पांचाली फिर दाँव पर - चंचल एम.माथुर Panchali Phir Daanv Par - Hindi book by - Chanchal. M. Mathur
लोगों की राय

नाटक-एकाँकी >> पांचाली फिर दाँव पर

पांचाली फिर दाँव पर

चंचल एम.माथुर

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :94
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2663
आईएसबीएन :81-7721-011-4

Like this Hindi book 12 पाठकों को प्रिय

328 पाठक हैं

पांचाली के जीवन पर आधारित नाटक.....

Panchali Phir Daanv Par

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पुरुष पात्र

कुशल : नाटक का नायक, लेखक और कवि, उम्र लगभग पच्चीस वर्ष
रामकुमार: कुशल का सबसे बड़ा भाई (एक व्यवसायी)
रोशन कुमार : रामकुमार से छोटा भाई (सहयोगी)
महेश कुमार : रोशन से छोटा भाई (सहयोगी)
प्रभाकर: महेश से छोटा भाई (सहयोगी)
छेगल वर्मा : ‘मुसकान’ मासिक पत्रिका के संपादक
रोहन: कुशल का मित्र, उम्र कुशल के समकक्ष
एक नौकर


स्त्री पात्र


प्रणेता: नाटक की नायिका, कुशल की प्रेमिका, उम्र लगभग बीस वर्ष
नीना : रामकुमार की पत्नी
शिखा: रोशन की पत्नी
चित्रा : महेश की पत्नी
करुणा : प्रभाकर की पत्नी
जयंति: प्रणेता की सहेली और रोहन की पत्नी
संगीत: नाटक के बीच-बीच में जहाँ दृश्यवार आवश्यकता हो, बाँसुरी का करुण संगीत


पहला दृश्य


(‘मुसकान’ मासिक पत्रिका के संपादक का कमरा, जहाँ कांच की दो अलमारियां हिंदी और अंग्रेजी की किताबों से भरी हुई हैं। सामने की दीवार पर महात्मा गांधी का चित्र लगा हुआ है। उसके ठीक नीचे दीवार घड़ी इस वक्त चार बजा रही है। संपादक की मेज पर कागजों का ढेर लगा हुआ है, एक-दो फाइलें कोनें में रखी हैं। उनमें से एक कागज संपादक छेगल वर्मा बार-बार पलट रहे हैं और साथ ही फोन का चोंगा हाथ में लिये हुए किसी से बतिया रहे हैं।)
छेगल वर्मा: (बात करते हुए) हाँ...हाँ, हम कोशिश करेंगे, मिस्टर देशवासी,..ओह नो, इट्स इंपोसिबल...कवर पेज हमेशा बुक ही रहता है..और आगे भी पूरे छह महीने के लिए बुक है...क्या कहा, डबल पैसा ! क्यों शर्मिन्दा कर रहे हैं हमें ? आपको मालूम है, हम हाँ हाँ....पैसा नहीं चाहिए..फिर भी आप..ओ.के.। आई विल डू माइ बेस्ट...आप फिर ट्राई कर लीजिएगा....ओ.के. थैंक्यू।

(फोन रखकर वर्मा फाइल उठाता है और उसे पढ़ने लगता है। दरवाजे पर दस्तक होती है।)
छेगल वर्मा: (फाइलों में ही देखता है) येस, कम इन।
(एक युवक और युवती का कमरे में प्रवेश होता है।)
(फिर सामने देखता है) अरे, आप..मिस्टर कुशल ! आइए-आइए, वहां क्यों खड़े हैं ? (वर्मा खड़ा होता है और कुशल से हाथ मिलाता है) टेक योर सीट।
(दोनों बैठते हैं। वर्मा भी बैठता है।)
कुशल: सर, ये है प्रणेता।
(युवती नमस्ते करती है।)

छेगल वर्मा :क्या ये भी लिखती हैं, कुशल साहब ?
कुशल: (मुसकराकर) जी नहीं, ये लिखती नहीं, लिखवाती हैं।
छेगल वर्मा: आपका मतलब, ये भी हमारी तरह किसी पत्रिका की संपादिका या मालकिन हैं। (जेब में हाथ डालकर सिगरेट निकालता है)
कुशल: नहीं, ये न तो संपादिका हैं, न पत्रिका की मालिक। ये तो मेरी प्रेरणा हैं, यही हैं जिनकी बदौलत मैं लिख पाता हूँ ये सब।
प्रणेता: (बात काटकर) सर ये तो इनकी जरा नवाजी है, वरना कौन किसी की वजह से लिखता है। फिर यह तो इनको ऊपरवाले की देन ही है।
छेगल वर्मा: (मुसकराता है) खैर, प्रणेताजी, जो भी हो चाहे आप लिखवाती हों या ये स्वयं लिखते हों, मगर हमारे लिए तो ये सोने की खान हैं।
कुशल: धन्यवाद वर्माजी ! ये तो आप ही हैं, वरना कौन छापेगा मेरी लिखी बकवास को। आप यकीन नहीं करेंगे मैं कुछ भी लिख देता हूँ, और ये प्रणेता उसे इतना अच्छा बता देती हैं कि क्या कहूँ। कभी-कभी तो मुझे खुद पर ही हँसी आ जाती है कि क्या लिख दिया मैंने !

छेगल वर्मा: ये क्या कहते हो, मिस्टर कुशल ? आपको मालूम होना चाहिए के जब से आपने हमारे लिए लिखना शुरू किया है, और मेरी सहायक छायाजी ने संपादन का कार्य संभाला है, तब से हम पाँच हजार एक्स्ट्रा प्रतियाँ निकाल रहे हैं। हम तो छायाजी का धन्यवाद भी आप ही को देंगे, आप न होते तो वह हमारे यहाँ कभी नहीं आती।
कुशल: शुक्रिया, मगर मेरी फीस, जो मैंने तय की है ?
छेगल वर्मा: (फाइल से रसीद निकालता है) यह लीजिए, पाँच हजार की रसीद। आपका जो पैसा इन छह महीनों में बना है, वह सारा अनाथालय भिजवा दिया है।
कुशल: और मेरे उस काम का क्या हुआ ?

छेगल वर्मा: ओह, वह...वह भी प्रोग्रेस पर है। फिलहाल हम पैसों पर अटके हुए हैं।
कुशल: क्या मतलब ?
छेगल वर्मा : मिस्टर कुशल...वे लोग आपका नॉवेल छापने को तैयार हैं, मगर पहले एडिशन पर पंद्रह हजार और ढाई परसेंट रॉयल्टी ही देने को कह रहे हैं। जबकि मैं बीस हजार और रॉयल्टी तीन परसेंट माँग रहा हूँ।
कुशल: जो दे रहे हैं, ले लीजिए, मगर हमारी वह शर्त उन्हें जरूर बताइएगा। उसके बिना मैं खुद नॉवेल नहीं छपवाना चाहूँगा।
छेगल वर्मा: वही शर्त मैंने उन्हें सबसे पहले बताई थी। और पाँच हजार अलग से इसलिए माँग रहा था। ताकि आप भी खुद रख लें। मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा, आप अपना सारा पैसा अनाथालय में क्यों दे रहे हैं ? कम-से-कम आधा तो रखना चाहिए आपको।

कुशल: नो वर्माजी, मैं नहीं रखूंगा। वैसे इसके कई कारण हैं। पहला तो ये कि भाई साहब कभी नहीं चाहेंगे कि मैं पाँच-सात हजार के लिए मारा-मारा फिरूँ, क्योंकि वे लेखक को दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी समझते हैं। न ही मुझे इतना पैसा चाहिए और न मैं पैसों के लिए लिखता हूँ। मेरी नजर में यदि ये पैसा गरीबों में चला जाए तो मेरी कलम में और धार पैदा होगी उनकी दुआओं से।

छेगल वर्मा: ओह, मिस्टर कुशल ! यू आर रिअली ग्रेट ! आप कितने सुलझे हुए इन्सान हैं, यह आज पता चला ! मैं आशा करता हूँ आपका सहयोग हमें हमेशा मिलता रहेगा और ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि आप अच्छे—से अच्छा लिखते रहें।
कुशल: (उठता है) अब हमें इजाजत दीजिए, फिर मुलाकात होगी।
छेगल वर्मा: माफ कीजिएगा, पहली बार आप अपनी प्रणेता को यहां लेकर आए और मैं चाय कॉफी तक नहीं पिला सका, हाँ, अगर आप चाहें तो बाहर किसी भी रेस्तरां में मेरे खाते में पेमेंट डलवाकर यहाँ की कमी पूरी कर सकते हैं।
कुशल: जी, शुक्रिया।

(कुशल और प्रणेता जाने लगते हैं)

छेगल वर्मा: (रोकते हुए) एक मिनट, मिस्टर कुशल।
कुशल: (पीछे मुड़कर) जी कहिए !

छेगल वर्मा: (उठकर) यदि आपको कष्ट न हो तो कुछ देर के लिए ऑफिस को सँभाल लीजिए। दरअसल मुझे एक जरूरी काम से बाहर जाना है, और आज उपसंपादक छायाजी भी अवकाश पर हैं।
कुशल: आप वाकई मुझे इस काबिल समझते हैं तो मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन....
छेगल वर्मा : डोंट वरी। मुझे आप पर पूरा विश्वास है, आप संभाल लेंगे। हां, आपके लिए कॉफी जरूर भिजवा दूँगा।

(वर्मा बाहर निकल जाता है।)
(कुशल और प्रणेता कुरसियों को अलग लेकर बैठते हैं।)

प्रणेता: कुशल, तुमने मुझे प्रेरणा क्यों कहा ?
कुशल: (मुसकराते हुए प्रणेता का हाथ अपने हाथ में लेकर) तो क्या गलत कहा ? तुम ही तो हो मेरी प्रेरणा, जिसके कारण मैंने लिखना शुरू किया और जिसकी तारीफों को पाकर अधिक-से-अधिक अच्छा लिखता रहा हूँ। वास्तव में जो तारीफें मुझे मिलती हैं, उनकी असली हकदार तुम हो।

(इसी बीच एक नौकर आता है और दो कप कॉफी रखकर चला जाता है।)

प्रणेता: अच्छा कुशल, यह बताओ जब तुम इतना अच्छा लिखते हो, पत्र-पत्रिकाओं में तुम प्रकाशित होते हो और उन कई अच्छे बड़े लेखकों से ज्यादा अच्छा लिखते हो, तो तुम्हारे भाई इससे नफरत क्यों करते हैं :
कुशल: बस यही आकर तो मेरी गाड़ी अटक जाती है। दरअसल वे चाहते हैं कि मैं भी उनकी तरह बिजनेस मैन बनूँ। जब मैं छोटा था तभी से वे यही कहते आ रहे हैं कि कुशल, तुम भी हमारी ही तरह पिताजी की राह पर ही चलना। मगर मेरा दिल बिजनेस की जगह लेखन में लग गया और जब उन लोगों को पता चला तो वे नाराज हो गए।
प्रणेता: कितनी अच्छी कविताएँ करते हो तुम ! मुझे अभी भी याद है, जब तुमने बड़े-बड़े कवियों के बीच अपनी कविता सुनाई थी तो कॉलेज का हर विद्यार्थी ‘वंस मोर, वंस मोर’ कहने लगा था और तुमने मेरी ओर देखा था। मैंने भी ‘वंस मोर’ कहा और तुम शुरू हो गए थे। क्या कविता थी वो...हो.. याद आया-


क्या तुमको लगता है, है ऐसा जहाँ,
हम दोनों को थोड़ा प्यार मिले,
चल फिर हम दोनों जाएँ वहाँ,
और प्यार का गीत बनाएँ सनम,
चल आ हम दोंनो दूर चलें,
जहाँ कुरबानी का नाम न हो,
गर मरना भी पड़े सुन मेरे सनम,
तो साथ मरें आ खाएँ कसम।


कितनी प्यारी कविता थी यह ! मैं तो उसी वक्त फिदा हो गई थी तुम पर।
(कुशल का हाथ चूम लेती है। फिर गरदन नीचे कर लेती है)
कुशल: इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम्हें मैं नहीं, मेरी कविताएँ अधिक अच्छी लगती हैं-और उनकी वजह से मैं। क्यों, एम आई राइट ?
प्रणेता: (नाराजगी) धत् ! ये किसने कहा तुमसे ? मैं तुम्हें अपने से भी ज्यादा चाहती हूँ, कभी आजमा लेना, पीछे नहीं हटनेवाली।
कुशल: यह सब फिल्मी बातें हैं प्रणी, कोई किसी के लिए कुछ नहीं कर सकता।
प्रणेताः ओह चाँद, फिर वही बात। भविष्य में कभी ऐसा वक्त आया तो मैं साबित कर दूँगी कि मैं क्या कुछ तुम्हारे लिए कर सकती हूँ।

कुशल: मान लो, मुझसे कहा जाए कि मैं या तो तुम्हें चुनूँ या अपने लेखन को-और मैं लेखन छोड़कर तुम्हें अपना लूँ, तो क्या तुम अपनाओगी या किसी और से.....
प्रणेता: (उठती है और जाने लगती हैः) मैं चली जाऊँ, यही बेहतर होगा।
कुशल: (हाथ पकड़कर रोकता है) बैठो, मुझे तुमसे कुछ कहना है।
प्रणेता: (बैठती है) क्या वही सब, जो तुम अपनी कविताओं में मुझे संबोधित करके लिखते आ रहे हो और मैं पढ़-पढ़कर खुश हो लेती हूँ कि चलो, जीवन में न सही, अपनी कविताओं में तो तुमने मुझे उतार ही लिया। फिर मेरे लिए इतना ही काफी है। वैसे भी मुझे ससम्मान यदि कोई अपना सकता है तो वो तुम हो, सिर्फ तुम। वरना...
कुशल: प्लीज प्रणी, पुरानी बातों को भूल जाओ। मैं तुम्हें अब वास्तविक जीवन में भी उतारने वाला हूँ। कल इतवार को मेरे भइयों और भाभियों को तुम्हारा इंटरव्यू लेना है, ताकि मेरे लिए तुम अप्वॉइंट हो सको।
प्रणेता: (मुसकराकर) यानी बात अभी भी वहीं की वहीं। लगता है, यह बेल मुंड़ेर नहीं चढ़नेवाली। खैर, चाँद साहब, कब तशरीफ लाऊँ ?

कुशल: कल ठीक एक बजे चारों भाई साहब और भाभीजी घर पर मिलेंगे; मगर मैं नहीं रहूँगा, इसका मलाल रहेगा।
प्रणेता: (आश्चर्य से) तुम कहाँ जाओगे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें कहीं भेज दिया जाए और पीछे से मुझे तुमसे अलग होने की कीमत थमा दी जाए। फिल्मों की तरह।
कुशल: अगर लाख-दो लाख दें तो रख ही लेना। हम लोग भागकर शादी कर लेंगे, तब काम आ जाएँगे।
प्रणेता: (गंभीर हो जाती है) मजाक मत करो, कुशल। ये कीमत तो तुम्हारे साथ बीते एक पल की भी नहीं है। तुम्हारी कीमत मेरी मौत ही हो सकती है, और कुछ भी नहीं। प्लीज कुशल, ऐसा मजाक करके मेरी उलझनों को और मत बढ़ाओ।
कुशल: अरे, डरो नहीं, प्रणी ! वे लोग कुछ सवालात करेंगे बस, और कुछ नहीं होना। जितना तुम प्यार करती हो न मुझसे उतना नहीं तो उससे थोड़ा कम तो वे भी करते ही हैं।
प्रणेता: कुशल मैं जानती हूं कि मैं तुम्हारे लायक नहीं। मैं तुम्हारा उतना खयाल भी नहीं रख पाऊँगी, जितना तुम्हारी भाभी वगैरह रखती होंगी...मगर इतना विश्वास मुझपर करो कि मैं अपनी जान..(बीच में ही रो पड़ती है)
कुशल: (प्रणेता को समझाने की मुद्रा में) देखो, प्रणी, ऐसे कैसे चलेगा ? कुछ नहीं होगा। प्लीज, रोओ नहीं, वरना मैं भी रो पडूंगा।

प्रणेता: पागल हो क्या, मैं तो यू ही मजाक कर रही थी। लो, कॉफी तो ठंडी हो चली हमारी बातों में। (कॉफी में उंगली डालती है)
कुशल: पता नहीं क्यों तुमसे मिलते वक्त मैं सबकुछ भूल जाता है।
प्रणेता: वह क्या ?
कुशल: हाल में ही एक नॉवेल पूरा किया है मैंने-‘सफर’ जिसके बारे में अभी वर्माजी से बातें हो रही थीं।
प्रणेता: मगर वह तो मैं पहले से ही जानती हूँ।
कुशल: इंपोसिबल ! मैंने कहां तुम्हें बताया था ‘सफर’ के बारे में !
प्रणेता: याद है, अपना नया कविता संग्रह तुमने दिया था-‘नफरत उगाने की तमन्ना’। उसी में एक पेज लगा हुआ था। उसमें लिखा था, ‘मेरी प्रणेता जो मेरी प्रेरणा है, मेरा उस तक पहुँचना ही सफर है।’ क्यों यही लिखा था न तुमने ?
कुशल: वेरी बैड ! मैं तो तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था, ताकि नॉवेल की पहली प्रति तुम्हें दे सकूं। जो तुम्हारे लिए लिखा गया था।

प्रणेता: (कुशल का हाथ अपने हाथ में लेती है) सरप्राइज कैसा ! कभी किसी ने अपनी ही धड़कन को, अपनी ही साँसों को, अपनी ही आत्मा को सरप्राइज दिया है जो तुम देते ?
कुशल: (मुसकराकर) लो, अब तुम भी कविता करने लगीं, प्रेरणाजी।
प्रणेता: (हाथों को चूमती हैः) कवि की होनेवाली धर्मपत्नी कविता नहीं करेगी तो क्या करेगी ?
(दोनों जोरदार ठहाका लगाते हैं। प्रणेता अपना सिर कुशल के कंधे पर रख देती है।)


दूसरा दृश्य


(एक खूबसूरत से मकान के सामने हरी घास का लॉन है। तरह-तरह के फूल गमलों में लगे हुए पौधों में खिल रहे हैं। लॉन इतना बड़ा है कि उसमें आठ दस लोग आराम से बैठ सकते हैं। लॉन में कुरसियाँ लगी हुई हैं।
इस वक्त लॉन में कोई नहीं है। जब परदा खुलता है तो धीरे-धीरे चार पुरुषों और चार स्त्रियों का वहाँ प्रवेश होता है और वे कुरसियों पर बैठते हैं। सबके चेहरों पर एक अजीब सी उलझन नजर आ रही है, और कोई बड़ा हादसा हो गया हो या होने वाला हो। उनकी बातें शुरू होती हैं।)
रामकुमार: रोशन, तुम्हें क्या लगता है, वह मान जाएगी ?






लोगों की राय

No reviews for this book