हवाबाज - गोविन्द मिश्र Hawabaj - Hindi book by - Govind Mishra
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हवाबाज

गोविन्द मिश्र

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :141
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2740
आईएसबीएन: 8171194133

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानी संग्रह....

Havabaz

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘रगड़खाती आत्महत्याएँ’ से चलकर ‘आसमान....कितना नीला’ तक आठ कहानी संग्रहों  के रास्ते से गोविंद मिश्र के कहानी लेखन की यात्रा गुजरी है। लगभग तीस वर्ष लंबी इस यात्रा में गोविन्द मिश्र कहानी लिखते हुए कहानी की तलाश भी करते रहे हैं, जो उनके हर नए कहानी संग्रह से स्पष्ट है। ‘अंतःपुर’ और ‘धाँसू’ में स्थितियों को जीने, यथार्थ पर तीखी टिप्पणी करने के बाद वे ‘पगला बाबा’ में जीवन के अच्छे और सुंदर रेखांकित करते दिखाए दिए और अब अपने नौवें कथा संग्रह ‘हवाबाज’ में जैसे वे उस कलात्मकता के भी पार जाने की कोशिश में हैं जो इतने वर्षों लगातार लिखते रहने से उनकी अपनी संपदा बन गई है-जहाँ कथ्य और कहने के ढंग की बारीकियाँ एक होकर ऐसी रसात्मक अन्विति में ढलती हैं कि कहानी पाठक के भीतर थरथराती हुई छूट जाती है।

‘‘आजकल अच्छी कहानी, सशक्त कहानी...इन सब चीजों से बहुत दूर मैं सिर्फ कहानी लिखना चाहा करता हूँ....उन व्यक्तियों की जो इस संसार से गुजरे पर जिनके नक्शेकदम हवा में खींची जाती लकीरों की तरह गुम हो गए या हो जाएँगे। उन उद्वेगों/तनावों की कहानियाँ जो एक वक्त कैसे जानलेवा थे...लेकिन समय ने जिन्हें बुहारकर एक तरफ रख दिया और लोग थे कि बेशरम हो जीते रहे।’’      

 

युद्ध

दफ्तर जाने को तैयार वह नाश्ते के लिए मेज पर बैठा था। कभी मेज पर रखी तश्तरी में परांठे की तरफ देखता (रोज-रोज परांठा नाश्ते में कुछ और नहीं हो सकता क्या, नॉनवैज इस घर में टैबू है, दकियानूसी हैं सब) कभी दाहिनी ओर थोड़ी दूर पर सामने बाथरूम साफ कर रही जमादारिन की तरफ (इस औरत के आने का समय यही क्यों है जब उसे नाश्ते पर बैठना होता है। उसके दफ्तर के लिए निकल जाने के बाद आने को क्यों नहीं कहा जा सकता इसे, खाने की मेज बाथरूम के सामने ही क्यों लगाई गई है) और कभी आँखें ऊपर, फिर नीचे करते हुए मेरी तरफ (इसे भी बात करने के लिए यही समय चाहिए, चैन से दो कौर पेट में भी न डाल सके..बाप है कि दुश्मन) सामने मेरे उगते ही उसकी आँखों में असुरक्षा का भाव जाग आया था, वह चौकन्ना हो गया था। दोनों हाथ कुहनियों पर टिके थे, हथेलियाँ दोनों तरफ से परांठे पर झुकी जैसे एक तरह का छाता-सा बनाए हुए थीं...गोया कि जितना वह अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा था, उतना ही परांठे को भी। उसकी गोल-गोल मांसल उँगलियों और चेहरे की एक-एक नस फड़क रही थी तब..

बड़े होने, शिक्षित होने और सबसे बड़ी बात नौकरी करने लगने से निश्चित उसमें एक आत्मविश्वास आया है जो जब वह कपड़े पहनकर निकलता है तो उसके जूतों से खटखट बोलता होता है। अपने कमरे में उसने बड़े-बड़े अक्षरों से लिख रखा है-थिंक बिग।’ उसकी महत्त्वाकांक्षा बड़ा आदमी यानी कि खूब पैसेवाला बनने की है। अकसर वह कहता भी है कि सुख-सुविधाएँ महत्त्वपूर्ण हैं-घर में फ्रिज, वीडियो, टीवी, कार जैसी चीजें होनी चाहिए...मैं आप लोगों की तरह आराम से परहेज नहीं करता। आखिर हम जीते क्यों हैं-इन्हीं आरामों के लिए। वह यह नहीं सोचता कि असली जीवन भौतिक सुविधाओं के पार है...वह भी नहीं सोचता कि अपने सपनों के भौतिक जीवन के लिए भी सिर्फ ‘थिंक बिग’ लिख कर कमरे में टाँग देने से काम नहीं चलेगा...उसके लिए कितनी मेहनत, कितनी तैयारी चाहिए। दफ्तर से आएगा तो नहाकर कुर्ता पायजामा डाल, वीडियो के सामने पड़ा रहेगा..लुंजपुंज। हफ्ता बीता तो शुक्रवार की शाम नियमित रूप से दोस्त सो जाएगा। आगे सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस करता भाई...आज का दिन मजे से निकल गया, बस ! सुबह खों-खों करता है, बुड्ढे की तरह...पिछली रात को ठंडी बियर और सिगरटें। मुझे दुःस्वप्न आते हैं कि इस ताजा उम्र में ही उसके गले में मोर्चा जम गया है, मोर्चे का लाल रंग काला हो गया है और उसे छील-छीलकर निकालना पड़ रहा है...

सर्विस में आते ही जैसे माँ-बाप से वास्ता खत्म। यही नहीं, उसका रवैया कुछ ऐसा हो गया है कि वह वही करेगा जिससे हमें चिढ़ छूटे। हम निरामिष हैं तो वह सामिष हो गया। कहता है खाने से और धर्म से क्या ताल्लुक। मैंने कहा कि खाने और सोचने का तो ताल्लुक है, तो बोला वाह ! एक पेट की चीज है, दूसरी दिमाग की, और वे शरीर के दो अलग-अलग हिस्से हैं। घर में सामिष नहीं बन सकता तो जब भी कहीं बाहर साथ खाने के लिए जाना हुआ, वह हमेशा सामिष खाएगा..अपनी माँ को दिखाते हुए गोश्त की बोटी कुत्ते की तरह चीथेगा। मुझे बाजार के खाने से नफरत है तो वह अकसर बाजार से सैंडविचेज़ या ऐसा कुछ लेता आएगा और घर में सबके सामने खाने की मेज पर रख लेगा और यह जताते हुए उसे खाएगा कि जो खाना घर में बना है, वह उस सैंडविच के आगे कुछ भी नहीं है। चभर-चभर खाएगा, ढकोसते हुए पानी पिएगा, बड़ी-बड़ी डकारें लेगा...जिससे आस-पास घिन फैले। मैंने किसी पार्टी में जाने से मना किया और होटल के खाने के प्रति उत्साह नहीं दिखाया तो मेरे देहातीपन पर हँसेगा। मैं गरीब परिवार का था, अपने श्रम से ऊपर आया हूँ...इसलिए कुछ आस्थाएँ हैं, मूल्य हैं जिनके सहारे जीवन बिताने में मैं विश्वास करता हूँ...तो वह हर मौके पर उन मूल्यों की खिल्ली उड़ाता होगा, जैसे कि उसी तरह पैसे को सर्वोपरि मानना ही आधुनिक और सभ्य होना है, सादगी से चलना या ऐसी चीजें बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है। उसे हर बात पर अपना विरोध करना ही करना है और इधर उसके प्रस्तावित ब्याह का मसला तो उसे ऐसा मिल गया है जहाँ वह जी भरकर-हमें विशेषकर अपनी माँ को कलपा रहा है। हम लोग जाएँ, लड़की पसंद करें, शुरू की बातचीत करें।

हम पास करेंगे तब वह देखेगा...और वह देखता क्या है, कोई मामूली-सा कारण देखकर प्रस्ताव को फुट्ट कर देगा। कहीं-कहीं मामले को उस बिंदु तक बढ़ने देगा जहाँ हमें लड़की से मोह हो बैठे...उसके बाद वह बेरहमी से काटेगा ताकि लड़की वालों से ज्यादा हमें तकलीफ हो। उस लड़की में मराठीपन है..वह लड़की माँ जैसी लगती है...उनके यहाँ क्या है-एक मकान तक नहीं...उस लड़की के भाई ने अपनी बीवी को भगा दिया है। जहाँ कुछ नहीं मिलेगा तो बोलेगा, उस लड़की में असाधारण क्या है। एक बार तो मैं भी गुस्से में कह बैठा-अरे अपनी तरफ भी तो देखो, तुममें असाधारण क्या है-तीस को छूने आई उम्र, चेहरे पर मुहाँसों के दाग, सफेद होते बाल, नाक से निकलती आऊँ-आऊँ बोलचाल। क्या असाधारण लड़कियों की ही शादी होती है, और जरा बताओ कि अब तक जितनी लड़कियाँ देखीं, उनमें असाधारण एक भी क्यों नहीं मिलीं ? कभी-कहीं शादी की बातचीत चल ही रही होगी और बीच कहीं उसकी राय ली तो वह बोलेगा-वह ? ‘‘वह चैप्टर तो क्लोज हो गया !’’ अरे भाई कब ? जनाब ने एकतरफा, मन ही मन चैप्टर क्लोज कर दिया और हम बेवकूफ से इस बीच सिलसिला चलाते रहे। एक बार मैंने काफी तीखेपन से कहा-‘‘चेप्टर क्लोज करने में है क्या, धड़ से हाथ मारा और किताब बंद क्रैडिट तो चैप्टर के आखिरी शब्द तक पहुँचने में है और तब तक चैप्टर को खोले रखने में है’’...तो मुझे इस तरह देखने लगा जैसे उसने कॉकरोच को अपने जूते से दबा दिया हो और उसे चिकरघिन्नी खाते देख रहा !

लेकिन हम ही उसके ब्याह को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं-यह सवाल मेरे सामने हर बार आता है और उसके कई जवाब मैंने खुद को और दूसरों को दिए हैं। वह भीरू स्वभाव का है, अपनी बात तक ठीक से नहीं कह पाता, लड़कियों के सामने तो और भी बोलती बंद हो जाती है...ऐसा लड़का अपनी शादी कर पाएगा क्या ? जब हम न होंगे तब क्या होगा उसका ? और यह संभावना पास है क्योंकि हमारा तबादला होने वाला है और जिस सरकारी मकान में अभी हम सब एक साथ रहते हैं, वह छोड़ना होगा। आगे जब वह अधेड़ होकर कभी बीमार पड़ेगा तब ? इसके जो दोस्त अभी हैं, वे जब अपनी-अपनी बीवीयों में डूब जाएँगे तब छड़ा यह कहाँ डोलता फिरेगा ! हमारे समाज में अविवाहित व्यक्ति के ऊपर पग-पग पर शक किया जाता है, वह शक परिवार में शुरू ही हो चुका है उसके लिए। जैसे बच्चा कभी नहीं चाहता पर उसे स्कूल भेजने की जिम्मेदारी माँ-बाप पर होती है, जो नहीं भेजते उन्हें कभी माफ नहीं किया जाता, वैसे ही विवाह भी है..
‘‘उन्हें क्या जवाब दूँ ?’’ जब वह परांठा खत्म कर चुका तो मैंने धीमे से पूछा।
‘‘किन्हें ?’’

‘‘लड़कीवालों को !’’
‘‘कौन लड़कीवाले ?’’
‘‘वही दुबे, जिनकी लड़की हमने पिछले सप्ताह देखी। तुम भी पसंद कर चुके हो।’’
‘‘मैं ?’’ वह ऐसे हँसता है जैसे कह रहा हो-इस पागल को देखो।
‘‘इस बार पहले तुमने पसंद की थी, तभी हम देखने गए थे। तुमने कहा नहीं था ?’’
‘‘मैंने यह कहा था कि ठीक-ठाक है। पसंद करने के लिए जो इनपुट्स चाहिए, वे कहाँ हैं। कोई इंटरैक्शन नहीं हुआ...मैंटेलिटी पता नहीं।’’
‘‘मैंटेलिटी किसी की पता लगाते-लगाते उम्र निकल जाती है, तुम क्या अपनी ही मैंटेलिटी जान सके ?’’
‘‘फिलॉसफी रहने दीजिए।’’
‘‘फिलॉसफी के बगैर जीवन समझा जा सकता है क्या तुम्हारी पीढ़ी की यही तो दिक्कत है कि फिलॉसफी को खारिज कर रखा है।

‘‘डैडी ! आपसे बात नहीं की जा सकती।’’
‘‘आपमें भी मेरी बातें समझने की कूबत नहीं पर यह मोटी-सी बात तो समझिए कि आप लड़की से अकेले में मिल लिए, उसके साथ रेस्तराँ में खाना खाया अब और क्या होता है इंटरैक्शन हमारे समाज में इससे ज्यादा की सुविधा..’’
पेश्तर इसके कि मैं जुमला पूरा कर पाता, वह उठ गया, वॉश-बेसिन में मुँह धोया और अपना टिफन बाक्स बैग में डाल, खटखट आफिस के लिए निकल गया।
अधजला मैं पीछे छूट गया। यही होता है-उससे बातचीत चाहे जितना मीठे से शुरू करो, वह कुछ ऐसा बोल देगा कि मैं उत्तेजित हो जाऊँ। फिर मेरा स्वर तेज हो जाता है और हम लड़ने की स्थिति में आ जाते हैं...लेकिन क्या इस डर से बातचीत ही न शुरू की जाए, हमारे बीच कोई संवाद ही न रहे ? मैंने शाम को फिर मोर्चाबंदी की और जब वह दफ्तर से लौट, नहा-धोकर इत्मीनान से बैठा था तब उसे घेरा-



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