भक्त प्रह्लाद - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला Bhakt Prahlad - Hindi book by - Suryakant Tripathi Nirala
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भक्त प्रह्लाद

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2859
आईएसबीएन :9788171788965

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भक्त प्रह्लाद के जीवन में घटित कहानियों का संग्रह...

Bhakt Prahlad a hindi book by Suryakant Tripathi Nirala - भक्त प्रह्लाद - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत के पौराणिक साहित्य में अनेक ऐसे किशोर चरित्र हैं जो मनुष्य के अडिग विश्वास, आस्था और संकल्प बल के प्रतीक हैं। भक्त प्रह्लाद हमारे पौराणिक आख्यानों का ऐसा ही चरित्र है। इस चरित्र की कथा के माध्यम से निराला ने प्रह्लाद के उस अटूट विश्वास को उजागर किया है जो किसी भी आततायी के सामने पराजित नहीं होता। साथ ही, मानव-प्रकृति वर्णन पर भी निराला ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है। भक्त प्रह्लाद जब शिक्षा के लिए गुरुकुल में पहुँचा तो गुरु ने आरम्भ में जो तीन बातें बतलायी थीं उनमें तीसरी थी, तुम कभी यहाँ घमण्ड न कर सकोगे कि तुम राजा के लड़के हो।

यहाँ जितने लड़के हैं, सबका बराबर आसन है। सम्मान की दृष्टि से वह बड़ा है जिसने अध्ययन अधिक किया है। तुम्हें सदा ही उसका अदब करना चाहिए। इसके बाद निराला लिखते हैं प्रह्लाद मौन धारण किये उन अनुशासनों को सुन रहे थे। तीसरी आज्ञा उन्हें भायी। राजा और रंक एक ही आसन पर बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं, समता के इस भाव से समदर्शी बालक का मुख प्रफुल्ल हो उठा।’’
उपरोक्त उद्धवरण से स्पष्ट है कि भक्त प्रहलाद एक पौराणिक चरित्र का पुनराख्यान-मात्र नहीं है, बल्कि उसके माध्यम से निराला ने किशोर पीड़ी के लिए समता और मनुष्यता का संदेश भी दिया है।

 

भूमिका

 

प्रह्लाद भक्तों में अग्रगण्य हैं। उनकी ईश्वर-निर्भरता भारत प्रसिद्ध है। दैत्यों के वंश में जन्म लेकर भी उन्होंने सत्त्वगुणी वृत्ति का आश्रय लिया था। अन्त तक आसुरी भावों पर वे विजयी हुए। ईश्वर-प्रेम, भक्ति, शान्ति, क्षमा, दया, धृति, सरलता आदि जितने सद्गुण हैं,

प्रह्लाद में वे सब थे। कठोर-से-कठोर परीक्षाएँ आयीं, परन्तु वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए। ऐसे धर्मनिष्ठ, सरल और दृढ़व्रत बालक के चरित्र का प्रचार-स्खलितमति, निर्वीर्य, निरुत्साह और पथभ्रष्ट कर देने वाली कुशिक्षा से बचाने के लिए देश के बालकों में अवश्य होना चाहिए। प्रह्लाद के चरित्र-चित्रण में यथा-साध्य हमने सरल भाषा का उपयोग किया है। साधना और सिद्धि संबंधी उच्च तत्वों के समुद्धाटन की चेष्टा भी की है। इसका अध्ययन बालकों के लिए यदि कुछ भी लाभप्रद होगा तो हम अपना परिश्रम सफल समझेंगे। इतिः।

 

15-8-30

 

विनीत सूर्यकान्त त्रिपाठी

 

प्रथम परिच्छेद

 

परिचय

 

देवताओं और दानवों के पूर्वज भगवान कश्यप थे। इनकी कई पत्नियाँ थीं। अदिति से देवता और दानव पैदा हुए। देवताओं और दानवों के अलावा नाग-नर, किन्नर और यक्ष-गन्धर्वों के पिता भी यही थे।

इस तरह सृष्टि का चक्र जब से चला, तभी से पुण्य और पाप, अमृत और गरल, भले और बुरे का इतिहास मिलता है। जिस तरह दिन और रात का जोड़ा सृष्टि के प्रथम समय से ही चला आ रहा है, उसी तरह देवता और दानव भी आदि काल से आपस में लड़ते चले आ रहे हैं।
जिस समय की कथा हम लिख रहे हैं, वह सत्ययुग था। सत्ययुग उसे कहते हैं, जिस समय संसार में सत्य का प्रभाव अधिक रहता है। यानि पुण्य अधिक और पाप कम होता है। सत्य के सुनहले प्रकाश में संसार के जीवों को हर तरह की शान्ति और समृद्धि मिली रहती है। उनमें ईर्ष्या-द्वेष, फूट-कलह, अनाचार-व्यभिचार आदि पापों का फैलाव बहुत कम, नहीं के बराबर रहता है। पृथ्वी मानो सुख की हिलोरों में बहती रहती है। प्रजा को ईति-भीति का कष्ट नहीं रहता। मनुष्यों को अपनी रोटी कमाने के लिए इतना परिश्रम नहीं करना पड़ता, न इस तरह का अकाल संसार को बेहाल किए रहता है।

सृष्टि का क्रम जारी हो चुका था। देवताओं और दानवों का वंश खूब बढ़कर संसार में फैल चुका था। देवताओं में सत्त्वगुण की मात्रा अधिक रहने के कारण, वे स्वभाव से संयमी, सरल, उदार, सहिष्णु, परोपकारी और परपमात्मा के भक्त हुए, उधर दैत्यों में तमों गुण अधिक था, इसलिए वे दुराचारी, क्रोधी, पराई भलाई न देख सकने वाले, असंयमी, भले आदमियों से डाह करने वाले, विष्णुद्वेषी हुए। वे किसी की कोई अच्छी चीज देखते तो इसे झट से हड़प जाने के लिए दिलो-जान से तैयार हो जाते। उन्हें न तो संसार में किसी का डर था और न वे धर्म और परमात्म को ही कुछ गिनते थे। वे शराब पीते, माँस खाते हर तरह के अत्याचार करते थे। यही उनका नित्य-कर्म था और इसी में उन्हें परम आनंद भी मिलता था। भले आदमी और खास कर देवता तो उनसे बहुत घबराते थे।

इसी दैत्य-वंश में, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, दो भाई बड़े प्रतापवान हुए। संसार में इनकी धाक बँध गयी। इन दोनों में दुर्जेय शक्ति थी। एक तो यों ही स्वभाव तमो गुणीं, तिस पर पराक्रम की कमी नहीं, इनके उत्पात से तीनों लोक तंग आ गए थे। ये जिधर से निकलते, उधर ही सन्नाटा छा जाता। मारे डर के लोगों की सांस ही रुक जाती, जंगली जीव भी मारे डर के दुम दबाकर चुपचाप एक ओर सरक जाते। जिस तरह हिन्दुस्तान में आजकल प्लेग का आतंक छाया हुआ है, उसी तरह संसार में कभी इन दोनों भाइयों के नाम मशहूर और लोगों के लिए खौफनाक हो रहे थे। देवताओं के लिए तो और आफत थी। इनकी शक्ति से वे इतने दब गए थे कि किसी भी हालत में इनका मुकाबला नहीं करते थे।


हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई था। जब वह जवान था, उस समय हिरण्यकशिपु बिल्कुल बच्चा था। हिरण्याक्ष अपने छोटे भाई को बहुत प्यार करता था। वह उसे अक्सर अपने साथ ही रखा करता था। लड़ने-भिड़ने की पेचीदा शिक्षा हिरण्यकशिपु को इसी से मिली थी। दैत्य वंश में पैदा होने के कारण इन दोनों भाइयों से देव-द्विजों को मानने वाले, इन्हें घृणा की दृष्टि से देखते थे।

लोगो का यह भाव हिरण्याक्ष को अपने बचपन में ही मालूम हो गया था, और इसका बदला लेने के लिए वह हृदय से निश्चय कर चुका था कि मैं संसार से धर्म की सत्ता मिटा दूँगा, जिस विष्णु की पूजा के कारण देवों और ब्राह्मणों को इतना गर्व है, मैं उस विष्णु की ही संसार से हस्ती मिटा दूँगा।

हिरण्याक्ष की उम्र के साथ उसका यह ख्याल भी जोर पकड़ता गया। कुछ भी हो, हिरण्याक्ष अपनी जवानी में बड़ा ही सुड़ौल और शरीर का संगठित निकला। शेर की-सी गर्दन, आँखों में झुलस देनेवाली वीरता की निडर चितवन, हाथ जैसे हाथी की सूंड, छाती गज-भर की चौड़ी, कमर पतली-पेटी का कुल मांस खिंचकर सीने पर चढ़ा हुआ,

पैर जैसे किसी रुस्तम-जहान जबरदस्त पहलवान के मुग्दर, और ताकत की तो बात ही क्या—कि शेर भी आए, तो जवान हाथों-हाथ फाड़ डाले और मरोड़कर उसी वक्त उसकी जान ले ले। हिरण्याक्ष को कुश्ती का शौक भी खूब था। शिकार तो वह रोज खेलता ही था और जब से जवानी की रोशनी आई, तब से तो शिकार के मांस के बिना उसका पेट ही नहीं भरता था।

इधर कुल-गुरु शुक्राचार्य को इस वीर से बड़ी-बड़ी आशाएँ होने लगीं। वे इसमें तेज, साहस और आत्मिक शक्ति भरने का भरसक प्रयत्न करने लगे। खूब इसका दिल बढ़ाया और तमाम संसार पर विजय प्राप्त करने के लिए खूब उभाड़ा। शुक्राचार्य के उपदेशों का उस पर वही असर पड़ा, जो सफेद कप़डे पर किसी रंग का पड़ता है। आत्मिक शक्ति बढ़ाने के लिए शुक्राचार्य ने उसे शिव का मंत्र दिया और उसे ही अपने जीवन का आधार बना लेने के लिए बार-बार होशियार कर दिया। कहा, मृत्युंजय के इस मंत्र से संसार भर में एक दिन तुम्हारी कीर्ति-पताका फहराएगी। हिरण्याक्ष को गुरु की आज्ञा पर दृढ़ विश्वास हो गया।
हिरण्यकशिपु हिरण्याक्ष के साथ-ही-साथ रहता था। जब तक वह बालक था, तब तक उसकी माता और हिरण्याक्ष सदा ही डरते रहते कि अकेले में पाकर हिरण्यकशिपु को देवता कहीं मार न डालें। इसलिए हिरण्याक्ष अपने छोटे भाई को एक क्षण-भर के लिए भी नहीं छोड़ता था। उसके साथ रहते हुए हिरण्यकशिपु के स्वभाव पर भी वही रंग चढ़ गया। वह भी देवों, ब्राह्मणों और खास तौर से विष्णु से जलने लगा। इधर उसके लड़ने-भिड़ने और दाँव पेच सिखलाने की ओर हिरण्याक्ष की अचूक दृष्टि रहती थी।

घोड़े पर चढ़ना, घोड़े पर सवारी करने की हालत में बल्लम मारना, दौड़ते हुए घोड़े पर से तीर चलाना, उड़ती हुई चिड़िया का निशाना बेधना, शेर का पैदल शिकार करना, दोनों होथों से तलवार चलाना, ढाल की ओझल से शत्रु की तलवार छीन लेना, तीर की नोक से छोटी-छोटी पत्तियों के डंठाल काट गिराना, सब तरह की युद्ध विद्याओं में
हिरण्यकशिपु को धीरे-धीरे पारंगत करने लगा। हिरण्यकशिपु भी जी लगाकर अपने भाई की दी हुई विद्या सीखने लगा। हिरण्यकशिपु की एकाग्रता देखकर हिरण्याक्ष के आनंद का ठिकाना न रहा, हिरण्यकशिपु की अस्त्रकुशलता बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही थी। शर-योजना में उसकी दक्षता और स्फूर्ति देखते ही बनती थी। फुर्तीलापन उसमें अपने बड़े भाई से कहीं बढ़कर था।
समय धीरे-धीरे पार हो जाता है। एक-से दिन किसी के नहीं रहते। कंगाल भी कभी मालामाल हो जाता है और बड़े-बड़े प्रजापालक महाराजाओं को द्वार-द्वार टुकड़ों के लिए हाथ फैलाना पड़ता है। हिरण्यकशिपु का मनोहर बालपन बीत गया। उसकी सीढ़ी से जवानी की छत पर पैर रखे। वहाँ से तमाम संसार की हरी-हरी शोभा जहाँ तक उसकी नजर पहुँची, उसने देखी। जी भर गया। हृदय में आनन्द की लहरें उठने लगीं और उन्हीं के साथ वह नदी पर पड़े-खिले फूल की तरह बह चला, अपने सौन्दर्य-बल से विजय प्राप्त करने की लालसा से।

हिरण्याक्ष की जवानी भादों की नदी की तरह भरी पूरी थी, अथाह थी। देखनेवालों की आँखों को उसे बार-बार देखकर भी तृप्ति नहीं होती थी।
और कभी-कभी उनमें आतंक भी छा जाता था। वह विशाल देह, विपुल बल, सुसंगठित भुजाएँ और गर्व से ऊँची गर्दन देखकर लोगों को कभी-कभी शंका भी हुआ करती थी। हिरण्यकशिपु की जवानी की वर्षा की पहली बाढ़ थी, बढ़ती हुई भी बढ़ने को उतावली। जब हिरण्यकशिपु अपनी रक्षा, आप कर लेने में समर्थ हो गया, जब हिरण्याक्ष को छोटे भाई के बल-वीर्य और रणकुशलता पर पूरा विश्वास हो गया, तब उसने अपनी चिरकाल का आशा-लता को सींचकर पल्लवित, कुसुमित, और फलित करने का इरादा पक्का कर लिया।



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