टेढ़ी लकीर - इस्मत चुगताई Tedi Lakir - Hindi book by - Ismat Chugtai
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टेढ़ी लकीर

इस्मत चुगताई

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :368
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2717
आईएसबीएन :9788171787944

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इस्मत चुग़ताई के उर्दू उपन्यास टेढ़ी लकीर का लिप्यन्तरण

Tedi Lakir

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस्मत चुग़ताई
जन्म : 21 जुलाई, 1915, बदायूँ (उत्तर प्रदेश)।
इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़ें की दबी-कुचली सकुचाई और कुम्हालाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है।

इस्मत चुग़ताई पर उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा चला। लेकिन ख़ारिज हो गया। गेन्दा उनकी पहली कहानी थी जो 1949 में उस समय उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका ‘साक़ी’ में छपी। उनका पहला उपन्यास ज़िद्दी 1941 में प्रकाशित हुआ। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी और बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं। कई कहानी-संग्रह हैं : कलियाँ, चोटें, एक रात, छुई-मुई दो हाथ दोज़खी, शैतान आदि। हिंदी में कुँवारी व अन्य कई कहानी-संग्रह तथा अंग्रेजी में उनकी कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशित जिनमें काली काफ़ी मशहूर हुआ। कई फ़िल्में लिखीं और जुगनू में एक रोल भी किया। 1943 में उनकी पहली फिल्म छेड़-छाड़ थी। कुल 13 फिल्मों से वे जुड़ी रहीं। उनकी आख़िरी फ़िल्म गर्म हवा (1973) को कई अवार्ड मिले।
साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें ‘इक़बाल सम्मान’, मखदूम आवार्ड और नेहरू आवार्ड भी मिले। उर्दू दुनिया में ‘इस्मत आपा’ के नाम से विख्यात इस लेखिका का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार मुंबई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया।


शबनम रिज़वी


पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर में जन्मी शबनम रिज़वी ने दस वर्ष पूर्व इस्मत चुग़ताई को अपने अध्ययन का विषय बनाया था। मूलतः कहानीकार शबनम रिज़वी ने तब से अब तक इस्मत की दर्जनों कहानियों के हिन्दी अनुवाद तथा उपन्यास टेढ़ी लकीर का लिप्यन्तरण किया। उर्दू में उनकी पुस्तक इस्मत चुग़ताई की नावेलनिगारी 1992 में दिल्ली से प्रकाशित। फ़िलहाल हिन्दी में इस्मत चुग़ताई ग्रन्थावली की तैयारी में व्यस्त।


आवरण-चित्र : विक्रम नायक


मार्च 1976 में जन्मे विक्रम नायक ने त्रिवेणी कला संगम में कला-शिक्षा पाई। 1996 से व्यावसायिक चित्रकार, इलस्ट्रेटर और कार्टूनिस्ट के रूप में कार्यरत। कई राष्ट्रीय दीर्घाओं के अलावा जर्मनी में भी प्रदर्शनी।


पेश-लफ़्ज़

जब नॉवेल टेढ़ी लकीर शाया2 हुई तो कुछ लोगों ने कहा मैंने एक जिंसी-मिज़ा़ज3 और बीमार ज़ेहनियत4 वाली लड़की की सरगुज़श्त5 लिखी है। इल्म-ए-नफ़सियात6 को पढ़िए तो ये कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन बीमार है और कौन तंदुरुस्त। एक पारसा हस्ती जिंसी बीमार हो सकती है और एक आवारा और बदचलन इनसान सेहतमंद हो सकता है ! जिंसी7 बीमार और तंदुरुस्त में इतना बारीक फ़ासला होता है कि फैसला दुश्वार है। मगर जहाँ तक मेरे मुताले का ताल्लुक है, ‘टेढ़ी लकीर’ की हीरोइन न जेहानी8 बीमार है और न जिंसी। जैसे हर जिंदा इनसान को गंदे माहौल और आस-पास की ग़लाज़त से हैज़ा ताउन हो सकता है, इसी तरह एक बिलकुल तंदुरुस्त ज़ेहनियत का मालिक बच्चा भी अगर ग़लत माहौल में फँस जाए तो बीमार हो जाता है और मौत भी वाक़े9 हो सकती है।

मगर ‘शम्मन’ ज़िंदा ही नहीं है, जानदार है। उस पर मुख़्तलिफ़10 हमले होते हैं लेकिन हर हमले के बाद वह फिर हिम्मत बाँधकर सलामत उठ खड़ी होती है। वह हर दिल से सोच-विचार करने के बाद दूसरा कदम उठाती है। ये उसका क़सूर नहीं है कि वह बेहद हस्सास है और हर चोट पर मुँह के बल गिरती है मगर सँभल जाती है। नफ़सियाती उसूलों से टक्कर लेकर वह उन्हें झुठला देती है-हर तूफ़ान सिर से गुज़र जाता है।

‘शम्मन’ की सबसे बड़ी बदनसीबी ये है कि कोई उसे समझ नहीं पाता। वह प्यार, मुहब्बत और दोस्ती की भूखी है और उन्हें नेमतों की तलाश में भयानक जंगलों की ख़ाक छानती है। उसका दूसरा ऐब है-ज़िद। या शायद यही उसकी ख़ूबी है। हथियार डाल देना उसकी तबीयत नहीं।

कुछ लोगों ने ये भी कहा है कि ‘टेढ़ी लकीर’ मेरी आपबीती है-मुझे खुद से आपबीती लगती है। मैंने इस नॉवेल को लिखते वक्त बहुत कुछ महसूस किया है। मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है। उसके साथ आँसू बहाए हैं और क़हक़हे
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1 .प्राक्कथन 2. प्रकाशित 3 सेक्सी नेचर 4. बीमार मानसिकता 5. जीवनी 6. मनोविज्ञान 7. मानसिक 8. शारीरिक 9. घटित 10. विभिन्न

लगाए हैं। उसकी कमज़ोरियों से जल भी उठी हूँ, उसकी हिम्मत की दाद भी दी है। उसकी नादानियों पर रहम भी आया है और शरारतों पर प्यार भी आया है। उसके इश्क़-ओ मुहब्बत के कारनामों पर चटख़ारे भी लिए हैं और हसरतों पर दुःख भी हुआ है। ऐसी हालत में अगर मैं कहूँ कि ये मेरी आपबीती है तो कुछ ज़्यादा मुबालग़ा1 तो नहीं।
और, जगबीती और आपबीती में भी तो बाल बराबर का फ़र्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस नहीं की हो तो वह इनसान ही क्या ? और बग़ैर परायी ज़िंदगी को अपनाए हुए, कोई कैसे लिख सकता है !

श्म्मन की कहानी किसी एक लड़की की कहानी नहीं है। ये ह़जारों लड़कियों की कहानी है। उस दौर की लड़कियों की कहानी है, जब वो पाबंदियों और आज़ादी के  बीच एक ख़ला2 में लटक रही थीं। और मैंने ईमानदारी से उनकी तस्वीर इन सफ़ात3 से खींच दी है, ताकि आने वाली लड़कियाँ उससे मुलाक़ात कर सकें और समझ सकें कि एक लकीर क्यों टेढ़ी होती है और क्यों सीधी हो जाती है। और, अपनी बच्चियों के रास्ते को उलझाने के बजाय सुलझा सकें और बजाय तंबीहुल ग़ाफ़लीन4 के अपनी बेटियों की दोस्त और रहनुमा बन सकें।


-इस्मत चुग़ताई


1. अतिशयोक्ति 2. शून्य 3. पृष्ठों 4 .बात बात पर बग़ैर विचार कि नसीहत करने वाले माता-पिता


एक



वह पैदा ही बहुत बेमौक़ा हुई। बड़ी आपा की चहेती सहेली सलमा की शादी थी और वह बैठी छपाछप सुरमई क्रेप के दुपट्टे पर लचका टाँक रही थीं। अम्मा इतने बच्चे जनने के बाद भी नन्हीं ही बनी हुई थीं। बैठी झाँवे से एड़ियों की मुर्दा खाल घिस-घिसकर उतार रही थीं कि एका-एकी घटा झूम कर घिर आई और वह दुहाई डाली कि मेम को बुलाने का सारा अरमान दिल का दिल ही में रहा और वह आन धमकी। दुनिया में आते ही बग़ैर गले में घाँटी किए ऐसी दहाड़ी कि तौबा भली।

नौ बच्चों के बाद एक का इज़ाफ़ा। जैसे घड़ी की सुई एकदम आगे बढ़ गई और दस बज गए। कैसी शादी और किसकी ब्याह ! हुकुम मिला, नन्हीं-सी बहन के नहलाने के लिए गर्म पानी तैयार करो। पानी से ज्यादा खौलते आँसू बहाती आपा ने कोसते हुए चूल्हे पर पतीली चढ़ा दी। पानी भी मज़ाक़ में ज़रा-सा छलक गया और सारा हाथ उबलकर रह गया।
‘ख़ुदा ग़ारत करे इस मुन्नी-सी बहन को। अम्मा की कोख क्यों नहीं बंद हो जाती, हद हो गई थी। बहन भाई और फिर बहन भाई, बस मालूम होता था, भिखमंगों ने घर देख लिया है। उमड़े चले आते हैं। वैसे ही क्या कम मौजूद थे जो और पै-दर-पै चले आ रहे थे !

कुत्ते, बिल्लियों की तरह, अज़ल के मरभुख्खे अनाज के घुन टूटे पड़ते हैं। दो भैसों का दूध तबर्रुक1 हो जाता फिर भी उनके तंदूर ठंडे ही पड़े रहते।
 
और, ये सब अब्बा का कसूर था। क्या मजाल जो अम्मा दूध पिला जाएँ। इधर बच्चा पैदा हुआ उधर आगरे से गवालन बुलवा ली। वह दूध पिलाए और बेगम की पट्टी से पट्टी जुड़ी रहे। फिर भला बच्चे क्यों साँस लेते ! घर क्या था, जैसे गाय-बैलों का बाड़ा। खाना है तो पतीलियों पीना है तो घड़ों सोना है तो घर का कोना-कोना जिंदगी से लबरेज़ छलकने को तैयार।
और ये पेट की खुरचन काली पीली धनिया सी नाक चियाँ-सी आँखें परचील से ज्यादा तेज। बड़ी आपा और मंझों, दोनों ने कई दफ़ा उसके चूहे के बच्चे जैसे मुँह को मुस्कुराते हुए देखा। गोया वह उन्हें छेड़ने को मुस्कुरा रही हो। वह ख़ूब समझती थी कि ये उसकी जरखरीद लौंडियों2 की तरह ख़िदमत करेंगी। अम्मा को क्या कम फिक्र
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1.प्रसाद 2. दासियों।

हो रही होगी। आखिर ये इतनी ढेर सी लड़कियों का नसीबा कहाँ खुलेगा। माना कि रुपया भी है और लड़की को दिखाने का फ़ैशन नहीं, फिर भी कहाँ तक ताले डाले जाएँगे, क्या होगा ?

न उसका पेट फूला न बीमार हुई और रोज़-बरोज़ फूलकर कुप्पा होती गई। दो एक भाई, बह


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