संघर्ष की ओर - नरेन्द्र कोहली Sangharsh Ki Or - Hindi book by - Narendra Kohli
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संघर्ष की ओर

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :376
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2866
आईएसबीएन :81-8143-189-8

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राम की कथा पर आधारित श्रेष्ठ उपन्यास...

Sangharsh Ki Or

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दीक्षा’, ‘अवसर’, संघर्ष की ओर’ तथा ‘युद्ध’ के अनेक सजिल्द, अजिल्द तथा पॉकेटबुक संस्करण प्रकाशित होकर अपनी महत्ता एवं लोकप्रियता प्रमाणित कर चुके हैं। महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में इसका धारावाहिक प्रकाशन हुआ है। उड़िया, कन्नड़, मलयालम, नेपाली मराठी तथा अंग्रेजी में इसके विभिन्न खण्डो के अनुवाद प्रकाशित होकर प्रशंसा पा चुके हैं। इसके विभिन्न प्रसंगों के नाट्य रूपान्तर मंच पर अपनी क्षमता प्रदर्शित कर चुके हैं तथा परम्परागत रामलीला मण्डलियाँ इसकी ओर आकृष्ट हो रही हैं। यह प्राचीनता तथा नवीनता का अद्भुत संगम है।

इसे पढ़कर आप अनुभव करेंगे कि आप पहली बार ऐसी रामकथा पढ़ रहे हैं जो सामयिक, लौकिक, तर्कसंगत तथा प्रासंगिक है। यह किसी अपरिचित और अद्भुत देश तथा काल की कथा नहीं है। यह इसी लोक और काल की, आपके जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर केन्द्रित एक ऐसी कथा है, जो सर्वकालिक और शाश्वत है और प्रत्येक युग के व्यक्ति का इसके साथ पूर्ण तादाम्य होता है।

संघर्ष की ओर
प्रथम खण्ड
1


‘‘ऋषि को आपकी बहुत प्रतीक्षा थी, भद्र !’’
राम की कल्पना में प्रातः देखा दृश्य पुनः साकार हो उठा। कुलपति की कुटिया के सम्मुख चबूतरे पर धू-धू जलती हुई चिता। ऊँची-से-ऊँची जलती हुई लपटों के बीच खड़े ऋषि शरभंग। नयन मूँदे, हाथ, जोड़े-इस प्रकार शांत मुद्रा में खड़े थे मानों जल में खड़े सूर्य का ध्यान कर रहे हों। शरीर अग्नि से ऐसे एकाकार हो गया था जैसे आग की लपटें उन्हें बाहर से न घेरे हों- उनके शरीर से निकलकर बाहर पड़ी लकड़ियों को जला रही हों।
राम की मंडली के आने से चिता को चारों ओर से घेरकर खड़े जल समुदाय में थोड़ी हलचल हुई थी....ऋषि का ध्यान जैसे भंग हो गया था। उनकी आखें निमिष-भर के लिए खुलीं। उन्होंने राम को पहचाना, मानों चलने के लिए पग उठाया, कुछ कहने को होंठ फैले ...किंतु तभी अचेत होकर गिर पड़े। न आँखें खुली रह सकी और होंठ से स्वर निकला और न पग ही आगे बढ़ सका।

राम का अपना ही मन अपने देखे पर संदेह कर रहा था। सूखे काठ के समान धू-धू जलता हुआ, मनुष्य का शरीर क्या किसी को देख कर पहचान सकता है; किसी को कुछ कहने का संकल्प कर सकता है ?... राम ने उसे अपना भ्रम माना था; किन्तु अब सामने बैठे मुनि ज्ञानश्रेष्ठ कह रहे हैं कि ऋषि को राम की प्रतीक्षा थी।
हतप्रभ-से राम चिता के कुछ दूर खड़े हो गये थे। ऋषि का अचेत, या कदाचित् मृत शरीर सूखे ईधन के समान जल रहा था।...ऋषि को बचाया नहीं जा सकता चिता में से जीवित अथवा मृत शरीर को खींच लेने का अब कोई लाभ नहीं था।
राम की आँखों में अश्रु आ गए थे। मनुष्य इतना भी असहाय हो उठता है कि अपने जीवित, अनुभूतिप्रवण शरीर को निर्जीव पदार्थ के समान अग्नि में झोंक दे। मन का ताप इतना तीव्र और असहाय हो उठता है कि जलता हुआ तन भी उसकी तुलना में शीतल लगने लगे।...और कोई राम-सा भी सक्षम नहीं हो सकता कि सामने चिता में शरभंग जल रहे हों और राम का हाथ उन तक न पहुँच पाए ।

उन्होंने डबडबाई आँखों से अपने आस-पास देखा था- सीता, लक्ष्मण, मुखर तथा उनके साथ आए अत्रि ऋषि के शिष्य-शस्त्राकार से लदे हुए उनके आस-पास आ खड़े हुए थे। सबकी दृष्टि चिता में जलते हुए ऋषि के शव पर भी चेहरों पर अवसाद निराशा तथा वितृष्णा के भाव घिर आए थे। आश्रमवासियों के स्थिति उन लोगों से तनिक भी भिन्न नहीं थी।
‘‘ऋषि ने प्रतीक्षा क्यों नहीं की ?’’
ज्ञानश्रेष्ठ चुपचाप राम को देखते रहे, जैसे कुछ सोच रहे हों। फिर धीरे स्वर में बोले, ‘‘ठीक-ठीक बता पाना कठिन है। कुछ-कुछ अनुमान किया जा सकता है।’’

‘‘कोई विशेष घटना घटी थी क्या ?’’ ज्ञान श्रेष्ठ को मौन हुए विलम्ब हो गया तो राम ने पूछा।
ज्ञानश्रेष्ठ धीरे-धीरे अपनी बोझिल आँखें ऊपर उठाई और राम के चेहरे पर टिका दीं’’ यहाँ तो कुछ-न-कुछ ऐसा घटता रहता है कि व्यक्ति आत्मदाह कर बैठे। यह तो कुलपति का ही साहस था कि आज तक टिक रहे शरीर का दाह तो उन्होंने आज किया, मन जाने कितनी बार दग्ध हुआ होगा।’’

‘‘फिर भी कुछ आभास तो आपको होगा।’’ लक्ष्मण अपने स्थान से कुछ आगे बढ़ आए।
‘‘मेरा ऐसा अनुमान है कि इसका सम्बन्ध खान श्रमिकों की बस्ती से अवश्य है।’’
ज्ञानश्रेष्ठ ने सहसा अपनी आत्म-तल्लीनता को त्याग दिया, ‘‘ऋषि के पास पिछले दिनों कुछ खान-श्रमिक आए थे। ऋषि ने उनकी बातें सर्वथा एकान्त में सुनी थीं। किंतु उसके पश्चात वे कई बार उनकी बस्तियों में गए थे। वे लोग भी बहुधा उनके पास आने लगे थे। लगता था, श्रमिकों ऋषि पर बहुत विश्वास करने लगे थे। उनसे सारी बातें एकांत में ही होती थीं, और उनके जाने के पश्चात् ऋषि बहुधा चिंतित हो जाया करते थे। उन्हें नींद नहीं आती थी और वे अपनी कुटिया के सामने के चबूतरे पर बैठकर आधी-आधी रात आकाश को घूरा करते थे। या फिर उत्तेजना की स्थिति में उसी चबूतरे की परिक्रमा किया करते थे।....और भद्र राम ! उसी अवधि में उन्होंने आपकी याद किया।’’
‘‘किस संगर्भ में ?’’ राम अनुमान लगाने का प्रयत्न कर रहे थे।

‘‘उन दिनो आपकी योजनाओं में उनकी रुचि बहुत बढ़ गई थी।’’ ज्ञानश्रेष्ठ बोले, ‘‘आप कहाँ है ? क्या कर रहे हैं ? आप लोगों को संगठित कैसे जुटा करते हैं उन्हें शस्त्रों की शिक्षा कैसे देते हैं आप साहसी लोगों को कैसे जुटा लेते हैं ? आपका शस्त्र बल और अस्त्र कौशल किस कोटि का है ?.....इत्यादि। मुझे स्वयं बड़ा आश्चर्य है कि वे अपनी तपस्या अथवा आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा न कर, शस्त्रों तथा युद्ध की बातों में क्यों रुचि लेने थे।’’
राम चुपचाप ज्ञानश्रेष्ठ की ओर देखते रहे।
‘‘तीन दिन पहले सहसा यहाँ स्वयं देवराज इन्द्र पधारे...’’
राम, लक्ष्मण, सीता और मुखर की दृष्टियाँ परस्पर टकराईं।

ज्ञानश्रेष्ठ ने अपनी बात आगे बढ़ाई, ‘‘ऋषि इतने प्रसन्न हुए जैसे उन्हें मोक्ष ही मिल गया हो। आश्रम में किसी अतिथि के आगमन पर ऐसा उत्साह-प्रदर्शन असाधारण था। इस आश्रम में वैसा स्वागत तथा सम्मान आज तक किसी अतिथि का नहीं हुआ। देवराज ने भी ऋषि से एकांन्त में बात करने की इच्छा प्रकट की। रात के भोजन के पश्चात ऋषि बड़ी प्रसन्न मुद्रा में देवराज के साथ अपने कुटीर में गए।....हमें कुटीर के निकट जाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए हममें से कोई भी नहीं जानता कि उनमें परस्पर क्या वार्तालाप हुआ। किंतु इतना स्पष्ट है कि वार्तालाप सुखद नहीं था। प्रातः बहुत तड़के ही देवराज बहुत जल्दी में प्रस्थान कर गए और ऋषि असाधारण मौन साधे उन्हें गंभीर कहूँ चिंतित कहूँ उदार कहूं या विक्षिप्त कहूँ...समझ नहीं पा रहा हूँ। वे तो ऐसे हो रहे थे, जैसे जीवन का आधार ही टूट गया हो। वे चिन्तन करते रहे, अपने कुटीर में, अथवा उसके सामने इधर-उधर टहलते रहे। कभी हममें से किसी से बात कर लेते, कभी स्वयं ही वाचिका चिंतित करने लगते ।....इस सारी अवधि में मै उनके पर्याप्त निकट रहा। मैंने उन्हें अनेक बार विविध प्रकार की बातें करते सुना हैं। वे जैसे निरंतर लड़ रहे थे। कभी स्वयं अपने आपसे लड़ते प्रतीत होते, कभी अपने अनुपस्थित शत्रुओं से। मेरा अनुमान है कि कभी-कभी वे स्वयं देवराज से झगड़ रहे होते थे।

....उस दिन और अगली रात ऋषि इसी प्रकार सोचते रहे, बोलते रहे और विक्षिप्तावस्था की ओर बढ़ते रहे। उन्हें सत्य पर, न्याय पर, समता पर, मानवता पर संदेह होने लगा था....यहाँ तक कि उनका स्वयं अपने ऊपर से विश्वास उठ गया था। अपनी इसी विक्षिप्तावस्था में, रात्रि के अंतिम प्रहर तक उन्होंने आत्मदाह का निश्चय कर डाला। उनका विचार था कि उनके शरीर से अब कोई सार्थक कार्य नहीं होगा। उन्होंने गलत व्यक्तियों के प्रति भरोसा जगाया है- इसका दण्ड भी उन्हें मिलना ही चाहिए; और अंततः इस क्षेत्र में होने वाले अत्याचार और अन्याय के प्रति जन-सामान्य को जागरुक बनाने के लिए उनको आत्मदाह करना ही होगा।’’
‘‘मुनिवर !’’ स्थिर दृष्टि से ज्ञानश्रेष्ठ को देखते हुए गंभीर स्वर में राम बोले, ‘‘अपनी विक्षिप्तावस्था में ऋषि कैसा वाचित चिंतित करते रहे, इसका कुछ आभास दे सकेंगे ?’’
ज्ञानश्रेष्ठ अपना मुख ऊपर उठाए, भावहीन खुली आँखों से शून्य में देखते कुछ सोचते रहे।
‘‘शब्द न भी बता सकें।’’ राम पुनः बोले, ‘‘उनका भाव...’’

‘‘कुछ आभास तो दे ही सकूँगा।’’ ज्ञानश्रेष्ठ स्मरण करने की-सी मुद्रा में बोले, ‘‘वे कह रहे थे- न्याय का क्या होगा....धनवान और सत्तावान तो पहले ही रक्त पान कर रहा है। बुद्धिजीवी भी उन्हीं के षड़यन्त्र में सम्मिलित हो जाएगा तो फिर दुर्बल और असहाय मानवता का क्या होगा ? ये कर्मकर ये श्रमिक, ये दास-ये इसी प्रकार मरते-खपते रहेंगे, पशुओं के समान जीवन काटेंगे ? मानव की श्रेणी में ये कभी नहीं आएंगे ? कभी..नहीं। शायद कोई नहीं चाहता, ये मनुष्यों का जीवन जीएँ। रावण बुद्धिजीवियों को खा जाता है, इंद्र उन्हें खरीद लेता है तो कौन आएगा अपनी सहायता को ? कोई भी नहीं.... राम ! क्या राम ! पर यदि राम भी नहीं आया तो ? वह भी तो राजकुमार है...’’
सबकी आँखें राम पर टिक गईं।

राम का चेहरा अत्यंत गंभीर था। और आँखों का दृढ़ संकल्प देखने वाले को हिला देने की क्षमता रखता था।
ज्ञानश्रेष्ठ ने राम को देखा तो उनकी दृष्टि टिकी न रह सकी। घबराकर उन्होंने अपनी आँखें हटा ली और भूमि को देखते हुए बोले, ‘‘कभी ऋषि कहते ‘यही संसार का सर्वश्रेष्ठ आदर्श है। श्रमिक बहुमूल्य संपत्ति हैं। अतः उनको लूट लो। तुम महान रक्षक हो श्रमिकों की रक्षा करते हो; चूहे बिल्ली का खेल है, खिलाड़ी तुम अच्छे हो।... मनुष्य है, श्रीमान्। वह उपकरण नहीं है। तुमने अपना हित पहचान लिया है, तुम बुद्धिमान हो। मैं तो मूर्ख हूँ, न्याय की बात सोचता हूँ सुविधाओं की बात नहीं करता।... तुम्हारी परिभाषा ठीक है, भाई बुद्धि वह जो स्वार्थ साधे। अर्थात धन, धनार्जन के लिए धूर्तता चाहिए।
जागृत विवेक का अपना शत्रु है। ठीक है।....’’ ज्ञानश्रेष्ठ ने रुककर फिर एक बार राम को देखा और बोले, ‘‘एक बार तो उन्हें मैंने बड़े आवेश में कहते सुना, ‘‘...रुको। अब भाग क्यों रहे हो ! स्वयं को बहुत समर्थ मानते हो तो राम के आने तक रुको। राम ने चौककर ज्ञानश्रेष्ठ को देखा।

ज्ञानश्रेष्ठ भी राम को ही देख रहे थे, ‘‘वे क्यों कह रहे थे, राम ?’’
राम ने तत्काल उत्तर नहीं दिया। वे मौन रहे, जैसे स्वयं को संतुलित कर रहे हों।
‘‘यह चुनौती इन्द्र के लिए रही होगी।’’ लक्ष्मण बोले।
सहसा राम की कल्पना में पुनः वही बिम्ब जागा। सूखे काठ-सा जलता शरीर, आँखों में उतरी वह निमिष-भर की पहचान, उठता हुआ पग और खुलते हुए होंठ।
राम की आँखें डबडबा आईं।

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