस, अर्थदोष तेइस, गुण चौबीस, राधा-नाम अट्ठाईस, कल्प तीस, तर्पणीय देवता इकतीस, अर्थहरण बत्तीस, संचारी भाव तैंतीस, दनुपुत्र चौंतीस, रागिणी, छत्तीस, भक्त अड़तीस, संस्कार चालीस, मंत्रदोष, पैंतालीस, पवन उनचास, ओंकार-कला पचास, कलाएँ चौंसठ, धृतराष्ट्र-पुत्र सौ, चरणाक्षर एक सौ आठ इत्यादि। इस प्रकार की 2196 प्रविष्टियाँ इस कोश में संग्रहीत हैं।
‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ के माध्यम से प्रायः समस्त भारतीय परम्परा को अंक और संख्या में परम्परा व्यवस्थित रूप में उपस्थित किया गया है। कोश का कोई भी पृष्ठ उलटिए, आपकी जिज्ञासा कौतुहल में और कौतुहल ज्ञानवर्धक आनंद में स्वतः रूपान्तरित होता चला जायेगा।

इस कोश की उपयोगिता सामान्य से विशिष्ट जन तक है। जैसे पूजा के समय पंचामृत और पंचगव्य में क्या-क्या पदार्थ हैं, इस तथ्य से आरम्भ कर न्याय को 334 प्रकार तक का उल्लेख यहाँ मिलेगा। पांडुलिपिकाल में ही इसका परायण करने वाले पाठकों के अभिमत में यह कोश प्रत्येक प्रश्न पिपासा के लिए उत्तर मानसरोवर सलिल सिद्ध होगा, जो अपने में अनुत्तर है।
यह कोश प्रत्येक परिवार से पुस्तकालय तक अलंकरण सिद्ध होगा।
इस ग्रन्थ को हम भारतीय जीवन धारा और संस्कृति की शोभा, शक्ति एवं संपदा के रूप में लोकार्पित करते हुए सुखद संतोष का अनुभव करते हैं।


‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ (गणित ज्ञानः संख्यात शास्त्र) अपने विषय का न केवल हिन्दी में वरन समस्त अट्ठारह भारतीय भाषाओं में पहला कोश है। पाँच सौ पृष्ठों वाला यह कोष प्रारूप और ज्ञान के संख्यात अनुशासन की प्रथम प्रस्तुति है। अपने में यह प्रथम प्राथमिकता और महत्त्व का विषय एवं ग्रन्थ है। समस्त ज्ञान को अंक और संख्या में समझने की एक और सामाजिक परम्परा रही है। ज्ञान कैसा भी और कितना भी विशाल क्यों न हो, समाज जब उस संख्या के धरातल पर खड़ा कर देखता है, तब उसे समझने में स्मरण रखने में दुविधा होती है। जैसे-सूर्य एक, द्वंद्व दो, काल तीन, वेद चार, तत्त्व पाँच, वेदांग छह, माताएँ सात, दिशाएँ आठ, अंक-मूल नौ, महाविद्याएँ दस, रुद्र ग्यारह, ज्योतिर्लिंग बारह, महापापोद्भव-रोग तेरह, चुंबन-प्रकार चौदह, अनर्थ पन्द्रह, चंद्रकलाएँ सोलह, ओषधि-प्रकार सत्रह, पुराण अट्ठारह, पूर्वरंग-अंग उन्नीस, उपरूपक बीस, नरक इक्कीस, आहुति-क्रम बाईस, अर्थदोष तेइस, गुण चौबीस, तत्त्व पचीस, योगविघ्न छब्बीस, नक्षत्र सताईस,राधा-नाम अट्ठाईस, कल्प तीस, तर्पणीय देवता इकतीस, अर्थहरण बत्तीस, संचारी भाव तैंतीस, दनुपुत्र चौंतीस, रागिणी, छत्तीस, भक्त अड़तीस, संस्कार चालीस, मंत्रदोष, पैंतालीस, पवन उनचास, ओंकार-कला पचास, कलाएँ चौंसठ, धृतराष्ट्र-पुत्र सौ, चरणाक्षर एक सौ आठ इत्यादि। इस प्रकार की 2169 प्रविष्टियाँ इस कोश में संग्रहीत हैं। ‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ के माध्यम से प्रायः समस्त भारतीय परम्परा को अंक और संख्या में परम्परा व्यवस्थित रूप में उपस्थित किया गया है। कोश का कोई भी पृष्ठ उलटिए, आपकी जिज्ञासा कौतूहल में और कौतूहल ज्ञानवर्धक आनंद में स्वतः रूपान्तरित होता चला जायेगा। इस कोश की उपयोगिता सामान्य से विशिष्ट जन तक है। जैसे पूजा के समय पंचामृत और पंचगव्य में क्या-क्या पदार्थ हैं, इस तथ्य से आरम्भ कर न्याय के 334 प्रकार तक का उल्लेख यहाँ मिलेगा। पांडुलिपिकाल में ही इसका परायण करने वाले पाठकों के अभिमत में यह कोश प्रत्येक प्रश्न पिपासा के लिए उत्तर मानसरोवर सलिल सिद्ध होगा, जो अपने में अनुत्तर है। यह कोश प्रत्येक परिवार से पुस्तकालय तक का अलंकरण सिद्ध होगा। इस ग्रन्थ को हम भारतीय जीवन धारा और संस्कृति की शोभा, शक्ति एवं संपदा के रूप में लोकार्पित करते हुए सुखद संतोष का अनुभव करते हैं।

प्राक्कथन


‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ (गणित ज्ञान : संख्यात शास्त्र) हिंदी में प्रस्तुत पहला कोश है। किसी अन्य भारतीय भाषा में इस तरह का कोई कोश उपलब्ध नहीं, ऐसा साहित्य और शोध के मर्मज्ञ विद्वान कहते हैं। इस कोश के निर्माण में आचार्य निशांतकेतु के जीवन के सैंतीस बहुमूल्य वर्ष लगे हैं। यह वही समय-सीमा है, जब वे प्राध्यापक-(सन् 1960 से 1997 तक) रहे। अपने अध्यापन काल में अध्ययन और अध्यापन के सिलसिले में इस प्रकार की संख्याबद्ध जितनी सामग्री उन्हें मिली, उसका संकलन और वैज्ञानिक क्रम इस कोश में प्रस्तुत होता चला गया है। संख्या एक साँचा की तरह होती है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान की आकृतियाँ ढलती जाती हैं। एकरूपता के कारण उन्हें स्मरण भी रखने में सहूलियत होती है। जैसे पाँच की संख्या में कोशकार ने 327 प्रविष्ठटियाँ संकलित की हैं और उनको अक्षरानुक्रम से उपस्थित किया है; जैसे पंचककार, पंचानृत पंचकर्म, पंचकेदार, पंचक्लेश, पंचगंगा, पंचगुप्त, पंचतत्त्व, पंचतन्मात्रा, पंचदेव, पंचमकार, पंचयज्ञ इत्यादि। इसी प्रकार सौ तक की संख्या के साँचे में ज्ञान-विज्ञान को प्रस्तुत किया गया है।
प्रत्येक पृष्ठ पर जिज्ञासा, रोचकता, कौतूहल और आनंद सहजभाव से उपलब्ध हैं।

मनुष्य का सामान्य ज्ञान संख्या-शासित होता है और व्यावहारिक ज्ञान-वित्त-शासित। संख्या ‘एक’ से आरंभ होती है और ‘महाशंख’ तक जाती है। इसके ऊपर ‘अनंत’ है। इसे ही ‘असंख्य’ कहते हैं। वह ‘ईश्वर’ बन जाता है। समाज संख्या के साथ-साथ ‘वित्त’ से भी बँधा है। वित्त को ही धन, अर्थ, द्रव्य इत्यादि नाम से जानते हैं। जिस ‘विद्’ धातु से वित्त बना है, उसी से ‘वेद’ शब्द बना है। ‘विद्’ के अर्थ ज्ञान और लाभ दोनों हैं। ‘धन’ शब्द जिस धातु से बना है, उसका मूलार्थ है हिंसा, अर्थात् संकेत यह है कि बिना हिंसा के धन का संग्रह नहीं हो सकता। ‘अर्थ’ का अर्थ है अभिप्राय। अर्थ अपने में साध्य नहीं, साधन है। ‘द्रव्य’ का अर्थ है द्रवणशील। द्रव्य कहीं भी बर्फ की तरह जमा नहीं रह सकता। यह पिघल-पिघलकर बहता रहता है। स्थिरता इसका धर्म नहीं है। इसीलिए धन का पर्याय ‘लक्ष्मी’ है, जिसका अर्थ है चंचलता। लक्ष्मी चंचला होती है। लेकिन समाज इस ‘लक्ष्मी’ की उपासना में ही लगा रहता है।

गाँव में चले जाएँ। वहाँ इसी संख्खायनुशासन और अर्थानुशासन की चर्चा होती है। शहर भी इससे अछूता नहीं। कोई बीमार पड़ गया। इलाज शुरू हुआ वह ठीक होने लगा। पूछने पर उसका उत्तर होगा-अभी चार आना ठीक हुआ हूँ। कोई परीक्षा की तैयारी कर रहा है। पूछने पर बताएगा-अभी तो पचास पैसे तक भी तैयार नहीं हो पाई। समाज का चिंतन प्रायः संख्या और वित्त के साँचे में ही चलता है।
स्थान, काल, विचार, भाव इत्यादि सबों को अंक-प्रतीकों में समझने-समझाने की ठोस परंपरा रही है। ज्योतिष का चरम विकास इसी संख्यात कालगणना पर हुआ है। विज्ञान दूसरे ग्रहों पर पहुँच पाने का चमत्कार दिखा पाया तो इसी अंकविद्या के कारण।

इस संख्या और अंक को जब प्रचलित प्रतीकों में उपस्थित किया जाने लगा तो समाज को स्मरण रखने में सुविधा हो गई। किसी वस्तु, काल, विचार या भाव को जब बार-बार संख्या के निश्चित-निर्धारित साँचे में देखा जाता है तो वह संख्या प्रसिद्ध हो जाती और प्रतीक बन जाती है; जैसे संस्कार-सोलह, कलाएँ-चौंसठ और आसन-चौरासी। इसी प्रकार यदि प्रसिद्ध संख्या-प्रतीक मात्र कहें तो अभीष्ट का उल्लेख किए बिना उनका बोध हो जाएगा; जैसे चौदह कहने से ‘भुवन’, सताईस कहने से ‘नक्षत्र’, चौरासी लाख कहने से ‘योनियाँ’ और एक कहने से ‘ब्रह्म’ का बोध बिना बताए हो जाता है। यही अंक-प्रतीक की विशेषता है।

अंकों को लेकर अनेक मुहावरे भी बने; जैसे छह-पाँच में पड़ना, नौ दो ग्यारह होना, तीन में न तेरह में इत्यादि। इन अंकों को देहांगों के साथ जोड़कर भी प्रतीक बनाए गए; जैसे आँखें चार होना, आठ-आठ आँसू रोना इत्यादि। मुहावरे में प्रयुक्त इन अंकों का और भी विषय-विस्तार हुआ; जैसे तीसमार खाँ, दसवाँ ग्रह (जामाता दशमो ग्रहः), बाईस पसेरी इत्यादि। इनपर भी अलग से विस्तारपूर्वक काम होना चाहिए।

मैंने इस ग्रंथ की पांडुलिपि आदि से अंत तक देखी है। मैं एक क्रियाशील समाजशास्त्रज्ञ (ऐक्शन सोशियलॉजिस्ट) होने के नाते ऐसे विषयों का सर्वेक्षण करता रहता हूँ। समाज में ज्ञान, आचार-संहिता, परंपरा, नवीनता और आधुनिकता की एक प्रवाहशील मुख्यधारा होती है। उस मुख्यधारा का रंग-रूप होता है; उसकी पहचान हमारे जैसे लोग करते रहते हैं। वर्तमान मुख्यधारा अपने प्रवाह-पथ पर इस ग्रंथ-नौका का संतरण कराएगी, ऐसा मेरा मनोसामाजिक अभिमत है। इस दृष्टि से मैंने यह अनुभव किया है कि यह मानव-समाज के प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक का ऐसा सहचर-सखाग्रंथ सिद्ध होगा, जो सदैव उसका सशक्तीकरण (इंपावरमेंट) तो करेगा ही, उसे सत्पथ भी दिखलाता रहेगा। मैं अनुभव करता हूँ, यह कोश अपने इस आकार में और अनेक खंडों में छपकर आए। यह कार्य आचार्य निशांतकेतु जैसे व्यक्ति ही इसलिए संपन्न कर सकते हैं, क्योंकि वे बाहरी आकर्षण और भाग-दौड़ से दूर रहकर भीतरी श्रीवृद्धि को समर्पित साधक हैं।
व्यक्ति की शक्ति रिवॉल्वर रखने से ही सौ गुना नहीं बढ़ जाती, ऐसे ग्रंथ से भी बढ़ जाती है। साथ ही अहिंसक मार्ग का सुख अलग। मैं भारत के उर्वर भूमिखंड पर ज्ञान के इस सरस रसाल एवं रसालवन का हृदय से स्वागत करता हूँ। साथ ही, इस आम्रवन के माली आचार्य निशांतकेतु को इस अभाव-पूर्ति कारक ग्रंथ की रचना के लिए बधाई देता हूँ।
पद्मभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक
प्रवर्तक
सुलभ धर्म एवं सुलभ आंदोलन

भूमिका


‘भारतीय अंक-प्रतीक’ में अनेक अंकों के प्रतीक-प्रतिपाद्य का व्याख्यान है। सामान्यतः गणना-प्रसंग में दस तक के अंकों का ही आदि-विधान मिलता है। इन्हीं अंकों तक सर्वाधिक अंक-प्रतीक उपलब्ध भी हैं। इसका कारण भी गणितज्ञों ने खोज लिया है। उनकी मान्यता है, मनुष्य ने अपने दोनों हाथों में पाँच-पाँच अर्थात् दस उँगलियों की संख्या सबसे पहले देखी। इसीलिए दस तक के अंकों का सर्वाधिक महत्त्व है। हाथ को ‘पंचशाख’ कहते हैं। पाँच उँगलियों के रूप में पाँच शाखाएँ फटती हैं। अब अलग-अलग उँगलियों का नाम-संस्कार किया गया-अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा। ये सभी उँगलियाँ मुहावरे से लेकर प्रतीक तक बनती चली गईं। अँगूठा दिखाना किसी को नींचा दिखाना हो गया। तर्जनी दिखाना दोषारोपण हो गया। मध्यमा सबसे बड़ी होकर भी मध्यम-व्यायोग की पीड़ा में पड़ी रही। अनामिका का महत्त्व सर्वाधिक हो गया। जिसका कोई नाम नहीं (अ-नामिका), वही नाम कमा गई। करमाला की सभी जपगणना अनामिका से आरंभ होती है। अनामिका से ही चंदन लगाते हैं। अनामिकांगुष्ठ से ही पूजार्चन करते हैं। इन्हीं से ‘पूजयामि नम: तर्पयामि नम:’ कहते हैं। कविगण कहने लगे, ‘अनामिका सार्थवती बभूव’। अँगरेजी में इसे मुद्रिकांगुलि (रिंग फिंगर) कहते हैं। यह अँगुली विवाह-बंधन की गवाह बन गई। बेचारी कानी (कनिष्ठा) उँगली बच्चों के बीच दोस्ती तोड़ने का इशारा, संकेत और प्रतीक बन गई। दोषारोपण और दोष-निर्देश में यदि एक उँगली (तर्जनी, फोरफिंगर) दूसरे की ओर उठाई जाती है तो प्रतिपक्षी जवाब में उँगलियों की व्याख्या से ही उत्तर देता है। वह कहता है, तुमने एक उँगली मेरी ओर उठाई है, पर जरा देखो तो तुम्हारी अपनी ही तीन उँगलियाँ तुम्हारी ओर संकेत कर रही हैं। तुम मुझसे तीन गुना दोषी हो।

अँगरेजी के प्रसिद्ध कवि एजरा पाउंड ने अपनी प्रसिद्ध कविता। ‘डांसिंग गर्ल’ में उँगलियों का वर्णन एक अनूठे और अछूते बिंब के साथ किया है। नायक के वक्ष पर नायिका की नंगी, गोरी, चमकीली और सुंदर बाँह पड़ी है। वे लिखते हैं-‘As a rillet among the sedge are thy hand upon me, a froasted stream.’ पाउंड बाहु को पतली, लचकदार, चमकीली नदी (Rillet) से उपमित करते हैं। फिर नदी आगे चलकर पाँच धाराओं में विभक्त हो जाए और उँगलियों की नोंक तक आते-जाते बाहु-प्रवाह जम जाए।

कंबन कवि ने अपनी कंबरामायण में सीता के विलाप का वर्णन करते हुए उनकी बाहु, करतल, उँगलियाँ और वक्ष का वर्णन किया है। वियोग में नारियाँ छाती पीटती हैं। सीता भी नारी हैं। वियोग की दशा में वे ऐसा ही करती हैं। कमल की नाल पर लाल कमल खिलता है। उसकी पंखड़ियाँ खिलती हैं। सीता की भुजाएँ कमलनाल की तरह हैं और करतल रक्तकमल की तरह। उँगलियाँ रक्तकमल-दल हैं। अंगुलि-सहित करतल लाल (रक्तकमल) इसलिए हो गया है कि छाती पीटते समय इन कोमल करतलों को चोट लगती है, क्योंकि वक्षःस्थल पर श्रीफल तथा नारिकेल-उपमित पयोधर हैं। इन फलों की कठोरता और करतल की सुकुमारिता। दोनों भिन्न-गुणधर्म के अंग हैं। इन्हीं दसों उँगलियों से सैकड़ों वैदिक तथा तांत्रिक मुद्राएँ बनती हैं, जैसे धेनुमुद्रा, भगवतीमुद्रा। शिवमुद्रा, शंखमुद्रा, घंटामुद्रा, आवाहनी मुद्रा और ऐसी अनेक-अनेक मुदाएँ। ये हाथ कर्मेंद्रिय हैं। उँगलियों को जोड़कर करतल सीधा कर हाथ ऊपर उठाने पर यह देवी-देवताओं की अभय मुद्रा बनती है। यह वरदान सिद्ध होता है। यह आज भी बड़े लोगों के द्वारा आशीर्वाद देने का ढंग है। यह अपनी आतुर प्रथमता घोषित करने की देहभाषा या अशब्द भाषा (Non-Verbal body language) है। यहीं से संकेत और प्रतीक का प्रारंभ होता है। एक वर्ग में अनेक छात्र बैठे हैं। शिक्षक कोई प्रश्न करता है। अचानक तीन-चार हाथ उन्नत और सम-युत उँगलियों के साथ ऊपर उठ जाते हैं। शेष सौ-पचास छात्र चुप बैठे हैं। जाहिर है, ये ऊर्ध्वबाहु छात्र कह रहे हैं-मुझे इस प्रश्न का उत्तर ज्ञात है। इन्हीं उँगलियों और हाथों को ऊपर उठाकर हम नारे लगाते हैं। हाथ लहराना हमारी बुलंदी को सिद्ध करता है।

कालिदास की कथा सभी जानते हैं। किंवदंती है-वे पहले मूर्ख थे। बल्कि कहा गया, महामूर्ख थे। एक बार जिस डाल पर वे बैठ थे, उसी को काट रहे थे। इधर काशी की विदुषी, किंतु रूपगर्विता विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि शास्त्रार्थ में जो पुरुष-पंडित उसे पराजित कर देगा, वह उसी से विवाह रचा लेगी। पंडित आते और पराजित हो-होकर लौटते जाते। एक बार इन पराजित पंडितों में कुछ ने मिलकर परामर्श किया और निष्कर्ष बना कि किसी छल-छलाक्षर से इस अहंकारिणी विदुषी विद्योत्तमा का विवाह किसी प्रचंड मूर्ख से करा देना चाहिए। फिर यह विद्वन्मंडली महामूर्ख की खोज में निकल पड़ी। रास्ते में एक सुंदर युवक, पर महामूर्ख वही कालिदास मिले, जो उसी डाल को कुल्हाड़े से काट रहे थे, जिसपर बैठे थे। सभी देखकर एकमत थे कि इससे अधिक मूर्ख नहीं मिल सकता। फिर रूप और यौवन भी है।

मंडली से एक पंडित ने समीप जाकर उस युवक से नीचे उतरने का निवेदन किया। उसने फटकार दिया। कहा-‘‘रास्ता नाप, मैं अपना काम पूरा करके ही नीचे उतरूँगा।’ दूसरे पंडित ने युक्ति लड़ाई। कहा-‘तुम्हारा विवाह कराने आया हूँ।’ सुनते ही युवक डाल से नीचे कूद पड़ा। स्वाभाविक रीति से नीचे आने में समय लगता। विवाह का प्रश्न था। वह एकदम कूद पड़ा। पैरों में मोच आ गई पंडितों ने पैर दबाए। उपचार किया। जड़ी-बूटी दी। हल्दी-चूना चढ़ाया। चोट कोई खास थी नहीं। फिर शादी की उमंग थी। वह घंटे-दो घंटे में ठीक हो गया।

पंडितों ने उस सुंदर युवक को अचकन-पचकन, पीतांबर-दुशाले, पाग-पगड़ी से सज्जित कर और भी शोभनीय बना दिया। कहा-‘चलो, अभी विवाह कराते हैं, पर एक शर्त है। बोलना कुछ नहीं। जहाँ बोले, शादी रद्द। कल से चाहे जितना बोल लेना। हाँ, हाथ और उँगलियों से जो हरकतें कर दिखानी हैं, कर लेना। बस, बोलती बंद रखना।’ युवक हर शर्त मानता चला गया।
शास्त्रार्थ-सभा शुरू हुई। पंडितों ने अपने महापंडित के मौनव्रत की चर्चा करते हुए संकेत और देहांग-भाषा में शास्त्रार्थ करने का अनुरोध किया। विद्योत्तमा मान गई। उसने एक उँगली उठाई। उसका तात्पर्य था, ‘ईश्वर एक है। अद्वैत ही ईश्वरत्व है।’ युवक की समझ में आया, ‘यह हमारी एक आँख फोड़ना चाहती है।’ अतः उन्होंने तत्क्षण दो उँगलियाँ ऊपर कर दीं। अर्थात् ‘तुम तो एक आँख फोड़ने की बात कर रही हो, मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड़कर अंधी बना दूँगा।’
पंडितों ने व्याख्या की, ‘ईश्वर एक है। आपने ठीक कहा, पर प्रकृति और विश्व के रूप में वही अन्य रूप धारण करता है। अतः पुरुष और प्रकृति, परमात्मा और आत्मा दो-दो शाश्वत हैं।’ श्रोताओं ने ताली बजाकर पंडितमंडली की व्याख्या का समर्थन कर दिया।

फिर विद्योत्तमा ने हथेली उठाई। पाँचों उँगलियाँ ऊपर की ओर उठी थीं। उनका तात्पर्य था, ‘आप जिस प्रकृति, जगत् जीव या माया के रूप में द्वैतवाद को स्थापित कर रहे हैं, उसकी रचना पंचत्तत्व से होती है। ये पंचतत्त्व हैं-पृथ्वी, पानी, पवन, तेज और आकाश। ये सभी तत्त्व भिन्न और अलग हैं, इनसे सृष्टि कैसे हो सकती है ?’
युवक की अक्ल में समझ आई, ‘यह युवती अब मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। इसीलिए हाथ उठाया है और थप्पड़ (करतल) दिखा रही है। ‘अच्छा, कोई बात नहीं। मैं अभी तुझे मजा चखाता हूँ।’ यह सोचकर उसने उँगलियों को समेटकर कड़ी मुट्ठी बाँध ली और विद्योत्तमा की ओर मुट्ठीवाला हाथ आगे फैला दिया। पंडितों ने व्याख्या की, ‘जब तक पंचतत्त्व अलग-अलग रहेंगे, सृष्टि नहीं होगी। पंचतत्त्व करतल की पंचांगुलि है। सष्टि तो मुष्टिवत् है। मुट्ठी में सभी मिल जाते हैं तो सृष्टि हो जाती है। यही तात्पर्य है, हमारे युवा महापंडित का।’ सभा-मंडप की दर्शक दीर्घा से फिर तालियाँ बजीं। अततः घोषणा हुई, विद्योत्तमा हार गई और इस तरह उसका विवाह उस महामूर्ख युवक से हो गया।

लोककथा, जनश्रुति और अत्यल्प उद्धरणों से पुनर्निर्मित कालिदास की जीवनी की कथा आगे बढ़ती है। रात में ही कालिदास एक ऊँट की आवाज पर जवाब और प्रतिक्रिया में बोल पड़े। विद्योत्तम ने माथा पीट लिया। ‘अरे, यह तो महापंडित के रूप में महामूर्ख निकला।’ उसने युवक को उसी रात, उसी क्षण घर से निकाल दिया।
आगे की कथा इस स्थान पर अप्रासंगिक है। संक्षेप में यह उल्लेख्य है कि कालिदास बाद में विद्वान बने और विश्वख्याति अर्जित की। इन्हीं कालिदास के लिए कहा गया-

‘पुरा-कवीनां गणना-प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव।’

उसी दिन से कई बातें घटित हो गईं। ‘महापंडित’ का अर्थ ‘महामूर्ख’ हो गया। आज भी लोग निरक्षर, किंतु निकटस्थ व्यक्ति को संबोधित करते हैं, ‘कहो महापंडित ! क्या समाचार हैं ?’ दूसरी बात यह कि कालिदास ने पृष्ठांकित अक्षरभाषा को छोड़कर देहांग को पढ़ना आरंभ कर दिया। वर्ण-परिचय तो दो-चार दिनों के अभ्यास का परिणाम हो सकता है। महत्त्वपूर्ण है, भाव और बोध। इसका अभिज्ञान जीवन के व्यवहार-प्रांगण में होता है।

उँगलियों से संबद्ध अनेक मुहावरे बन गए-उँगली दिखाना, उँगली पर नाचना, दाँतों तले उँगली दबाना, कानों में उँगली डालना, मुँह में उँगली डालकर बोलवाना, उँगली उठाना, अँगूठा दिखाना, अँगूठा चूमना इत्यादि। अंगुलियुक्त करतल के साथ भी मुहावरे बने-थप्पड़ उठाना, हाथ मारना, मुट्ठी बाँधना, घूँसा (मुट्ठी) मारना इत्यादि। फारसी का मुहावरा है, बदयाँ गिरफ्तन (दाँतों तले उँगली दबाना-आश्चर्य करना)। हिंदी में ‘हाथ का जस वाक् का सत्त’ मुहावरा प्रसिद्ध है। फणीश्वरनाथ रेणु ने इसी मुहावरा-शीर्षक से एक प्रसिद्ध कहानी लिखी। मुट्ठी-भर धूप (कृतनारायण प्यारा), नाखून बढ़े अक्षर (डॉक्टर रवींद्र राजहंस), हथेली पर का आदमी (डॉक्टर शांति जैन) जैसी पुस्तकें भी छपीं।

ऋग्वेद में ‘मुष्टिदत्तया’ (मुक्का मारना) मुहावरा मिलता है। बेबीलोनिया में एक मुहावरा प्रचलित है, जिसका अर्थ है, परमात्मा ने उँगलियाँ इसलिए दी हैं कि यदि दूसरे अप्रिय वचन बोलें तो हम कान बंद कर सकें। महात्मा गाँधी के तीन बंदर इन्हीं उँगलियों से कान, आँख और मुँह बंद करते हैं। ‘बापू के तीन बंदर’ का अभिप्राय है, बुरा नहीं सुनें, बुरा न देखें और बुरा न बोलें। बापू ने यह प्रतीक फारसी मुहावरा से लिया है, गोश बद्द, चश्म बद्द, लव बद्द, ऐसा विनोबा भावे का अभिमत है।
फारसी में ‘पंजकस’ का अर्थ है ‘ पंजा लड़ाना’। पंजा शब्द पंच (पंचांगुलि) से ही बना है। पंजा से कई मुहावरे बने-पंजा लड़ाना, खूनी पंजा, नाखूनी पंजा। संगीत में पंचम स्वर, तत्त्व में पंचतत्त्व तिथियों में पंचमी तिथि इत्यादि उँगली से गणना के परिणाम हैं। फिर प्रतीक बनने लगे। पंचमी तत्त्व आकाश है। आकाश शून्य है। शून्य को नारी का प्रजनन-स्थल माना गया। ऐसा तंत्र-ग्रंथों में उल्लेख है।

फारसी का प्रसिद्ध मुहावरा ‘दस्त पाक बूदन’ का अर्थ है ‘हाथ का जस वाक् का सत्त।’ भारतीय शुभाचरण में एक है प्रातःकरदर्शन। श्लोक है-‘कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, करमूले स्थिता ब्रह्मा (कालिका) प्रभाते करदर्शनम्।’ यह वैदिक विधान है। तांत्रिक विधान में ब्रह्म के स्थान पर काली हैं-‘करमूले स्थिता काली।’ विशिष्टता-प्रदर्शन के लिए ‘अंगुलिगण्य’ विशेषण का प्रयोग होता है। हथेली (करतल) पर ही आत्मतीर्थ (कायतीर्थ), देवतीर्थ तथा पितृतीर्थ के स्थान हैं। इन्हीं स्थलों से भिन्न-भिन्न तर्पण-विधान है। ‘हस्तरेखाशास्त्र’ का निर्माण करलत की रेखाओं पर ही आधारित है। अँगूठे का निशान किसी भी दस्तावेज की प्रामाणिक अनुबंधधर्मिता है।
पृथ्वीराज को चंदवरदाई ने आत्मरक्षा का संकेत जिस पद से दिया था, उसमें अंगुलि-प्रमाण का उल्लेख है, ‘चार बाँस, चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान, एते पै सुलतान है मत चूको चौहान।’
अंगुलि का व्याख्या में व्याकरण-विधान है,‘अंगुल्यां कायते निधीयतेऽसौ अंगुली।’

कर्मेंद्रिय पाँच हैं-हाथ, पैर, मलद्वार, मूत्रमार्ग और वाणी। इनमें वाणी और हाथ को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। मुख बोलता है, हाथ लिखता है। एक वक्ता और दूसरा लेखक है। अक्षर (उच्चरित) और वर्ण (लिखित) का विकास इन्हीं दोनों कर्मेंद्रियों के परिणाम हैं। वाक्-व्यक्त भाषा और अंगुलि-संकेत भाषा है। मूक-वधिर इन्हीं अंगुलियों की मुद्राओं से बोलते हैं। नेत्रहीन इन्हीं अंगुलियों से लिखते और पढ़ते भी हैं। नेत्रहीनों के नेत्र अंगुलियाँ ही हैं।
आनंद और उल्लास में ताली बजाना (करतल-ध्वनि) अशब्दभाषा है। ‘तालियों की गड़गड़ाहट’ प्रशस्तिसूचक संकेत हैं। उपमा भाषा में शरीर एक वृक्ष है। बाहुएँ शाखाएँ हैं। अंगुलियाँ प्रशाखाएँ या प्ररोह हैं। प्ररोह अधोमुखी होते हैं। वट-वृक्ष के अधोमुखी प्ररोह उदाहरण हैं। अंगुलियों पर नख होते हैं। नख पर साहित्य और ज्योतिषशास्त्र भी है। श्रृंगार-प्रकरण में नखों की अलक्तक या नेल पॉलिश से रगने का विधान है। हथेली को मेंहदी से रचाना शुभ-सौभाग्य-लक्षण माना गया। तंत्र की हस्तमुद्राएँ तो उत्तरोत्तर विशिष्टिता प्राप्त करती गईं।

तात्पर्य यह कि मानव-वंश ने अपनी अँगुलियों पर ही गणनाशास्त्र सीखा। कालांतर में इसका विकास हुआ। मनुष्य की विशिष्टता के दो आधार माने गए हैं-प्रज्ञा तथा उँगलियाँ। प्रजा से वह त्रिकाल-दर्शन करता और उँगलियों से चिंतन को साकार रूप देता है। सभी आविष्कार उँगलियों की सूक्ष्म सक्रियता के परिणाम हैं। ‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ में सहस्राधिक शब्दों के अंक-प्रतीक उपस्थित किए गए हैं। प्रत्येक अंक के क और ख दो खंड हैं। ज्ञान को अंकबद्ध-रूप में सीखने-समझने का यह शास्त्र प्राचीन है। अभी तक इस विषय पर कोई पुस्तक नहीं थी। हिंदी में अपने विषय की यह पहली पुस्तक है।
मुझे आशा है, शास्त्र-मंथन से उपलब्ध यह अंक-प्रतीक-कलश जिस ज्ञानामृत से भरा है, पाठकों को तृप्त करेगा। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है। यह कार्य-समय-साध्य और कठिन अवश्य है, पर मेरा मौलिक नहीं है। मैंने भारतीय ज्ञान-सागर में उपलब्ध अंक-प्रतीकों का ही संचयन किया है। इसलिए संचयनकर्ता से अधिक श्रेय का मैं अधिकारी हूँ भी नहीं। हाँ, चयन-वृत्ति और उपस्थापन-विधान मेरा अपना अवश्य है। मैं सुधी पाठकों की प्रतिक्रिया तथा परामर्श की अपेक्षा अवश्य रखता हूँ।

बहुत शब्द ऐसे हैं, जिनका संद्रोभल्लेख आवश्यक नहीं। जैसे कालभेद-भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्यकाल। इसका उल्लेख सभी व्याकरण ग्रंथों में मिलता है। ऐसे ही अनेक शब्दों के साथ संदर्भोल्लेख उपस्थित किया गया है। शब्दों को अक्षरानुक्रम से रखा गया है।
बहुसमय-श्रम-साध्यता तथा सावधानता के बावजूद इस ग्रंथ को पूर्ण-संपूर्ण नहीं कहा जाएगा, क्योंकि ऐसे अंक-प्रतीक और भी हैं। ज्ञान के जितने अनुशासन तथा शाखाएँ हैं, उन्हें-एकत्र समेकित कर पाना संभव भी नहीं। यहाँ इस ग्रंथ में दो हजार से अधिक शब्दों के अंक-प्रतीक उपस्थित किए गए हैं। यह दस वर्षों के श्रम का परिणाम है।
छूट का होना संभव और स्वाभाविक है। फिर भी सुधी सज्जनों के परामर्श को अगले संस्करण में नामोल्ल्खपूर्वक ध्यान में रखूँगा।
इस ग्रंथ की पांडुलिपि तैयार करने में मृत्युंजय कुमार मनोज ने समर्पित सहयोग दिया है। श्री मनोज तो मेरे साथ दिल्ली-पटना, पटना-दिल्ली भी आते जाते रहे। मैं उन्हें आशीर्वाद देता हूँ।
अंत में मैं सुधी पाठकों की निर्मल प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में हूँ।
निशांतकेतु

‘शब्दाश्रम’
बी-170, पालम विहार,
गुड़गाँव-122017 (हरियाणा)

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