गोल्डी सिल्विया के कारनामे - अभिलाष वर्मा Goldi Siliviya Ke Karnamey - Hindi book by - abhilash verma
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गोल्डी सिल्विया के कारनामे

अभिलाष वर्मा

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2769
आईएसबीएन :81-7119-612-8

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प्रस्तुत है बाल उपन्यास...

Goldi Silviya Ke Karname

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब बच्चे बड़े के बारे में सोचते हैं तो उन्हें यही लगता है। सारे नियम अनुशासन की बातें तो बस हमारे लिए ही बनी हैं। और जब बड़े बच्चे को देखते है तो उन्हें लगता है कि बचपन कितना अच्छा है-बस बढ़ो और मस्ती करो, किसी बात की कोई चिन्ता नहीं।
इस पुस्तक में गोल्डि और सिलविया दो ऐसे ही बच्चे हैं जो पूरे समय और मस्ती और धमाचौकड़ी करते रहते हैं, पढ़ाई से उनका नाता जरा कम ही है। वास्तव मे स्कूलों या दूसरी जगहों पर नियम एवं अनुशासन के बारे में बहुत-सी बातें कहीं जातीं हैं। चूकि ये सामान्यतः थोपी हुई होती हैं। जब कि प्रकृति के सान्निध्य में किसी में भी जो पपरिवर्तन आता है, वो चूँकि अंदर से होता है, इसलिए लम्बे समय तक रहता है।
बच्चों एवं किशोरों के लिए यह पुस्तक न सिर्फ मनोरंजन साबित होगी, बल्कि उन्हें प्रकृति के लिए प्रेरित भी करेगी।

1
गोल्डी-सिल्विया और उनका स्कूल
एक परिचय


गोल्डी ग्यारह वर्ष का था और सिल्विया तेरह वर्ष की। इनमें सिर्फ उम्र का ही अंतर था। जहाँ तक मस्ती और शैतानी करने की बात थी, दोनों बिल्कुल एक बराबर थे। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे या शायद यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि एक ही स्कूल में थे (क्योंकि दोनों की पढ़ाई-लिखाई में कोई रुचि नहीं थी)। इनके शिक्षक भगवान को हृदय से धन्यवाद देते कि ‘‘अच्छा हुआ, दोनों एक ही कक्षा में नहीं, हैं, अन्यथा हमें त्यागपत्र देना पड़ता।’’

लेकिन गोल्डी-सिल्विया को एक कारण से भी महान व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता था कि काफी बुरा वक्त रहने पर भी अर्थात् काफी डाँट-मार खाते वक्त भी ये बिलकुल सहज बने रहते थे। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जरा-भी घबराहट या डर इनके चेहरों पर देख पाना संभव नहीं होता था।

आनंद विहार-गोल्डी-सिल्विया का यह स्कूल शहर का एक अच्छा स्कूल माना जाता था और यहाँ दिल लगाकर काम करने वाले कुछ खास लोगों ने इसे काफी खास स्कूल बना दिया था। इस स्कूल के प्रिंसिपल थे-मि. सुपरमणि बन्नातवाला। इस बारे में जरूर विवाद हो सकता है कि उनका नाम ज्यादा विचित्र था या सरनेम, लेकिन यह बात बिलकुल निश्चित है कि उनकी हरकतें बहुत ही विचित्र और बेहद आकर्षक थीं। बच्चे उन्हें आदर से मोगली अंकल कहते थे और शिक्षक प्यार से मि. डोमकौआ।

मि. सुपरमणि की ऊँचाई थी या यह कहें कि वे पाँच फीट छोटे थे, तो बेहतर होगा। उनका सिर भले ही छोटा था, लेकिन पेट काफी बड़ा था सिर से ज्यादा बाल कलमों में थे, जो उन्हें गुलमुच्छों की उपाधि दिलाने में विशेष सहायक होते। उनके चश्में का काँच देखकर सोडा वॉटर की बोतल का पेंदा याद आने लगता था। कुछ मिलाकर अगर उन्हें जोकर और सूमो पहलवान का यौगिक कहा जाए तो हमारा मन बुरा नहीं मानेगा।

मि. सुपरमणि सुबह साढ़े सात बजे खाना खाते और दोपहर में डेढ़ बजे आधा गिलास दूध पीते थे। स्कूल का समय था-आठ से दो। दो बजे के बाद वे क्या करते थे, ज्यादा किसी को भी मालूम न था। कहा यह जाता था कि वे घर जाकर हर रोज डायरी में लिखते थे कि दिन में उनको किसने क्या कहा ! वे शाम को पाँच से नौ बजे तक सोते थे और उठने के बाद फोन करके चौकीदार से पूछते कि स्कूल ठीक-ठाक है या नहीं। चौकीदार लालजी नौ बजे फोन के पास ही बैठा रहता। फोन पर प्रिंसिपल साहब की बात का जवाब देने के बाद वह घोड़े-गधे, गाय-बैल सब बेचकर ऐसे सोता कि फिर सीधे सुबह छः बजे से पहले उठने की गलती कभी न करता।

स्कूल में अपना एक खास व्यक्तित्व रखने वाली मैडम थीं-मिसेज खोसला। वे अधिकतर देर से ही स्कूल पहुँचतीं। लेकिन हम इसके लिए अगर उन्हें जिम्मेदार ठहराएँगे तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। दरअसल स्कूल जाने के लिए जब मिसेज खोसला घर से निकलतीं, तो बीच रास्ते में ही एक ब्यूटीपार्लर आ जाता, और फिर उन्हें वहाँ रुकना पड़ता। चूँकि गुरुवार को शहर का वह हिस्सा बंद रहता, तो वह पार्लर भी बंद रहता। इस गंभीर घटना से मिसेज खोसला अंदर से इतनी टूट जातीं कि गुरुवार को पूरी तरह से मन लगाकर बच्चों को पढ़ा नहीं पाती थीं। और इस बात से कि आज उन्होंने ठीक तरह से अपना कार्य नहीं किया-वे इतनी ज्यादा दुखी हो जातीं कि शाम को शहर के सबसे अच्छे होटल ‘रणजीत’ में जाकर दुगुना खाना खातीं। फिर वे घर आतीं और अपने इतने सारे दुःखों को भुलाने के लिए जोर-जोर से खर्राटे लेकर सोतीं। वैसे तो काकरोच और चूहे, रसोईघर और स्टोर-रूम में आम तौर पर अपनी सहज और निश्चल गति से इधर-उधर घूमते रहते, लेकिन गुरुवार की रात मिसेज खोसला के दिल दहलाने वाले खर्राटों की वजह से वे एक जगह दुबके, आनेवाले किसी भयानक तूफान की आशंका से रात-भर काँपते रहते।

स्कूल के महान व्यक्तियों के वर्णन में अगर हम गेम्स टीचर मि. तोश्नीवाल का नाम छोड़ देंगे तो वास्तव में यह कुछ वैसी ही बात होगी, जैसे कोई द्वितीय विश्वयुद्ध पर किताब लिखे और राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का नाम छोड़ दे। मि. तोश्नीवाल समय, नियमों और अजीबों-गरीब हरकतें करने के काफी पाबंद थे। वे दोनों हाथों में एक-एक घड़ी पहनते, ताकि एक के बंद होने या गलत समय बताने पर दूसरी का सहारा लिया जा सके। उनका यह कहना था कि ‘अगर मैं सपने में भी स्कूल पहुंचता हूँ तो समय पर।’ मि. तोश्नीवाल को जिस दिन से स्कूल में नियुक्ति मिली थी, उसी दिन से उन्होंने अपनी डरावनी प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था।

आनंद विहार स्कूल में अपना कार्यभार सँभालते ही महान गेम्स टीचर मि. तोश्नीवाल ने खेल के मैदान में काफी सूक्ष्म निरीक्षण किया। कई जगह आवर्धक लैंस जैसे जटिल यंत्र की सहायता लेने में भी वे बिलकुल नहीं हिचकिचाए। खो-खो के खंभे देखते ही उन्होंने घोषणा की, ‘‘जब तक इन्हें निकाला नहीं जाएगा, बच्चे निर्भीक होकर नहीं दौड़ पाएँगे।’’
वैसे तो मि. तोश्नीवाल के आकर्षक व्यक्तित्व से निकलती चमकीली किरणें विचित्रता की सारी हदों को हमेशा छूने की कोशिश करती रहतीं, लेकिन एक बार ये किरणें सभी हदों को पार कर गईं। हुआ यूँ कि मि. तोश्नीवाल की तीसरी बेटी का पाँचवाँ जन्मदिन था। और इस उपलक्ष्य में रखी गई शाम की पार्टी का समय था-7.20 से 9.10। वास्तव में मि. तोश्नीवाल शाम 6.05 से 7.15 तक न्यूज़पेपर पढ़ते थे और 9.15 पर सोने चले जाते थे। लेकिन जैसा हम शुरूआत में ही देख चुके हैं कि मि. सुपरमणि के तो उठने का समय ही नौ बजे था, तो जब ये तैयार होकर करीब 9.12 तक पार्टी में पहुँचे तो सभी बाशिंदे ढेर-सा खाना खाकर घर जाने के लिए रवाना हो रहे थे। मि. सुपरमणि ने काफी धैर्य और मजबूत आत्मविश्वास से एक प्लेट में छोले और बालूशाही ली। अभी वे बालूशाही को मुँह तक ले ही गए थे कि हमारे प्रिय गेम्स टीचर मि. तोश्नीवाल ने कार्ल लुइस से भी ज्यादा तेज गति से दौड़ लगाई और वह बालूशाही तथा प्लेट मि. सुपरमणि से छीन ली। पार्टी का गूँजता माहौल एकदम सन्नाटे में बदल गया। इस लोमहर्षक दृश्य को देखते लोग मंत्र-मुग्ध हो गए थे या स्तब्ध शायद इसका फैसला करने में हेग की अदालत को भी पसीना आ जाए।

तो अब हमें इस बात में कोई भी संदेह नहीं रह जाना चाहिए कि ऐसे खास हीरे तराशनेवाले लोगों के हाथों में पकड़कर गोल्डी-सिल्विया जैसे हीरे कितने निखर गए होंगे ! गोल्डी-सिल्विया का पढ़ाई के बारे में यह आलम था कि वे इतनी कम पढ़ाई करते कि शायद इससे कम पढ़ाई करना संभव, न होता। उन्हें स्कूल में ज्यादा डाँट-मार पड़ती थी या घर पर, कहना मुश्किल था। लेकिन ये दोनों अपने रास्ते में आनेवाली इन रुकावटों से बिना विचलित हुए अपनी मंजिल यानी ‘मौज-मस्ती’ की तरफ लगातार चलते रहने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करते रहते। और फिर जैसा हम जानते ही हैं कि जो भी व्यक्ति अपना कार्य ईमानदारी से करता है, भगवान भी उसका साथ देते हैं, तो गोल्डी-सिल्विया ने भी बुरे विद्यार्थियों और लगातार बे-सिर-पैर की मस्ती करनेवाले बच्चों के रूप में इस छोटी-सी उम्र में ही काफी नाम कमा लिया था।

कहनेवाले लोग यही कहते, ‘एक बार कुत्ते की पूँछ स्केल की तरह सीधी हो सकती है, खरगोश दौड़ में कछुए से जीत सकता है, लेकिन गोल्डी और सिल्विया, उनमें किसी अच्छी बात को ढूँढ़ निकालना प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों रूप से असंभव है।

2
वार्षिक परीक्षा, रिजल्ट और उसके बाद....


जैसाकि हम देख ही चुके हैं कि गोल्डी-सिल्विया को किसी भी तरह के छपे हुए अक्षर-चाहे वे कोर्स की किताब के हों या न्यूजपेपर के या फिर कॉमिक्स के-फूटी और साबुत, दोनों आँखों नहीं सुहाते थे।
वास्तव में दोनों की प्रमुखता रुचियों में से एक थी, ‘कम से कम पढ़ना।’ इस महत्त्वपूर्ण बात को जान लेने के बाद भी अगर हमारी जिज्ञासा थोड़ी-बहुत बाकी बची रहती है कि ‘उन्होंने अपने वार्षिक परीक्षाओं के पेपर कैसे किए होंगे ?’ तो यह हमारे द्वारा, उनके इस दृढ़ निश्चय का कि ‘वे कभी नहीं पढ़ेंगे’, बहुत बड़ा मजाक उड़ाना होगा।
मार्च महीने की शुरूआत। हम तरफ पढ़ाई का जबरदस्त माहौल। कोई वार्षिक परीक्षा के लिए पढ़ रहा था तो कोई पूरक परीक्षाओं के लिये, लेकिन पढ़ सभी रहे थे।

ऐसे ही चिंता-फिकर के दिनों की एक रात गोल्डी-सिल्विया और मम्मी-पापा खाना खा रहे थे। काफी देर की चुप्पी को तोड़ते हुए पापा ने पूछा, ‘‘वार्षिक परीक्षा कब से है ?’’
‘‘पंद्रह मार्च से।’’ गोल्डी ने नीबू के अचार की कली चूसते हुए कहा।
‘‘हूँ ! पढ़ाई कैसी चल रही है ?’’ पापा ने दोनों की तरफ देखते हुए पूछा।
दरअसल हर साल परीक्षाएँ बीस मार्च से शुरू होती हैं लेकिन इस साल कुछ जल्दी शुरू होने की वजह से थोड़ा-सा पढ़ना बाकी रह गया है।’’ सिल्विया के स्वर में चिंता और गंभीरता दोनों थीं।

‘‘बहाने वही लोग बनाते हैं जो मेहमत करने से हमेशा बचते रहते हैं।’’ पापा का स्वर काफी कड़क था।
कुछ देर शांति छाई रही, फिर पापा ने कहा, ‘‘मैं उम्मीद करता हूँ कि इस साल तुम दोनों निश्चित रूप से ही प्रथम श्रेणी में आओगे।’’
‘‘हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे।’’ गोल्डी-सिल्विया की आवाज उत्साह और जोश से पूरी तरह लैस थी।
खाना खाने के बाद गोल्डी-सिल्विया ने पढ़ाई के कमरे में घुसते ही बड़े तूफानी ढंग से पढ़ाई शुरू की।

लेकिन पंद्रह मिनट बाद ही दोनों को जम्हाई आने लगी, और तीस मिनट बाद वे पढ़ तो रहे थे, लेकिन सपने में।
और आखिर साल का सबसे बड़ा दिन भी आ ही गया-पंद्रह मार्च आज गोल्डी-सिल्विया सुबह सात बजे ही उठ गए-पेपर जो आठ बजे से था। जब वे परीक्षा देने पहुँचे तो किसी ने भी उन्हें अच्छा दिन बीतने की शुभकामनाएँ देने का जोखिम नहीं उठाया। दूसरी तरफ गोल्डी-सिल्विया ने भी किसी को शुभकामनाएँ नहीं दीं-क्योंकि दोनों अच्छी तरह जानते थे कि किसी के 45 प्रतिशत आएँ या 95 प्रतिशत, वह जाएगा तो अगली ही कक्षा में, दो-तीन कक्षाएँ आगे तो नहीं पहुँच जाएगा।
चूँकि समय कभी रुकता नहीं, इसलिए पेपर धीरे-धीरे निपटते रहे। लेकिन आठवीं के विज्ञान के पेपर में कुछ प्रश्न कोर्स से बाहर के आ गए। इससे हर तरफ काफी बड़ा भूचाल आ गया। सबसे ज्यादा वे विद्यार्थी चिल्लाए, जिन्होंने साल-भर बिलकुल पढ़ाई नहीं की थी। सिल्विया तो घर आकर दो-तीन घंटे लगातार रोती रही। उसने खाने में आज एक रोटी कम खाई, पापड़ भी काफी मनाने के बाद ही लिया और अचार की भी दो कली ही लीं।

जब पापा ने सिल्विया से पूछा कि कौन-कौन से प्रश्न कोर्स के बाहर के थे, तो सिल्विया बहुत ज्यादा दुखी होने के कारण उन प्रश्नों को नहीं बता पाई।
लेकिन पापा ! वे तो सिल्विया की मानसिक स्थिति को न समझते हुए चिल्लाए, ‘‘जब कोर्स के अंदर की ही बातें न मालूम हों तो कोर्स के अंदर और बाहर के प्रश्नों में फर्क तुम्हें कैसे मालूम पड़ेगा ?’’
इधर गोल्डी महोदय गणित का पेपर देने के बाद आते ही खाने की मेज पर डट गए। उन्होंने बैठते ही अपनी पसंद की बेहिसाब चीजों की माँग एक साथ करनी शुरू की।
‘‘मम्मी, कटहल का अचार दे दो, दही में नमक-जीरा डालकर दे देना, सलाद में ककड़ी भी। पापड़ लहसुन वाले ही खाऊँगा।’’

‘‘पेपर कैसा गया ?’’ मम्मी ने खाना परसते हुए पूछा।
‘‘आज तो मैंने बिलकुल फोड़ डाला।’’ गोल्डी के स्वर में ऐसा आत्मविश्वास था जैसा नेपोलियन सपने में भी नहीं सोच सकता था।
लेकिन मम्मी के इस एक वाक्य से कि ‘ऐसा तो तुम हर साल ही कहते हो’ गोल्डी को छोड़कर रसोईघर की हर चीज के दिल को गहरी ठेस लगी।
वास्तव में जब भी हम दूसरे लोगों का व्यवहार गोल्डी-सिल्विया के प्रति देखते हैं तो यही पाते हैं कि कोई भी व्यक्ति इन उत्साही बच्चों को निराश करने का एक भी मौका नहीं छोड़ता। वह तो हमें गोल्डी-सिल्विया के आत्मविश्वास की तारीफ करनी चाहिए, जो उन्हें उनकी रुचि के हर कार्य में सफलता दिलाता था।
तो इन सारी प्रतिकूल परिस्थितियों को देखते हुए गोल्डी-सिल्विया के रिजल्ट के विषय में कुछ इस तरह से कहना ही ठीक जान पड़ेगा, ‘हर साल की तरह इस साल भी परीक्षाएँ हुईं। दोनों 100 प्रतिशत आत्मविश्वास से परीक्षाओं में बैठे। पेपर 90 प्रतिशत अच्छे किए। परिणाम ! गोल्डी के 50 प्रतिशत और सिल्विया के 48 प्रतिशत।’

प्राचीन ग्रंथ हमें बार-बार बताते हैं कि परिणाम हमारे वश में नहीं होता है, तो गोल्डी-सिल्विया ने भी उन ग्रंथों का आदर करते हुए मात्र एक-एक पीरियड अर्थात् 35-35 मिनट से ज्यादा का शोक नहीं मनाया।
रिजल्ट के आधार पर गोल्डी-सिल्विया को कुछ भी कहा जाए, लेकिन परिणाम के प्रति इनकी प्रतिक्रिया देखकर हमारा विश्वास इस वाक्य पर और भी गहरा हो जाता है, ‘हमेशा प्रसन्न रहना ईश्वर की सबसे बड़ी भक्ति है।

3
गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बिताएँ-गहन विचार-विमर्श


एक तरफ था गोल्डी-सिल्विया का परीक्षाफल और दूसरी तरफ मम्मी की यह जिद कि इस बार तो वे और बच्चे ननिहाल जरूर जाएँगे। पापा इन दोनों बातों में से किस बात से ज्यादा दुखी थे, कहना एकदम आसान नहीं है।
दरअसल बात यह थी कि मम्मी ने अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध शादी की थी। इस बात से नाराज होकर उन्होंने मम्मी से अपने संबंध तोड़ लिए थे। लेकिन इस साल जनवरी से ही माता-पिता के लगातार पत्र आ रहे थे कि तुम सब यहाँ गर्मी की छुट्टियों में आ जाओ। अप्रैल तक करीब 18-20 पत्र आ चुके थे। लेकिन पापा को वहाँ जाना कई कारणों से अच्छा नहीं लग रहा था।

एक कारण तो यह था कि अगर बच्चों के सामने कोई नाटक हुआ तो बच्चों पर उसका बड़ा गलत असर पड़ेगा और दूसरी बात यह थी कि नाना-नानी रहते थे खंडवा में, जिसे कि एक बड़ा गाँव कहना ठीक होगा। वहाँ जाना यानी समय की पूरी बरबादी होगी। पापा सोच रहे थे कि अगर बच्चे इंदौर में रहकर ही दो महीने कंप्यूटर या इंग्लिश स्पीकिंग की कोई क्लास ज्वाइन कर लें तो बहुत अच्छा होता। फिर पापा यह भी कहते, ‘अगर घूमने ही जाना है तो किन्हीं पर्यटक स्थलों पर चलें, ताकि मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान की भी बहुत-सी बातें जानी जा सकें।

अप्रैल का आखिरी सप्ताह चल रहा था। मम्मी-पापा जाने और न जाने के पसोपेश में पड़े थे और उनकी हालत प्रिंस हेमलेट से भी ज्यादा खराब थी।
दुनिया का सबसे बुरा काम है, ‘किसी भी कलाकार की कला का अपमान।’ बस ! इसी बात का खयाल करते हुए गोल्डी-सिल्विया दूरदर्शन के हर धारावाहिक को पूरी गहराई में उतरकर बहुत चाव से देखने में डूबे रहते।
और जब-जब रिजल्ट का दुःख उन्हें बहुत ज्यादा सताता, तो वे उसे भूलने के लिए कभी अरनॉल्ड श्वार्जनेगर की टर्मिनेटर, ट्रू लाइज सिल्वेस्टर स्टैलॉन की फर्स्ट ब्लड, और क्लिफहैंगर जैसी भयानक मार-धाड़ की फिल्में देखते, तो कभी चार्ली चैप्लिन और लॉरेल हार्डी की हास्य फिल्में देखकर अपने को तनाव-मुक्त रखने की पूरी कोशिश करते; और कभी ई.टी. जुरासिक पार्क जैसी विचित्र वैज्ञानिक कल्पनाएँ देखते, ताकि वे फैंटेसी की दुनिया में खोकर वास्तविक जगत की कड़वी बातें भूल सकें। टेलीविजन भी शायद किसी विचित्र ही धातु का बना था। दिन-भर लगातार चलने के बाद वह बहुत गर्म तो हो जाता, लेकिन भाप बनकर उड़ता नहीं था।
1 मई, श्रमिक दिवस। आज 1917 की रूसी क्रांति से भी बड़ी घटना श्रमिकों के जीवन में घटी, जबकि मम्मी का अथक श्रम सफल हो गया था।



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