बेदखल - कमलाकान्त त्रिपाठी Bedakhal - Hindi book by - Kamla kant Tripathi
लोगों की राय

ऐतिहासिक >> बेदखल

बेदखल

कमलाकान्त त्रिपाठी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :216
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2832
आईएसबीएन :81-7055-504-3

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

292 पाठक हैं

1857 के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा.....

Bedakhal a hindi book by Kamla kant Tripathi - बेदखल - कमलाकान्त त्रिपाठी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सन् अट्ठारह सौ सत्तावन के विप्लव और उसके दमन के बीच से ही अवध में वह क्रूर और तालुकेदारी व्यवस्था पनपी थी जिसमें पिसती रिआया की छटपटाहट इसी शती के दूसरे दशक तक आते-आते एक तूफान के रूप में फूट पड़ी, जिसने एक बार सत्ता की तमाम चूलें हिला दीं। कमलाकांत त्रिपाठी का दूसरा उपन्यास ‘बेदखल’ उसी तूफान के घिरने, घुमड़ने और फिर एक कसक-सी छोड़ते हुए बिखर जाने की कथा है और इस दृष्टि से अठारह सौ सत्तावन की पृष्ठभूमि में लिखे उनके पहले उपन्यास ‘पाहीघर’ की अगली कड़ी भी।
अवध का किसान आन्दोलन ऊपर से राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा का अंग भले लगे लेकिन दोनों की तासीर में बुनियादी फर्क था। जहाँ मुख्य धारा सत्ता में महज ऊपरी परिवर्तन और उसमें भागीदारी के लिए उन्मुख होने से देशी तालुकेदारी के कुचक्रों के प्रति आँखें मूँद रही, वहीं किसान आन्दोलन ने भू-व्यवस्था और उससे जुड़ी उस विषम सामाजिक संरचना को चुनौती दी जिसके केन्द्र में यही तालुकेदार मौजूद थे। इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

शायद इस अन्तर्विरोध को रेखांकित करने के लिए ही लेखक ने इतिहास की इस विडंबना को अपने उपन्यास का विषय बनाया है।
कमलाकांत त्रिपाठी अपने पात्रों को कुछ इस तरह छूते हैं कि उनके और पाठकों के बीच न काल का व्यवधान रह जाता है, न लोगों को अतिमानव बनाने वाली इतिहास की प्रवृत्ति का। यह जन-शक्ति के उस स्वतःस्फूर्त उभार की कथा है जो बाबा रामचन्द्र जैसे जन-नायक पैदा करती है, जिन्होंने रामचरित मानस की चौपाइयों को आग फूँकने के औजार की तरह इस्तेमाल किया और जिनकी ‘सीताराम’ की टेप पर हिन्दु-मुसलमान दोनों अपने धार्मिक भेद को भुलाकर दौड़ते चले आये।
उपन्यास में ‘साधु’ और ‘सुचित’ जैसे कुछ सामान्य चरित्र भी हैं जिनकी आम भारतीय तटस्थता और दार्शनिकता के बरअक्स ही अवध के किसान आंदोलन को उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।


दूर जलते अलाव की छोटी-छोटी लपटें अँधेरे के बीच रोशनी का एक रहस्यमय वृत्त बनाती थिरक रही थीं। वहाँ से उठती बोल-चाल की अस्पष्ट आवाज रात की निस्तब्धता को तोड़ती, फासलों के ऊपर से तैरती बीच-बीच में कानों से टकरा जाती थी। रात, अँधेरा, सुनसान, फसलों की गंध, अलाव की रोशनी, दूर से आती बोलचाल की आहट-सबकुछ बाबा के मन में एक गहरा, अटूट सन्नाटा भर रहे थे। एक तड़प, एक अवसाद, एक अकुलाहट। सब से भागकर कहीं खो जाने गुम हो जाने की पलायनी वृत्ति ।...क्या था इसकी जड़ में ? धिराजी ? अकल्पित मोड़ पर पहुँचे आन्दोलन की अनिश्चितता ? या और कुछ ?


एक


साल की पहली बारिश थी। वैसे तो अंधड़ के साथ बूँदाबाँदी हो चुकी थी लेकिन अभी तक लहरा नहीं पड़ा था। आज खूब जमकर बारिश हो रही थी। हवा भी तेज थी। पेड़ों की पत्तियाँ और ऊपर की डालें जोर से हिल रही थीं। नीचे की सूखी डालों पर रेंगते हुए पानी की लकीरें तने की ओर बढ़ रही थीं। छप्पर और खपरैल की ओर तेज धार गिरने लगी थी जिसकी आवाज बारिश और हवा के शोर में खो गई थी। द्वार पर उमड़ी धूल बैठ गयी थी। और पानी फैलकर ढाल की ओर बहने लगा था। द्वार के सामने वाली गड़ही में कुछ पानी जमा हो गया था
और उसमें बूँदें पड़ने से बुलबुले नाच रहे थे।
शाम तक बारिश बंद हुई तो गड़ही में इतना पानी भर गया था कि मेंढक बोलने लगे थे। बच्चे उनकी आवाज के साथ आवाज मिलाते थे-सम गम, गए हम। लेकिन बीच में टर्र-टर्र का कर्कश, एकाकी स्वर संगत तोड़ देता था। अँधेरा होते ही झींगुरों ने भी सुर मिलाना शुरू कर दिया। बिलों में पानी चले जाने से चींटे-चींटियाँ और दीमक पंख लगाए बाहर निकले और दिवठी पर रखे दीये के चारों ओर मंडराने लगे।

बुढ़ऊ आँगन में भोजन करने उठे थे। पाँखियाँ अगल-बगल गिरने लगीं तो दीए को दूर हटा कर रख दिया गया। पर उससे थाली के पास अँधेरा हो गया। अब तो कोई पाँखी आकर थाली में गिर जाए तब भी नहीं पता चलेगा। बुढ़ऊ खाते समय बोलते नहीं थे। वे अन्दर-ही-अन्दर कसमसाते ही रहे। जब दो पाँखियाँ बदन से टकराईं तो वे थाली छोड़कर उठ खड़े हुए। बाहर आकर मुँह-हाथ धोया और गरज उठे—
‘‘मइ कहा, ई दोनों बहुरियाँ मुझे मांसाहार कराने पर तुली हुई हैं। आगाह किया था कि आज पहली बारिश हुई है, पाँखियाँ निकलेंगी, दिन रहते खवाई-पिआई निपटा लेना। लेकिन कौन सुनता है ! आखिर ठहरीं तो धाकरों (निम्न कुल के ब्राह्मणों) की ही बेटियाँ।’’
द्वार सूना था। उनकी आवाज घिरते अँधेरे से टकराकर लौट आयी। वे जाकर मड़हे में लेट गए। बूँदाबाँदी फिर शुरू हो गयी थी। घर के अन्दर से खटर-पटर की आवाज आती रही।

बुढ़ऊ का असली नाम था शालग्राम जो बिगड़कर सालिकराम हो गया था। उम्र पचपन के आस पास। लम्बा ऊँचा शरीर। हल्का साँवला रंग। सिर और दाढ़ी के बाल साधुओं की तरह बढ़े हुए। साल में सिर्फ एक बार माघ मेले में संगम जाकर बाल बनवाते थे। माथे पर द्वादश तिलक जो शाम तक जो धुँधला पड़ जाता था। भगवान् शालग्राम की बटिया वे हमेशा साथ रखते थे। रोज सुबह नहाकर बटिया को नहलाते थे। चन्दन, फूल, धूप, नैवेद्य चढ़ाते थे। संध्या-तर्पण करते थे।

विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते थे। एक माला ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करते थे। फिर उठ कर भगवान का भोग लगाते थे। तब जाकर मुँह में कौर डालते थे। वेश-भूषा के चलते लोग उन्हें साधू भी कहने लगे थे। शालग्राम नाम के कारण कई लोग उन्हें भगवान भी बुलाते थे। पर घर वालों के लिए वे बुढ़ऊ थे। इलाके के दस्तूर के अनुसार बड़े बेटे की बहू आते ही वे बुढ़ऊ कहलाने लगे थे। तीन बेटे थे उनके—तीनों की अपनी-अपनी अलग राह थी। बड़ा–राम अभिलाख—गैर जिम्मेदार की हद तक अपने में मस्त। मंडलीबाज और बोलिकर। देश-पवस्त और नाते-रिश्तेदारियों में नेवहड़ छौंकता, गप्पें मारता घूमता था। मझला—रामदेव—गुरु के यहाँ से संस्कृत व्याकरण पढ़कर आया था। पंडिताई करता था

और साथ-साथ घर गृहस्थी भी देखता था। छोटा—रामहित—मेहनती पर रंगीन मिजाज। गाँव में उसका मन नहीं लगता था। लड़-भिड़कर रंगून भाग गया था। दोनों बड़ी बहुएँ घर में थीं, छोटी मायके में । बड़ी बहू देखने में गोरी-चिट्टी, सुन्दर और स्वभाव से फितरती थी। सास के रहते उसने मालिकाना सँभाल लिया था। मझली देखने-सुनने में साधारण और स्वभाव से सीधी थी। वही बुढ़ऊ की सेवा करती थी और डाँट भी खाती थी। बूढ़ा पूरी गऊ थीं। ऊपर से सांस की मरीज। देखते-देखते सबकुछ बड़ी बहू के कब्जे में आ गया था। बूढ़ा कभी मँझली का पक्ष लेकर कुछ बोलतीं तो उन पर भी झाड़ पड़ जाती थी।
घर में सात बच्चे थे। राम अभिलाख के एक लड़की और दो लड़के। रामदेव के दोनों लड़के। रामहित के एक लड़का और एक लड़की—दोनों प्रायः माँ के साथ ननिहाल में रहते थे।

मड़हे में लेटे हुए सालिकराम ने आँखें बन्द कर लीं। गहराती रात के सन्नाटे में उनके भीतर उमड़-घुमड़ हो रही थी। पहली बारिश हमेशा उन्हें विकल कर देती है। मन पीछे बहुत पीछे भाग जाता है।....वक्त कैसे उड़ते चला गया। उन्चास-पचास साल तो हो गए होंगे। ऐसा ही दिन था और ऐसी ही बूँदाबाँदी वाली रात जब वे बसौली आए थे। पैतृक गाँव से पैदल चलकर। माँ-बाप के रहते अनाथ और बेसहारा। तब कहाँ पता था कि यहीं के होकर रह जाएँगे।

कहने को ननिहाल था यहाँ लेकिन दुर्बली नाना भरी जवानी में ही चल बसे थे। कम्पनी सरकार की फौज में थे और गदर के समय मारे गए थे। उनके बड़े भाई शंकर का मालिकाना था। उनके आगे पीछे कोई नहीं था पर स्वभाव से वे बेहद उग्र और हृदयहीन थे। दुर्बली के एक ही लड़की थी जिसे शंकर ने एक दरिद्र, घुमंतू, बूढ़े ब्राह्मण के साथ ब्याह दिया था। जिसकी पहले ही तीन शादियाँ हो चुकी थीं। वे तो इधर-उधर भटकते, दूसरों के यहाँ माँग-जाँचकर अपना पेट पाल लेते थे,

विपन्नता की मार पड़ती थी बीवी पर। गरीब और अवहेलना से जूझती तीनों बीवियाँ एक के बाद एक बिना कोई संतान दिए चल बसीं थी। तब आयी थी दुर्बली की बेटी—कच्ची उम्र की पितृहीन लड़की। गौने के दो साल बाद ही सालिकराम पैदा हुए थे। एक साल बाद एक लड़की और हो गई थी। बिना किसी सहारे के दो-दो बच्चों को सम्हालना। और उसकी अपनी ही उम्र क्या थी। ग्यारह साल की थी जब शादी हुई थी, एक साल बाद गौना। महज सोलह-सत्रह की उम्र में। मायके में सबकुछ भरा था लेकिन ससुराल में दरिद्रता का अखंड साम्राज्य। चार बीघे बीजर-बाँगर खेत थे और एक हड्डी गाय।

बारिश ठीक से हो गई तो दूसरों के हल बैल के सहारे एक फसल हो जाती थी। नहीं तो वही आकाश-वृत्ति। पिता महीने दो महीने में घूम-फिककर लौटते तो उनके झोले में आटा-दाल की छोटी-छोटी पुटकियाँ होती थीं। कभी-कभी वह भी नहीं। बीच-बीच में उपवास की नौबत आ जाती थी। ऊपर से लगान की चिन्ता हमेशा सिर पर सवार रहती थी।

उस साल बारिश हुई तो खेत में डालने को एक दाना अन्न नहीं था। पिता कहीं रमे हुए थे। माँ ने सालिकराम को पुराने चिथड़े पहनाकर किसी के साथ बसौली भेज दिया था। बड़े नाना ने कैसी ठंडी निगाहों से देखा था ! पर घर के अन्दर नानी ने अंकवार में भर लिया था और देर तक हुमस-हुमस के रोती रहीं थीं। फिर उन्होंने जल्दी-जल्दी खाना पकाया था। सामने बैठकर पूछ-पूछकर खिलाया था। कितने दिन बाद पेट भर खाने को मिला था। उस दिन भी दिवठी पर दीया ऐसे जल रहा था, पाँखियाँ मँडरा रही थीं और थाली के पास अँधेरा था।

लेटे-लेटे सालिकराम को झपकी आने लगी। बारिश तेज हो गई थी मेंढकों और झींगुरों की आवाजें उसमें दब गई थीं। द्वार पर पानी भर गया था जो धीरे-धीरे गड़ही की ओर सरक रहा था। बीच-बीच में बिजली चमकती तो बहते पानी पर लावे की तरह तैरते बुलबुले नजर आते।
दूर से किसी के पानी में चलने की आवाज आयी तो बुढ़ऊ उठकर बैठ गए।
‘‘के आ हो ?’’
‘‘हम हैं दादा।’’
रामदेव मड़हे के एक कोने में जाकर धोती बदलने लगा।
‘‘मइ कहा बड़ी देर कर दी आज ?’’
‘‘हाँ, झिंगुरीसिंह की सभा थी पट्टी में। चले तो बारिश शुरू हो गयी।’’
‘‘तुम भी पड़ गए इन लुंगाड़ों के चक्कर में।’’
रामदेव सूखे गमछे से देह पोंछते-पोंछते धीरे से हँसा पर कुछ बोला नहीं।
‘‘यह विकरमाजीत का पाछिल, खुद तो ढूबेगा ही, दूसरों को भी डुबोयेगा। राय साहब ने सुन लिया तो आफत खड़ी हो जाएगी।’’ विक्रमाजीत झिंगुरीसिंह के बाप का नाम था।


रामदेव भोजन के लिए उठने लगा तो बुढ़ऊ ने ताकीद की—
‘‘मार पाँखी उठी हैं, जरा देख के कौर उठाना।’’
रामदेव भोजन खत्म कर बाहर निकला तब तक बारिश बन्द हो गई थी। वह ओसारे में बैठकर हाथ-मुँह धोने लगा तो बुढ़ऊ मड़हे में लेटे-लेट बोले—
‘‘आसमान औंधा हुआ है। रात में फिर बारिश के आसार हैं। हो सकता है, सुबह तक खेतों में लेव लग जाए। बेहनौर और धनहा खेतों का माड़ संभालना है।...बड़े जन तो जाने कहाँ रमे हैं। वैसे भी उन्हें कौन फिकिर है खेती-बारी की ! पहला दौंगरा पड़ता है तो किसान घर की ओर भागता है, पर वे तो चुपड़ी रोटी और बघारी दाल उड़ा रहे होंगे।’’

रामदेव कुछ असमंजस में खड़ा रहा। फिर धोती का फाँड़ और कन्धे पर फावड़ा लेकर सिवान की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचने तक आसमान छँटने लगा था। एक ओर बादल के फाहों के पीछे से चाँद निकल आया था और सिवान में धुँधली-सी चाँदनी बिछ गयी थी। झिल्लियों की झंकार, रेवों की सिसकार, मेंढकों की टर्राहट और चुहचुइया की एकतार चीख आपस में मिलकर साज-सा बजा रहे थे जिससे सिवान का एकाकीपन गाढ़ा हो गया था। जिन खेतों की जुताई नहीं हुई थी

उनमें मजे का पानी भर गया था और चाँदनी में दूर से चमक रहा था। रामदेव ने मेड़ों के चारों ओर घूम-घूमकर कटे हुए घारों को बाँधा। कई जगह चीटों और चूहों ने मेड़ों के नीचे से सुरंगें बना दी थीं जिनमें से पानी धीरे धीरे रिस रहा था। पर रात में उन्हें बन्द करना आसान नहीं था। अक्सर ये टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें मेड़ के नीचे-नीचे दूर तक चली जाती हैं और पानी के अन्दर घुसने की जगह बाहर निकलने की जगह से बहुत दूर होती है। पानी निकलता तो दिखता है पर उसके अन्दर घुसने की जगह बहुत ध्यान से खोजनी पड़ती है। कभी-कभी तो पूरी सुरंग की लम्बाई तक मेंड़ को काटकर फिर से दबा-दबाकर बाँधना पड़ता है। चाँदनी की धुँधली उजास में यह काम नहीं हो पाएगा और दिन में दुबारा आना ही पड़ेगा–रामदेव ने सोचा और फावड़ा कन्धे पर डाले घर की ओर लौट पड़ा।
बारिश के बाद की निस्तब्धता। रात का दूसरा पहर। फीकी चाँदनी में डूबे जंगल के बीच से गुजरते हुए रामदेव का मन बार-बार झिंगुरीसिंह की सभा की ओर दौड़ जाता था। देशी जबान में कैसे ठह-ठह कर बोलते हैं वे—

‘‘मोरे भइया किसानो, तोहरी कमाई पर तालुकेदारन की धोती आकाश में झुराए रही है और तोहार दुःख-तकलीफ सुनै वाला कोई नहीं।...पहली बारिश के बाद किसान उछाह के साथ हल-बैल लिए खेत की ओर दौड़ता है। मगर खेत उसका नहीं। तालुकेदार जब चाहे उसे बेदखल कर दे। जिस मिट्टी को पालते-पोसते बाप-दादे मिट्टी में मिल गए वह मिट्टी उसकी नहीं। दूर अपने आलीशान कोट में बैठा तालुकेदार उसका मालिक है और अंग्रेज बहादुर उसका रखवाला।

दोनों ने मिलकर रिआया को तबाह करने की कैसी रचना रची है। यही तालुकेदार जब सत्तावन के गदर में अँगरेजों के खिलाफ खड़े हुए तो रिआया ने आगे बढ़कर उनका साथ दिया। उनके साथ लड़ी-मरी। बाद में दोनों मिलकर एक हो गए और रिआया को मक्खी की तरह निकाल फेंका। उसका कोई हक नहीं, कोई अख्तियार नहीं। बस वह तालुकेदार का मुँह जोहे। उसके यहाँ हारी-बेगारी करे, नजराना दे और खुद दाने-दाने को मोहताज रहे। मोरे भैया किसानो, आप कब तक चुप सहते रहोगे ?...’’

रामदेव स्वभाव से भावुक था। झिंगुरी सिंह की बातें सुनकर उसका दिल पिघलने लगता। उसकी इच्छा करती थी। सबकुछ छोड़कर उन्हीं के साथ लग जाए। मगर घर का ध्यान आते ही मन सिकुड़ जाता था।

दरवाजे पर पहुँचकर उसने खँखारा और फावड़े को कंधे से उतार कर जमीन पर रख दिया। कहीं कोई आवाज नहीं थी। चारो-ओर सोता पड़ गया था। उसने अपनी चारपाई मड़हे से बाहर निकाली और लेट गया। गड़ही में मेंढकों की टर्राहट पूरे उफान पर थी। घर के चारों ओर जंगल, उसके बाद खेतों और बागों का सिलसिला। सबको अपने में समेटे चाँदनी की धुँधली उजास दूर तक पसरी थी। देर तक सोचते, करवटें बदलते पता नहीं कब नींद आ गई।


दो



राता-भर बारिश नहीं हुई। सुबह बादल घिरे थे और पुरवइया चल रही थी। दो घड़ी दिन चढ़े हवा का रुख बदला और रिमझिम शुरू हो गयी। बीच-बीच में लहरा भी आ जाता था। ताल-तलैयों में पानी जमा होने लगा। लोग इधर-से-उधर उलीचकर बेहनौर के खेतों में लेव लगाने लगे। अब तक जो सिवान सूना पड़ा था, हल और पाटा चलाते और फावड़ लेकर खेतों के कोन गोड़ते या मेंड़ संभालते किसानों से भर गया। चारों ओर से हट्-हट् नांऽऽह की आवाजें आने लगीं।

सालिकराम के दोनों हलवाहे तड़के ही आकर बैलों को सानी-पानी डाल दिये थे। बैल नाँद में मुँह डालकर सानी खाने लगे तो वे हल कन्धे पर उठाए समुझ लोहार के यहां चल दिए। उनमें फाल ठुकवाकर लेव में चलाने के लिए दाबी लगवानी थी। समुझ के यहाँ एक ओर भाथी चल रही थी जिसे उसका बेटा खींच रहा था। दूसरी ओर वह खुद बसूला लेकर बैठा था और हलों में दाबी देकर फाल ठोकता जा रहा था। वहाँ बड़ी भीड़ थी। कई किसान हाथों से हल थामे अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे और बातें भी करते जा रहे थे।
‘‘अरे मिस्त्री, जरा जल्दी हाथ चलावा हो।’’ एक किसान बेसब्री से बोला।
‘‘हाँ भइया, आज तो सबको जल्दी होगी। खरिहग-फरवार देते समय नानी मरती है। दस-दस चक्कर लगवाते हो।’’ समुझ अपने ढंग से काम करता रहा।
‘‘क्या करें, जब राजा-दैव से बचे तो तोहका दें।’’
‘‘अरे भइया, दैव से एक बार बच भी जाए पर राजा से कैसे बचे।’’
‘‘ठीक कहा भइया।... आज हाड़ तोड़कर बुआई कर रहे हैं, कल बेदखली हो जाए तो घरौ का ओर्द जंगेरे में जाए कि नाहीं ?’’
‘‘लगान पूरा भरोगे तो बेदखली काहे होगी हो।’’
‘‘अरे कौनो अन्त है लगान का। बस भरे जाओ। रसीद देता है कोई ?’’
‘‘रसीद दें दें तो बेदखली का डर कैसे दिखाएँ। और बेदखली का डर न रहे तो नजराना कौन देगा।’’
‘‘लो, हम बातों में लगे रहे और ई सुखई का पाछिल मेरी बारी झपट लिया।....चल हट हियां से।’’
‘‘बनवा लेने दो, उसी को बनवा लेने दो भइया। मिस्त्री कहीं भागे थोड़े जा रहे हैं।’’

हलवाहे समुझ के यहाँ से हल बनवाकर लौटे तब तक दो घड़ी दिन चढ़ आया था। एकाएक जोर से लहरा आया और टप-टप बूँदे गिरने लगीं। जुआ खोज कर दोनों भीगते हुए बैलों को बाँधने लगे। तभी सालिकराम नहाकर गमछा पहने कुएँ से लौटे और मड़हे के एक कोने में खड़े होकर सूखी धोती पहनने लगे। एक बैल उसी समय पेशाब करने लगा। देबीदीन हलवाहा उन्हें सुनाकर बैल से बोला—
‘‘लो, ऊपर से भगवान तुलतुल कर रहे हैं, नीचे से तुमने भी शुरू कर दिया।’’
सालिकराम ने भौहें टेढ़ी करके उसकी ओर देखा और चुपचाप धोती बाँधते रहे। देबीदीन शरारत से मुस्कराता अपने काम में लगा रहा। वह और सालिकराम दोनों बराबर की उम्र के थे और सालिकराम से उसकी खंगड़ई चलती रहती थी। वे अकच्छ होने पर बोल नहीं सकते थे। उन्होंने काँछ बाँध ली तो नकली गुस्से में बोले—
‘‘ऐसे ही मेल्हते रहे तो खेत तक पहुँचते दिन लटक जाएगा देबीदीन। आज जुताई का इरादा नहीं है क्या ?’’
‘‘अब क्या करें भगवान्। न ऊपर वाला बस में है, न तोहरे ई बरधऊ। दोनों मिल के मार किच-किच किए हैं। आखिर मौका देख कर न कौनो काम करे चाही।’’
सालिकराम ओंठ में मुस्कराकर रह गए।
दोनों हलवाहे हल-बैल लेकर चले गए तो वे मड़के के कोने में रखी चौकी पर बैठकर पूजा करने लगे। तभी बांस की टूटी छतरी लगाए, काँख में एक फटी-पुरानी पिछौरी दबाए, उघारे बदन एक आदमी आता दिखा। पास आने पर उसने झुककर पैलगी की और छतरी एक किनारे रखकर चौकी के सामने खड़ा हो गया। सालिकराम ने सिर उठाकर हाथ के इशारे से उसे बैठने को कहा।
‘‘बिसार (उधार पर बीज) के लिए गए थे भगवान् पदारथ महराज के यहाँ। पर वे निराश लौटा दिए।’’ सुचित जमीन पर उकड़ूँ बैठ गया और शालग्राम के शंपुट की ओर सिर नवाकर हाथ जोड़े।
आचमन करते-करते हाथ के इशारे से सालिकराम ने कारण पूछा।

‘‘अभी पिछले साल का बकाया है महराज। बहुत हाथ-पैर जोड़े पर वे टस से मस न हुए। समझ में नहीं आता के अब कहाँ जाएँ।...घर में मुट्ठी-भर धान नहीं है। लरिकन को भात खाए महीनों गुजर गए। मजूरी में जो मोट महीन मिलता है उसी से किसी तरह गुजारा चल रहा है। अगर धनहा खेत में बीज न पड़े तो आगे भी सब अँधियार है।’’
सालिकराम ने संकेत से कहा कि वह धीरज के साथ बैठे। फिर दत्तचित्त होकर पूजा करने लगे। सुचित एक कोने में रखी सुतली लेकर धीरे-धीरे साफ करने लगा। भगवान् को नहलाकर चन्दन और फूल चढ़ाने के बाद सालिकराम ने घंटी बजाई। मझली बहू धूप के लिए कलछुल में आग और नैवेद्य के लिए पत्ते में गुड़ लेकर घूँघट काढ़े घर से बाहर आयी। वह आग और बाल भोग रखकर वापस जाने लगी तो उन्होंने ताली बजाकर उसे रोका और सुचित को उससे अपनी बात कहने के लिए इशारा किया।
‘‘बिसार चाही दुलहिन।....दो पसेरी धान मिल जाता तो लरिकन के लिए आगे का सहारा हो जाता। नहीं तो वे खाना बिना मरेंगे।’’
बहू ने हाथ हिलाकर अपनी असमर्थता जाहिर की और अन्दर जाकर बड़ी बहू से बोल दिया। वह कुछ देर बड़बड़ाती रही, फिर बूढ़ा को सिखा-पढ़ाकर बाहर भेजी।
‘‘कउनो सदाबरत खुला है क्या।...बस खाने और बीज भर का धान रखा है। उसमें से इसको कैसे देंगे ?...बैठे-बैठे हुकुम चलाते रहते हो।’’ कहते-कहते बूढ़ा की सांस फूलने लगी।
सालिकराम ने बेसब्री से हाथ हिलाकर बूढ़ा को वापस जाने का इशारा किया। पर माला जपते हुए बराबर उनके माथे पर शिकन बनी रही। सुचित आशा-निराशा में झूलता बैठा रहा। पूजा खत्म होते ही सालिकराम ने आवाज लगाई—
‘‘मई कहा, कउनो है ?’’
फिर से बूढ़ा बाहर आयीं—‘‘अब क्या है ?...रसोई तैयार है, उठते क्यों नहीं ?’’
बुढ़ऊ का नियम था, पूजा खत्म होते ही सीधे भोजन के लिए उठ जाते थे। पीढ़ा-पानी न रखा हो तो बहुओं की शामत आ जाती थी। थोड़ी-सी अधपकी दाल मिल जाए तो ठीक, नहीं तो चार मोटी-मोटी रोटियां जरा से अमचुर के साथ खाकर बड़े प्रेम से उठ जाते थे।
‘‘देखो, सुचित इतनी देर से आस लगाए बैठा है। उसे दो पसेरी धान तुलवा दो।
‘‘जानते तो हो, धरना-उठाना दुलहिन के हाथ में है। उसने जो कहा, मैंने आकर बोल दिया। अब हमारी जान न खाओ।’’
बुढ़ऊ कुछ देर शून्य में ताकते रहे। फिर अन्दर उठते उबाल को दबाकर शान्त स्वर में बोले—
‘‘जरा बड़की बहू को भेज दो।’’
बूढ़ा बड़बड़ाते अन्दर गईं और थोड़ी देर बाद बड़ी बहू तिरछा घूँघट निकाले ओसारे के पास आकर खड़ी हो गई।
‘‘बहू यह बताओ, हमें खाने को देती की नहीं ?...बस उसी में से निकाल दो। हम भात नहीं खाएँगे इस साल।’’
बहू चिनकती हुई अन्दर गई। पहले एक दौरी में धान लेकर आई और ड्योढ़ी में धम्म से रखा। फिर अन्दर से तराजू और बाँट लाकर पटका। वह कुढ़ती हुई धान तौलती रही और साधू उसकी झटक-पटक को नजर अंदाज कर खुलती धूप में धोती फैलाते रहे।
सुचित पोटली बाँध कर खड़ा हुआ और साधू के सामने झुककर हाथ जोड़े—
‘‘धन्य हैं महराज। तोहरे पुन्न-परताप से सात पीढ़ी फूले-फलेगी।’’
सुचित के जाने के बाद बुढ़ऊ ने भोजन किया और मड़हे में आकर अपनी चारपाई पर लेट गए। एक झपकी लेने के बाद उठे तो ओसारे में जाकर आवाज लगायी—
‘‘अरे कउनो है, जरा सुँघनी बना के दे देना।’’
इस बीच रामदेव आकर नहा-खाकर वापस चला गया था। औरतें भी खा-पीकर लेटी हुई थीं। बुढ़ऊ की आवाज सुनकर मझली बहू उठी। ताक पर रखा सुरती का पत्ता उठाया। चूल्हे से गरम राख भी निकाली। उस पर रखकर पत्ते को गरम किया। हाँड़ी से चूना लेकर लत्ते में दबाकर सुखाया। सुरती और चूना मलकर सुँघनी बनाई और डिबिया में भरकर बुढ़ऊ के पास ले गयी।
‘‘इसको यहीं रख दो। जरा एक लोटा ताजा पानी लेती आओ। लोटा ठीक से माँज लेना।’’
बुढ़ऊ का लोटा अलग था जो चौकी पर रखा हुआ था। बहू ने उसे उठाया, अन्दर ले जाकर राख से माँजा। फिर डोरी खोज कर कुएँ पर गयी। पानी भरकर लायी और चौकी पर रख दिया।
‘‘जरा खड़ाऊँ दे दो।’’
बहू ने छप्पर में खुँसे खड़ाऊँ लाकर रखे तो बुढ़ऊ ने फिर आदेश जमाया—
‘‘एक ढोंका गुड़ लेती आओ।’’
बहू का सब्र जवाब दे रहा था—
एक बार में सबकुछ क्यों नहीं बोल देते। जब तक वह गगरी से गुड़ निकालकर उसे पत्ते पर रख कर आई, बुढ़ऊ हाथ-मुँह धो चुके थे और खड़ाऊँ पहनकर पैर लटकाए चौकी पर बैठे इन्तजार कर रहे थे।
‘‘पैर में जाँत बँधा है क्या लक्ष्मी ? जरा जल्दी-जल्दी डुलाया करो।’’
बहू कुछ बोल तो नहीं सकती थी, अन्दर-ही-अन्दर कसमसाकर वापस चली गई। बुढ़ऊ ने गुड़ खाकर पानी पिया। कुछ देर सुँघनी सूँघते बैठे रहे। फिर उठकर पौला पहना, सोंटा उठाया और सिवान की ओर चल पड़े बेहनौर वाले खेत में हल चल रहे थे और रामदेव कोने गोड़ने में लगा था। बगल में पदारथ का खेत था। उसमें चार-चार हल एक साथ चल रहे थे।

दो उनके और दो कुर्मियान के। बिसार और महाजनी से उन्होंने पूरे कुर्मियान को बाँध रखा था। जिस कुर्मी को बोल देते, वह अपने हल-बैल लेकर पहले पदारथ के खेत की बुआई करता फिर अपने खेत में जाने की हिम्मत करता। हलवाहों के अलावा तीन आदमी और काम पर लगे थे। घर का कोई आदमी खेत पर नहीं था पर सारा काम मुस्तैदी के साथ चल रहा था।
सालिकराम कुछ देर मेड़ पर बैठे काम का जायजा लेते रहे, फिर उठकर पदारथ के घर की ओर चल दिए। आज सुबह से ही पदारथ का बखार खुल गया था। अभी तक बिसार लेने वालों की भीड़ लगी थी। पदारथ दालान के ओसारे में चारपाई पर लेटे थे। और बगल में मँझला बेटा बही लेकर बैठा था। जिन लोगों का पुराना हिसाब बकाया था वे हाथ जोड़कर

गिड़गिड़ा रहे थे लेकिन पदारथ पर कोई असर नहीं हो रहा था। बड़ा बेटा धान तौल रहा था और खुले आम डंडी मार रहा था पर किसी की कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी। जिसका पिछला चुकता हो गया था वह पिछौरी बढ़ाकर धान रोपता, पोटली बाँधकर कन्धे पर डालता, पदारथ के सामने पूरा झुककर पैलगी करता और अपने को धन्य मानता रास्ता पकड़ लेता। सालिकराम के आ जाने से इस काम में थोड़ी बाधा पड़ी।
‘‘आवा-आवा हो साधू, कहाँ से रास्ता भूल पड़े ?’’ पदारथ ने चारपाई से उठकर उन्हें सिरहाने बिठाया। उच्च कुल के नाते वह उन्हें पूज्य मानता था।
‘‘बेरन-वेरन कुछ डलवा रहे हैं ? लेव लगने भर का पानी तो हो गया होगा।’’
‘‘हाँ, रो-धो के हो ही गया है। रामदेव बड़के बेहनौर में लगा है। ...तुम खेत पर नहीं गए ?’’
‘‘हमें बिसरहों से फुरसत मिले तब तो जाएँ। सुबह से नाक में दम किए हैं। देख तो रहे हैं।’’
‘‘भगमान हो भइया, बिना हिले-डुले सब काम हो रहा है।...सिवान से ही आ रहा हूँ।’’
‘‘इन ससुरों को दबा के रखो तो दौड़ के सब करेंगे। जाति ही ऐसी है इनकी।’’
पदारथ आवाज धीमी करके बोला।
सालिकराम बिना कुछ कहे पदारथ की ओर देखते रहे। उनका ध्यान सुचित की ओर चला गया।
‘‘अच्छा यह बताओ पदारथ, जो बिसार नहीं पाएँगे बोएँगे कहाँ से, और बोएँगे नहीं तो पहले का बकाया कैसे वापस करेंगे ?’’
‘‘जरा धीमे बोलो साधू।... सब ससुरे जोत-बो लेंगे और लगान भर देंगे तो बेदखल कैसे होंगे ? बेदखल नहीं होंगे तो हमारे-तुम्हारे यहाँ मजूरी कौन करेगा ? फिर बेदखल होंगे तो आखिर खेतवा कहाँ जाएगा। राय साहब किसी को तो देंगे, खुद तो यहाँ काश्त करने आएँगे नहीं।’’ पदारथ साधू की ओर झुककर उनके कान में फुसफुसाए।
किसी ने ध्यान नहीं दिया कि सालिकराम के चेहरे का रंग कैसा बदल गया। आखिर धरम-ईमान भी कोई चीज है। ऊपरवाले का कोई खौफ नहीं इसे। वहाँ और बैठने का मन नहीं हुआ उनका।

वहाँ से चले तो उनके मन में भवरें पड़ रही थीं। पदारथ ने देखते-देखते कैसे अपना ऐश्वर्य बढ़ा लिया ! शुरू में जमीन जायदाद क्या थी, बस जैसे-तैसे खाने को हो जाता था। आषाढ़-कार्तिक में हमारे यहाँ से अनाज जाता था तो खेत में बीज पड़ता था। लेकिन जब से इसने होश संभाला है जैसे लक्ष्मी बरसने लगी हैं। अब तो रुपया थैली में लिए घूमता है। जहाँ बेदखली हुई, नजराना गिनने को तैयार हो जाता है। कितने गाँवों में जमीन बना ली है। बिसार और महाजनी ऊपर से।

चारों ओर तूती बोल रही है। थोड़ी बेरहमी, थोड़ा कपट और थोड़ा भाग्य।... अपने से तो यह होने वाला नहीं। दो वक्त की रोटी मिल जाती है यही क्या कम है। भगवान ने बहुत दिया है। जब बसौली आए थे तो क्या था। आज गाँव के आधी सीर के मालिक हैं। दरवाजे पर जोगी-फकीर को भीख मिल जाती है। साल में एक बार साधुओं का भंडारा हो जाता है। पवस्त में इज्जत आबरू है। और क्या चाहिए।...लेकिन पदारथ का रोब-दाब देखकर मन क्यों कसमसाता है ? एक पानी पर क्यों नहीं रहता वह ? दोनों तो नहीं हो सकता न।

रास्ता जंगल के बीच से जाता था। पानी बरसने से बीच-बीच में कीचड़ हो गया था। वे सोंटे के सहारे सँभल-सँभल के चल रहे थे। शाम ढलने में अभी देर थी। पश्चिम में सूरज के पास से बादल हट गए थे और चटक धूप निकल आयी थी जिसमें बारिश से धुले ढाक के पत्ते चमक रहे थे। आसमान की ओर देखने से लगता नहीं था कुछ देर पहले बारिश हो चुकी है। घर तक पहुँचने में उनके पसीना चुहचुहा आया।


तीन



यह सन उन्नीस सौ सत्रह का साल था। आषाढ़ का दूसरा पाख। बसौली से चार कोस दूर, अवध की सरहद पर बसा छोटा-सा गाँव रूरे। गाँव में बछगोती ठाकुरों का टोला-ठकुरइया। इनके पूर्वज कभी छोटे-मोटे जमींदार थे। परिवार बढ़ता गया और भइयाबाँटन के तहत जमीन के टुकड़े होते गए। उस के साथ पुरानी शान मिटती गई और दरिद्रता का साया फैलता गया।

















अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book