अर्धविराम - यशवंतराव गडाख Ardhviram - Hindi book by - Yashvantrao Gdakha
लोगों की राय

लेख-निबंध >> अर्धविराम

अर्धविराम

यशवंतराव गडाख

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2806
आईएसबीएन :81-8361-085-4

Like this Hindi book 13 पाठकों को प्रिय

188 पाठक हैं

पंचायत राज्य व्यवस्था पर आधारित पुस्तक...

Ardhaviram A Hindi book by Yashvantrao Gdakha - अर्धविराम - यशवंतराव गडाख

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यशवन्तराव चव्हाण के जमाने में महाराष्ट्र में पंचायत राज्य व्यवस्था का प्रयोग शुरू हुआ। इससे सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो गया और ग्रामीण क्षेत्र में नये नेतृत्व को अवसर मिल सका। लेखक को उस पहली पीढ़ी का प्रतिनिधि बनकर इस व्यवस्था में ऐन बीस वर्ष की उम्र में काम करने का मौका मिला। उसके बाद अट्ठारह-बीस वर्षों तक पंचायत समिति के सभापति, जिला परिषद के उपाध्यक्ष, और अध्यक्ष के पद पर काम किया।। उसके बाद विधायक बन गये। और फिर सांसद बने। राजनीतिक और सामाजिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने ग्रामीण साहित्य सम्मेलन दलित साहित्य सम्मेलन सत्तरहवें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन आदि का भी आयोजन किया।
पंचायत राज्य-व्यवस्था में सहभागी बनकर खेत की मेंड़ पर चलने वाले को सत्ता का महामार्ग मिल गया। इस व्यवस्था में काम करते हुए वे कई लोगों से मिले और उनका व्यक्तित्व-बनाता निखरता गया।


मन की बात



‘ऋतुरंग’ पत्रिका के सन् दो हजार के दीपावली विशेषांक में श्री. टी. एन. परदेशी का लिखा मेरा रेखाचित्र प्रकाशित हुआ। लोगों ने उसे बहुत पसंद किया। कई अपरिचित जनों के फोन आ गए। चिट्टठियाँ आईं। इससे मुझे अहसास हुआ कि अपने अनुभव लोगों के दिलों को छू गए हैं। फिर मेरे स्नेही साहित्यकार श्री रंगनाथ पठारे की चिट्ठी आई। उनकी चिट्ठी से मैं आनन्दित हो गया। और अन्तमुर्ख भी !

शरद पवारजी का मुकाम एक बार अहमदनगर में था तब एक व्यक्तिगत मुलाक़ात में उन्होंने मुझसे कहा था, ‘‘आपका अहमदनगर ज़िला अन्य ज़िलों से बहुत अलग है। इस ज़िले में समाजकार्य, राजनीति, सांस्कृतिक संवर्धन, परिवर्तन के आन्दोलन, सहकार की बुनियाद आदि कई ऐसे पहलू हैं जिनका सारा इतिहास ज़िले के युवा कार्यकर्ताओं के सामने आना चाहिए। किसी जानकार आदमी को यह काम करना चाहिए।’’ बैठक तो समाप्त हो गई लेकिन उनके विचारों से मैं बेचैन हो गया। स्वतंत्रतापूर्व युग का इतिहास मैंने पढ़ा था। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जो राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ हो रही थीं, उस तीर्थयात्रा का मैं भी एक छोटा-सा यात्री था। इन सब बातों को निकट से देख रहा था।

शरद पवारजी के मन में इतिहास की पुस्तक की जो अवधारणा थी, उसको साकार करना मेरे बस की बात नहीं थी। मैंने अनुभव किया कि इस काम को कोई प्रतिभाशाली लेखक ही अंजाम दे सकता है। तभी सहसा मेरे मन में आत्मकथा का खयाल कौंध गया। खानदान में राजनीति की कोई परम्परा न होने के बावजूद मेरे जैसा साधारण किसान का एक युवा पुत्र राजनीति में प्रवेश करता है और मज़बूती से पैर गड़ाकर खड़ा रहता है। अपने अतीत की गतिविधियों का चित्रण करना मेरे लिए मुश्किल नहीं था और इसीलिए मैंने अपनी बीती हुई ज़िंदगी का मुआयना करना शुरू किया।
दया पवार की बलुतं (अछूत), लक्ष्मण माने की ‘उपरा’, आनन्द यादव की ‘झोम्बी’ (जूझ), अरुण साधु की ‘सिंहासन’, रणजित देसाई की ‘राधेय’ जैसी कृतियों ने मुझ पर अपनी छाप अंकित कर दी थी। यशवन्तराव चव्हाण की ‘कृष्णाकाठ’ रचना भी मेरे मन में हमेशा के लिए बसी हुई है।

यशवन्तराव चव्हाण साहब के जमाने में महाराष्ट्र में पंचायत राज्य व्यवस्था का प्रयोग शुरू हुआ। इससे सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो गया और ग्रामीण क्षेत्र में नये नेतृत्व को अवसर मिल सका। उस पहली पीढ़ी का प्रतिनिधि बनकर मुझे इस व्यवस्था में ऐन बीस की उम्र में काम करने का मौका मिल गया। उसके बाद अठारह-बीस वर्षों तक पंचायत समिति के सभापति, ज़िला परिषद के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष के पद पर मैंने काम किया। उसके बाद विधायक बन गया। सांसद बन गया। राजनीतिक और सामाजिक जीवन के साथ-साथ मैंने ग्रामीण साहित्य सम्मेलन, दलित साहित्य सम्मेलन, सत्तरवें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन आदि का भी आयोजन किया।

पंचायत राज्य-व्यवस्था में सहभागी बनकर मेरे जैसे खेत की मेंड़ पर चलने वाले को सत्ता का महामार्ग मिल गया। इस व्यवस्था में काम करते हुए मैं कई लोगों से मिला। कई अनुभव प्राप्त हो गए। मेरा व्यक्तित्व बनता-निखरता गया।
पंचायत-राज्य के केन्द्र में देहात एक प्रधान इकाई थी। इससे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देहातों में जो बदलाव आया, उसकी प्रक्रिया में मैं सहभागी हो सका। इस काम के साथ-साथ मैंने अपने परिसर में कई संस्थाओं की नींव डाली। ग्रामीण-विकास प्रक्रिया में अपना स्वल्प योगदान देते समय मेरे सामने यशवन्तराव चव्हाण साहब का प्रतिमान था। बहुत विशाल दृष्टिकोण और बड़े मन के इस नेता के सुसंस्कृत व्यक्तित्व ने मेरी संवेदनाओं को पोसा था।


सामाजिक कामों के दौरान कई मुसीबतों को झेलना पड़ता है। इन्सानी रिश्तों के रंग बराबर बदलते रहते हैं। कई घटनाएँ होती रहती हैं और संघर्ष भी होते रहते हैं। जिंदगी की राह में मोड़ आने पर मुड़ना बहुत होता है लेकिन मुकाम और मील के पत्थर गिने चुने ही होते हैं। अपने-अपने समय में कुछ घटनाएँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण लगती हैं तब उनके लिए बहुत मेहनत और मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन कुछ समय बाद उनकी अहमियत कम हो जाती है और वह मामूली नज़र आने लगती हैं। ज़िंदगी पर दूर तक असर डालनेवाली और सार्वकालिक अहमियत वाली घटनाएँ गिनी-चुनी ही रह जाती हैं।
सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ रिश्तों-नातों और पारिवारिक सम्बन्धों तथा उनके तनावों का मुझ पर कई बार गहरा असर हुआ है। मेरे विकास में मेरा परिवार और उसके सदस्यों की भी हिस्सेदारी है। इन सब तानों-बानों की खोज मैं आत्मकथा के बहाने करता गया। इसके लिए मैं अपने तीन मित्रों-टी. एन. परदेशी, सु. प्र. कुलकर्णी और अरुण शेवते के साथ कई रात जागा हूँ। तीनों मेरे साथ संवाद साध रहे थे और मैं अन्तर्मुख होकर अपने आपको ही खोज रहा था। हमारी सारी बातचीत को ध्वनिमुद्रित किया गया। पच्चीस-तीस, कैसेट बन गए।

परदेशी कवि और कथाकार हैं। उसने इस पूरे अंकन को प्रस्तुत करने का जिम्मा उठा लिया। कैसटों में बंद संवाद को मेरे सामने रखा। सु. प्र. कुलकर्णी ने इस काम में उसका पूरा साथ दिया।
उम्र के साठ बरस बीत गए। कामयाबी मिली, तो नाकामयाबी भी। कुछ पाया, तो कुछ खोया भी। वक्त पड़ने पर मुकाबला भी किया। जड़मूल से उखाड़ देनेवाले तूफान भी झेले। मैं टिका रहा क्योंकि बचपन से मेरी जड़ें, लोगों में गहरे बसी हुई हैं। गाँव के पेड़ पौधों, सोनई की लोकमाता कौतुकी और उसके किनारे बसे मंजिरों-देहुरों और मामूली आदमियों तथा पुस्तकों और गानों से मेरा दिल लगा हुआ है।
जीवन आत्मान्वेषण की यात्रा है। उसमें अपने साथ समरस होनेवाले साथी मिल जाते हैं तो यह यात्रा सुखदायी होती है।


आदमी के सुख दुख को समझने वाले
उससे समरस होने वाले सम्बन्धियों और
स्नेहियों का मिल जाना ही सच्चा सुख है।
ऐसे लोगों का मिल जाना ही
मेरे सच्चे सुख का चेहरा है।

लोगों को मैंने बहुत देखा
लोगों को लेन-देन पर उतरते भी देखा
पीठ दिखा कर भागते हुए भी देखा
ऐन वक़्त पर अकेले को छोड़कर जाते हुए भी देखा

लोगों को मैंने बहुत देखा
लोगों को विमुख होते हुए देखा
पहचान को भूलकर
‘तुम कौन ?’ पूछने वालों को पलटते हुए भी देखा
लोगों को मैंने बहुत देखा....


‘विरंगुला’
यशवन्त कालोनी
अहमदनगर

-यशवन्तराव गडाख पाटील



प्रस्तावना



महाराष्ट्र राज्य के बाद के दस वर्षों को महाराष्ट्र कांग्रेस का स्वर्णयुग कहने में कोई आपत्ति नहीं है। इसलिए नहीं कि दल का शासन स्थिर था बल्कि इसलिए कि यह कांग्रेस शासन की रचनात्मक सृजनशीलता का समय था। दरअसल इस रचनात्मकता की बनावट पहले से ही शुरू हो जानी चाहिए थी। महाराष्ट्र अलग-अलग प्रदेशों में तीन खण्डों में विभाजित था। 1956 में भाषिक आधार पर प्रदेशों की पुनर्रचना हो जाने पर महाराष्ट्र के हिस्से में दो भाषाएँ आईं। यह सच है कि पुराने समय से ही राजनीतिक सूत्र में आ गए। लेकिन महाराष्ट्र राज्य के रूप में सभी मराठीभाषियों का स्वतंत्र राजनीतिक प्रदेश वास्तव में 1960 में ही स्थापित हो सका। इसके बाद ही सही मायने में मराठी जन की सर्जनशीलता को मुक्त अवसर प्राप्त हो सका। भाषिक आधार पर राज्यों की पुनर्रचना करने के पीछे यही सैद्धान्तिक भूमिका थी।

महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्र की जनता के मुख्य राजनीतिक धारा में सम्मिलित होने की जो प्रक्रिया 1936 के प्रान्तीय विधानमण्डल चुनावों के साथ शुरू हुई थी, वह 1960 तक पूरी हो गई। सत्ता की गति के विज्ञान को ग्रामीण किसान सहजज्ञान से जैसा बूझता है, वैसा मध्यवर्गीय व्यक्ति नहीं समझ सकता। शहरी संस्कृति के प्रभाव से सत्ता के अंगारे उन्हें शायद भून ही डालते हों। सत्ता के उग्र मुख की अपेक्षा सत्ता के दोयम अंगों के साथ उनका वास्ता कभी तो पड़ता होगा। इसीलिए दल 1935-40 के बाद ही प्रातिनिधिक परिपूर्णता को प्राप्त करने लगा। 1960 तक ग्रामीण क्षेत्र के क्रियाशील कार्यकर्ताओं की एक सशक्त पीढ़ी पूरी ताकत के साथ मुख्य धारा में उतरी थी। स्वाधीनतापूर्व युग में दल में जो एक सामाजिक एकांगिता थी, वह हट गई और उसे देसी दिमाग का आयाम मिल गया। इसी की पहचान यशवन्तराव चव्हाण के द्विभाषिक मुम्बई राज्य के मुख्यमंत्री पद के पाने में मिल जाती है। यह स्पष्ट था कि द्विभाषिक से जब महाराष्ट्र राज्य बनेगा तब चव्हाण ही मुख्यमंत्री रहेंगे। संयुक्त महाराष्ट्र के आन्दोलन के जमाने में कांग्रेस को बड़ी भारी धक्के लगे, दल किसी तरह हार से बच गया लेकिन टूट-फूट नहीं हुई। यशवन्तरावजी ने स्थिति को सँभाला। महाराष्ट्र के बन जाते ही दल से कटुता मिल गई।

1960 में दल एक अभेद्य चट्टान की तरह था। उस जमाने के अँग्रेजी अखबारों में महाराष्ट्र कांग्रेस की हमेशा ‘दि मोनोलिथिक ऑर्गनाइजेशन’ अर्थात् अखण्ड संगठन सम्बोधित किया जाता था। यह दल की सत्ता से चिपके रहने की चतुराई की वजह से नहीं, बल्कि ग्राम स्तर से राज्य स्तर तक कार्यकर्ताओं के सघन जाल और उनकी व्यवस्थित कार्यप्रणाली भी इसके कारण थे। कांग्रेस का कार्यकर्ता ग्रामसभा, तहसील पंचायत जिला परिषद आदि स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं तथा उस समय विकसित हो रहे कृषि उत्पाद प्रक्रिया के कारखाने खड़ी करने वाली सहकारी संस्थाओं, साख संस्थाओं आदि में तपकर मथकर ही प्रायः विधानसभा में आ सकता था, मंत्री बन सकता था। ऐसा भी नहीं कि सभी इस प्रक्रिया से गुजरते थे लेकिन आमतौर पर ऐसा ही होता था।

गांधीजी ने कहा था कि महाराष्ट्र सामाजिक कार्यकर्ताओं की खदान है। उन्नीसवीं सदी से इस राज्य में सामाजिक सुधार के आन्दोलन ने जोर पकड़ा था। ग्रामीण महाराष्ट्र भी पीछे नहीं था लोकमान्य तिलक, मदन जी आगरकर शाहूमहाराज, डॉ. भीमराव आम्बेडर विट्ठल रामजी शिन्दे, भाऊराव पाटील आदि के कामों का प्रभाव ग्रामीण मानस पर भी था। मजदूर आन्दोलन से आई वाम विचारधारा भी कई देहातों में पहुँच चुकी थी। महाराष्ट्र का किसान-विशेष रूप से पश्चिम महाराष्ट्र का हरफनमौला और मेहनती है। पश्चिम महाराष्ट्र का काफी क्षेत्र पूर्जन्यछाया का होने से कृषि-कार्य कठिन है। उपलब्ध जल को पूरी तरह से काम में लाने का प्रयास होता है। सिंचाई का प्रबन्ध हो जाने पर यहाँ के मेहनती किसान की सर्जनशीलता को अवसर मिलने लगा। पद्मश्री विखे पाटील की चीनी मिल ने महाराष्ट्र में सहकार युग का आरम्भ कर दिया। उनके नक्शेकदम पर वसन्त दादा पाटील, तात्यासाहब कोरे आदि दूरदृष्टि के कार्यकर्ता इस क्षेत्र में आने लगे। ग्रामीण क्षेत्र में नई ऊर्जा पैदा हो गई। नई खुशहाली और सम्भावनाएँ दिखाई देने लगीं।

महाराष्ट्र राज्य के निर्वाण के समय माहौल इस तरह जोश-भरा और आशावादी था। यशवन्तराव चव्हाण समझदार, कुशल और सबको साथ लेकर चलनेवाला सुसंस्कृत मुख्यमंत्री था। उन्हें ऐसे ही नेताओं और कार्यकर्ताओं का साथ मिला हुआ था। अगले बारह पन्द्रह वर्षों में जो परिवर्तन हुआ, उसकी पृष्ठभूमि में ये बातें थीं। इसी कारण महाराष्ट्र भारत में प्रगतिशील राज्य का गौरव प्राप्त कर सका। यशवन्तराव गडाख की यह आत्मकथा एक व्यक्ति की आत्मकथा न होकर इस माहौल में बने दुर्दमनीय उत्साह और सर्जनशील जोशवाले, परिवर्तन की प्रक्रिया को गहराई से समझने वाले और देसी दिमाग रखने वाले टिपिकल युवा कांग्रेसी कार्यकर्ता की जीवन यात्रा का सहृदय आलेख है। इस कार्यकर्ता ने गरीबी और अभावों से रास्ता निकाला है। स्वाधीनता के बाद प्राप्त शिक्षा के अवसर को वह गँवाना नहीं चाहता। बहुत मेहनत से पढ़ता है। शिक्षा से उसे नई चेतना मिलती है। नई उम्मीद मिल जाती है। नीचे खींचनेवाली परिस्थितियों के चक्रव्यूह को भेदने की इच्छाशक्ति मिलती है।

समाज के प्रति दायित्व का अहसास होता है, साथ ही नई आकांक्षाएँ पैदा होती हैं। आकांक्षा पूर्ति के अवसर भी हैं और साधन भी। ऐसे ही कार्यकर्ताओं में से कुछ ज़िला परिषद के अध्यक्ष बन गए, तो कुछ सभापति चीनी मिल के संचालक विधायक सांसद मंत्री आदि। महाराष्ट्र का ग्रामीण नेतृत्व तृणमूल से उत्पन्न हुआ है। सभी नेता सामंती वर्चस्ववादी घरानों से नहीं आए। इसे ध्यान में रखना होगा कि मेहनत करनेवाले समाज के प्रति प्रतिवद्ध, हरफनमौला, कुशल, आशावादी और बेहद राजनीतिक आकांक्षा रखनेवाले कार्यकर्ताओं के रसायन से महाराष्ट्र में परिवर्तन आया।
जमाना बदल गया, राजनीति बदल गई। राजनीति के सफर के रास्ते और सीढ़ियाँ भी बदल गई। इस मजबूत मराठी सांचे से अब नहीं लगता कि ऐसे और नये कार्यकर्ता बनेंगे। साठ के आसपास इस साँचे में ढले कार्यकर्ता अब साठ के आसपास होंगे-वे सब कहाँ हैं ? अस्सी के बाद की राजनीति से भी वे गुजरे हैं। वे आज की अधोगामी राजनीति के बारे में क्या सोचते होंगे ?

यशवन्तराव गडाख ठीक छठे दशक के पूर्वार्ध में सार्वजनिक जीवन में आए। उनकी राजनीतिक यात्रा वैसी ही थी जैसी ऊपर बता चुका हूँ। अभावग्रस्त क्षेत्र, गरीबी, शिक्षा प्राप्ति की उमंग, खेत में काम करने के लिए आदमी चाहिए फिर भी घर के लोगों को नाराज़ कर मेहनत से पढ़ाई करना, राज्य परिवहन की बसों से आनेवाले टिफिनों में होनेवाली गड़बड़ी, छात्रों की शिकायतें सामने रखनेवाले यशवन्तराव अपने आप नेता बनते गए।
अहमदनगर ज़िले का एक खास रसायन है। साठ का जमाना ही ऐसा था कि जिले के किसी भी दल के कार्यकर्ता को प्रगतिशील विचारों और सामाजिक प्रतिबद्धता का पाठ छुट्टी में ही मिल जाता था। शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त कर नौकरी के लिए कोशिश की। शिक्षक बन गए। लेकिन भीतरी ऊर्जा चुप नहीं बैठने देती थी। सहसा पंचायत समिति के उम्मीदवार बन गए। गाँव के लोगों ने ही जोर लगाया था। चुनाव के खर्च के लिए रुपया नहीं था। गाँववालों ने चंदा इक्ट्ठा किया। उम्र के बीसवें वर्ष में ही गडाख जी की राजनीतिक यात्रा शुरू हो गई।

गडाखजी चुनाव लड़े। अठारह वर्ष परिषद में रहे। पाँच वर्ष पंचायत समिति के अध्यक्ष, सात वर्ष जिला परिषद के। विकास के कई काम किए। युवा उम्र में ही अपने गाँव सोनई के पास सहकारी चीनी मिल बनाई। कई शिक्षा संस्थाओं का निर्माण किया। सही ढंग से चलाया। विधानसभा का एक चुनाव हार गए लेकिन दक्षिण अहमदनगर निर्वाचन क्षेत्र से लगातार तीन बार सांसद चुने गए साहित्य सम्मेलन के संयोजक बने। अपनी इस सफलता की कहानी को गडाखजी ने बड़े संकोच और विनय के साथ कहा है-जोकि एक राजनेता के लिए मुश्किल काम है। इस मामले में आप टिपिकल नेता नहीं है। गडाख जी का संयम प्रशंसनीय है। वह उनका स्वभाव ही होगा इसलिए अभिव्यक्ति शैली में भी उतर आया होगा। गडाख जी को अभी भी पन्द्रह बीस वर्ष राजनीति करनी है। ऐसा नेता प्रायः मुक्तमन से अपने अनुभवों का बयान नहीं करेगा क्योंकि उसे लोगों का मन सँभालना होता है। इसके बावजूद गडाखजी ने काफी कुछ दो टूक शब्दों में कह डाला है।

इस पुस्तक की अहमियत इतनी ही नहीं है कि यह एक प्रातिनिधिक आत्मकथा है। अपने अनुभवों के माध्यम से लेखक ने इस बात को भी मार्मिकता से कहा है कि कैसे एक नेता को जिसने राजनीति को एक व्रत की तरह स्वीकारा हो और जो सामाजिक न्याय के लिए तड़पता रहता हो, एक अजीब सी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियाँ और जरूरतें तो दूसरी ओर लगातार लोगों के सम्पर्क में रहने से परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने सत्ता की राजनीतिक की अपेक्षा राजनीति और समाजकार्य में अपनी, अस्मिता, आत्मसम्मान और सोच को सँभालने के गतिविज्ञान को ही खोलकर रख दिया है। मध्यवर्गीय पाठक जो आम तौर पर राजनीति से नफरत करता है और शायद ही मतदान करता है, सोचता है कि नेताओं के बड़े मज़े होते हैं। गाड़ी-घोड़ा, नौकर-चाकर, जो चाहो सो हाजिर, आराम ही आराम और असीम भ्रष्टाचार। उनके सामने अपने लोगों के लिए दिल से खून पसीना एक करनेवाले नेता नहीं होते। चुनाव तो उम्मीदवार की राजनीतिक आर्थिक बौद्धिक मानसिक और शारीरिक कसौटी ही हुआ करते हैं। आज के नेता को कौटिल्य से भी अधिक तत्पर और हजार आँखों और कानोंवाला होना पड़ता है। हरदम लोग उसको घेरे रहते हैं। भीड़, गर्दोगुबार, पसीना और एक के बाद एक हक से माँगनेवालों के गुस्ताख झुण्ड-इन सबको संयम से सुनना पड़ता है, जितना हो सकता है, काम करना पड़ता है और अपने दिलो दिमाग को ठण्डा भी रखना पड़ता है।

चुनाव में ठीक तरह से खाना भी नहीं खा सकते, न वक्त पर नींद ही नसीब होती है। फिर भी दूसरे दिन प्रातः तरोताजा दिखना पड़ता है। भारत जैसे देश में जहाँ भी सामन्ती अवशेष बचे हुए हैं, निस्सन्देह बड़ी ऊर्जा है। गडाख जी ने शरद पवार की मिसाल दी है। यह शख्स दिन-भर धूल-गड्ढों से भरे रास्तों में सफर कर रात में ढाई-तीन बजे तक कार्यकर्ताओं के साथ बातें करने के बाद सो पाता है। फिर भी सुबह छह बजे नहा-धोकर तैयार। जिनके खून में लोकनीति बसी हुई हो, ऐसे बड़े लोग ऐसे ही कामों को निपटाते रहते हैं। मैंने एक मुख्यमंत्री के रात के दरबार को देखा है। लोगों का ताँता खतम ही नहीं होता था। अन्ततः अब सब लोग चले गए, ऐसा सोचकर वह जब टायलेट के लिए जाने लगते हैं तो एक कार्यकर्ता उनके पीछे बाथरूम में भी घुस जाता है। लेकिन बिना संयम का त्याग किए मुख्यमंत्री उसे समझाते हैं : ‘‘अरे भाई, पेशाब तो करने देगा कि नहीं ? कल सुबह आठ बजे आ जाना।’’ इसके उलटे स्वभाव के मंत्री, मुख्यमंत्री होते नहीं, ऐसा भी नहीं। गड़ाखजी ने इस धामधूर्म का बयान मार्मिक शब्दों में किया है। लोग नेताओं को चूसकर उनका जीवन रस खींच लेते हैं। कई नेता और मंत्री सामन्ती वृत्ति के भी होते हैं। लेकिन उन्हें लोगों ने ही पोसा होता है। लोग सोचते हैं कि विधायक, सांसद या मंत्री अपना कोई भी काम कर सकता है। सिर्फ कहने की जरूरत है।

यूँ कार्यकर्ता और लोग नाराज़ तो होते ही हैं। रिश्ते-नातेवाले भी साधिकार अपने नेता को सता-सताकर परेशान करते हैं। गलत काम न करने पर वे ही बदनाम भी करते हैं। रिश्तेदारों को अपना अधिकार जताना होता है। यह प्यार नहीं, स्वार्थ होता है। नेता पर संकट आने पर वे भाग जाते हैं। मज़ा देखते हैं। गड़ाखजी ने ऐसी घटनाओं का जिक्र बड़े दुख के साथ किया है। उनकी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता प्रायः ऐसे अनुभवों से गुजरे हैं। आज की अपनी राजनीतिक संस्कृति की अधोगति का विश्लेषण करने पर लगता है कि भूमण्डलीकरण, बाजारवाद, विश्व में उभरी उपभोक्ता संस्कृति मान-सम्मान का लोभ आदि बातों के साथ अभी भी लोग सामन्तवादी, राजा-महाराजाओं की मानसिकता से बाहर नहीं आ सके हैं। इन बातों को गहराई से सोचना होगा। लोग अपनी बढ़ती आकांक्षाओं को अपने प्रतिनिधि के मार्फत पूरा करना चाहते हैं। अनुभव है कि धनिकों के निहित स्वार्थों के दबाव की तरह जनतंत्र में लोगों का ऐसा दबाव भी नेताओं और सत्ताधारियों को विचलित और भ्रष्ट कर देता है। हम इस नजारे को खुलेआम देखते हैं। लेकिन जनता का नाम लेकर राज करनेवाले सत्ताधारी प्रायः इस बारे में चुप रहते हैं। गडाखजी की इस साहसपूर्ण आत्मकथा में अनजाने ही उन्होंने इस विषय को छेड़ा है। आज के भारतीय जनतंत्र के पुनर्मूल्यांकन में इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शून्य से चीनी मिल का निर्माण किया। तब गड़ाखजी न विधायक थे, न सांसद। मात्र ज़िला परिषद के पदाधिकारी थे। सरकारी मिल को खड़ा करना, घूम, घूमकर जनता से शेअर प्राप्त करना, प्रशासन के कार्यालयों में आना-जाना, मंजूरी पाना, जगह की खोज करना, मशीनरी लाना आदि हजार मुसीबतें। काम रुक जाने पर लोग मज़ाक उड़ाते थे। नाउम्मीदी बढ़ती थी। गड़ाखजी को वसन्तदादा पाटील, अण्णासाहब शिन्दे, स्वयं पद्मश्री विखे पाटील ने सहारा दिया। वे भी इन हालात से गुज़रे थे। बातों-बातों में गडाखजी ने इनके और अन्य नेताओं के बड़े संक्षिप्त लेकिन सही रेखाचित्र खींचे हैं। सहकारिता के काम में लोगों को सँभालना पड़ता है। यह जनतांत्रिक व्यवस्था होती है, पता नहीं, कब कौन क्या मीनमेख निकालेगा। इसीलिए गड़ाखजी पुरानी मशीनरी खरीदने आन्घ्र प्रदेश जाते हैं, तब अपने साथ बीस पच्चीस सदस्यों को ले जाते हैं। उनमें उनके विरोधी भी होते हैं कि इतने लोगों को ले जाने की क्या जरूरत थी ? खर्च वसूल किया जाए। तब अध्यक्ष श्री रत्नप्पा कुम्भारजी ने सुनाया, ‘‘कागज़ी घोड़े दौड़ाकर सहकारी मिल को खड़ा नहीं किया जा सकता। आम जनता के रुपयों से यह काम होनेवाला है। अभी तो काम की शुरुआत है। लोगों का विश्वास प्राप्त करना है। ऐसे वक्त लोगों को साथ ले जाना जरूरी होता है। यशवन्तराव गडाख इन लोगों को हवाई जहाज से नहीं, तीसरी श्रेणी रेल से ले गए थे इस बात की ओर ध्यान दीजिए। ऑडिट प्वाइंट को खारिज कर दीजिए।’’

पुस्तक के हर पन्ने पर गडाखजी की संवेदनशीलता जाहिर होती है। जायकवाडी बाँध के लिए कई आबाद गाँव पानी के नीचे चले जानेवाले थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाँव में रहनेवाले पुराने बूढ़े बुजुर्गों को समझाना बड़ा मुश्किल था। गडाखजी बेचैन हो जाते हैं। उन्होंने कहा है, ‘‘विकास तो होना ही चाहिए लेकिन विकास की प्रक्रिया को संवेदना के रेशमी धागों से बुनना चाहिए। ऐसा होता नहीं है। मैं सब खुली आँखों से देख रहा था। आज भी जब नाथसागर का विस्तीर्ण जलाशय देखता हूँ तो तीस-पैंतीस वर्ष पूर्ण की संस्कृति की टूटफूट को देख अपने मन की बेचैनी को मैं याद करता हूँ। मुझे नाथसागर का पानी नहीं दिखाई देता। उस जगह डूबे हुए गाँवों, मकानों, आबाद लोगों को देखता हूँ।...’’ ऐसी ही संवेदनशीलता का अनुभव उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक बातों में दिखाई देती है। बहत्तर के अकाल की कुछ यादें उन्होंने दर्ज की हैं। यह भी बता दिया है कि विपत्ति आने पर प्रशासन तंत्र भी कैसे जोर-शोर से काम शुरू कर देता है। गड़ाखजी ने भी दिन-रात मेहनत की। अकाल के कारण ज़िले में कई रचनात्मक काम करवा लिए।

गडाखजी के व्यक्तित्व में समाज-सुधार का भी एक पहलू है जो समय-समय पर दिखाई देता है। लोगों को समझा-बुझाकर शादी-ब्याह के खर्च को कम करवाया। बड़े बेटे ने सिविल विवाह किया और गाँव में एक नई परिपाटी शुरू कर दी। गडाखजी ने मिल के अहाते में किसानों के बेटे-बेटियों के सामूहिक विवाह सम्पन्न कराए। अपने दो बेटों के विवाह भी इनमें शामिल थे। छोटे भतीजे की शादी में सारी औपचारिकताओं को ताक पर रखकर लड़की देखने गए तो बहू बनाकर ही घर ले आए। ईमानदारी से यह भी बताया कि अपनी शादी के वक्त ऐसा नहीं कर सके, इस बात से रंज होता है। उन्हें दुख होता है कि अपनी पीढ़ी के युवा परम्परा में ही उलझकर रह गए।



लोगों की राय

No reviews for this book