हिन्दी शब्द सामर्थ्य - कैलाशचन्द्र भाटिया Hindi Shabd Samarthya - Hindi book by - Kailash Chandra Bhatiya
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हिन्दी शब्द सामर्थ्य

कैलाशचन्द्र भाटिया

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :303
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2650
आईएसबीएन :81-7315-361-2

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प्रस्तुत है हिन्दी शब्द संबंधी ज्ञान-संपदा...

Hindi Shabad Samarthya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रत्येक शब्द अपना इतिहास होता है। एक शब्द का ठीक व समुचित उपयोग व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है, जबकि एक शब्द के दुरुपयोग से (अंधो के अंधे होते हैं) महाभारत भी हो सकता है। शब्द के उचित प्रयोग और उसकी उपयोगिता तथा हिन्दी भाषा संबंधी पर्याय, विलोम, युग्म, पुनरुक्ति, अनेकार्थक आदि विषयों के अतिरिक्त शब्द को लेकर अन्य अनेक दृष्टियों से विस्तार पूर्वक चर्चा की गई है।

‘संक्षिप्तीकरण’, ‘शब्द परिवार’, ‘एक मूल धातु से अनेक शब्दों का निर्माण’, ‘सहप्रयोग और शब्दार्थ’, ‘अंकों की सहायता से शब्द ज्ञान’, ‘शब्द की अनेकार्थकता’, ‘अनेक शब्द के स्थान पर एक शब्द’, ‘शब्दावली में वृद्धि के साधन’, ‘मिलते-जुलते शब्द’, ‘समरूपी भिन्नार्थक शब्द’ जैसे कुछ प्रमुख शीर्षकों सा यह आभास स्वतः ही मिल जाता है कि पुस्तक कितनी महत्त्वपूर्ण व उपयोगी होगी। अपने इन गुणों के कारण यह पुस्तक हिन्दी शब्द से संबंधित अन्य पुस्तकों की पंक्ति से अलग, नितांत भिन्न स्वरूप में नजर आती है।
प्रस्तुत पुस्तक पाठकों को हिन्दी शब्द संबंधी ज्ञान-संपदा को और अधिक समृद्ध करेगी, ऐसा विश्वास है।

कुछ अपनी


शब्दों की दुनिया निराली है। प्रतिदिन-प्रतिक्षण विभिन्न संचार माध्यमों से नवीन शब्द भाषा में आते रहते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी से इस दिशा में विशेष गति आई है। शब्द की शक्ति अनंत है, यही कारण है कि ‘शब्द’ को ‘ब्रह्म’ की संज्ञा दी गई है। संतों ने अपने वाचिक संदेश को भी ‘सबद’ ही कहा।

शब्दों का अध्ययन कई दिशा में संभव है। अब तक शब्द के जन्म, इसकी उत्पत्ति/व्युत्पत्ति पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया है। इस सृष्टि से मेरा अध्ययन भी दो दशक पूर्व ‘शब्दश्री’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ।

किसी ‘शब्द’ का अर्थ प्रयोग और संदर्भ में निश्चित होता है। बिना कोश देखे भी कैसे शब्द के अर्थ तक पहुँच सकते हैं और मूलांश को निकालकर नए-नए शब्दों के निर्माण की दिशा में अग्रसर कर सकते हैं, इस दृष्टि से एक पुस्तक तैयार करने का विचार तो मन में चार दशक पूर्व ही आ चुका था, जिसके फलस्वरूप निरंतर सोच-विचार भी चलता रहा और यत्र-तत्र लिखता भी रहा। भाषा मर्मज्ञ पण्डित विद्यानिवास मिश्रजी ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक हुए तो ‘शब्द-प्रयोग’ पर लिखता रहा, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप प्रेरक पत्र भी प्राप्त हुए। यदि चि. प्रभात कुमार का विशेष आग्रह न बना रहता तो योजना बस्ते में ही बंद रहती। मन में यही भाव केन्द्रित रहा कि जिज्ञासु विद्यार्थी/पाठक न केवल शब्द का अर्थ समझ लें वरन् नए शब्दों का निर्माण करने की क्षमता भी विकसित कर लें। कई पत्र-पत्रिकाओं में इस प्रकार के स्तम्भ भी रहते हैं, जिनमें से ‘कादंबिनी’ शीर्ष पर है।

प्रत्येक शब्द का अपना इतिहास होता है। एक शब्द का ठीक व समुचित उपयोग व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है, जबकि एक शब्द के दुरुपयोग से (अंधो के अंधे होते हैं) महाभारत भी हो सकता है। शब्द के उचित प्रयोग और उसकी उपयोगिता तथा हिन्दी भाषा संबंधी पर्याय, विलोम, युग्म, पुनरुक्ति, अनेकार्थक आदि विषयों के अतिरिक्त शब्द को लेकर अन्य अनेक दृष्टियों से विस्तार पूर्वक चर्चा की गई है। ‘संक्षिप्तीकरण’, ‘शब्द परिवार’, ‘एक मूल धातु से अनेक शब्दों का निर्माण’, ‘सहप्रयोग और शब्दार्थ’, ‘अंको की सहायता से शब्द ज्ञान’ आदि।

छठे दशक में शब्दों के अध्ययन की दिशा में आगे बढ़ने की जो प्रेरणा शब्द मर्मज्ञ डॉक्टर बाबूराम सक्सेना तथा डॉ. हरदेव बिहारी से प्राप्त हुई उसका ही यह सुपरिणाम है। ‘अंकों’ वाले अध्याय को व्यवस्थित करने में आचार्य निशांतकेतु के ग्रंथ ‘भारतीय अंक प्रतीक कोश’ से काफी सहायता मिली। प्रस्तुत ग्रंथ से यह भी स्पष्ट है कि हिन्दी शब्द संपदा कितनी विशाल है। इससे जहां एक ओर शब्द की संकल्पना स्पष्ट होती है वहीं एक ही शब्द से अनेक शब्द सीखने की ओर अग्रसर होने का अवसर मिलता है।

आशा है, सुधी पाठक, विशेषत: विद्यार्थी इस पुस्तक से अपना शब्द ज्ञान बढ़ाने में सक्रिय हो सकेंगे। पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी, जिससे नवीन संस्करण में संशोधन/परिवर्धन किया जा सके।

कैलाशचन्द्र भाटिया

1
एक शब्द से अनेक शब्द सीखिए



‘उचित’

एक समाचार पढ़ने को मिला कि ‘गणतंत्र दिवस पर भाग लेनेवाले लोकनर्तकों को दिल्ली में ठहराने की समुचित व्यवस्था हो चुकी है।’ इस वाक्य में प्रयुक्त ‘समुचित’ के स्थान पर हिंदुस्तानी शैली में ‘वाजिब’ का प्रयोग भी किया जा सकता है। ‘समुचित’ से तात्पर्य है- ‘हर दृष्टि से हर रूप में उचित’। इसके अन्य विशेषणवत् प्रयोग हैं- समुचित उत्तर, समुचित आधार, समुचित शीर्ष (हेड), समुचित कार्रवाई आदि। ‘समुचित’ का प्रयोग अन्य विविध सन्दर्भों में किया जाता है; जैसे- समुचित समय, समुचित उपाय, समुचित विवरणी आदि। इसके मूल में तो सर्वसाधारण की समझ में आनेवाला शब्द ‘उचित’ है; जैसे- ‘उचित समय पर सही कार्य करने पर सफलता मिलती है।’ ‘उचित’ का प्रयोग काफी व्यापक अर्थों में- सही, ठीक, योग्य-किया जाता है; जैसे-


1.    ठीक-ठीक (फेयर) के अर्थ में-


-भाव, -मूल्य, -बरताव, -व्यवहार, -कीमत, -दाम, -दर, -रकम, -किराया आदि।


2. जैसा होना चाहिए (प्रॉपर) के अर्थ में-


-माध्यम, अभिरक्षा, -मार्ग, -प्रणाली, -प्रबंध, -प्रारूप, -लेखा, -साधन, -हिसाब आदि।


3. एकदम न्याय्य, बिलकुल ठीक (जस्ट) के अर्थ में-


  -कारण, -अधिकार, -उचित सिद्ध करना (क्रिया रूप में)।


4. उपयुक्तता के भाव में

-जवाब/उत्तर।

‘उचित’ का विपरीतार्थक रूप ही ‘अनुचित’ है, जिसका प्रयोग अभद्र, अयोग्य, अशोभनीय, निंदनीय, गलत आदि अर्थों में किया जाता है। इस दृष्टि से कुछ प्रयोग दृष्टव्य हैं-

अनुचित प्रभाव (कुछ लोग अनुचित प्रभाव के बल पर गलत काम करते/ करवाते हैं।)
इसी प्रकार –लाभ, -ग्रहण, -नियोजन, -भेदभाव आदि।
जब कोई व्यक्ति समय के अनुकूल व्यवहार न कर सर्वथा विपरीत दिशा में बरताव करता है तो स्वेच्छाचारी, मनमौजी का अर्थ ‘अनुचित’ से व्यक्त होता है।

‘-देरी’ के संदर्भ में इससे अनावश्यक देरी का भाव व्यक्त होता है। यही दर्शनशास्त्र में अयोग्य के भाव में प्रयुक्त है; जैसे-प्रतीक (उपलक्षित अन्वितार्थ)।

उचित के साथ पर्याप्तता का भाव जोड़ने के लिए ‘यथोचित’ का प्रयोग भी किया जाता है जिसके स्थान पर ‘उपयुक्त’, ‘मुनासिब’ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भाववाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग होने पर उचित के रूप ‘औचित्य’ बन जाता है, जिसका प्रयोग भी भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्नता ले लेता है। ‘न्याय्य’ के अर्थ में, तर्कसंगत के भाव में ‘औचित्य स्थापन’।
इसको ही विपरीत अर्थ में ‘अनौचित्य’ कर दिया जाता है।

औचित्य के साथ ‘सहित’ का भाव लेने के लिए ‘औचित्यपूर्वक’ अब प्रयोग में स्थिर हो चुका है।
क्रियाविशेषण रूप में इसके प्रयोग ‘उचित तौर पर’, ‘उचित प्रकार से’ आदि भी मिलते हैं।


‘एक: शब्द: सम्यक् ज्ञात: सप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति।’

-एक भी शब्द यदि सम्यक् रीति से ज्ञात हो तथा सुप्रयुक्त हो तो वह इस लोक में व स्वर्ग में कामधुक् (कामधेनु) होता है।

    -पतंजलि (पातंजल महाभाष्य, प्रथम आह्रिक)

सामान्य प्रयोग के अतिरिक्त प्रशासन तथा विधि में इसके अनेक प्रयोग अब स्थिरता प्राप्त कर चुके हैं, जिनकी संक्षिप्त चर्चा की गई है।


‘अभियान’


अभी पिछले सप्ताह दो वाक्य समाचार-पत्र में पढ़ने को मिले- ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के अंतर्गत इस पाँच साला योजना में तीन सौ पचास जिलों में संपूर्ण ‘साक्षरता अभियान’ चलाए जाने का प्रस्ताव है।’

‘कर चोरी के खिलाफ ‘छापा अभियान’ तेज होगा।’
इन दोनों वाक्यों में प्रयुक्त ‘अभियान’ का अर्थ निकला किसी काम को तेजी से बढ़ाना, और यह काम तेजी से कैसे बढ़े, इसके लिए सुनियोजित कार्यक्रम पहले से निश्चित करना।

‘अभियान’ में सामान्यत: बहुत सारे लोगों को इकट्ठा कर महान् लक्ष्य की ओर बढ़ने की कोशिश होती है। लक्ष्य सीमित, पर निश्चित होता है, जिससे प्राप्ति की जा सके। सीमित से यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं है कि उसका महत्त्व नहीं है, वरन् वह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है तब ही ‘अभियान’ की संज्ञा दी जाती है। ‘अभियान’ ‘आंदोलन से भी भिन्न है, जिससे विरोधी शक्तियों का मुकाबला करने का भाव भी रहता है। सामाजिक क्षेत्र में संबंधित जन-आंदोलन भी हो सकता है, जो लंबे अरसे तक चल सकता है। सामाजिक क्षेत्र में इसकी व्यापकता के कारण ही यह आंदोलन बन जाता है; जैसे- दहेज विरोधी आंदोलन’।

 


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