कृष्णावेणी में सन्ध्या - सुरेन्द्र महान्ति Krishnaveni mein Sandhya - Hindi book by - Surendra Mahanti
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कृष्णावेणी में सन्ध्या

सुरेन्द्र महान्ति

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :155
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2802
आईएसबीएन :81-7119-779-5

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विशाल उत्कल महाराज्य के महानायक गजपति प्रतापरुद्र की करुण गाथा....

Krishnaveni Main Sandhya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जैसे सूर्य का उगना शाश्वत है, वैसे ही भूख भी शाश्वत है। चाहे वह भूख सत्ता की हो या किसी और चीज की। भूख तो भूख ही है। और जब दो भोजन के भूखे आपस में टकराते हैं-खाद्ध-पदार्थों को झपटने के लिए, तो फिर उनमें गुत्थम-गुत्था शुरू हो जाती है; लेकिन जब राज पाठ के लिए लड़ाई हो, सत्ता-प्राप्ति की लड़ाई हो तो फिर दोनों पक्ष इस कदर क्रूरता का नंगा नाच करते हैं। कि गर्दनें गाजर-मूली की तरह कटने लगती हैं। दोनों पक्षों में समझौता होने तक लाशों का ढेर लग जाता है। और फिर आते हैं- अवसाद के क्षण, मातम के क्षण ! सगे-सम्बन्धियों की मृत्यु से उपजी कचोट के क्षण ! आँसुओं से भीगी आँखों में होते हैं फिर पश्चाताप के क्षण।
विशाल उत्कल महाराज्य के महानायक गजपतिप्रतापरुद्र की ऐसी ही करूण-गाथा है-कृष्णावेणी में संध्या !


गंगा से कावेरी तक फैले विशाल उत्कल महाराज्य की पतनोन्मुखता की त्रासदी है- कृष्णावेणी में संध्या !
घर के भेदी गोविन्द विद्याधर की कुटिल चाल से बंगाल-नवाब हुसैन शाह उत्कल के राजाओं पर आक्रमण कर देता है; किन्तु इस दौरान उसका ऐसे वीरों से सामना होता है कि कुछ शर्तों के साथ वह समर-क्षेत्र से पलायन कर जाता है।

कर्णाट राजा कृष्णदेव राय का समर-कौशल, उसके मन्त्री तिमरसु की कूटनीति, गजपति महाराजाओं के द्वारा स्थापित दक्षिण के दर्जनों दुर्गों का पतन, रामानन्द राय का वैराग्य, तिरूमल्ल राय की वीरगति, राजकुमार वीरभद्र की भरी सभा में आत्महत्या, राजकुमारी जगन्मोहिनी का सन्धि की शर्त बनकर जाना, उसके प्रणय की विडम्बना इत्यादि ऐतिहासिक घटनाएँ अपने कलेवर में छिपाए हुए है यह पुस्तक !
पूर्व खंड की तत्कालिक जीवन्त तथा सरस घटनाओं से साक्षात्कार करानेवाली पठनीय पुस्तक है-कृष्णावेणी में संध्या !

प्रथम परिच्छेद


उत्कल-कलिंग साम्रा़ज्य के उत्तरी सीमान्त मेंप्रतापरुद्र देव की छावनी। गौड़ के नवाब हुसैन शाह के लड़ाई से भाग खड़े होने पर, सारी उत्तेजना धीमी पड़ गई है। रूपनारायण नदी के स्रोत पर जहाँ-तहाँ ढलते सूरज की सुनहली आभा बिखरी पड़ी है। क्षितिज पर विदायकालीन रक्ताभ वेदना है।

नदी किनारे सम्राट गजपतिप्रतापरुद्र के शिविर में सन्नाटा है। शोरगुल के बाद अखंड निर्जनता अच्छी लगती है।
प्रतापरूद्र जैसे आज पहली बार नदी की छाती पर प्रकाश और छाया का खेल देख रहे हैं। युद्ध-विग्रह की व्यवस्ता के भीतर अब तक उनको इसके लिए अवसर ही नहीं मिल पाया था। हल्की-हल्की हवा के स्पर्श से दोनों पलकें झपकी लेने लगी हैं।
गौड़ के सुलतान हुसैन शाह ने प्रतापरुद्र के दक्षिण अभियान से मौका पाकर याजनगर पर कब्जा करने के बाद वाराणसी कटक पर भी हमला किया था। कहीं श्रीक्षेत्र पर भी आक्रमण न कर दे, इसी भय से पंडे-पुजारियों ने देव-प्रतिमाओं को देवालय से हटाकर चिलिका झील के किसी अज्ञात स्थान में छिपाकर रखा था।

यह खबर मिली तो प्रतापरुद्र कृष्णा नदी के किनारे से अपनी छावनी उठाकर लौट आए थे, नहीं तो शायद हुसैन शाह बारबाटी दुर्ग पर आक्रमण करके उसको तहस-नहस कर डालता। अब प्रतापरुद्र के प्रति आक्रमण से हुसैन शाह जंगली जानवर की तरह मन्दारन किले के भीतर छिप गया है। इसलिए मन्दारन में ज्यादा समय और ताकत नष्ट करने की जरूरत नहीं है। उत्कल साम्राज्य की उत्तरी सीमा अब सुरक्षित है। दक्षिणी सरहद भी मोटे तौर पर शान्त ही है। रूपनारायण के किनारे कुछ दिन आराम करने के लिए मानो प्रतापरुद्र के श्रान्त शरीर और क्लान्त मन बेचैन हो रहे थे। वैसे आराम के लिए काफी वक्त था। लेकिन शान्ति नहीं थी ? सैकड़ो बिच्छुओं के डंक से प्रतापरुद्र नित्य पीड़ित रहते।... दक्षिण अभियान के समय वे कृष्णा के किनारे थे तो हुसैन शाह वाराणसी कटक तक कैसे घुस आया ? उनको इस सवाल का कोई जवाब अभी तक नहीं मिल पा रहा था। याजनगर में भी उसका प्रतिरोध नहीं हो सका। आखिर क्यों ? अगर वे ऐन वक्त पर नहीं पहुँचते तो शायद कटक भी हाथ से निकल जाता !

कहीं कटक के जिम्मेदार गोविन्द विद्याधर ने विश्वासघातकता तो नहीं की ? वे तो समर्थ थे, आसानी से प्रतिरोध कर सकते थे। अधिकार राजनीति के कोश में असंभव नाम का शब्द ही नहीं होता। एकदम अनुगत मित्र भी मौका पाते ही तलवार उठा सकता है सूर्यवंश के प्रतिष्ठाता उनके दादा कपिलेन्द्र देव ने भी क्या अन्तिम गजपति-नरेश मस्त भानुदेव के साथ विश्वासघात नहीं किया था ? ऐसा करके ही तो उन्होंने उत्कल-कलिंग साम्राज्य के सिंहासन को हथिया लिया था न ! राजनीति का इतिहास हर समय विश्वासघात का इतिहास है।

उत्कल मंडल में तैलंग गंगवंश के उच्छेद के लिए तब शायद यही इतिहास का अलंघनीय निर्देश था। क्या पता आज भी वह परिस्थित अन्दर-अन्दर पनप रही हो ?  कुछ नहीं कहा जा सकता। आज भी तैलंगी लोगों के साथ सूर्यवंशी राजाओं का घनिष्ठ सम्बन्ध बना हुआ है। विवाह तथा दूसरे सूत्रों के द्वारा। दक्षिण मंडल में सभी पद-पदवियों में वे तैलंगी लोग ही जमे हुए हैं। गोविंद विद्याधर इसके प्रच्छन्न विरोधी हैं प्रतापरुद्र से यह बात छिपी नहीं हैं। हुसैन शाह के साथ मिलकर उन्होंने कुचक्र रचा हो, यह असम्भव नहीं लगता। खासकर इस वक्त गजपति प्रतापरुद्र के सभी विश्वस्त सेनापति दक्षिण में व्यस्त हैं-कुमार वीरभद्र कोण्डाविडु में हैं, तिरमल्ल राय उदयगिरि में और राय रामान्नद राजमहेन्द्री में डटे हुए हैं। इसी मौके से लाभ उठाकर गोविन्द विद्याधर ने हुसैन शाह को कटक तक घुस आने की छूट दे दी हो तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए।

प्रतापरूद्र की आँखों के सामने गोविन्द विद्याधर की दो कँटीली आँखें साफ झलकने लगीं। मानो गठीले चेहरे पर किसी विषधर साँप की दो आँखें दमक रही हों। गोविन्द विद्याधर को अधिकार च्युत कर देने का उपाए भी तो नहीं है। उत्कल से उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ शत्रु डटा हुआ है। ऐसे में घर के भीतर शत्रु बनाना बेवकूफी होगी।
प्रतापरुद्र ने लम्बी साँस ली। उसमें क्लान्ति, अवसाद और असहायबोध भरी हुई थी। क्या यही एक सम्राट का जीवन होता है !

इधर गोधूलि के स्वर्णरेणु से रूपनारायण विचित्र वर्णों से झलमला उठी है। मशाल जलानेवाले प्रहरी अर्धवृत्ताकार में सजी मशालों में आग जलाने लगे हैं। आसन्न संध्या की पृष्ठभूमि पर मशालें मानो नक्षत्रमालिका की तरह जलने लगी हैं। स्निग्ध और शान्त परिवेश है। यहाँ तो युद्ध, संघर्ष और विश्वासघातकता के बारे में सोचना ही एक अपराध है।
 
क्योंकि इतिहास हर युग में इन सम्राटों और सम्राज्यों का यशोगान करता आ रहा है ? साम्राज्य के साथ जीवन का कोई सम्बन्ध भी होता है क्या ? लेकिन साम्राज्य के बहाने करोड़ो जीवन-दीप बुझा दिए जाते हैं। धरती पर विभीषिका छा जाती है। फिर भी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। शायद यह कभी खत्म न हो !

रूपनारायण के वक्ष पर अचानक ‘हरिबोल’ की ध्वनि गरज उठी। प्रतापरुद्र की एकाग्रता टूट गई। कौन हैं यह भगवा भेषधारी, सूर्य जैसे दमकते, सुगठित शरीरवाले नवीन संन्यासी ? नाव पर कुछ अनुचरों के साथ उन्मत्त होकर दोनों हाथ ऊपर उठाए नाच रहे हैं... ‘‘हरिबोल...हरिबोल....।’’ शान्त गोधूलि उनकी हरिबोल ध्वनि से गूँज रही है। ये लोग निश्चित रूप से गौड़ देश से आ रहे हैं। लेकिन वहाँ तो हुसैन शाह की धर्मान्धता के कारण हरिनाम लेना मना है। प्रतापरुद्र ने भी लोगों से सुना है एक बार यवन हरिदास ने रूपनारायण के बाजार में ‘‘हरिबोल’’ की आवाज लगाई तो हुसैन शाह के सिपाहियों ने चाबुकों से मारकर उन्हें बेहोश कर दिया था। फिर उन्हें गौड़ की सीमा से निकाल दिया था तो फिर इस तरूण संन्यासी की हरिबोल-ध्वनि उस धर्मान्धता के लिए चुनौती नहीं है क्या ? लेकिन हैं कौन ये ? सच में कितने निडर और निःशंक हैं। उनकी हरिबोल ध्वनि में जैसे युग-युग की व्याकुलता प्रकटित हो रही है। मानो व्याकुल बुभुक्षु आत्मा को आह्वान के लिए वाणी मिली है।

संन्यासी युवक अपने अनुयायियों के साथ रूपनारायण पार होकर ढलती साँझ के अन्धकार में ओझल हो गए। प्रतापरुद्र ने अपने अनुचरवर्ग से संन्यासी के बारे में काफी पूछताछ की, लेकिन कोई सही विवरण नहीं दे सका। नाविक ने अवश्य इतनी सूचना दी थी कि ये लोग छत्रभोग से आ रहे हैं- श्रीक्षेत्र पुरी जानेवाले हैं।
चिन्तित भाव से प्रतापरूद्ध कुछ समय तक रूपनारायण के किनारे टहलते रहे। कभी उनके सामने गोविन्द विद्याधर की आँखे तैर जाती थीं तो कभी उस युवक संन्यासी की प्रमत्त नृत्य की झाँकी।

वैसे इस उद्वेग का कोई निश्चित कारण नहीं है। फिर भी उद्वेग और व्याकुलता से प्रतापरुद्र की रंगीन सन्ध्या भी उन्हें आकृष्ट नहीं कर पा रही है। संध्या की कोमल आँखों पर धीरे-धीरे तरल अन्धकार उतरता आ रहा है।
उस तरूण संन्यासी की हरिध्वनि कभी की चुप हो गई है। लेकिन उसकी मूर्च्छना से तो रूपनारायण का कूल-किनारा अभी तक मुखरित हो रहा है। हरिनाम के उस उद्वेलन की एक अपूर्व लहर है। यह आनन्द सिर्फ एक मुग्ध-अनुभूति नहीं है। वह काफी ऊपर है...सुखातीत उपलब्धि है। यह तो संसार के कीचड़-पंक से हठात् जीवन को ऊपर उठकर वर्णनातीत आनन्द लोक की ओर ले जाती है। प्रतापरुद्र मानो लम्बे अरसे के बाद उस बहु-आकांक्षित आनन्दलोक का आश्वासन पा गए हैं। कौन हैं यह साधु ? क्या प्रतापरूद्ध उनकी तरह उन्मत्त होकर नाच-नाचकर हरिकीर्तन नहीं कर सकते ?

लेकिन दूसरे क्षण प्रतापरुद्र सचेत हो उठे। यह क्या सोच रहे हैं। सम्राट और कीर्तन ! क्या वह क्लीवत्य, मूर्खता नहीं है ? कैसा अनोखा संशय मन में जागता है ? क्या सम्राट भी कभी संन्यासी बन सकता है ? नहीं-नहीं, संन्यास उसका धर्म नहीं है। धर्मान्धता के विजातीय आक्रमण के अन्धड़ में देशभर में आज उत्कल प्रान्त ही तो सनातन धर्म और संस्कृति का एकमात्र आश्रयस्थल है। उत्तर में हुसैनशाह, दक्षिण में गोलकुंडा, बहमनी, बीजापुर की मुसलमानी ताकत।

इधर विजय नगर की नई राजशक्ति कृष्णदेव राय के नेतृत्व में उत्कल के लिए नई आफत बनकर खड़ी हो गई है। इन्हीं कृष्णदेव राय के डर से ही तो आज गोलकुंडा के साथ प्रतापरूद्र की मैत्री बनी हुई है। एक बार वह डर टूटा नहीं कि गोलकुंडा बहमनी, बीजापुर के मुसलमान शासक उत्कल की दक्षिणी सीमा पर जमकर वार करने लगेंगे- इतना तो वे अच्छी तरह जानते हैं। पर दुर्भाग्य है कि ऐसे संकट के समय पूर्व और दक्षिण भारत की दो हिन्दू शक्तियाँ उत्कल और विजयनगर एक दूसरे को धूल में मिला देने की कसम खा बैठी हैं। इस आत्मघाती व्रत के पीछे साम्राज्य का नशा ही तो है।

प्रतापरुद्र को गीता की वे पंक्तियाँ याद आ गईं-‘‘क्षुद्र हृदय दौर्बल्यं त्यक्तोत्तिष्य परंतप !’’ शायद भारतीय इतिहास के किसी विडम्बनापूर्ण मूहूर्त में यह श्लोक फूट निकला था, एक मोहग्रस्त जाति के उद्बोधन के लिए। क्षण-भर में ही उसका सारा अवसाद दूर हो गया।
चौंक उठे प्रतापरुद्र ! सन्धिविग्रहिक नरसिंह बाहुबलेन्द्र पास खड़े थे, काफी देर से, कुछ कहने के लिए उत्सुक थे। लेकिन अब तक सम्राट का उधर ध्यान ही नहीं गया था इसलिए वे भी मौन थे।
‘‘अरे बाहुबलेन्द्र हैं ? क्या कुछ कहना चाहते हो ?’’
नरसिंह बाहुबलेन्द्र ने कहा- ‘‘उदयगिरि के मंडलेश्वर तिस्मल्ल राय महापात्र का दुःसंवाद मिला है प्रभु।’’
    ‘‘क्या है ?...’’ विस्मित हुए प्रतापरुद्र।

उदयगिरि तो बड़ा दुर्जय किला है, नहीं, उत्कल साम्राज्य के दक्षिणी सीमान्त का सजग प्रहरी है। कांचीराज साल्व नरसिंह पूरी ताकत लगाने पर भी उदयगिरि की सीमा को छू नहीं सका था। फिर कांची राजा नरसा नायक के लिए तो उदयगिरि मानो उसकी मृत्युशय्या पर आखिरी दीर्घश्वास था। उत्कल साम्राज्य का दुर्भेद्य उदयगिरी भी विजयनगर के आक्रमण से कभी विपन्न हो सकता है, प्रतापरुद्र को इसका विश्वास नहीं होता था।

दुर्गम पर्वतमाला के बड़े-बड़े दाँतों पर बसा उदयगिरि दुर्ग सचमुच दुर्भेद्य था। इसका परकोटा भी तीखा नोकदार बना था। वहाँ से पर्वत के पाददेश तक फैला हुआ था दुर्गम अरण्य। वृक्षों की शाखाओं पर छिपकर पहरा देते थे धनुष-बाण से लैस पाइक (पदातिक) सैनिक। दुर्ग की सीमा तक पहुँचने के पहले ही शत्रु इनकी बाण-वर्षा से धरती पर लोट जाता था। प्रतापरुद्र के चाचा निरमल्ल राय महापात्र भी बड़े पराक्रमी सेनापति थे। फिर भी उदयगिरि का किला कैसे विपन्न हो गया ? निरमल्ल ने क्या बुरी खबर भेजी है।

बाहुबलेन्द्र ने फिर निवेदन किया- ‘‘इस बार स्वयं कृष्णदेव राय ने आक्रमण का नेतृत्व लिया है, सम्राट ! विजयनगर की सेना ने उदयगिरि को बहुत दिनों से घेर रखा है। कृष्णदेव राय का धूर्त मन्त्री है तिमिरसु । उसने हुक्म दिया है कि खाद्याभाव से किले के सैनिक तिल-तिलकर मर जाएँ। इससे विजयनगर भी रक्तक्षय से बच जाएगा। इधर दुर्ग का खाद्य-भंडार दिनोंदिन सूना होता जा रहा है। गजसेना तो खाद्य के अभाव में एकदम जीर्ण हो गई है। अब लगभग अकर्मण्य है।

‘‘लेकिन उदयगिरि का घेराव तो कोई नई बात नहीं है बाहुबलेन्द्र। लगभग एक साल हुआ कृष्णदेव राय बीजापुर और बहमनी पर धावा बोल चुके थे। उसके बाद से तो उदयगिरि भी अवरूद्ध हो गया था।’’

बाहुबलेन्द्र मन ही मन खीज उठे। क्या सम्राट इतना नहीं समझ रहे है कि हालत कितनी बिगड़ गई है। एक साल से भी ज्यादा समय से उदयगिरि का अवरोध चल रहा है रसद की आपूर्ति के बिना कब तक काम चल सकता है ? उन्होंने कहा- ‘‘खाद्य के अभाव के कारण उदयगिरि के सैनिक मरने लगे हैं। तिरूमल्ल राय ने यही संवाद भेजा है कि अगर विजयनगर की सैन्यवाहिनी पर पीछे से आक्रमण न किया गया तो उदयगिरि को कब्जे में नहीं रखा जा सकता। कोंडाबिडु से भी कुमार वीरभद्र अचानक कटक आ पहुँचे हैं। उदयगिरि के बाद कोंडाबिडु की बारी है। उनका एक प्यादा कटक से यह खबर लाया है कि कोंडाबिडु को भी जल्द से जल्द रसद और अस्त्रशस्त्र भेजना पड़ेगा। अब तो कोंडाबिडु भी विपन्न हो चुका है।
‘‘वीरभद्र आए हैं ?...’’प्रतापरुद्र के ज्येष्ठ पुत्र और दुर्ज्जय सेनापति हैं कुमार वीरभद्र। लेकिन वे तो छोटी-मोटी  विपत्ति से घबड़ाने वाले जीव नहीं हैं ! सच में कुछ गड़बड़ी है...’’

बाहुबलेन्द्र ने जोड़ दिया- ‘‘ इससें समझें कि हालत कितनी गम्भीर है।’’
इसी समय एक संदेशवाहक ने बड़ी हड़बड़ी में यह खबर पहुँचाई- ‘‘गोलकुंडा से आजम खाँ आए हैं। हुजूर से मिलना चाहते हैं।’’ पीछे-पीछे आजम खाँ पहुँच ही गए। कुर्नीस अर्ज करके सीधे कहा-‘‘नवाब ने खबर दी है। बीजापुर और बहमनी  को खत्म करने के बाद अब कृष्णदेव राय कृष्णा नदी को पार करना चाहता है। यह सिर्फ गोलकुंडा के लिए खतरा नहीं है, उत्कल साम्राज्य के लिए भी है।’’

एक-से-एक बुरे समाचारों के डंक- ‘‘उधर रूपनारायण के वक्ष पर फागुन की चाँदनी सैकड़ों चिनगारियाँ बनकर बिखर गई है। प्रतापरुद्र अपने शिविर की ओर लौटे। आदेश दिया-‘‘उठाव शिविर।’’ फागुन की ज्योत्स्ना रूपनारायण की छाती पर होंठ दबाकर विदा ले। समय नहीं है। फिर वही कृष्णा !

क्या साम्राज्य का मतलब सिर्फ लड़ाई, आक्रमण और रक्तपात ही है ? यह राजमुकुट है या काँटो का ताज ? प्रतापरुद्र ने दीर्घश्वास लिया। पल भर में रूपनारायण के स्कन्धावार में ‘‘चलो चलो’’ की आवाज गूँज उठी।
परन्तु प्रतापरुद्र वाराणसी कटक में रुके नहीं। कोंडाबिडु के मुंडलेश्वर कुमार वीरभद्र, तिरुमल्ल राय के विशेष संवाददाता उदयगिरि से आकर वहाँ बैठे हैं। गोलकुंडा का प्रतिनिधि...। करें प्रतीक्षा। दक्षिण से लौटकर प्रतापरुद्र ने अब तक अपने इष्टदेव जगन्नाथ जी के दर्शन नहीं कर पाए हैं। पात्रमन्त्री आदि को कटक भेजकर वे पुरी चले गए।

मन्दिर में मध्याह्न उपासना की षोडषोपचार पूजा समाप्त हो चुकी है। अब सबके लिए मन्दिर खोल दिया गया है। यात्री बाईस सीड़ियों से होकर मन्दिर के भीतर घुस रहे हैं। प्रतापरुद्र भी उनकी भीड़ मे शामिल हो गए। उनके लिए आज देवालय के शोध की जरूरत नहीं पड़ी। आप राजसेवक हैं, सम्राट का अभिमान नहीं है उनके मन में। विपन्न उत्कल के प्रतिनिधि के रूप में वे आए हैं, उत्कल-कलिंग साम्राज्य के इष्टदेव से आशीर्वाद लेने के लिए। भावावेग से प्रतापरुद्र में तन्मयता छाई हुई थी। चलते-चलते कब वे कालाहाट के दरवाजे के छायान्धकार में खड़े हो गए हैं- मन्दिर के सेवक भी उन्हें नहीं देख पाए हैं। गरुण स्तम्भ के पास वे एक दूसरे झमेले में डटे हुए हैं। जगमोहन के यात्री लोग भी वहीं भीड़ जमाए हुए खड़े हुए हैं। कौतूहल भरे दर्शक-

‘‘ अरे कौन है रे, हनुमान की तरह चौकड़ी भर रहा है रे।’’
‘‘अरे यह तो एक गैंडा है रे !’’   
जिसे देखकर सेवक लोग इस प्रकार के आदेश भर्त्सना इत्यादि कर रहे हैं, उनका इस पर ध्यान नहीं है। होश-हवाश खोकर वे नाचते-कूदते सुललित कंठ में गा रहे हैं।
 ‘‘कदाचित् कालिन्दी तटविपिन संगीत करवो।
   मुद्राभीरी नारी बदन कमल स्वाद मधुप।’’

सेवक फटी आवाज में चिल्ला उठते हैं- ‘‘गुसाईं जी, यह तो वृन्दावन है नहीं। यह यमनिक तीर्थ है। यहाँ योग और संयम दरकार होते हैं। यहाँ क्यों नाचते उछलते हो ? मुद्राभीरी नारी यहाँ मिलेगी नहीं।
जगमोहन की धूपछाँह में साफ दिखाई नहीं देता था। लेकिन प्रतापरुद्र को लगा यह वही युवा संन्यासी ही हैं जिनको उस दिन रूपनारायण नदी के किनारे उन्होंने एक बार देखा था। ठीक ऐसे कीर्तन करते हुए ! लेकिन मन्दिर के भीतर इस तरह के कीर्तन और नर्तन का मतलब वे नहीं समझ सके। अथवा उस युवा संन्यासी को भी वहाँ सही ठिकाने पर वे स्थापित भी नहीं कर पाए। शायद नाचते-नाचते वह संन्यासी मूर्छित हो गए हैं।

‘‘अरे रे बेहोश हो गए हैं रे ! पानी ला पानी !’’ एक साथ भीड़ चिल्ला उठी। संन्यासियों के दल में से एक लंडितमुंड संन्यासी ने कहा-‘‘आप लोग घबड़ाइए नहीं। कभी-कधार प्रभु इस प्रकार उन्माद-दशा को प्राप्त हो जाते हैं। यह तो दिव्योन्माद है न !’’
सेवक लोग इस स्थित को बिलकुल समझ नहीं पा रहे थे। दिव्योन्माद कौन-सी चिड़िया है ? विस्मय से एक दूसरे का मुँह ताकने लगा। संन्यासी के सहयात्रियों ने उनके मूर्छित शरीर को ऊपर उठाया और मन्दिर के बाहर निकल गए। सेवकों के बीच उत्तेजना और कोलाहल भी धीरे-धीरे शान्त हो गया।

जब कभी प्रतापरुद्र पुरी आते तो राजगुरू वासुदेव सार्वभौम के पदबन्दन के लिए भी अवश्य उपस्थित होते। सार्वभौमजी बड़े पंडित हैं। शास्त्रज्ञ, अद्वैतवादी। जन्मभूमि नवद्वीप छोड़कर बहुत दिन हुए पुरी में रह रहे हैं। गौड़ देश के आध्यात्मिक वातावरण में सार्वभौम की खोज करने पर भी तृप्ति नहीं मिल पाई। अपने अगाध शस्त्रज्ञान के हेतु पुरूषोत्तम देव के जमाने से वे पुरी में राजगुरू की पदवी अलंकृत कर रहे हैं। श्रीमन्दिर का संचालन उनके प्रत्यक्ष तत्त्वाधान में ही होता है। इसलिए जगन्नाथ वल्लभ उद्यान में एक मठ उनके आवास के लिए बनाया गया है। सार्वभौम जी के दर्शन के लिएप्रतापरुद्र जगन्नाथ वल्लभ में आ पहुँचे।

लेकिन वहाँ पर भी उसी संन्यासी को घेरे बड़ी भीड़ लगी थी। संन्यासी की मूर्छा अभी तक टूटी नहीं। मठ के प्रांगण में एक बकुल पेड़ के नीचे सुशीतल छाया में सहयात्रियों ने उन्हें लिटा दिया है। ये लोग नदियों या नवद्वीप के अधिवासी हैं। इसलिए संन्यासी को परिचर्या के लिए वे उनको सार्वभौम के मठ में ले आए हैं। सार्वभौम जी भी उसी नदिया के ही हैं। खुद सार्वभौम जी, एक मूढ़ा लेकर बैठ गए हैं, संन्यासी के मूर्छित शरीर के पास ही। धीरे-धीरे पंखी झलते हुए हवा कर रहे हैं। होश लाने के लिए कुछ लोग उनके मुँह पर पानी के छीटे दे रहे हैं।

प्रतापरूद्र ने पहचाना- यही वह युवा संन्यासी हैं। इन्हें देखा था उस दिन रूपनारायण नदी के किनारे। उस सुनहली गोधूलि में। भीड़ को चीरते हुए प्रतापरुद्र संन्यासी के निकट पहुँचे। उनका कौतुहल तब तक आवेग में बदल गया था। कौन है वह संन्यासी ? मन्दिर में कीर्तन करते-करते वे अचानक बेहोश क्यों हो गए ?
संन्यासी की मूर्छा टूटी। अर्धनिमीलित आँखें खोलकर उन्मत्त की तरह नीचे से उठ बैठे। फिर वासुदेव सार्वभौम के पाँव पकड़कर फिर अचानक मूर्छित–से होकर पड़े रहे। सार्वभौमजी घबड़ाकर उन्हें ऊपर उठाते हुए कहा-
‘‘ बैठो बाबा, बैठो।’’

इसी बीच सहयात्रियों से सार्वभौमजी ने संन्यासी का परिचय प्राप्त कर लिया था।
‘‘तुम नवद्वीप के नीलाम्बर चक्रवर्ती के नाती हो ? विश्वम्भर ! यह सब नहीं बताकर ये लोग कहते हैं ठाकुर ! ठाकुर ! चक्रवर्ती महाशय मेरे पिताजी के बचपन के साथी हैं। मुझको तो नवद्वीप छोड़े बहुत दिन हो गए, बाबा ! इसलिए तुम्हारे पिताजी जगन्नाथ मिश्र के साथ मेरा परिचय नहीं हो पाया। जो भी हो तुम तो ठहरे नीलाम्बर चक्रवर्ती के पोते। उस हिसाब से तुम मेरे पौत्र हो। लेकिन ऐसी दुर्दशा क्यों कर रखी है
बाबा ?’’

संन्यासी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उनके एक प्रौढ़ सहयात्री ने कहा... ‘‘यह दुरवस्था नहीं है सार्वभौम महाशय ! प्रभु जी की कभी-कभी ऐसी उन्मादावस्था होती ही है।’’
‘‘लेकिन उन्माद दशा क्यों ?’’ विस्मित होकर सार्वभौम जी ने पूछा।
‘‘यह सात्विक प्रेम विकार है बाबा...’’ एक दूसरे सहयात्री ने टिप्पणी की। नव्यन्याय में सुपंडित, तर्कवादी हैं वासुदेव सार्वभौम। उन्माद या विकार का तर्कसंगत कारण वे नहीं समझ पाए। चिन्तित होकर पूछने लगे –
‘‘यह कोई अस्वस्थता... कोई व्याधि तो नहीं है न ?’’
धूल से लथपथ युवा संन्यासी अब तक निर्वेद की स्थित में बैठे हुए थे। वासुदेव सार्वभौम के प्रश्न से वे क्षुब्ध नहीं हुए। शान्त आवाज में बोले-

‘‘ आप जिसे विकृति मानते हैं वही प्रेमभक्ति की मरमी साधना है। यह शुद्धा भक्ति ही सत्य है। प्राणनाथ के साथ मिलन केवल इस शुद्धा भक्ति से संभव है।’’
‘‘सार्वभौम ने उत्तर दिया- ‘‘ यह कोई नया तत्त्व तो नहीं है बाबा। भक्ति ही तो भारतीय आध्यात्मिक दर्शन का आखिरी उच्चारण है। किन्तु किसकी भक्ति करोगे ? उसके लिए आवश्यकता है ज्ञान की। ज्ञान से ही उनकी उपलब्धि हो सकती है।’’
‘‘ज्ञान का मार्ग तो सूखे तर्क-वितर्क का है। रसराज का परिचय नहीं मिल सकता प्रभु।’’ तरूण संन्यासी का तर्क था।
वासुदेव सार्वभौम ने कहा-‘‘किन्तु उत्कल तो ज्ञान मार्ग की भूमि है। यहाँ सोऽहम् की साधना चलती है। जीवात्मा और परमात्मा यहाँ एक और अभिन्न हैं। अद्वय हैं। परमात्मा के साथ जीवात्मा का मिलन यहाँ योग प्राणायाम इत्यादि के जरिए होता है। उन्माद अवस्था में तो वह सम्भव नहीं है।’’

सार्वभौम जी युवा संन्यासी को उत्कलीय आध्यात्मिक परिवेश के बारे में समझाने की चेष्टा कर रहे थे। किन्तु युवा संन्यासी की बस वही एक युक्ति थी- ‘‘ अद्वैत नहीं, द्वैत भी नहीं। द्वैत और अद्वैत का घनिष्ठ मिलन। वह अचिन्त्य है।’’
सार्वभौमजी ने कहा-‘‘फिर कभी इस पर तर्क करना। अब तुम यहीं पर विश्राम करो बेटे। तुम थके हुए हो।’’ सार्वभौम के परिचारक लोग संन्यासी और उसके सहयात्रियों को मठ के अन्दर ले गए।
तब वहाँ पर अचानक प्रतापरुद्र की उपस्थिति का भान होते ही सार्वभौमजी  ने कहा-‘‘महाराज, अचानक आप यहाँ !’’
प्रतापरूद्र ने सर्वभौम का चरन स्पर्श करते हुए कहा -‘‘फिर से दक्षिण की ओर जाने से पहले आ गया। श्री जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए।

‘‘लेकिन कुल दो महीने पहले ही तो दक्षिण सीमा से लौटे थे !... इसी बीच हुसैन शाह ने श्रीक्षेत्र में आतंक फैला दिया था। सेवक लोगों ने देवताओं को देवालय से निकालकर चिलिका के गर्भ में छिपाए रखा था।’’
प्रतापरूद्र ने उत्तर दिया-‘‘ परन्तु अब अचानक कृष्णदेव राय ने आक्रमण कर दिया है। दक्षिण सीमा पर। आशीर्वाद दीजिए कि उत्कल का सम्मान बरकरार रहे।’’
वासुदेव सार्वभौम ने गले से रूद्राक्ष की माला निकालकर प्रतापरुद्र के मस्तक पर छुलाते हुए अनुच्च कंठ में आशीर्वाद किया- ‘‘विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ताः शरणं गताः न तेषां जायते किंचित् अशुभं रण संकटे ! दुर्गामाधव उत्कल की राजधानी की रक्षा करें।’’

द्वितीय परिच्छेद

बारबाटी दुर्ग के अन्तःपुर में राजकुमारी जगन्मोहनी का प्रकोष्ठ। आसन पर बैठी हैं नागम्मा वीणा विशारदा...सामने बैठी हैं राजकुमारी जगन्मोहिनी ! वीणावादन की शिक्षा चल रही है शायद। लेकिन मृदुल गोद में वीणा मूर्छित होकर पड़ी है। कभी-कभार जगन्मोहनी की अनमनी उँगलियाँ वीणा के तार को छू जाती है तो स्वरलहरी पलभर के लिए जाग उठती है, फिर चुप हो जाती है। अन्तःपुरा के बाहर दुर्ग के बाहरी पँवरियों में सजगता की हाँक। आज महाराज प्रतापरुद्र लौट रहे हैं।
‘‘आज तो पुरवी कल्याण राग की साधना करनी थी न राजकुमारी ?’’ नागम्मा ने हल्की डाँट बताई। काँची की अत्यन्त प्रसिद्ध वीणावादिनी नागम्मा को प्रतापरुद्र ले आए थे अपनी दुलारी पुत्री को संगीत सिखाने के लिए।

‘‘संगीत तो साधना है न, अन्यमनस्क होने से कैसे चलेगा ?’’
लेकिन आज वीणा सीखने में जगन्मोहनी की एकाग्रता है ही नहीं। वातायन से वे बार-बार सूनी नजर से महानदी की जलवेणी की ओर झाँकने लगती हैं। कृष्ण की स्त्रोतवेणी में क्या ऐसी ही मुग्धता होती है ?
नागम्मा ने फिर कहा-‘‘महादेवी क्या कहेंगी ?’’

 किन्तु नागम्मा तुम्हीं तो इस चित्त-विक्षेप के लिए जिम्मेवार हो। तुम्हारे कारण यह एकाग्रता टूटी है। किस कुक्षण में नाग्म्मा के पास रखी कृष्णदेव राय की तस्वीर को उत्सुकता से देखा था जगन्मोहिनी ने। लाल-लाल आँखे सुगठित माँसपेशियाँ, विशाल वक्षस्थल, पद्मराग मणियों से बना हार, बाजुओं में वलय। स्फीत अधर मानो चुम्बन के लिए व्याकुल है।

नागम्मा कृष्णदेव राय की तस्वीर वीणा के खोल में जतन से रखी हुई है, ‘‘वीणा में मैं इनकी बराबरी नहीं कर सकती अम्मा ! कृष्णदेवराय जैसा दूसरा वीणावादक काँची राज्य में है ही नहीं।’’
‘‘आश्चर्य ! यही वीणा बजाते हैं, जो सम्राट है, अधीश्वर है। शत्रु के रक्त में उनकी होली का खेल चलता है। जो उँगलियाँ तलवार की कठोरता की कलना करती हैं, क्या वे वीणा में मूर्च्छना जगा सकती हैं ?’’

‘‘तुम हँसी उड़ा रही हो नागम्मा !’’ जगन्मोहिनी को विश्वास नहीं होता था। ‘‘नहीं तो राजकुमारी तुमसे ठिठोली काहे को करूँगी। ये तो वीणा में मेरे गुरू हैं। वीणा में इनकी बराबरी कोई दूसरा नहीं कर सकता।’’
जगन्मोहिनी ने अचरज होकर पूछा-‘‘ये फिर वीणा भी बजाते हैं। विद्यानगर के प्रतापशाली नरपति तो यही हैं न !’’
‘‘अमाँ ये तो संन्यासी थे। वीर नरसिंह सच में नरपति होते। नरसा नायक के मन्त्री तिमरसु ने इनको कूटचक्र करके विद्यानगर में सिंहासन पर बिठाया है न ! वह लम्बी कहानी है।’’

‘‘सचमुच नागम्मा नहीं जानती तिमरसु की वे कूटनीति  की घातें ! वे सब सुनी सुनाई बातें हैं !’’
लेकिन जगन्मोहिनी का कौतूहल क्रमशः बढ़ने लगा था। उन्होंने पूछा-
‘‘सच बताना नागम्मा, इनको तुमने कहाँ देखा था ?’’ जगन्मोहिनी की आँखों में चुहलबाजी और ईर्ष्या ! दोनों समान उम्रवाली हैं न ! नागम्मा अगर कृष्णदेव राय के प्रेम में नहीं फँसती तो उनकी तस्वीर को वीणा के खोल में ऐसे छिपाकर काहे को रखती ?

‘‘जब कोंडाबिडु में थी तो कांच की एक गायिका से मैंने यह तस्वीर खरीदी थी। उनको कभी देखा नहीं। कृष्णा में नौकाविहार के लिए, कृष्णा के किनारे जंगल में मृगया के लिए अनुचर वर्ग के साथ कभी-कभी कृष्णदेव राय आते रहते। लेकिन उनकी आँखें कोंडाबिडु दुर्ग पर लगी रहती थीं। पर मैंने कभी उनको अपनी आँखों से नहीं देखा, राजकुमारी।’’
लेकिन तब से अनेक बार जगन्मोहिनी वीणा के खोल से कृष्णदेव राय का चित्रपट निकालकर देख चुकी हैं। चित्र पर उँगली चलाते हुए हर बार वे चौंक उठती हैं। कृष्णदेव राय के कोमल हाथों का स्पर्श मानों उनके शरीर में बिजली की चमक पैदा कर देता है। कभी-कभार कृष्णदेव राय के चित्र में उनके स्फीत अधर पर चुम्बन अंकित कर देती हैं।

कोंडाबिडु उत्कल-कलिंग साम्राज्य की दक्षिण सीमा में अवस्थित दुर्भेद्य गिरि-दुर्ग है। बेकार में कृष्णदेव राय कोंडाबिडु पर आँखे गड़ाए घूमते रहते हैं। इधर बिना लड़ाई के कृष्णदेव राय ने उत्कल-कलिंग साम्राज्य की राजकुमारी के हृदय पर विजय प्राप्त कर ली है। चित्रपट देखकर पूर्वराग अनुराग में बदल गया है। नारी का हृदय भी एक साम्राज्य होता है। कोई उसे क्षत-विक्षत कर देता है तो कोई उस पर अधिकार जमा लेता है। एक मुग्ध मुहूर्त्त में। उस दिन जगन्मोहिनी के लिए एक ऐसा ही मुग्ध मुहूर्त था।

आसन से अचानक उठ खड़ी हुई जगन्मोहिनी... ‘‘मैं कोंडाबिडु जाऊँगी।’’ शायद कभी दुर्ग के गवाक्ष से अचानक किसी क्षण नौका विहार के समय जगन्मोहिनी कृष्णदेव राय की एक झाँकी देख ले तो। अनदेखी अपहुँच का यह आकस्मिक आमन्त्रण है। जगन्मोहिनी जाकर वातायन के पास खड़ी हो गई। वेशभूषा बिखरी हुई, कुंतल मेखला को पार कर नीचे तक झूल रहे हैं। कमर तक।

कृष्णा की जलदेवी क्या इसी तरह नीली होगी ? जगन्मोहिनी की आँखो के सामने तैर रही हैं कृष्णदेव राय की कमल जैसी लाल-लाल आँखें, चुम्बन के लिए व्याकुल उनके होंठ !
जगन्मोहिनी के इस अजीब बर्ताव का कारण खुद नागम्मा नहीं समझ पाई। ‘‘राजकुमारी, पगली हो गई है क्या ? कोंडाबिडु में युद्ध चल रहा है। अल्हड़ राजकुमारी अभी जा रही है कोंडाबिडु।’’ हाँ-हाँ, ठीक वैसी पगली का-सा चेहरा। दोनों आँखें अस्वाभाविक रूप से चमक रही हैं। कभी मलिन पड़ जाती हैं। स्वप्न और स्वप्नभंग का आँखमिचौली खेल चल रहा है। नागम्मा चिंतित हो उठी। महादेवी को राजकुमारी के इस अजीब व्यवहार की खबर पहुँचाने उठकर चली गई।

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