अमर सुहागिन - तेज बहादुर Amar Suhagin - Hindi book by - Tej Bhahadur
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अमर सुहागिन

तेज बहादुर

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2669
आईएसबीएन :81-7721-075-0

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एक सुहागिन औरत की दास्तान....

Amar Suhagin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


प्रिय प्राठकों
यह इतिहास नहीं, उपन्यास है। कुछ नाम, स्थान और एक-दो घटनाओं के अतिरिक्त उपन्यास में आए सभी नाम, स्थान और घटनाएँ काल्पनिक हैं। एक नाम के हजारों लोग हो सकते हैं। यदि किसी को इसमें साम्यता दिखाई दे तो वह संयोग मात्र है। इसलिए विनम्र निवेदन है कि प्रबुद्ध पाठकगण कृपया इसे उपन्यास समझते हुए उपन्यास की ही भाँति पढ़ें।
तेज बहादुर ‘तेज’

अमर सुहागिन

एक

जनवरी का महीना। कड़ाके की ठंड। अँगुलियाँ ठिठुरने लगीं, दाँत बजने लगे, ऊपर से आकाश में काले-काले बादल और अति शीतल तेज वायु। ऐसे में हर एक यही चाहता कि वह लिहाफ या रजाई में दुबका पड़ा रहे और गरम-गरम पकौड़ियाँ व गरम-गरम चाय मिलती रहे, पर मेजर राजेंद्र प्रताप सिंह अपनी बिटिया के साथ घंटादेव की तरफ जा रहा था। शाम को ही उसने शिवदत्त भाई साहब को कहा था कि जीप में डनलप पिलो का गद्दा और अगल-बगल में रानी के लिए गरम टोपा व स्कॉर्फ रखवा दें तथा पता लगा लें कि रतनपुर के लिए रास्ता कैसा है। उन्होंने बिना बताए अपनी तरफ से एक बास्केट में एक ब्रेड और बिस्कुट के कुछ पैकेट तथा पानी की चार बोतलें भी रखवा दी थीं। उनके ही बताए अनुसार मैं जीप बढ़ाए जा रहा था।

मध्याह्न के बारह बजे से कुछ पूर्व वे घंटादेव पहुँच गए। वहाँ एक सड़क पर कई होटल थे। एक के साइनबोर्ड पर लिखा था-‘‘एक्स सोल्जर्स को-ऑपरेटिव होटल एंड रेस्त्राँ’, नीचे लिखा था-‘आपका खाना आपके सामने बनेगा-माकूल दाम।’
उसी रेस्त्राँ के आगे जीप रोकी। जीप के रुकते ही उसमें कार्यरत चार बुजुर्ग फौजी ड्रेस में खड़े होकर देखने लगे और जब राजेंद्र प्रताप अपनी बेटी को गोद में लिये रेस्त्राँ में धुसे तो सावधान की मुद्रा में ही ‘सैल्यूट’ करके बोले, ‘‘वेलकम, मेजर साहब।’’

राजेंद्र प्रताप ने बेटी को गोद से उतारा तथा सावधान की मुद्रा में आकर एड़ी से एड़ी मिलाकर उनको सैल्यूट का उत्तर दिया और बाहर आकर जीप में से अपनी राइफल उठाई और कहा, ‘‘मुझे शाम तक रतनपुर पहुँच जाना है। इसलिए खाना जरा जल्दी बनाइए।’’
एक ने उत्तर दिया, ‘‘अभी तो बारह भी नहीं बजे हैं। आप खाना खाकर आराम कीजिए। अगर आप ढाई बजे भी चले तो आराम से नदी पर साढ़े चार बजे तक पहुँच जाएँगे। आखिरी फेरी पाँच बजे जाती है। अगर किसी वजह से आप पाँच बजे के बाद पहुँचे तो भूलकर भी वहाँ न रुकिएगा। नहीं तो सवेरे न जीप का पता लगेगा, और न आपके कपड़ों आदि का; आपकी रिवॉल्वर और राइफल भी नहीं बचेंगी। इतने चुपके से आप पर भाला मारेंगे कि राइफल बेकार हो जाएगी। आप रिवॉल्वर से दो-तीन को मार सकेंगे। तब तक आपकी जान चली जाएगी। नदी तट से दो-तीन किलोमीटर पर मल्लाहों का गाँव है। वहाँ भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। वापस यहीं लौट आइएगा।’’
दूसरे ने कहा, ‘‘ऑर्डर दीजिए।’’

राजेंद्र ने कहा, ‘‘पाँच रोटी, दाल मक्खन या घी पड़ी हुई। आलू-मटर की रसेदार सब्जी और सलाद। बेटी के लिए एक गिलास दूध और स्वीट डिश। हमारी स्पेशलिटी केसरिया मेवे पड़ी खीर है। एक प्लेट वह भी।...जीप को सेफ जगह में खड़ी कर दीजिए।’’
एक ने उनसे चाबी ली और पिछवाड़े बने गैराज में जीप बंद करके आ गया।
‘‘मेजर साहब। आप क्या पसंद करेंगे ? फ्रूट, फ्रूट-जूस या वेजिटेरियन सूप या बीयर-रम ब्रांडी आदि ?’’
‘‘बीयर चलेगी।’’
एक पीछे बने होटल में गया। बालटी में बर्फ डाली। चार-पाँच बीयर की बोतलें रखीं और ले आया। एक साफ बीयर-मग ऊपर तक भरा और राजेंद्र को दे दिया। फिर चारों बोले, ‘‘क्या हम चीयर्स कह सकते हैं ?’’
राजेंद्र ने कहा, ‘‘शौक से, अब तो मैं भी एक्स हूँ।’’
उन्होंने भी मग भरे। चीयर्स कहा और पीने बैठ गए। एक ने कहा, ‘‘मेजर साहब, आपने नॉनवेज का कोई ऑर्डर नहीं दिया। अपना ही पोल्ट्री फॉर्म है।’’

‘‘तो फिर दाल व वेजिटेरियन की जगह दो एग करी बना दीजिए।’’ दो-तीन घूँट पीने के बाद राजेंद्र ने पूछा, ‘‘इस जगह का नाम घंटादेव है ! बड़ा अजीब नाम है।’’
एक ने उत्तर दिया, ‘‘हमने बुजुर्गों से सुना कि कभी यह बड़ी बस्ती थी। नाम भी इसका चंद्र नगर था। पास में एक छोटा सा वन भी था। न जाने कहाँ से एक निर्दयी राक्षस उसमें आकर रहने लगा। भूख न भी लगी हो, फिर भी जानवरों, आदमियों को चीरने-फाड़ने लगता। बस्ती में त्राहि-त्राहि मच गई। लोग भागने लगे। मुहल्ले वीरान होने लगे। लोगों ने माँ दुर्गा की शरण ली। सच्चे दिल से उन्हें पुकारा। एक दिन जब वह राक्षस सो रहा था तो एक बड़ा भारी घंटा, जिसके अंदर तीन त्रिशूल थे, उस राक्षस पर गिरा। त्रिशूलों ने उसके बदन को छेद दिया और वह इस घंटे में बंद हो गया। साहब, हमें तो कोई तजरबा नहीं, पर बुजुर्ग लोगों को कहते सुना है कि कोई बाहरी आदमी अगर यहाँ कुछ देर भी रुका तो उसे घंटादेव के मंदिर में एक अगरबत्ती या धूपबत्ती सुलगाकर जरूर रख देनी चाहिए, अन्यथा उसे परेशानी उठानी पड़ जाएगी। चाहे कुछ घंटे को या पूरे दिन भर या ज्यादा दिनों तक। हाँ, हमने बड़े-बूढ़ों को हर मंगलवार को ऐसा करते देखा है।’’
उधर, घड़ी ने साढ़े बारह बजाए, इधर मेजर के सम्मुख भोजन की थाली आ गई।
खाना रखकर राजेंद्र प्रताप ने पर्स निकाला। चारों हाथ जोड़कर खड़े हो गए। एक ने कहा, ‘‘जब से रेस्त्राँ खोला है तब से आप पहले एक्स-सोल्जर...वह भी मेजर आए हैं। शायद आगे भी कोई मेजर न आए। हमने विक्टोरिया क्रॉस का नाम तो सुन रखा है, पर देखने का सौभाग्य आज मिला। आप बस इजाजत दे दीजिए कि चारों आपके साथ फोटो खिंचवा लें। बस, पेमेंट हो जाएगा।’’

राजेंद्र ने हँसते हुए कहा, ‘‘शौक से, पर एक शर्त पर। फोटो की एक प्रति मुझे भी भेज दीजिएगा।’’
एक गया और एक फोटोग्राफर को ले आया। अंदर भी एक बोर्ड लगाया। उसके साथ एक फोटो ली और खाना खाने लगे।
उन्होंने फिर कहा, ‘‘चलिए, आराम कर लीजिए।’’
वह मेजर को पिछले द्वार से ले गया, जहाँ उनका होटल था। एक सजे कमरे को खोल दिया, ‘‘आप आराम कीजिए। हम ठीक दो बजे आपको जगा देंगे।’’
राजेंद्र प्रताप तो दोपहर में सोने के आदी न थे। बेटी को सुला दिया और खुद सोफे पर लेटकर सिगरेट पीने लगे।
फौजी समय की पाबंदी मशहूर है। ठीक दो बजे जीप होटल के दरवाजे पर आ गई और कमरे में लगी घंटी बजी। राजेंद्र प्रताप और उनकी बेटी तुरंत कमरे से बाहर आ गए। चारों भागीदार खड़े थे। एक ने कहा, ‘‘सर, मौसम के तेवर बिगड़े नजर आ रहे हैं। हवा बहुत तेज चल रही है। बारिश के भी आसार हैं, इसलिए पीछे के परदे गिराकर अच्छी तरह बाँध दिए हैं। प्लास्टिक की मोटी शीट भी तीनों तरफ कसकर बाँधी है। आगे से बौछार रोकने के लिए एक शीट भी लटका दी है। आपको नीचे की सीटों से बाँधना पड़ेगा। एक ने मिट्टी के एक दीये में एक धूपबत्ती लगाकर दी। आप सीधे इसी सड़क पर जाएँ। आधे मील पर जरा सा हटकर घंटादेव का मंदिर है। यह जरूर सुलगाकर रखिएगा। उससे कुछ दूर मेन रोड है।’’
राजेंद्र प्रताप ने कहा, ‘‘आपने खाने का कुछ भी नहीं लिया। मैंने आपकी बात मानी। आराम से कमरे में ठहराया तो रूम चार्जेज जो मैं दूँ, उसे लेना होगा। इसको आप चाहे रिक्वेस्ट मानें या ऑर्डर।’’ और उसने दो सौ रुपए उन्हें दिए। चारों ने सैल्यूट किया। राजेंद्र ने भी सैल्यूट किया। बेटी को आगे बिठलाया और जीप स्टार्ट कर दी। यद्यपि उसे इन कलियुगी देवी-देवताओं में कोई श्रद्धा न थी, पर केवल घंटादेव देखने की उत्सुकता थी। अतः उसने जीप रोकी, उतरकर अंदर गया और केवल प्रचलित मान्यता के अनुसार धूपबत्ती सुलगाकर रख दी और जीप पर बैठकर चल दिया।

लगभग एक घंटे बाद ही सड़क के आर-पार एक लट्ठे को देखा। उसपर लाल झंडी फहरा रही थी। बोर्ड पर लिखा था-‘रुकिए, आगे सड़क खराब है।’ पी.डब्ल्यू.डी. का एक आदमी भी लाल झंडा लिये रुकने का इशारा कर रहा था।
उसने बताया, ‘‘आगे तीन-चार जगहों पर सड़क धँस गई है। आप इधर इस कच्चे रास्ते पर जाएँ। इसपर कहीं-कहीं खरंजा लगा हुआ है; जहाँ नहीं है वहाँ मिट्टी कुटी हुई है। साढ़े चार मील के बाद एक तिराहा आएगा। वहाँ एक छोटे खंभे पर बोर्ड लगा होगा-पक्की सड़क फेरी और तीर का निशान, आप उधर मुड़ जाएँ।’’
राजेंद्र ने पूछा, ‘‘फेरी कितनी दूर है ?’’
‘‘सीधे रास्ते से आधा घंटा लगता। अब आप घूम कर जा रहे हैं, इसलिए ज्यादा-से-ज्यादा एक घंटा लगेगा।’’
राजेंद्र ने घड़ी देखी। तीन बजे थे। उसने स्वयं से कहा-काफी समय है। सहसा मौसम बहुत खराब हो गया। बूँदें पड़ने लगीं, हवा और तेज हो गई। राजेंद्र की बेटी जिधर बैठी थी उधर का परदा गिराया और कच्चे रास्ते पर जीप मोड़ दी। आँधी-पानी का जोर बढ़ गया।

तिराहे पर जब पहुँचा तो बोर्ड एक सड़क पर गिरा मिला। संयोग से सीधा था। जिधर तीर की नोक थी, वह उसी सड़क पर बढ़ गया। घड़ी में चार बजे थे। स्पीड जरा तेज कर दी। खरंजा लगी सड़क एक जंगल से होकर जा रही थी। उसने सोचा कि इस जंगल से होकर फेरी का रास्ता है। अतः बढ़ता गया। आगे खरंजा नहीं था। पेड़ घने होते गए। उनके बीच में होकर रास्ता था। वह बढ़ता गया। अंधड़ चलने लगा। वर्षा भी मूसलाधार होने लगी। फड़फड़ करके पेड़ टूटने की आवाज आने लगी। घड़ी देखी तो पौने पाँच बज रहे थे ! अब फेरी समय से नहीं पहुँचा जा सकता। जीप मोड़नी चाही कि लौंटें, पर पेड़ों के कारण नहीं मोड़ पाया।

राजेंद्र प्रताप ने मन ही मन कहा, ‘काश ! वे चारों यहाँ होते तो देख लेते कि उनके घंटादेव की असलियत क्या है ! उनके कहने पर धूपबत्ती भी रखी, फिर भी यह परेशानी। खैर, यदि मैं इस रास्ते से वापस आया तो पोल खोलूँगा।’
राजेंद्र प्रताप एक तो राजपूत, दूसरे फौजी। कायरता क्या है, उसने जाना नहीं। सदा आगे बढ़कर दुश्मन का सामना किया। यह जंगल भी तो इस समय दुश्मन के समान हो रहा है। डरकर भागना कभी सीखा नहीं। कहीं तो इस बीहड़ जंगल का अंत होगा। पूरी रात अपने लिए पड़ी है। कुछ दहाड़ने की आवाज दूर से आई। उसने अपनी राइफल देखी, भरी हुई थी। होलस्टर से रिवॉल्वर निकाला, भरा हुआ था। उसे गोद में रखा। अंधड़ खत्म हो गया था, पर पानी बरस रहा था। बौछार नहीं पड़ रही थी। बेटी रानी ऊँघने लगी थी। उसे पीछे लिटा दिया। सर्दी और पानी दोनों से बचाने को अपना फौजी ओवरकोट, जो उसे फ्रांस में दिया गया था, ओढ़ा दिया। जीप की रोशनी में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।

एक-दो घंटे बाद अचानक जीप को झटका लगा। आगे की लाइटें टूटने की आवाज आई। जीप में भी अँधेरा हो गया। जीप किसी चीज से टकरा गई थी। आकाश काले-काले बादलों से घिरा। एक तारा तक नहीं था। जीप के अंदर घुप अँधेरा। बाहर झाँककर देखा। कुछ दिखाई नहीं दिया। इस समय यह देखना संभव नहीं कि जीप किस वस्तु से टकराई। घड़ी देखी, साढ़े दस बजे थे। जब तक उजाला न हो, सात-आठ घंटे बैठे-बैठे समय काटना, वह भी अकेले, चुपचाप, एक पहाड़-सा मालूम पड़ने लगा। कुछ जाड़ा-सा मालूम हुआ। वह सिर्फ जर्सी पहने था। बैग में ब्रांडी की बोतल निकाली और दो घूँट गले के नीचे उतार दिए। सिगरेट सुलगा ली। जब आँखों पर निद्रा देवी अपना अधिकार जमाना चाहती तो ओवरकोट की टोपी पहन सिर बाहर कर लेता। मुँह भीग जाता। नींद भाग जाती और फिर सोचने लगता-‘वह रतनपुर क्यों जा रहा है ? कोकिला देवी से मिलने ! कोकिला देवी से क्या रिश्ता है ? कोई नहीं और है भी दो विरोधी बातें एक साथ। बड़ी अजीब बात है। लगती अवश्य है, पर है सच। कैसे ? कोकिला देवी जगपाल सिंह की धर्म-पत्नी हैं और जगपाल सिंह मेरी पूज्य माता के धर्म भाई हैं। उनके तो एक सगा भाई है, कुँवर सुरेंद्र बहादुर सिंह, फिर...फिर रुकिए। पहले मेरी बात सुन लीजिए, बाद में प्रश्न कीजिए। उसने मन से कहा-‘उसके होश में एक बार भैया-दूज पर जगपाल सिंह और कोकिला देवी आए थे। मेरे पिता ने हर्ष प्रकट किया। माताजी ने उन दोनों को टीका किया। दोनों को साथ-साथ ग्रास खिलाए और बाद में एक-एक मिठाई दी। बस, उसे खाकर माँ को सौ-सौ के नोट देकर दोनों चल दिए। पिताजी ने जीमने के लिए आग्रह किया तो जगपाल सिंह ने कहा, ‘छोटी बहन के यहाँ जीमना उचित नहीं।’

दो

मेरे पूछने पर माताजी ने बताया था, ‘इनके पिता बृजपाल सिंह और तेरे नाना बृजेंद्र बहादुर सिंह सहपाठी रहे हैं। पाँच-छह साल दोनों एक कमरे में रहे। दोनों में दाँत-काटी दोस्ती थी। जब दोनों पढ़कर घर वापस आए तो ज्यादातर साथ-साथ रहते। तेरे नाना जब भी बाहर जाते तो दो पठान अंगरक्षक उनके साथ जाते।’
मैंने माँ से पूछा, ‘पठान ?’
‘हाँ, पठान ! मेरे बाबा के बाबा राजा सूर्येंद्र बहादुर सिंह....’
‘राजा ?’
‘हाँ ! बहादुरगढ़ एक बड़ी जागीरदारी है। इसके जागीरदार को राजा का खिताब मिला था। तेजगढ़ इससे भी काफी बड़ी है। अतः महाराजा का खिताब दिया गया। देख, टोका-टाकी मत करना। सुनना है तो चुपचाप सुन, नहीं तो चले जाना। मैं भी दूसरे काम देखूँ।’
‘नहीं-नहीं ! मेरी प्यारी अच्छी माँ, तू बता। मैं चुपचाप सुनूँगा।’
माँ ने कहा, ‘वे घोड़ों के और आदमियों के पारखी थे। एक दिन वे कहीं जाने के लिए गढ़ी से निकले कि पाँच-छह धोड़ों पर सवार मर्द, औरतें, बच्चे वहाँ पहुँचे। राजा साहब को देखते ही सब घोड़ों से उतर पड़े। मर्द लोग घुटनों पर बैठ गए-पनाह राजा साहब !’

घोड़ों को देखते ही वे समझ गए कि असली अरबी हैं। पुरुषों, औरतों, बच्चों के चेहरे कुम्हलाए हुए और धूल-धूसरित थे; पर अच्छा खानदान झलक रहा था। राजा साहब एक सेवक से बोले, ‘सबको महल से बाहरवाले कमरे में बिठाओ। बच्चों के लिए दूध और बड़ों के लिए चाय या लस्सी, जो ये पसंद करें। साथ में रोटी, पूड़ी जो भी हो, दो। साईस से कहो, घोड़ों को खाली अस्तबल में ले जाएँ। दाना-पानी दें, मलें-वलें, नहलाएँ।’ फिर उन पठानों से कहा, ‘आप लोग सराय में जाकर आराम करें, थकान उतारें, फिर आइए। यह आदमी आपको वहाँ ले जाएगा। खाने-पीने की फिक्र न करें।’
‘हम सीधे अफगानिस्तान से आए हैं।’
‘आप यह बताइए कि इतनी दूर क्यों आए ?’

एक ने जवाब दिया, ‘हम लोग बादशाह सलामत के नजदीकी रिश्तेदार हैं और उँचे ओहदों पर थे। बादशाह की हम पर खास इनायत थी। हमारे बादशाह शलामत वैसे तो बहुत अच्छे हैं, पर हैं कान के कच्चे। हमसे वहाँ लोग जलते थे। उन्होंने वजीर को मिलाया। वजीर ने हम लोगों के खिलाफ कान भरे। एक ख्वास वहाँ सब सुन रहा था। उसने फौरन आकर बताया कि आप लोगों को मौत की सजा दी गई है। हम लोगों ने देर न की। इत्तफाक से काली रात थी, जिसे आप अमावस कहते हैं। हम लोगों ने कुछ भी न लिया। सिर्फ अपनी राइफलें, तलवारें और दो थैली भरकर मेवे लिये। आठ घोड़ें अपने अस्तबल से लिये। साईस था नहीं कोई। उनके पैरों में चमड़े के मोजे पहनाए, जिससे खुरों के निशान न बनें और पिछवाड़े से निकल भागे। हम यह जानते थे कि जैसे ही हमारी फरारी मालूम होगी, खोली हमारे पीछे दौड़ाए जाएँगे, इसलिए अपने हर एक घोड़े की दुम से एक लंबा बोरा बाँधा। यह भी जानते थे कि खैबर दर्रे पर चौकसी बढ़ा दी गई होगी। पर हम लोग उधर नहीं गए। दक्खिन की जानिब चलकर एक सूनी वादी में ठहर गए। दिन भर वहीं रहे। रात होते ही राजपूताने में घुस आए। जासूसों को हमारे भागने की खबर कर दी गई होगी। इसी से इतनी दूर चले आए। राह में एक जगह डाकुओं ने घेरा भी, पर हमारे आगे टिक न पाए। भाग गए। उसी मुठभेड़ में हमारे दो घोड़े मारे गए।’

यह पूछे जाने पर कि कैसा काम वे चाहते हैं और क्या तनख्वाह लेंगे ? उन्होंने जवाब दिया, ‘हम तो फौजी किस्म के हैं। हमें रहने की जगह, खाने-कपड़े के लिए मुनासिब तनख्वाह।’
राजा साहब ने कहा, ‘गढ़ी के अंदर ही तीन-चार मकान खाली पड़े हैं। आप पसंद कर लीजिए। खाने-कपड़े का इंतजाम हम करेंगे। बीमारी की हालत में हमारा डॉक्टर या हकीम-वैद्य इलाज करेंगा। ऊपर से दस रुपए महीना। कहिए, मंजूर है ?’
वे बोले, ‘हुजूर, हम क्या बोलें। आपने तो अंधे को आँखें दीं। आपको यह बता दूँ कि हम पठान नमकहराम नहीं होते। हमारे खानदान का बच्चा-बच्चा, मर्द-औरतें सब गुलाम रहेंगे। हमारे बाद आगे की पीढ़ी भी। आपके अहसानों का बदला कयामत तक नहीं चुकाया जा सकेगा।’
‘पर, आपको पहले अपनी जाँबाजी का इम्तिहान देना होगा।’
इम्तिहान में चारों पास हो गए और अंगरक्षक नियुक्त कर दिए गए। उन चारों का ही खानदान अंगरक्षक का काम कर रहा है।

एक दिन मेरे बाबा साहब राजेंद्र बहादुर सिंह ने मेरे पिता और चाचा बृजपाल सिंह को बुलाया और दोनों की पगड़ी बदलवाई। फिर बोले, ‘अब तुम दोनों वयस्क हो गए हो। मैं बृजेंद्र को सबकुछ सौंपकर निश्चिंत हो जाना चाहता हूँ। राजतिलक का मुहूर्त अगली पूर्णिमा है। गाँव के मुखिया लोग, नाते-रिश्तेदार और आस-पास के जागीरदार आएँगे। वे दोनों दुष्ट भी आएँगे।’
‘कौन पिताजी...कौन ?’
‘अरे ! वहीं, सुर्जन और दुर्जन। इनके पिता बहुत सीधे थे। पुरखों का काफी मान था। जागीर भी अच्छी-खासी थी। पर इन दुष्टों ने वेश्यागमन, शराब और जुए में सब खो दिया। अब देसी ठर्रा पीकर अपनी प्यास मिटाते हैं। दोनों खानदानी कलंक हैं। गले में ऐसे अटके हैं कि न निगलते बनता है, न उगलते। न भी बुलाया जाए तो भी दोनों आएँगे। आईना पकड़कर चोरों के समान इधर-उधर खड़े हो जाएँगे। इन्हें अच्छी तरह पहचान लेना। (पठानों से) खाँ साहब, आप भी तथा अपनी बेगम-बच्चों से कहना कि पहचान लें। ये खुलकर तो कुछ करेंगे नहीं, हाँ, छिपी घात से बाज नहीं आएँगे। सामान खरीदने और अटाला (रसोई) में खूब चौकन्ने रहना। यह किसी को जहर भरी कटारी भी लेकर भेज सकते हैं कि बस, जरा सा खरोंच देना। यही नुस्खा उन्होंने अपने सगे बहनोई पर अपनाया; पर उस आदमी ने वहाँ पहुँचकर सब कुबूल किया। पूछने पर बताया कि उसकी पत्नी और लड़की को घर में बंद कर रखा है। इससे कहा, समझ लो, अगर तुम खून लगी कटार वापस न लाए तो ये गुंडे तुम्हारी बीवी व लड़की की दुर्गति करेंगे और घर में बंद करके आग लगा देंगे। अगर तुम असफल होकर आए तो तुम्हें भी मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा देंगे। अगर सफल होकर आए तो तुम्हें हजार रुपए इनाम देंगे। कहीं जाना चाहो तो जाने दिया जाएगा। इत्तफाक से एक जंगली खरगोश मारकर शिकारी दे गया था। उसी के खून में नोक से कुछ ऊपर भिगोकर दे दिया गया। वह रात में परिवार सहित आया। सवेरे अपने गाँव चला गया। उनका बहनोई मुझसे सब कहने आया। तुम सबको चौकन्ना रहना है। समझे !’

माताजी ने आगे बतलाया, ‘मेरी शादी सात साल की उम्र में कर दी गई। मैं सुरेंद्र से ढाई साल बड़ी हूँ। तुम्हारे पिता उस समय दस वर्ष के थे। प्रचलन के अनुसार नारियल आदि लेकर पंडित या पंडित और नाई को विवाह का प्रस्ताव लेकर जाना था; परंतु न मालूम क्यों, पिताजी भी गए और अपने साथ चाचा बृजपाल सिंह को भी ले गए। तुम्हारे बाबा ने ज्योतिषियों को बुलाकर जन्म-पत्रियाँ मिलवाईं। उनके कहने पर प्रस्ताव मान लिया। फौरन पिताजी और चाचा ने पाँच-पाँच अशर्फियाँ उनको नजर करीं और इतनी ही महारानी साहिबा को भी। ज्योतिषियों ने पाँच-छह महीने बाद वैशाख सुदी पंचमी को रात नौ बजकर चालीस मिनट का शुभ मुहूर्त निकाला और कहा कि ऐसा शुभ मुहूर्त सात साल बाद आएगा।
पिताजी ने महाराजा साहब से कहा, ‘अगर मुझे कुछ हो जाए...?’
‘ऐसा क्यों कहते हैं, राजा साहब।’
‘इसलिए कह रहा हूँ महाराजा साहब, क्योंकि किस समय क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। उस हालत में मेरे सहपाठी पगड़ी बदल भाई बृजपाल सिंह कन्यादान करेंगे और यही सारा प्रबंध करेंगे।’ उन्होंने दोनों नालायकों के बारे में भी बतला दिया। महाराजा साहब ने भी कहा, ‘राजा साहब ! बरात में ढाई सौ से ज्यादा आदमी नहीं होंगे और बरात तीसरे दिन तड़के विदा होगी। ज्यादा रुकने की जिद न कीजिएगा।’
लौटकर शादी की तैयारियाँ जोर-शोर से होने लगीं। होनी बड़ी प्रबल है। जिस समय जो घटित होना पूर्व निर्धारित होता है, वह घटित होकर रहता है।

विवाह के एक महीना पूर्व मेरे पूज्य पिताजी एक दिन अपने दोनों अंगरक्षकों के साथ घोड़े दौड़ाते हुए कहीं से लौट रहे थे। गढ़ी के पीछे एक जगह बहुत पथरीली थी। बड़े, छोटे, नुकीले पत्थर जमीन में गड़े हुए थे। पगडंडी इन पत्थरों से दूर थी। पत्थरों के पास से इनका घोड़ा अचानक बिदक गया। उछला और पगडंडी से हटकर पत्थरों से टकराया। दाएँ घुटने के नीचे की हड्डी कड़ाक से टूटी। घोड़ा गिरा और पिताजी बड़े जोर से एक पत्थर पर सीने के बल गिरे। मुँह से ‘हाय’ निकली और बेहोश हो गए। सिर किसी नुकीले पत्थर से टकराया। माथे पर घाव हो गया, खून बहने लगा। बड़े खाँ साहब ने इधर-उधर निगाहें दौड़ाईं। उन्हें एक जगह गेंदे का पेड़ दिखाई दिया। लपककर काफी पत्तियाँ ले आए। उसका रस घाव पर टपकाया और काफी पत्तियों की लुगदी बनाकर घाव पर रख दी। अपना साफा फाड़ उसकी गद्दी बनाकर रखी। ऊपर से पट्टी बाँध दी। समस्या उठी कि कैसे गढ़ी ले जाएँ संयोग से कुछ दूर एक पालकी किसी जगह जाती दिखाई दी। उन्होंने अपने छोटे भाई से कहा, ‘उसे ले आइए।’ घोड़ा दौड़ाकर वह गया और उसे ले आया। दोनों ने मिलकर राजा साहब को उसमें लिटाया। बड़े ने कहा खूब तेज जाओ और बृजपाल साहब को बुला लाओ। रास्ते में डॉक्टर साहब को कहते जाना।’ फिर बोले, ‘अल्लाहताला का करिश्मा देखें ! अपने आका के चेहरे पर नूर वही है। होंठों पर मुसकराहट वही है। मैं पालकी के साथ जाता हूँ।’

गढ़ी पहुँचे तो कुहराम मच गया। नौकर-चाकर दौड़ पड़े। हाथोहाथ राजा साहब को महल में पहुँचाया।
खाँ साहब ने एक साहब से कहा, ‘फौरन पट्टी, तख्ती, मरहम लेकर आओ, घोड़े को धीरे-धीरे ले आओ !’ डॉक्टर साहब भी आ गए थे। फौरन घाव धोकर दवा लगाई। खून बहना तो बंद हो चुका था। फिर होश में लाने के लिए उपचार करने लगे। बृजपाल भी बदहवास से भागे आए। कुछ देर बाद होश आ गया।
‘बृजपाल ! याद है, मैंने तेजगढ़ जाते समय तुमसे क्या कहा था ? यही कि मैं अपनी प्यारी बिटिया की शादी नहीं कर पाऊँगा।’ कुछ क्षण बाद बोले, ‘मुझे मेरे बेडरूम में क्यों पलंग पर लिटाया गया है, बृजपाल भैया ! बाहरवाले कमरे से कुरसियाँ, सोफा, फर्श वगैरह हटवा दो। मुझे जमीन पर लिटाओ। मुख दक्षिण दिशा में हो।’
माँ और मैं जोर से रो उठीं। चाचाजी के भी आँख से आँसुओं की झड़ी लग गई।

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