निरुपमा - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला Nirupama - Hindi book by - Suryakant Tripathi Nirala
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निरुपमा

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2019
पृष्ठ :132
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2719
आईएसबीएन :9788126713974

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अप्सरा, अलका और प्रभावती के बाद निराला का चौथा उपन्यास ‘निरुपमा’...

Nirupma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रचनाक्रम की दृष्टि से निरुपमा निराला का चौथा उपन्यास है। पहले के तीन उपन्यासों—अप्सरा, अलका और प्रभावती की तरह इस उपन्यास का कथानक भी घटना-प्रधान है। स्वतंत्रता-आन्दोलन के दिनों में, खासकर बंगाल में समाज-सुधार की लहर पूरे उभार पर थी। निराला का बंगाल से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज-सुधार का स्वर बहुत मुखर है। लेकिन इसे समाज-सुधार न कहकर सामंती रूढ़ियों से विद्रोह कहें तो अधिक उपयुक्त होगा।

निरुपमा में उन्होंने ऐसे ही विद्रोही चरित्रों की अवतारणा की है। जनवादी चेतना से ओतप्रोत नवशिक्षित तरुण-तरुणियों के रूप में कृष्णकुमार, कमल और निरुपमा के चरित्र, नन्दकिशोर नवल के शब्दों में ‘‘सामंती रूढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख एक आदर्श रखते हैं। उनके मार्ग में बाधाएँ आती हैं, पर वे उनसे विचलित नहीं होते और संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।’’ कमल और निरुपमा के माध्यम से निराना ने नारी-जाति की मुक्ति का भी पथ प्रशस्त किया है।
सन् 1935 के आसपास लिखा गया निराला का यह उपन्यास हमारे लिए आज भी कितना नया और प्रासंगिक है, यह इसे पढ़ कर ही जाना जा सकता है।

 

निवेदन

हिन्दी के उपन्यास-साहित्य को ‘निरुपमा’ मेरी चौथी भेंट है। आलोचक साहित्य जिन महानुभावों ने उठने की कसम खाई है भाषा और भावों के लच्छेदार वर्णन के सम्बन्ध में, उनके लिए मैं स्वयं उतर आया हूँ। उन्हें यदि ‘निरुपमा’ स्थलविशेष पर भी सौन्दर्य के बोध से  निरुत्तर कर सकी तो मैं श्रम सार्थक समझूँगा। पर अगर सिंहलवासियों को प्रयाग सुलभ न हुआ, तो मुझे आश्चर्य न होगा। जिन्होंने ‘अप्सरा’ और ‘अलका’ आदि की तारीफ कर मुझे उपन्यास-साहित्य का आधुनिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया है और मूल्य आँकते-आँकते अमूल्यता तक पहुँच गये हैं; पर जिनकी मानसिकता उच्चता के सामने कृतज्ञ मैं अत्यधिक संकुचित हूँ; पर ‘निरुपमा’ के संकुचित होने का कोई कारण नहीं। मुझे। विश्वास है, वह उन्हें ‘निरुपम सौन्दर्य और संस्कृति देकर प्रसन्न कर सकेगी।  

मेरे लिए हुए भिन्न दो समाजों के विषय, हिन्दी के अपरिचय के कारण, यद्यपि विष ही होना चाहते थे, फिर भी यथा-साध्य मैंने अमृत बनाने की कोशिश की है। दूसरे अन्नत समाज उपन्यास-लेखक की जो सहायता करते हैं, वह हिन्दी के समाज से प्राप्त नहीं। इसलिए काल्पनिक सृष्टि करनी पड़ती है, जैसे समाज की लेखक आशा करता है और जिसका है और जिसका होना सम्भव भी है। अनभ्यस्त और स्वभाव-संचालितों को वहाँ अस्वाभाविकता मिलती है। पर वह है स्वाभाविक। साथ, प्रचलित छोटे-छोटे चित्र, सहारे के लिए रहते हैं, साधारणों के हक में उतना ही आता है। फिर भी, जैसा परिवर्तन है, मुझे विश्वास है, साधारण भी इसे असाधारण कलंक न देंगे।

 

एक

लखनऊ में शिद्दत की गरमी पड़ रही है। किरणों की लपलपाती दुबकी-पतली असंख्यों नागिनें तरु लता-गुल्मों की पृथ्वी से लिपटी हुई कण-कण को डस रही है। उन्हीं के विष की तीव्र ज्वाला भाप में उड़ती हुई, हवा में लू होकर झुलसा रही है। तमाम दिन बड़े-बड़े लोग खस-खस की तर टट्टियों के अन्दर बन्द रहकर काम और आराम करते हैं। इसी समय योरप की मुख्य भाषाओं का समझ भर के लिए अध्ययन कर लण्डन की डी. लिट्. उपाधि लेकर लौटा हुआ कुमार, स्थान रहने पर भी योग्यता की अस्वीकृति से उदास, कलकत्ता विश्वविद्यालय से लखनऊ आया हुआ है-यहाँ कोई स्थायी-अस्थायी काम मिल जाए, पर चूँकि किसी चान्सलर, वाइस-चान्सलर, प्रिन्सिपल, प्रोफेसर या कलक्टर से उसकी रिश्ते की गिरह नहीं लगी, इसलिए किसी को उसकी विद्वत्ता का अस्तित्व भी नहीं मालूम दिया। जाँच करनेवाले ज्यादातर बंगाली सज्जन एक राय रहे कि एम.ए. में किसी तरह घिसट गया है-थीसिस चोरी की होगी। एक अस्थायी जगह लखनऊ विश्वविद्यालय में बाबू कामिनीचरण चटर्जी की छुट्टी से हो रही थी, वहाँ बाबू यामिनीहरण मुखर्जी आ गये। ये पी-एच. डी. ही थे, पर इनकी पूँछ में बालों का गुच्छा मोटा मिला। कुमार फिर जगह की तलाश में क्रिश्चियन-कालेज गया, पर वहाँ वर्णाश्रम-धर्मवाला सवाल था। देखकर विद्या ने आँखें झुका लीं और हमेशा के लिए ऐसे स्थानों का परित्याग कर देने की सलाह दी।
योरप से लौटे हुए कुमार की दृष्टि में ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का ही महत्त्व है, इसलिए मन में हार की प्रतिक्रिया न हुई। कोहनूर होटल की नीचे वाली मंजिल में टिका हुआ है। सामने के कमरों में दो-तीन बाबू और रहते हैं शायद अलग-अलग दफ्तरों में नौकर हैं। रात को कमरों से बाहर सड़क के किनारे चारपाइयाँ डलवाते हैं। ठंडी-ठंडी हवा लगती है, नींद अच्छी आती है।

सब जगह हताश होकर भी कुमार दिल से दृढ़ रहा। योरप जाते वक्त भी उसे समाज का सामना करना पड़ा था। लौटकर और करना पड़ेगा, यह पहले से निश्चय कर चुका था। इसलिए, हेच जरा भी नहीं खायी; एक तरंग उठी और दिल-बहलाव की स्वाभाविक प्रेरणा से गुनगुनाने लगा। गुनगुनाते-गुनगुनाते भावना पैदा हुई, गाने लगा। रात के साढ़े-नौ का समय होगा। गाना समाप्त हुआ है कि सामने के सुन्दर मकान से हारमोनियम का स्वर गूँजता हुआ सुन पड़ा, फिर किशोरी-कण्ठ का ललित संगीत। तरुणी भाव के मधुर आवेश में गा रहा रही थी-‘तोमारे करियाछि जीवनेर ध्रुवतारा।’ कुमार का हौसला अभी पूरा न हुआ था, पुनः संगीत का श्रीगणेश उसी ने किया था, इसलिए वह भी गाने लगा। पर गाता क्या, भाव के आवेश में शब्दों का ध्यान ही जाता रहा। जब जगह रागिनी गाई जा रही हो, तब दूसरी रागिनी गाना असम्भव भी है, दुःखप्रद भी। भाव के आवेश में कण्ठ उन्हीं-उन्हीं पदों पर फिरने लगा। एक ही पद के बाद हारमोनियम बन्द हो गया। पर कुमार की गलेबाजी चलती रही। हारमोनियम क्यों बन्द हो गया, इस तरफ ध्यान देने की उसे फुर्सत भी नहीं हुई। उसकी तान-मुरली समाप्त हुई, उधर ग्रामोफोन में किसी बंगाली महिला का काफी ऊँचे स्वर में, जहाँ उसके पुरुष-की पहुँच नहीं हो सकती, टागोर-स्कूल का गाना होने लगा। यह चाल और चालाकी कुमार समझ गया। साथ-साथ यह भी उसके खयाल में आया कि इस स्वर से गला मिलाकर गाने की उसे चुनौती दी गयी है। उसने गला एक सप्तक घटा दिया। इससे उसे सहूलियत हुई। वह इतने ही स्वरों पर गाता था। टागोर स्कूल का ढंग भी उसे मालूम था। तमाम किशोरावस्था बंगाल में बीती थी। गाने लगा, बल्कि कहना चाहिए, अगर कण्ठ के कामिनीत्व को छोड़कर कमनीयत्व की ओर जाया जाय तो कुमार ने ही बाजी मारी।

एकाएक गाने के मध्य में रेकार्ड बन्द हो गया। गाड़ीवाले बराम्दे की छत पर एक तरुणी आकर रेलिंग पकड़कर खड़ी हो गई। होटल की ओर देखा। कई चारपाइयाँ पड़ी थीं। कुमार का गाना बन्द हो चुका था। वह तकिए पर सिर रक्खे एक भले आदमी की तरह उसी ओर देख रहा था। तरुणी निश्चय न कर सकी कि उसे चिढ़ाने वाला किस चारपाई पर पड़ा है। एक बार देखकर ‘छूँचो,-गोरू, -गाधा’* कहकर तेजी से फिरकर चली गई। कुमार समझकर निर्विकार चित्त से करवट बदलकर-‘भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़मते’-गाने लगा।

गाने के भीतर गाली की ध्वनि-‘छूँचो,-गोरू,-गाधा-’ बार-बार गूँजती हुई सुन पड़ने लगी। कुमार ने गाना बन्द कर दिया। विचार करने लगा। सोचकर हँस पड़ा। गाली की तरफ ध्यान न गया, क्योंकि गाली के साथ-साथ उसकी वजह भी सामने आई। जहाँ गाली की कठोरता की तरह उसकी वजह मुलायम हो, वहाँ कोई मूर्ख गाली की तरफ ध्यान देगा ! वह मूर्ख नहीं। कोरे ‘छूँचों, गोरू, गाधा’ में क्या रखा है ? न इनमें से वह कुछ है। वह उस भाव को सोच रहा है जो गाली देते वक्त जाहिर हुआ था, जिसमें गाली सुनाने की स्पर्द्धा को शालीनता से दबा रखने की शक्ति भी साथ-साथ प्रकट हुई थी, जहाँ भय था कि जिसे सुनाती हूँ उसके सिवा दूसरा तो न सुन लेगा, जिसमें पाप के विरोध में खड़ी होने की सरल पुण्य प्रतिभा थी, भले ही वह पाप दूसरों के विचार में पाप न हो।

युवती के मनोभवों की सुखस्पर्श उधेड़-बुन में कुमार को बड़ी देर हो गयी। रात काफी बीत चुकी, पर न पी हुई उस मधु को एक बार पी कर बार-बार पीने की प्यास बढ़ती गयी। आँखे न लगीं, उन विरोधी भावों में प्राणों के पास तक पहुँचनेवाली शक्ति थी कि वह स्वयं उसको धीरे-धीरे प्राणों को आवृत करनेवाली कोमलता से मिलता हुआ परास्त हो गया। जब आँखें लगीं, तब वह जैसे उसकी पूर्ण पराजय की ही सूचना हो।
तब तक रात के दो-तीन का समय हो चुका होगा। नींद जैसे युवती के पढ़े जादू का नशा हो।
*‘छूँचो’ का अर्थ होता है छछून्दर, मतलब औरतों के पीछे छुछुआने वाला। ‘गोरू’ अर्थात् गऊ; मूर्खता, निर्बुद्यिता आदि अर्थो पर बंगला में यह गाली प्रचलित है। ‘’गाधा’-गधा।
कुमार की आँखें खुली जब सूरज निकल आया था, मुँह पर धूप पड़ रही थी। पास के और-और सोने वाले उठकर चले गये थे। भ्रामण समाप्त कर लौट चुके थे। रास्ते पर काम से चले लोगों की काफी भीड़ हो रही थी।

जगने के साथ ही जिस तरफ का मुँह था, आँखें सीधे उसी तरफ आप-ही-आप गयीं। जिस कल्पना को लेकर वो सोया था, जगने के साथ ही अपनी मूर्तिमत्ता में लीन न होने के लिए उसी तरफ वही चलीं। सामने टोलीग्राफ के पोस्ट को बाँधनेवाले एक तार पर उसी मकान के भीतर से मधु-माधवी की एक लता ऊपर तक चढ़ी हुई प्रभात के वायु से हिल-हिलकर फूलों में हँस रही थी। उसी की फूली दो शाखाओं के अर्द्धवृत्त के भीतर से देखती हुई दो आँखें कुमार की आँखों से एक हो गयीं- उसकी कल्पना जैसे सजीव, परिपूर्ण आकृति प्राप्त कर सामने खड़ी हो। इस खड़े होने के भाव में भी रात का वही भाव स्पष्ट था। सारी देह लता की आड़ में छिपी हुई, मुख लता के दो भुजों के बीच, जैसे छिपने का पूरा ध्यान रखकर खडी़ हुई हो।
बराम्दे पर सुबह-शाम रोज वह वायु-सेवन के लिए, बाहरी दृश्य देखने की इच्छा से निकलती थी, जरूरत पर यों ही आती थी। कल जिसे गाली दी, मुमकिन आज देख लेने के लिए आयी हो। पहचान थी नहीं, सोते कुमार को देखा हो। आँखों को अच्छा लगा हो, इसलिए छिपकर देखने लगी हो।

कोई भी कुमार को सुन्दर कहेगा। उसके सोते समय युवती किस भाव से किस दृष्टि से देख रही थी, नहीं मालूम। पर उसके सोने पर भी उसके ललाट, चिबुक, नाक और मुँदी आयत आँखें विद्या के परिचय से प्रदीप्त रहती हैं। लम्बे बाल कानों को ढककर कपोलों तक आ जाते हैं। गोरे चेहरे पर केवल साबुन से धुले सुनहरे बाल किसी मनुष्य को एक बार देखने के लिए खींच लेंगे, मुख और बालों की ऐसी मैत्री है।
कुमार के देखते ही युवती लजा गई। उसी की प्रकृति ने उसकी चोरी की गवाही दी। आँखें झुक गयीं, होंठों पर पकड़ में आने की सलाज मुस्कुराहट हो गई। सामने मधु-माधवी की लता हवा में हिलने लगी। पीछे सूर्य अपने ज्योतिमण्डल में मुख को लेकर स्पष्टतर करता हुआ चमकता रहा। युवती छिपने के लिए पहले से तैयार थी, पर छिप न सकी। कुमार अपनी कल्पना को सुन्दर प्रकृति के प्रकाश में घिरी, प्रत्यक्ष सजीव अपार रूप-राशि के भीतर सलज्ज सहानुभूति देती हुई देर तक देखता रहा-जैसे कल गाली देने के कारण आज वह मूर्तिमती क्षमाप्रार्थना बन रही हो, जैसे कल के भीतरवाले भाव आज व्यक्तरूप धारण कर रहे हों।

सुन्दर को सभी आँखें देखती हैं। अपनी वस्तु को अपना सर्वस्व दे देती हैं। क्यों देखती हैं, क्यों दे देती हैं, इसका वही कारण है जो जलाशय की ओर जल के बहाव का। रूप ही दर्शन की सार्थकता है। यहाँ एक रूप ने दूसरे रूप को-आँखों ने सर्वस्व-सुन्दर आँखों को चुपचाप क्या दिया, हृदय ने चुपचाप दोनों ओर से क्या समझा, मौन के कितने बड़े महत्त्व को मुखरा भाषा कैसे व्यक्त कर सकती है।
दोनों देख रहे थे, उसी समय एक बालिका आयी। बहन के सामने खड़ी होकर रेलिंग पकड़े हुए पंजों के बल उठकर अजाने मनुष्य को एक बार देखा, फिर दीदी को देखकर दौड़ती चली गयी।
पकड़ में आकर हटते हुए युवती के पैर नहीं उठ रहे थे। वह रेलिंग पकड़े हुए मुँह फेरकर दूसरी ओर देखने लगी- होंठों से मुस्करा रही थी। कुमार उठकर कमरे के भीतर चला गया।


             

दो

 

एक साधारण रूप से अँगरेजी रुचि के अनुसार सजा हुआ कमरा। एक नेवाड़ का पलंग पड़ा हुआ। पायों से चार डण्डे लगे हुए; ऊपर जाली की मसहरी बँधी हुई। पलँग पर गद्दे-चदरे आदि बिछे हुए। चारों ओर तकिये। बगलवाले दो लम्बे गोल, सिरहाने और पाँयते के कुछ चपटे, कोनों के दो सिरहाने सूचित करते हुए। दो बड़े शीशे आमने-सामने लगे। दीवार पर चुनी हुई तस्वीरें-परमहंस रामकृष्णदेव, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, पं. मदनमोहन मालवीय, बाबू चित्तरञ्जन दास और पं. मोतीलाल नेहरू  आदि की बड़े आकारवाली। इनके नीचे एक-एक बगल, मासिक-पत्रों में निकली हुई, आशा, भावना, कविता, शरत, वासन्ती, वर्षा आदि कि काल्पनिक तस्वीरों की अधिकता न मामूली देती हुई। लोहे की छड़ों के बाहर से पूरे दरवाजे के आकार की खिड़कियों का आधा ऊपर वाला हिस्सा खुला हुआ, आधा नीचे वाला बन्द। पूरब वाली खिड़कियों से प्रभात की हल्की धूप आती हुई। एक ओर एक मेज, जिसके दो ओर दो कुर्सियाँ। एक पर वही बलिका बैठी पढ़ रही थी। इसी समय उसकी दीदी कमरे में आयी और दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी। सामने बलिका के रोज के पढ़ने की तालिका रखी थी, उठाकर देखने लगी। मन का दृष्टि के साथ सहयोग न था इसलिए देखकर भी कुछ न समझ सकी। केवल लिखावट पर निगाह दौड़ाकर रह गयी। मस्तिष्क तक विषय का निश्चय न पहुँचा।

तालिका रखकर युवती बहन को हँसती आँखों से देखने लगी। फिर पूछा -‘‘अच्छा नीली (बालिका का नाम नीलिमा है), हमारे सामनेवाले बैडमिन्टन ग्राउन्ड की घास दो घोड़े दो दिन में चरें तो एक घोड़ा कितने दिन में चरेगा ?’’
उच्छ्वास से उमड़ती हुई, उसकी ओर मुँह बढ़ाकर, उसी वक्त बालिका ने उत्तर दिया-‘‘एक दिन में।’’
‘चट्ट’ से एक चपत पड़ी। बालिका गाल सहलाती हुई, सजल आँखों एकटक बहन की चढ़ी त्योंरियाँ देखने लगी।
इसी समय एक दासी ने आकर कहा-‘‘दादा बुलाते हैं। यामिनी बाबू मोटर लेकर आये हैं, हवाखोरी को जा रहे हैं।’’
युवती दासी की बातें सुन रही थी कि एक ओर से बालिका निकल गयी। सीधे यामिनी बाबू के पास पहुँची। यामिनी बाबू उसका आदर करतें है। उस समय उसका दादा सुरेश वहाँ नहीं था। कपड़े बदलने के लिए निरुपमा को बुलाकर अपने कमरे में गया हुआ था। बालिका अच्छी तरह जानती है कि यामिनी बाबू उसकी दीदी को प्यार करते हैं, और उसके घर वालों की इच्छा है कि उसकी दीदी का यामिनी बाबू से विवाह हो। फिर मन-ही-मन दीदी से रुष्ट होकर बोली-‘‘वह जो बड़े-बड़े बाल वाला हिन्दुस्तानी है न–उस होटल में !-आज सुबह गाड़ीवाले बराम्दे पर खड़ी दीदी उसे देख रही थी, वह भी दीदी को देख रहा था।’’

बालिका की बात का असर साँप के जहर से भी यामिनी पर ज्यादा हुआ। प्रेम और संसार की नश्वरता का सच्चा दृश्य उन्हें देख पड़ने लगा ‘यां चिन्तयामि सततम्’ आदि अनेक पुण्य-श्लोक याद आने लगे। इसी समय बालिका ने कहा, ‘‘अभी मुझे पढ़ा रही थीं, पूछा, उस बैडमिन्टन ग्राउन्ड की घास दो घोड़े दो दिन में चरें तो एक कितने दिन में चरेगा ?    कितना सीधा सवाल है ? हमारे स्कूल में जबानी पूछा जाता है। मैंने ठीक जवाब दिया, पर दीदी ने मुझें मार दिया।’’
बालिका जीने की तरफ देखकर सभय चुप हो गयी। दासी के साथ निरुपमा धीरे-धीरे उतर रही थी। अचपल-दृष्टि, गौरव की प्रतिमा बालिका व्याकुल हो गयी कि पीछेवाली बात इसने सुन न ली हो। निरुपमा नीचे के बरामदे में पहुँचकर धीरे-धीरे नीली के पास गयी और उसका हाथ पकड़कर बगीचे की ओर देखने लगी। नीली को विश्वास हो चला कि नहीं सुना। फिर भी धड़कन थी, इसलिए इस प्रकार स्नेह का दान पाने पर भी खुलकर कुछ बोल न सकी-छड़ी की तरह चुपचाप सीधी खड़ी रही।

यामिनी बाबू के वैराग्य-शतक की शक्ति निरुपमा में आने के बाद से क्षीण हो चली। रूप के साथ आँखों का इतना घनिष्ट समबन्ध है। पतंग एक दूसरे पतंग को जलकर भस्म होते देखता है, पर रह नहीं सकता। इतना बड़ा प्रत्यक्ष ज्ञान भी रूप के मोह से उसे बचा नहीं सकता-वह दीपक को सर्वस्व दे देता है। दीपक अपने ही स्थान पर जलता रहता है।
निरुपमा की दृष्टि में चाह नहीं, ऐसा कौन कहेगा ? उसकी दृष्टि से उसकी बातें सुनकर सभी उसे प्यार करने लगते हैं, जो जिस तरह के प्यार का हृदय में अधिकार रखता है। और वह, वह शमा है जो बाहर की भस्म को ही भस्म करती है। इसलिए वैराग्य-शतक का कृत्रिम भस्म उसके एक ही दृष्टिपात से अपनी स्वार्गीय सत्ता में मिलित हो गया। यामिनी बाबू उमड़कर कुछ क्षण के लिए पहले-से हो गये।

तबीयत अच्छी न रहने के कारण निरुपमा की इच्छा दासी को लौटाने की थी, पर भाई के बुलावे का ख्याल कर चली गई। उसके आने के कुछ ही देर में सुरेश बाबू भी कपड़े बदलकर आ गये। मोटर रास्ते के किनारे लगी हुई है। यामिनी बाबू के साथ सुरेश बाबू बहन को बुलाकर आगे-आगे चले नीली को साथ लेकर पीछे-पीछे निरुपमा चली। नीली के जाने की कोई बात न थी इधर जब से यामिनी की सुरेश बाबू से घनिष्टता हुई, भाई के कहने से केवल निरुपमा साथ जाती थी, कभी-कभी नीली, यों प्रायः जाने के लिए खड़ी छलकती रहती थी। सुरेश बाबू डाँट देते थे। कभी-कभी पढ़ने के लिए खुलकर कड़ी जबान कह देते थे। वह लाज से मुरझाकर लौट जाती थी। भाई की आज्ञा पर कुछ कहने का अभ्यास निरुपमा को पहले से न था।

किसी बगीचे के पास मोटर से उतरकर टहलते हुए सुरेश बाबू निरुपमा को अकेली छोड़ देते थे। यामिनी बाबू को बातचीत की सुविधा हो जाती थी। कुछ देर बाद किसी कुञ्ज से टहलकर सुरेश आते थे। इस प्रकार दोनों का परिचय बढ़ गया है। दोनों के हृदय निश्चय से बँध चुके हैं। अँगरेजी पढ़ने पर भी, प्राचीन विचारों की महिलाओं में रहने के कारण निरुपमा हिन्दू-संस्कारों में ही ढली है। भाई तथा अपर स्त्रियों का निश्चय ही उसका निश्चय है। पर यामिनी बाबू योरप की हवा खाकर लौटे हैं, इसलिए इस वैवाहिक प्रसंग पर कुछ अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं। सुरेश अपने बंगाली समाज की वर्तमान खुली प्रथा के समर्थक हैं, पर एकाएक यामिनी बाबू को दी पूरी स्वतंत्रता से अभ्यास के कारण निरुपमा को संकोच पहुँच सकता है, इस विचार से धीरे-धीरे रास्ता तय कर रहे हैं।

नीलिमा का साथ रहना यामिनी बाबू को पसन्द न था, पर आज सुरेश के मना करने से पहले उसे बुलाकर, ड्राइवर की सीट की बगल में, अपने पास बैठा लिया। सुरेश बाबू निरुपमा के साथ पीछेवाली सीट पर बैठ ही रहे थे कि होटल के सामने बराम्दे पर कुमार खड़ा हुआ दीख पड़ा। नीली यामिनी बाबू को कोंचकर होटल की तरफ देखने लगी। यामिनी बाबू कुमार को देखकर निरुपमा को देखने लगे। निरू सिर झुकाए बैठी थी।

 कुमार देखता रहा। मोटर चल दी। सीधे सिकन्दर बाग गयी। एक जगह सब लोग उतरकर इधर-उधर इच्छानुसार टहलने लगे। यामिनी बाबू नीली के साथ एक कुञ्ज की तरफ गये। भ्रम था ही। सोचते हुए नीली से पूछा- ‘‘क्या पूछा था निरू ने तुमसे ?’’
नीली मुस्कराकर बोली-‘‘आप भूल गये। आप याद नहीं रख सकते। अच्छा इसमें घोड़े हैं, बतलाइए ?’’
‘‘हाँ, दो घोड़े दो दिन में, तो एक, क्या कहा तुमने ?’’
‘‘एक दिन में, ’’कहकर नीली समझदार की तरह हँसने लगी।

‘‘अच्छा, इसलिए मारा तुम्हें !’’
आवाज ऐसी थी की नीली ने सहृदयता सूचक न समझी। एक विषम दृष्टि से यामिनी बाबू को देखने लगी।
अब यामिनी बाबू को नीली की मैत्री खटकने लगी; नीली के भविष्य पर अनेक प्रकार की शंकाएँ उन्होंने कीं। निरु के प्रति जितने विरोधी भाव थे, एक साथ, तेज हवा में बादलों की तरह कट-छँट गये। प्रेम का आकाश पहले-सा साफ हो गया। निरुपमा की ओर अभियुक्त की तरह धीरे-धीरे बढ़ने लगे। वह एक चम्पा के किनारे खड़ी फलों की शोभा देख रही थी। सोच रही थी-‘इनकी प्रकृति इनका कैसा विकास करती है ! ये कितने कोमल हैं ! खुली प्रकृति की सम्पूर्ण कठोरता, उपद्रव और अत्याचार बरदाश्त करते हैं। इनके स्वभाव से मनुष्य क्या सीखता है। केवल सौन्दर्य के भोग के लिए इनके पास आता है !’  


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