सरगम - फिराक गोरखपुरी Sargam - Hindi book by - Firaq Gorakhpuri
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सरगम

फिराक गोरखपुरी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2673
आईएसबीएन :81-7028-270-5

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इस पुस्तक में चुनी हुई गजलों का संकलन किया गया है...

Sargam

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘सरगम’ उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी की चुनी हुई बेहतरीन ग़ज़लों का संकलन है। जो ग़ज़लें इसमें शामिल की गई हैं। वे फ़िराक़ साहब ने खुद चुनी थीं। फ़िराक़ साहब से पहले उर्दू शायरी में करुणा और शान्त रस का ऐसा अनोखा संगम कभी-कभार ग़ालिब और मीर जैसे महान शायरों की शायरी में ही देखने को मिलता था। सरगम की ग़ज़लों में प्रेम और सौन्दर्य के सम्बन्धों और प्रतिक्रियाओं की जो अनुगूँजें सुनाई देती हैं वे मन की गहराइयों में उतर जाती हैं। इन अनुगूँजों में संगीत है। सहजता है और धरती की सुगन्ध भी। इन ग़ज़लों की यह विशेषता ही ग़ज़ल प्रेमियों को मन में बरबस अपनी तरफ खींचती है।
 
उर्दू शायरी के इतिहास में फ़िराक़ गोरखपुरी का आगमन एक युगान्तरकारी घटना के रूप में दर्ज है। राष्ट्रीय पुनर्जागरण के उस दौर में जबकि राजनैतिक सामाजिक कारणों से उर्दू कविता-धारा राष्ट्रीयता की धारा से अलग-थलग पड़ती जा रही थी, तब फ़िराक़ साहब ही थे जिन्होंने उसे मुख्य धारा से मिलाने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उर्दू शायरी की लगभग ढाई सौ साल पुरानी परम्परा का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए उसे एक नई आवाज़, नया स्वर देना उनकी क़लम का सबसे बड़ा कारनामा है।


भूमिका


महाकवि कहलाना उसी कवि को शोभा देता है जो सृष्टि और जीवन के महत्त्व की चेतना और अनुभव लाखों-करोंड़ो व्यक्तियों को दे सके। आज से साठ-पैंसठ बरस पहले जब ‘फ़िराक’ ने काव्य-रचना शुरू की तो भारत का पुनरूत्थान या पुनर्जागरण अपनी जवानी पर आ रहा था। महर्षि दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, परमहंस रामकृष्ण, विवेकान्नद, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविन्द घोष, रानाडे, तिलक, गोखले और अनेक दूसरे महापुरुषों ने एक नये भारत को जन्म देना शुरू कर दिया था। साहित्य में यह पुनर्जागरण बंकिमचन्द्र चटर्जी, भारतेन्दु हरिशचन्द्र, शरच्चन्द्र, पंडित रतननाथ सरशार, चकबस्त, प्रेमचन्द, श्री रमेशचन्द्र दत्त की कृतियों द्वारा वाणी पा रहा था। कुछ मुसलमान लेखक भी मैदान में आ गए। लेकिन विदेशी शासन के कारण, मुसलमानों  की जागृति में इस शासन की कूटनीति और सर सैयद अहमद आदि मुस्लिम नेताओं द्वारा चलाये हुये आन्दोलन ने मुस्लिम जागरण को भारत के राष्ट्रीय जागरण से अलग-अलग रहना बल्कि उसका विरोध तक करना उस समय के मुस्लिम साहित्य में खुले या छिपे ढंग से दिखाई देता है। गुरुदेव टैगोर ने इसे मुस्लिम विगलता (Muslim exclusivism)  कहा है। यह ज़रूर है कि सच्चाई अपने आपको मनवा लेती है। इसके कारण मुस्लिम साहित्य में साथ ही साथ दो आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं। एक तो आज़ाद भारतीयता की आवाज़ दूसरी आवाज़ भारतीय या राष्ट्रीय जीवन की प्रमुख धारा या असली बहाव से कुछ अलग-अलग या अजनबी रहने की प्रवृत्ति या धारणा।

‘फ़िराक़’ साहब के जीवन में दस या ग्यारह वर्ष की उम्र से ही भारतीयता की केन्द्रित प्रेरणायें और शक्तियां चुपचाप अपना काम करने लगी थीं। जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती गई और उसकी मनोवृत्तियों और आन्तरिक-प्रेरणाओं का गुप्त रूप से विकास होता गया, उनमें भारत चेतना प्रबल होती गई।

 उनके के घरेलू जीवन में कुछ घटनाओं का उन पर गहरा प्रभाव पड़ता रहा। वेदान्त के ज्ञानी और प्रचारक संन्यासी महात्मा अकसर उनके पिता के यहाँ आते-जाते रहे। बचपन में फ़िराक़’ के मास्टर साहब फ़िराक़ और उनके भाई-भतीजों के सामने तुलसीकृति रामायण का पाठ करते थे; जिससे फ़िराक बहुत प्रभावित होते थे। घरवालों और पड़ोसियों से भारतीय लोक कथायें सुनकर उनका मुस्तक़िल असर फ़िराक़ के बचपन पर पड़ता रहा और वह भीतर ही भीतर बनते रहे। लोक-संगीत और लोककथायें उनकी चेतना के रूप पर अपना गहरा असर डालती हैं। आज जबकि आधी शताब्दी से फिराक़ साहब की ख्याति अखण्ड भारत में कवि की हैसियत से फैल चुकी है, फिर भी जिस बात को बहुत लोग जानते हैं वह यह कि जिन शक्तियों ने उन्हें कवि बनाया और उस तरह का कवि बनाया जैसी उनकी कविता है, वह काव्य रचना की शक्तियाँ नहीं थीं; बल्कि एक नई तरह की भारत-चेतना की शक्तियाँ थीं। उनके अन्दर भारतीयता एक विशेष व्यक्तित्व और रूप-रेखा के साथ जन्म ले रही थी और भारतीय-आत्मज्ञान चुपचाप जन्म ले रहा था।

यह संग्रह केवल फ़िराक़ की ग़ज़लों का संग्रह है। जो बातें फ़िराक़ के संबंध में अभी-अभी कही गयी हैं, उनका अत्यन्त सुंदर और चमत्कारपूर्ण वर्णन फ़िराक़ की अनेक कविताओं में मिलता है, जो ग़ज़लों नहीं बल्कि नज़्मों की शक्ल में है। इन कविताओं की प्रमुख मिसाल उनकी कविता ‘हिंडोला’ में पाई जाती है। हिंडोला के अलावा, नग़्मये हक़ीक़त, जुगनू, रूप की रुबाइयां, आधी रात, परछाइयाँ और भारत दर्शन की रुबाई आदि ऐसी रचनाएँ हैं जो फ़िराक़ की आन्तरिक प्रेरणाओं का पता देना शुरू कर दिया था, जिससे-उनके साथी-सहयोगी और घर के बड़े या उनके अध्यापक एक अवर्गीकरण और अकथनीय ढंग से प्रभावित हो जाते थे। सौभाग्य से इसी ज़माने में उन्होंने एफ० ए० और बी०ए० क्लास की शिक्षायें प्राप्त कीं और बचपन की अर्द्ध-ज्ञात शक्तियों ने अपने आप को पाना और पहचानना शुरू कर दिया। न्याय (Logic), दर्शन (Philosophy), साहित्य में वर्ड् स्वर्थ, कीट्स, शैली, टेनीसन और दूसरे विख्यात कवियों की रचनायें, सूर, तुलसी कबीर, मीरा, रहीम और उच्च्तम फ़ारसी कवियों की कृतियां, वेदान्त पर स्वामी रामतार्थ, स्वामी विवेकानन्द इत्यादि के विश्व-विख्यात भाषण, इंगलैड और योरुप तथा अमरीका के उन विचारकों के लेख, जिन्होंने भारतीय संस्कृति का सुन्दरतम उल्लेख किया था और इन सबके अतिरिक्त फ़िराक़ का अपना मौलिक चिंतन और मनन-ये सब शक्तियाँ मिलकर काम करने लगीं। जब इन शक्तियों ने अपना पहला समात्त कर लिया तब पहले-पहल फ़िराक़ की कविता ने जन्म लिया और फ़िराक़ उभरते हुए कवि की हैसियत से लोंगो के सामने आने लगे।

फ़िराक़ साहब पर चारों तरफ़ से मुसीबतों और बरबादियों के पहाड़ टूट पड़े थे। न जाने किन गुप्त शक्तियों और प्रेरणाओं की सहायता से फ़िराक़ साहब ने इन नागरीय परिस्थितियों में अपनी मानसिक शक्तियों को इतना बचा कर रखा कि एम० ए० और बी० ए० की शिक्षाओं और परिस्थितियों में उनका चमत्कार अध्यापकों और सहपाठियों में बचा रह गया। एफ० ए० में फ़िराक़ साहब का पूरे प्रदेश में सातवां स्थान था और पंडित अमरनाथ झा का तीसरा स्थान था। बी० ए० में फ़िराक साहब का चौथा स्थान था और डा० ज़ाकिर हुसैन का तीसरा। यह है 1918 के जुलाई तक फ़िराक़ साहब के विकास और उन्नति की सच्ची कहानी।

इसी दौरान वह अंग्रेजी राज्य की उच्चतम पदवियों, अर्थात् पी० सी० एस० और आई० सी० एस० के लिए चुन लिये गए और अपने सहपाठियों से बहुत आगे  बढ़ गये।
सन् 1914 में उनका ब्याह हुआ जो एक निहायत अन्तःकरण-हीन पतित दृष्टिकोण रखने वाले आदमी ने तय कराया था। फ़िराक साहब को और उनके पूरे परिवार को धोखा देकर। जब फ़िराक़ साहब की स्त्री विदा होकर फ़िराक़ साहब के घर आई तब देखा गया कि लड़की बहुत ही कुरूप थी। न तो वह लड़की इतने अच्छे घराने में आने के लायक थी और न ही उसके घर वाले इस योग्य थे कि फ़िराक़ साहब के और उनके परिवार के रिश्तेदार बन सकें। लड़की गिनती तक नहीं जानती थी। रामचरितमानस की एक पंक्ति तक नहीं पढ़ सकती थी। न घर का हिसाब-किताब रख सकती थी। न किसी तरह का खाना बनाना जानती थी। फ़िराक़ साहब के घर में उसके आने के दिन से ही सबको हर समय ऐसा लगता था कि इस घर में किसी की मत्यु हो गयी है। उसके एक बेटा भी पैदा हुआ, जो बिल्कुल अपनी माँ पर गया था। स्कूल के लड़के यह देखकर कि कितने बड़े बाप का लड़का है यह समझ सोच नहीं पाते थे कि उनकी माँ कितनी कुरूप और कितनी बड़ी डलर्ड हैं। नवें दर्जे में बार-बार फेल हो जाने पर और सहपाठियों के निर्दय मजाक के कारण इस लड़के ने अठारह-उन्नीस वर्ष की उम्र में ही आत्महत्या कर ली। लेकिन उसकी माँ घर में बनी रही और उसकी मनहूसियत के फलस्वरूप फ़िराक़ साहब का घर सिरे से उखड़ गया और हरा-भरा लहलहाता हुआ बाग एक मुर्दाघाट बन गया। कई बार फ़िराक़ साहब की स्त्री को उसके मायके भेज दिया गया लेकिन उससे दो एक दो लड़कियाँ भी पैदा हो चुकी थीं, इसलिये लगभग चालीस वर्ष तक खून पीकर फ़िराक साहब ने अपनी स्त्री को अपने साथ उसी घर में रखा जो उखड़ कर रेगिस्तान बन चुका था।

 फ़िराक साहब के घर वालों को यह अनुभव हुआ कि जिस परिवार से वह आई वह परिवार और इसके निकटतम परिवारों की कुछ लड़कियाँ जो दूसरे घरों में गईं वहाँ भी नतीजा बहुत खराब निकला। यह अतन्त tragedy या दुःखान्त नाटक खास-खास लोग ही जानते हैं। इन हालातों में फ़िराक़ साहब ने काव्य रचना शुरू की और उनके महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व ने पहले उर्दू जगत में और फिर क्रमशः सम्पूर्ण भारत के साहित्यिक जगत में उच्चतम स्थान पाना आरंभ कर दिया। यह ख्याति उस हालत में फ़िराक़ साहब से प्राप्त करनी शुरू की जब उनके जीवन का घातक और सर्वनाशी घाव अभी बिल्कुल नया-नया था और कभी अच्छा होने वाला नहीं था। बी० ए० में आने से पहले ही घाव लग चुका था। उस पूरे वर्ष में एक रात भी फ़िराक़ साहब को नींद नहीं आई और उन्हें भयानक संग्रहणी का असाध्य रोग हो गया, जिसके कारण फ़िराक़ साहब को साल भर के लिए कालेज छोड़ देना पड़ा। पंडित त्र्यम्बक शास्त्री का बनारस में इलाज करवाया गया और तब फ़िराक़ साहब की जान बाल-बाल बची लेकिन एक शाप की तरह विवाह से पैदा होने वाला दुःख अपना घातक काम करता रहा और अब फ़िराक़ साहब अस्सी वर्ष की उम्र के बाद इतने  रोगों के शिकार हो गये हैं कि वह चारपाई नहीं छोड़ सकते।

कई बरस हुए जब एक बार फ़िराक साहब अपने जन्म-स्थान गोरखपुर गये हुए थे तो जिस धोखेबाज ने उनकों और उनके परिवार को धोखा देकर उनका ब्याह कराया था, उससे और उनके ससुर से फ़िराक़ साहब की भेंट हुई। फ़िराक़ साहब ने मामलें में विश्वासघातों और ख़ासकर ज्योतिषियों ने इस विवाह के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी और मैं यह जानता था कि यह विवाह भयानक हद तक अनुचित है लेकिन मुझे तो अपने घर का बोझ हलका करना था। जिस धोखेबाज ने यह ब्याह तय किया था उसने यहाँ तक मान लिया कि ब्याह बिलकुल धोखा लेकर किया गया था, आप चाहें तो दूसरा ब्याह कर लें। फ़िराक़ साहू ये बातें सुनकर हक्का-बक्का रह गये।

 इस विवाह से उन पर और उनके घर पर इतनी मुसीबतें आ चुकी थीं। कि दूसरा ब्याह क्या करते तब उनकी उम्र भी पचास वर्ष के लगभग हो चुकी थी। इस धोखेबाज ने अपनी निहायत गंवार और फूहड़ सगी बहन का ब्याह भी धोखा देकर फ़िराक़ साहब ही के एक दोस्त से कर दिया था। ब्याह के बाद लड़की के विदा होने से पहले कुछ ही देर के लिए ससुराल में इस लड़की को देखकर उन्हें इतनी घृणा हुई कि उसने उसे जिन्दगी भर के लिए त्याग दिया। गौना या विदाई हुई ही नहीं। उसने अपना दूसरा ब्याह कर लिया और एक सुहागिन बेवा की तरह इस धोखेबाज की बहन ब्याह के लगभग तीस बरस बाद तक अपने मैके में पड़ी रह कर मर गई। फ़िराक़ साहब के जीवन में जिस आन्तरिक विनाशकारी दुःख ने उन्हें जीवन भर के लिए बर्बाद कर दिया था, उसे फ़िराक साहब के परिवार के लोग और सब रिश्तेदार जानते हैं फिर भी फ़िराक साहब ने अपने आप को मर-मर के संभाले रखा और मुसीबतों से लड़ते हुए ख्याति पर ख्याति अर्जित करते गये।




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