नकद धर्म - नन्द कुमार अवस्थी Nakad Dharm - Hindi book by - Nand Kumar Awasthi
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धर्म एवं दर्शन >> नकद धर्म

नकद धर्म

नन्द कुमार अवस्थी

प्रकाशक : भुवन वाणी ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :84
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2833
आईएसबीएन :00-0000-00-0

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स्वामी रामतीर्थ के संकलनों का वर्णन...

nakad dharma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रकाशकीय

भौतिक उन्नति के चरमोत्कर्ष से प्रलुब्ध किन्तु, सच्चे सुख और शान्ति की क्षुधा से त्रस्त आज के समस्त विश्व की आँखें, भारतीय अध्यात्म एवं वेदान्त दर्शन के व्यावहारिक स्वरूप की ओर आशा के साथ निहार रही हैं।
प्रस्तुत ‘रामतीर्थ वचनामृत’ के अन्तर्गत प्रकाशित साहित्य का उद्देश्य, मनुष्य के लिए नित्यप्रति के जीवन में वेदान्त के सूत्रों को ढालने के सम्बन्ध में मनीषियों द्वारा प्रदत्त अमृत-वचनों को संगृहीत करना और विश्व की प्रस्तुत नयी समस्याओं का समाधान प्रदान करने के लिए, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि तैयार करना है।
यत्किंञ्चित् सफलता यदि हमें इस अभीष्ट में प्राप्त हुई, तो निस्संदेह वह हमें अपने उद्देश्य में आगे बढ़ने को उत्साहित करती रहेगी।

प्रकाशक

नक़द धर्म

(अमली वेदांत)

(अक्टूबर 1906 में गाजीपुर में दिया हुआ व्याख्यान)
सत्यमेव जयते नानृतम्।– (मुण्डकोपनिषत्)


हमारे वेद का वचन है कि जय सदैव सत्य की होती है; असत्य की कदापि नहीं। कहावत है कि-‘‘साँच को आँच नहीं, दरोग को फ़रोग नहीं।’’ संसार में जहाँ कहीं भी ऐश्वर्य और प्रताप है, वहाँ उसका मूल कारण धर्म ही है। हिन्दुओं का कथन है कि लक्ष्मी विष्णु की स्त्री है और वह पतिव्रता है। जहाँ विष्णु अर्थात् सत्य अथवा विवेक होगा वहीं लक्ष्मी का निवास निश्चित है, उसको अन्य किसी की अपेक्षा नहीं। विभव-प्रताप कोई भौगोलिक पदार्थ नहीं अर्थात् वह किसी स्थान विशेष में सीमित या बँधा हुआ नहीं है। जो लोग यूरोप अमेरिका आदि की उन्नति का मूल कारण वहाँ की शीत जलवायु को समझते हैं, अथवा किन्हीं अन्य पिछड़े हुये देशों की अधोगति को वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के सर पर थोपते हैं, वे सर्वथा भ्रम में हैं। दो हजार वर्ष भी कठिनता से गुजरे हैं, जब इँगलैण्ड के निवासी, रोम आदि देशों में गुलाम और बँधुओं की दशा में हाट-बाट बिकते थे। आज वही इँगलैण्ड इतने विशाल साम्राज्य का शासन कर रहा है।

 तो क्या यह समझा जाय कि आज इँगलैण्ड देश अपनी पुरानी चौहद्दी से भागकर कहीं अन्यत्र उन्नतिशील स्थल पर चला गया है। पाँच सौ वर्ष पूर्व का अमेरिका आज भी अपने उसी पूर्वकालीन भूखण्ड पर विराजमान है। परंतु इस समय के बीच वहाँ के निवासियों की हालत में जो महान परिवर्तन हो गया है, इस पर गौर करें। रोम, यूनान मिस्र और भारत आज धरातल पर वहीं तो कायम हैं, जहाँ वे पहले थे और जबकि सारे भूमण्डल में उनकी विद्या और वैभव की धाक थी। सुख समृद्धि देशों और व्यक्तियों का मुँह नहीं जोहती। जो लोग जहाँ भी सत्य पर चलते हैं उन्हीं की जय होती है, और जब तक वे सत्य धर्म पर आरूढ़ रहते हैं, वे जयी बने रहते हैं।

प्यारे ! क्षमा करना ! राम आपका है और आप राम के हैं। तुम हमारे हो और हम तुम्हारे हैं। प्रेममय होकर सामने आपके हम जो भी कहेंगे प्यार से कहेंगे। किन्तु चाटुकारी न होगी। प्रेम में खुशामद व चापलूसी की गुंजाइश कहाँ ? राम जापान में रहा, अमरीका में रहा, योरप के भी कई देश देखने में आये। किन्तु जहाँ भी ‘जय’ पाई, सत्य ही की पाई। अमेरिका जो भी उन्नति कर रहा है, एकमात्र धर्म पर चलने की ही बदौलत कर रहा है। धर्म का कोई ठेकेदार नहीं। धर्म का आचरण प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक स्थान पर कर सकता है। धर्म दो प्रकार का होता है।–एक नक़द, दूसरा उधार। एक उदाहरण द्वारा यह स्पष्ट हो जायेगा। एक व्यक्ति ने कुछ संपत्ति धरती में गाड़ रखी थी। उसके लड़के को किसी प्रकार पता चल गया और उसने जमीन खोदकर वह धन निकाल लिया और खर्च कर डाला। परंतु तौल में उतने ही परिमाण के पत्थर उसने उसी स्थान में गाड़ दिये। कुछ दिन बीतने पर पिता ने जमीन खोदी और वहाँ अपना धन लापता देखकर रोने लगा कि हाय मेरी सम्पत्ति कहाँ गई। लड़के ने कहा-‘‘पिता जी ! रोने की क्या बात है ? आपको वह धन उपयोग में तो लाना ही न था। फिर रख छोड़ने के लिये तो जैसे रुपये वैसे ही पत्थर ! देखो पत्थर वहाँ मौजूद हैं।’’


‘‘बराए निहादन चे संगो चे ज़र’’


धार्मिक संघर्ष और झमेले-झीखने ‘नक़द धर्म’ पर नहीं हुआ करते, वे उधार धर्म पर होते हैं। नक़द धर्म का संबंध परलोक अथवा मरणोपरांत से नहीं वरन् प्रस्तुत जीवन से है। उधार धर्म अन्धविश्वास और नक़द धर्म श्रद्धा और युक्तिपूर्ण होता है। उधार धर्म कहने मात्र के लिये और नक़द धर्म आचरण के योग्य होता है। नक़द धर्म वह धर्म है जिस पर प्रचलित सभी धर्म एकमत हैं। सत्य बोलना ज्ञान की प्राप्ति और उसके अनुसार आचरण, स्वार्थपरता से परे होना; पराया धन, परायी नारी-इनको देखकर नियत न बिगाड़ना, संसार के लाभ अथवा भय के मायाजाल में फँसकर वास्तविक आत्म-स्वरूप (जात मुतलक) को न भूलना चित्त में दृढ़ता और स्वभाव में स्थिरता आदि नक़द धर्म के अँग हैं। इन पर विभिन्न मत नहीं हो सकते। उधार धर्म या जमा कर रखने वाले धर्म को वादविवाद और हुज्जत पसंद लोगों को सौंपकर जो लोग नक़द धर्म पर चलते हैं, वही लोग विकास और उन्नति को प्राप्त होते हैं। इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव दूसरे देशों में जाने से हुआ।

भारत और अमेरिका में क्या अंतर है ? यहाँ दिन है तो वहाँ रात है और यहाँ रात है तो वहाँ दिन। जिन दिनों भारत का नक्षत्र शिखर पर था, अमेरिका को लोग जानते भी न थे। आज अमेरिका परमोत्कर्ष पर है, तो भारत बेचारे की पूछ नहीं। हिन्दुस्तान में राह-बाजार चलते लोग बाईं ओर चलते हैं, अमेरिका में दाईं ओर। उपासना और सम्मान के समय यहाँ जूता उतार दिया जाता है, इसके विपरीत वहाँ टोपी उतारते हैं। यहाँ घरों में पुरुषों का आधिपत्य है, तो वहाँ कुमारियों का बाहुल्य है। हम कहते हैं, ‘‘किताब मेज पर हैं’’, वे कहते हैं, ‘‘किताब पर मेज है (दि बुक इज आन दि टेबिल)’’ भारत वर्ष में गधा और उल्लू मूर्खता के प्रतीक हैं, वहाँ गधा और उल्लू नेकी और बुद्धिमानी के परिचायक हैं। यहाँ जो पुस्तक लिखी जाती है, उसका लगभग आधा अंश यदि प्राचीन विद्वानों के प्रमाणों और उद्धरणों से भरा न हो तो उस पुस्तक की कदर नहीं; उस देश में पुस्तक में सारी सामग्री मौलिक न हो, तो उसकी पूछ नहीं।

यहाँ कोई उपयोगी हुनर या कला हाथ लग जाने पर उसे जनसाधारण से छिपा कर रखा जायगा; तो वहाँ सर्व-साधारण के लाभ के लिये उसे तत्काल प्रचारित कर दिया जाता है। यहाँ पुराने लागों के द्वारा कहे अथवा चलाये गये यथाकथित धर्मों का मौखिक अन्धानुकरण ही अधिक है; वहाँ नक़द धर्म अर्थात् विश्व के अपरिवर्तशील एकमात्र धर्म को आचरण और व्यवहार में लाने पर विशेष जोर है। हमारे यहाँ ये गौरव के विषय हैं कि दूसरों से सम्पर्क न रखें, अपना पकाया ही भोजन करें और सब से दूर-दूर रहें। इसके विपरीत अमेरिका निवासी जितना ही दूसरे लोगों से मिलें उतना ही प्रशंसा के योग्य है। यहाँ पर अन्य देशों की भाषा सीखना कलंक सा समझा जाता है-‘‘न पठेत् यावनी भाषाम्’’ (यवनों की भाषा कदापि न पढ़ी जाय।) किन्तु अमेरिका के लोग जितनी ही अधिक विदेशी भाषाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें, उतना ही सम्मान वे प्राप्त करते हैं।

जब राम जापान की यात्रा पर था, जहाज पर एक वयोवृद्ध अमेरिकन प्रोफेसर उसका मित्र बन गया। वह रूसी भाषा सीख रहा था। यह भी पता चला कि इसके पूर्व वह ग्यारह भाषाओं का जानकार था। यह पूछने पर कि उम्र में अब यह नई भाषा सीखने का क्या प्रयोजन है, उसने उत्तर दिया कि मैं भूगर्व शास्त्र (Geology) का प्रोफेसर हूँ, रूसी भाषा में इस विषय पर एक अद्भुत पुस्तक प्रकाशित हुई है। अगर अपनी देशीय भाषा में उसका अनुवाद मैं प्रस्तुत कर सका तो मेरे देश को अत्यंत लाभकर होगा; इसलिये रूसी भाषा पढ़ रहा हूँ। राम ने प्रोफेसर से कहा, ‘‘तुम्हारा अन्त समय तो समीप है। अब क्यों पढ़ने में लगे हो, इस डुकृड़् करणे’ में क्या धरा है।’’ जवाब मिला, ‘‘लोक की सेवा ही भगवान की सेवा है।’’


‘‘बन्दा हूँ बेखुदा मैं, बन्दे मेरा खुदा है।’’
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अर्थात् मुझ बन्दे का कोई ईश्वर नहीं; ये बन्दे ही मेरे लिये ईश्वर-स्वरूप हैं। लोकसेवा के मार्ग में यदि मुझे रौरव नरक में जाना पड़े तो कुछ परवाह नहीं। नरक के वे क्लेश सहस्र जीवनों की अपेक्षा मुझे स्वीकार हैं, यदि उससे मेरे देश-बन्धुओं का भला हो जाय-उन्हें सुखलाभ हो। मृत्यु के उपरांत के भय के आतंक से, मैं लोक-सेवा के आनन्द के अपने स्वत्व को तिलाञ्जलि नहीं दे सकता।


‘‘गुज़श्ता ख्वाबों आमन्दा खयालस्त,
ग़नीमत दाँ हमीं हमरा कि हालस्त।’’


अर्थात् भूतकाल स्वप्नवत् और भविष्य अनुमान की ही उपज है। केवल वर्तमान काल के जीवन को ही श्रेष्ठ और सत्य समझना चाहिये।
यही नक़द धर्म है। भगवतगीता में बड़ी सुन्दरता से निर्देश किया गया है-

‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।।’’-गीता 2।47।


अर्थात् कर्म करते जाओ। कर्म करने का ही तुमको अधिकार है। उनके परिणामों में चित्त को न फँसने दो।
लार्ड मेकाले की प्रार्थना थी कि मैं मरूँ तो पुस्तकालय में मरूँ। मैं मरूँ तो प्रियतम की गली में मरूँ।


‘‘दफन करना मुझको कूए यार में,
कब्र-बुलबुल की बने गुल्जार में।’’


प्राण जायँ तो कर्तव्य का पालन करते हुए जायँ, शस्त्रों से युक्त रणक्षेत्र में बलिदान होकर साहस, हर्ष और उत्साह के सहित प्राणों को विसर्जन करें। एक व्यक्ति बाग लगा रहा था। किसी ने पूछा-बड़े मियाँ यह क्या हलाकान हो रहे हो ? तुम्हें क्या इस बाग़ के फल खाने को मवस्सर होंगे ? एक पाँव तो तुम्हारा जानो कब्र में है ही। क्या तुमको वह फकीर की बात याद नहीं है:-


‘‘घर बनाऊँ खाक इस वहशत-कदा में नासिहा,
आये जब मजदूर मुझको गोर-कन याद आ गया,’’


भावर्थ-ऐ नसीहत करने वाले ! इस दुर्दान्त संसार में घर क्या खाक बनाऊँ ? जब मजदूर आये तो मुझे कब्र खोदने वाले ध्यान में आ गये।
इस प्रश्न के उत्तर में माली ने कहा, ‘‘औरों ने बोया था, हमने खाया; हम बोयेंगे तो दूसरे खायेंगे।’’ इसी प्रकार जगत का काम चलता चल रहा है। ईसा, मुहम्मद आदि जो महान बुजुर्ग पहले हो चुके हैं, क्या उन महानुभावों ने अपने लगाए हुये वृक्षों के फल स्वयं खाये ? कदापि नहीं। इन महान आत्माओं ने तो अपने शरीरों को खाद बना डाला, फल कहाँ खाये ? जिन वृक्षों के फल आज शताब्दियों से हम लोग खाते चले आ रहे हैं वे उन्हीं ऋषियों की खाक से उत्पन्न हुए हैं। यही सिद्धांत वास्तव में धर्म का प्राण है और इसी सिद्धांत पर वह रूसी भाषा पढ़ने वाला अमेरिकन वृद्ध प्रोफेसर अमल कर रहा था। राम जिस समय जापान से अमेरिका की यात्रा पर था, उस समय जहाज पर लगभग डेढ़ सौ जापानी छात्र थे। उनमें कई अमीर घराने के भी थे।

किन्तु उनमें कदाचित् ही कोई ऐसा था जो घर से रुपया लेकर चला हो। प्रायः तो ऐसे थे कि जहाज का टिकट भी उन्होंने घर के रुपये से नहीं खरीदा था। कोई उनमें से धनी यात्रियों के बूट साफ करने पर, कोई जहाज की छत के तख्ते धोने पर और कोई इसी तरह के अन्य साधारण कामों पर नौकर हो गये थे। इस प्रकार वे जहाज और यात्रा का खर्च निकाल रहे थे। पूछने पर पता चला कि उनका विचार है कि स्वदेश की लक्ष्मी को दूसरे देश क्यों भेजा जाय। जहाज का किराया भी अपने श्रम के बूते अदा करते थे। अमेरिका पहुँचने पर इनमें से कुछ विद्यार्थी तो रईस घरों में दिनभर मेहनत मजदूरी करते थे और रात में नाइट स्कूलों में जाकर शिक्षा प्राप्त करते थे और कोई-कोई तो रेल की सड़क अथवा बाजारों में रोड़ी कूटने पर या ऐसे ही किन्हीं कामों में लग गये थे। ये लोग गर्मियों में मजदूरी करते और सर्दियों में कालेजों में शिक्षार्जन करते थे।


‘‘पये इल्म चूँ शमअ बायद गुदाख्त।’’
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अर्थात विद्या रूपी प्रकाश प्राप्त करने के लिए शमा (मोमबत्ती) के समान पिघलना होगा। इसी ढंग पर सात-आठ वर्ष अपना जीवन-निर्वाह करते हुये, ये जापानी नौनिहाल, अपने मस्तिष्क को अमेरिका के कला-पाण्डित्य पूर्ण ज्ञान से परिपूर्ण कर और अपनी जेबों को अमेरिका के रुपयों से भरकर अपनी मातृभूमि वापस आते हैं। हर जहाज में बीसियों और कभी-कभी तो सैकड़ों जापानी अमेरिका आदि विदेशों को जाते रहते हैं। हजारों क्या लाखों जापानी प्रतिवर्ष जहाजों द्वारा जर्मनी और अमेरिका जाकर वहाँ से ज्ञान अर्जन कर स्वदेश को लौटते हैं।

इसका सुफल तो आप देख ही रहे हैं। पचास साल पहले जापान की दशा भारतवर्ष से भी गई बीती थी। आज वह योरोप से भी बाजी ले गया है। तुम्हारा हाथ अति गोरा चिट्टा है। उसमें प्रवाहित रक्त भी नितांत स्वच्छ है। अब उसी हाथ की कलाई पर तुम पट्टी कस दोगे तो हाथ का रुधिर हाथ में सीमित होकर रह जायेगा। शरीर के अन्य भागों में बहकर न जा सकेगा। फलतः रुधिर दूषित होकर हाथ भी सूख जायगा। अस्तु। जिन देशों ने मस्ती बघारी कि हम अनोखे हैं, हमी श्रेष्ठ हैं, हम ही महान हैं, हम म्लेच्छों अथवा काफिरों से सम्पर्क क्यों रखें और इस मद में आकर जिन्होंने अपने को अलग-थलग कर लिया, उन्होंने मानों अपने आप पर पट्टी कस ली और अपने को सुखा लिया। कहावत प्रसिद्ध है कि-‘‘बहता पानी निरमला रुका सो गन्दा होय।’’


‘‘आबे दरया बहे तो बेहतर, इंसाँ रवाँ रहे तो बेहतर।’’


नदी के जल का बहते रहना और मनुष्य का चलते-फिरते रहना अर्थात परिश्रमशील रहना ही श्रेष्ठ है।
ध्यानपूर्वक देखने पर विदित होगा कि जिन देशों ने उन्नति की है वह सब अपने चलते रहने ही की बदौलत की है। इस दृष्टि से अमेरिकावासियों की स्थिति पर ध्यान दीजिये। 45000 की औसत संख्या में ये लोग पेरिस में सदैव मौजूद रहते हैं-समूह के समूह निरन्तर आते-जाते रहते हैं। फ्रांस में जरा भी कोई नई खोज या घटना नजर में आते ही चट अपने देश में पहुँचाते हैं। प्राचीन विद्या-कला कौशल के सीख लेने में सदैव तत्पर। क्या मजाल जो पीछे रहें। प्रत्येक ऋतु में 80000 अमरीकन मिस्र देश में आते जाते रहते हैं; वहाँ मीनारों का अध्ययन करते हैं। अमरीका के 40 प्रतिशत निवासी सारी धरती का भ्रमण कर चुके हैं। इस प्रकार जहाँ भी किसी ज्ञान-विज्ञान का पता इन्हें चलता है, ये तुरन्त उसे लाकर अपने देश में पहुँचा देते हैं। जर्मनी देश के निवासियों की भी यही दशा है। अमरीका से लौटते समय राम एक जर्मनी जहाज पर यात्रा कर रहा था। जहाज पर लगभग तीन सौ यात्री पहले दर्जे के थे। उनमें प्रोफेसर, ड्यूक, बैरेन, सौदागर आदि सम्मिलित थे।

दिन में राम प्रायः जहाज की सबसे ऊँची छत पर जाकर बैठता था। वहाँ एकान्त में पढ़ता-लिखता अथवा मनन ध्यान में निमग्न रहता। किन्तु जर्मन लोग ऊपर छत पर आकर राम को नीचे ले जाते और उसके व्याख्यान कराते थे। राम को विदेशी समझकर उसके साथ काफिर या म्लेच्छ जैसा व्यवहार तो वे न करते थे। वरन् उनकी लगन थी कि इस अन्य देशीय से जितना भी ज्ञान प्राप्त हो सकता हो, ले लिया जाय। सँयुक्त राज्य अमरीका में सर्वप्रथम नगर जो राम ने देखा वह वाशिंगटन था। वहाँ की यूनीवर्सिटी ने राम को हिन्दू दर्शन पर व्याख्यान देने के लिये, आमन्त्रित किया। भाषण समाप्त होने पर एक युवक प्रोफेसर से भेंट हुई। वह तत्काल जर्मनी से लौटकर आया था। राम ने उससे जर्मनी आने का कारण पूछा और उसने उत्तर दिया कि ‘‘वनस्पति शास्त्र और रसायन शास्त्र’’ के विषय में अपनी यूनीवर्सिटी की जर्मन यूनीवर्सिटियों से तुलना करने गया था, और साधारण तौर पर वह इस परिणाम पर पहुँचा था कि उस समय से दस वर्ष जर्मनी, उनके अमेरिका से इन शास्त्रों में बढ़-चढ़ कर था, किन्तु अब वे जर्मनी से पीछे नहीं हैं। ‘‘पीर शोबीया मोज’’,-अर्थात आयुपर्यन्त अध्ययनशीन रहो। जीतोड़ परिश्रम के द्वारा अमेरिकनों ने विदेशियों से नाना ज्ञान प्राप्त कर अपने देश को उन्नत और समृद्ध किया।

यह कथन असंगत है कि अमेरिकावासी डालर (लक्ष्मी) के दास हैं। सच तो यह है कि लक्ष्मी तो स्वयं सरस्वती के पीछे लगी रहती है। जो लोग यह आरोप मढ़ते हैं कि अमेरिकरनों का धर्म नक़द धर्म नहीं वरन नक़दी धर्म है, वे या तो अमरीका की सही स्थिति का ज्ञान नहीं रखते अथवा वे घोर अन्यायी हैं, और ‘अंगूर न मिलें तो खट्टे’ वाली कहावत उन पर चरितार्थ होती है।

कैलीफोर्निया में एक नारी ने अठारह करोड़ रुपया अर्पित कर एक विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसी प्रकार देश में विद्या की उन्नति और प्रसार के लिये प्रतिवर्ष करोड़ों का दान दिया जाता है। भारत की ब्रह्मविद्या की वहाँ कदर इसी से प्रकट है, कि जैसा ‘व्यावहारिक वेदांत’ अमेरिका में इस समय व्यवहृत हो रहा है। वैसा भारत में आज नहीं है। उन लोगों ने यद्यपि भारत के वेदांत को अपने में पचा लिया है और मनसा कर्मणा गृहण कर लिया है, फिर भी वे हिन्दू नहीं बन गये हैं। वैसे ही हम भी उनके ज्ञान कला कौशल को अपने में पचा लेने पर भी अपनी राष्ट्रीयता को कायम रख सकते हैं। वृक्ष बाहर से खाद संग्रह करते हैं, स्वयं खाद नहीं बन जाते। बाहर की मिट्टी, जल वायु प्रकाश आदि ग्रहण करती और अपने में पचा लेती है, किन्तु वह स्वयं जल, वायु और प्रकाश नहीं हो जाती। जापानियों ने अमेरिका और योरोप के विज्ञानशास्त्र और नाना कला कौशल को अपने में पचा लिया, फिर भी जापानी ही बने रहे। देवाओं ने अपने यहाँ से कुछ को असुरों के पास भेजकर उनकी जीवन तुल्य संजीवनी विद्या, सीख ली, परंतु वे असुर नहीं हो गये। इसी प्रकार तुम लोग भी अमेरिका योरोप आदि जाकर वहाँ से ज्ञान विज्ञान कला कौशल प्राप्त करो और इससे तुम्हारे धर्म और राष्ट्रीयता में धब्बा न आयेगा। जो लोग विद्या और ज्ञान, को भौगोलिक सीमा में परिसीमित करते हैं, जिनका कथन है, कि विदेशियों का ज्ञान हमारे यहां आने से अधर्म होगा और हम अपने ज्ञान को स्वदेश की सीमा से बाहर दूसरों के कल्याण के लिये क्यों जाने दें, और इस प्रकार जो लोग अपना ज्ञान पराया ज्ञान कहकर ज्ञान में विभाजन करते हैं, वे अपने ज्ञान को अज्ञान में बदलते हैं।

इस कमरे में प्रकाश फैला है। यह प्रकाश अत्यंत लुभावना और सुहावना है ! यदि हम कहें कि यह प्रकाश हमारा है, एकमात्र हमारा है, हाय, यह कहीं बाहर के प्रकाश से मिलकर अपवित्र न हो जाय; और इस भय से हम अपने प्रकाश को सुरक्षित रखने के लिये, कमरे की खिड़कियाँ रौशनदान कपाट सब बंद कर दें; चिकें, परदे गिरा दें, तो परिणाम यह होगा कि वह स्वयं प्रकाश ही लुफ्त हो जायगा। नहीं-नहीं कस्तूरी के समान काला नितांत अंधकार छा जायगा। हाय हम लोगों ने हिन्दुस्तान में इस भ्रान्तिमूलक धारणा और चलन को क्या अपना लिया।

‘‘हब्बुलवतन अज मुल्के सुलेमाँ खुश्तर।
खारे-वतन अज संबुले-रेहाँ खुश्तर।’’

इसे भूलकर स्वयं काँटा बन जाना और स्वदेश को काँटों का वन बना देना, यह कैसी देशभक्ति है ? साधारण तौर पर एक ही प्रकार के वृक्ष जब गुन्जान समूहों में इकट्ठा उगते हैं, तो सब कमजोर रहते हैं। इनमें से किसी को उस झुण्ड से अलग ले जाकर कहीं बो दें तो वही बढ़कर बड़ा और अति पुष्ट हो जाता है। यही राष्ट्रों और जातियों की है। कश्मीर के संबंध में कहाजाता है-


‘‘अगर फिरदौस बन रुए जमी अस्त।
हमीनस्तो, हमीनस्तो हमीनस्त’’

अर्थात् यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यही है, यही है, यही है।
किन्तु यही कश्मीरी लोग, जो अपने फिरदौस (स्वर्ग) अर्थात् कश्मीर से बाहर निकलना पाप समझते हैं, अपनी कमजोरी नादानी और गरीबी लिये प्रख्यात हैं। और वह पुरुषार्थी कश्मीरी पण्डित जो उस पहाड़ी (फिरदौस) से बाहर निकलकर आये, उन्होंने अन्य भारतवासियों को हर बात में मात कर दिया। वे सब ऊँचे-ऊँचे ओहदों पर विराजमान हैं। जापानी जब तक जापान में बन्द रहे, वे कमजोर और पस्त रहे। जब वे विदेशों को जाने लगे, वहाँ की हवा लगी, वे सशक्त हो गये। योरोप के गरीब धनहीन और प्रायः निम्न स्तर के लोग जहाजों पर सवार होकर अमरीका जा बसे और आज उनकी जमात संसार की सबसे शक्तिशाली कौम है। कुछ भारत वासियों ने भी विदेश का मुँह देखा। जब तक स्वदेश में रहे उनकी कोई पूछ-गछ न थी। विदेशों में गये तो उन उन्नत कौमों में प्रथम श्रेणी के समझे गये और उन्होंने ख्याति प्राप्त की।


‘पानी न बहे तो उसमें बू आये,
खञ्जर न चले तो मोरचा खाये।
गर्दिश से बढ़ा लिहर व मह का पाया,
गर्दिश से फ़लक ने औज़ पाया।’’
वृक्ष सारी रुकावटों को काटकर अपनी जड़ों को वहाँ प्रविष्ट कर देते हैं जहाँ जल प्राप्त हो। इसी प्रकार अमेरिका, जर्मनी, जापान, इँगलैण्ड के लोग सागरों को चीरकर, पर्वतों को काटकर धन खर्च करके, सभी प्रकार की विपत्तियों और कष्टों को झेलकर वहाँ-वहाँ पहुँचे, जहाँ से उन्हें कम या ज्यादा, किसी भी प्रकार का ज्ञान हो सका। यह तो है एक कारण उनकी उन्नति का। अब और सुनिये।


जाँनिसारी-प्राणोत्सर्ग



एक जापानी जहाज में कुछ भारतीय विद्यार्थी सवार थे। जहाज के उस दर्जे के मुसाफिरों को जो कुछ खाने को मिला, वह किसी विशेष कारण से उन भारतीयों ने स्वीकार नहीं किया। एक गरीब जापानी लड़का, उन भारतीय विद्यार्थियों को भूखा देखकर उनके लिए दूध, फल आदि खरीद लाया और उनके सम्मुख रखा। भारतीयों ने पहले तो अपने देश के शिष्टाचार के अनुसार लेने से इन्कार किया, किन्तु बाद में उन्हें स्वीकार कर लिया। जहाज से जब वे उतरने लगे, तब वे उन वस्तुओं का मूल्य देने लगे। जापानी ने मूल्य नहीं लिया, बल्कि रोते हुए निवेदन करने लगा, ‘‘जब आप भारतवर्ष लौटकर जायँ तो कृपा कर वहाँ यह धारणा न फैला दें कि जापानी लोग ऐसे नालायक हैं कि वे अपने जहाजों पर निम्न दर्जे के प्रवासी यात्रियों के लिए उनके खाने-पीने का समुचित प्रबंध नहीं रखते।’’

अब जरा गौर की कीजिये ! एक गरीब यात्री बालक, जिसका उस जहाज के साथ कोई भी सरोकार नहीं, वह अपनी निजी सामान्य पूँजी इसलिए निछावर कर रहा है कि कहीं उसके देश के जहाजों की कुव्यवस्था का प्रचार विदेशों में न हो-उसके देश की बदनामी न हो। इस जापानी विद्यार्थी के नजदीक उसके अपने जीवन और उसके देश में कोई भेद नहीं है। सारे देश के जीवन को वह अपना जीवन मानकर व्यवहार कर रहा है। क्या यही स्वदेश-भक्ति है। कैसा आत्मसमर्पण है। यह है भेदरहति अद्वैत भाव यह है नक़द धर्म ! इस अमली (व्यावहारिक) वेदांत के बिना उन्नति और कल्याण का और कोई रास्ता नहीं है।



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