वे अंधेरे दिन - तसलीमा नसरीन Ve Andhere Din - Hindi book by - Taslima Nasrin
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वे अंधेरे दिन

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :465
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2891
आईएसबीएन :81-8143-165-0

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तसलीमा नसरीन पर आधारित आत्मकथा का वर्णन...

Ve andhere din

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘चाहे जो हो जाए, जब तक मैं जिन्दा हूँ बिना कोई समझौता किए बराबरी और इंसाफ के लिए लड़ती रहूँगी।

तसलीमा

‘‘इस किताब को पढ़कर ‘मेरे बचपन के दिन’ (मैक्सिम गोर्की) और ‘मेरा भाई’ की याद आती है। इसकी शैली तो उन किताबों की तरह नहीं है, लेकिन तसलीमा नसरीन की कहानी में वैसी ही गहराई और विस्तार है।’’

मातिमा हुसैन, ‘‘माई गर्लहुड’’ के बारे में

‘‘जो लोग यह समझते हैं कि वे तसलीमा नसरीन का मूल्यांकन कर रहे हैं, उन सबकी राय में वह एक अच्छी लड़की नहीं हैं। वह उन खास चीजों के बारे में बड़ी बेबाकी और तटस्थ रहकर लिखती हैं।’’

रिमी बी. चटर्जी

भारत एक गणतंत्र है लेकिन यहाँ भी विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। ‘द्विखंडित’ उन्होंने लिखी अवश्य है लेकिन वह उनका विषय नहीं रह गया। यह विषय पाठक का होता है।
वह नारी की स्वाधीनता का सम्मान करती है, वह हमेशा पुरुष पाखण्ड पर लिखती है और लिखती रहेगी।
उनकी लेखनी किससे प्रेरित है उनका वक्तव्य-आज जो अत्याचार महिलाओं पर हो रहा है उसी से प्रेरित होकर लिखती हूँ

इन्सान के धार्मिक अहसासों को ठेस लगती है,
यह वजह बताकर, तसलीमा नसरीन की आत्मकथा का
पहला और दूसरा खंड, बांग्लादेश सरकार ने निषिद्ध कर
दिया। बिल्कुल यही वजह दिखाकर पश्चिमी बंगाल सरकार
ने उनकी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘द्विखांडित’ पर पाबंदी
लगा दी। बांग्लादेश और पश्चिमी बंगाल में इन किताबों के खिलाफ (पश्चिम बंगाल में, ‘द्विखंडित’ और बांग्लादेश में ‘क’) कुल इक्कीस करोड़ रुपयों का मुकदमा दायर किया गया है। दोनों ही बंगाल की अदालतों ने इन किताबों की बिक्री पर रोक लगा दी है। बंगला साहित्य के इतिहास में पहली बार किसी लेखक। लेखिका के हाथों से कलम छीन लेने के लिए बौखला उठे हैं, समाज के लगभग सभी गुटवादी लोग, कटट्ररवादी समुदाय गैर-कट्टरवादी समुदाय, अपने-अपने स्वार्थों से जुड़े लेखक, कलाकार, राजनीति-विशेषज्ञ, यहाँ तक कि तथाकथित
गणतांत्रिक सरकार !
‘वे अंधेरे दिन’ तसलीमा के उन दिनों की कहानी है, जब उन्हें अपने ही देश में दीर्घ दो महीनों तक अंधेरे में छिपकर रहना पड़ा था। यह किताब मूलतः तथ्यों पर आधारित है। बांग्लादेश में प्रकाशित, ‘आजकेर कागज’ ‘भोरेर कागज़’ ‘इत्तेफाक’ ‘संवाद’, ‘बांग्ला बाजार’ ‘इन्कलाब’ ‘दिनकाल’ ‘संग्राम’ ‘मिल्लत’-वगैरह दैनिक अखबारों से, वहाँ की खबरें संग्रहीत की गई हैं।

जिनकी मैं आजीवन कृतज्ञ हूँ

शिवनारायण राय
अहमद शरीफ़
कलीम शराफ़ी
खान सरवर मुर्शिद
कबीर चौधुरी
शम्सुर रहमान
निखिल सरकार
के.एम.सुभान
डॉ. कमाल हुसेन
हमीदा हुसेन
रुकैय्या कबीर
सुलताना जमाना
रूबी रहमान
शमीम सिकदार
सारा हुसेन
शहीदुल आलम
फिरदौसी प्रियभाषिणी

प्रकाशक की बात


इंसान की धार्मिक भावनाओं को चोट लग सकती है, यह वजह दिखाकर तसलीमा नसरीन की ‘मेरे बचपन के दिन’ और ‘उत्ताल हवा’-प्रथम और द्वितीय खण्ड, बांग्लादेश सरकार ने ज़ब्त कर लिया। यही वास्ता देकर, पश्चिम बंगाल सरकार ने उनकी आत्मकथा का तृतीय खण्ड-द्विखंडित पर पाबन्दी लगा दी। (पश्चिम बंगाल में ‘द्विखंडित’ बाग्लादेश में ‘क’) के खिलाफ़ कुल इक्कीस करोड़ रुपयों का मुकदमा दायर किया गया हैं और दोनों बंगाल की अदालत ने इस किताब की ब्रिक्री पर रोक लगा दी है। साहित्य के इतिहास में पहली बार किसी लेखक से कलम छीन लेने के लिए समाज के लगभग सभी स्तर के लोग, कट्टरवादी समुदाय, गैर-कट्टरवादी इन्सान, लेखक, कलाकार, राजनीतिविशेषज्ञ, यहाँ तक कि तथाकथित गणतांत्रिक सरकार भी बौखला उठी है।

‘अंधेरे वे दिन....’ तसलीमा के उन अँधेरे दिनों की कथा बयान करते हैं जब उन्हें दीर्घ दो महीने, घुप्प अँधियारे में आत्मगोपन करके रहना पड़ा, वह भी अपने देश में। यह उपन्यास मूलतः तथ्यपरक हैं। बांग्लादेश में प्रकाशित ‘आजकेर कागज’ ‘भोरेर कागज’ ‘इत्तफाक’ संवाद’ ‘बांग्ला बाजार’ ‘इन्क़लाब’ ‘दिनकाल’ ‘संग्राम’ वगैरह दैनिक अखबारों से उन दिनों की ख़बरों से ली गई हैं।

पैरिस की डायरी


जिस गान्जालेज फारेस्टर जिस दिन मेरे घर आया, उस दिन आस्ट्रेलिया कप का खेल चल रहा था ! भारत और पाकिस्तान खेल रहे थे; मैंने जिल को सोफे पर बैठ जाने का इशारा किया; मेरी तरह वह भी खेल देखने में दत्तचित्त हो गया; खेल देखते हुए, पूरा एक घंटा गुजर गया। पूरे घंटे भर मैंने जिल से किसी किस्म की बातचीत नहीं की, क्योंकि मैं निश्चत तौर पर जानती थी कि खेल के बीच में बातचीत करने से लड़कों को झुँझलाहट होती है; हमारे घर में यही नियम हैं; बाकी और किसी समय परेशान करना चाहो, तो करो, मगर लेकिन खेल देखते वक्त नहीं। खासकर क्रिकेट के खेल के समय हरगिज नहीं, उस पर से खासतौर पर ऐसे समय, जब खेल भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा हो। जड़ेजा जीरो पर ही विदा हो गया। सचिन भी बाइस या तेइस बनाकर, पैवीलियन में लौट गया। अजहर तीन में ही फिस्स !

धत्तेरे की ! कहकर, मैंने खेल से नजरें हटा लीं और जिल से यह दरयाफ़्त किया कि वह किस टीम का समर्थक है।
मेरा सवाल सुनकर, सहमी निगाहों से मेरी सूरत निहारते हुए, उसने सवाल किया, ‘‘इस खेल का नाम क्या है ?’
‘‘खेल का नाम ? मतलब तुम नहीं जानते कि यह कौन-सा खेल हैं ?’’ मैं सच ही आसमान से गिरी !
जिल ने इन्कार की मुद्रा में सिर हिलाया; वह नहीं जानता। उस खेल का सिर-पैर, उसे कुछ समझ में भी नहीं आया।
क्या कहता है यह छोकरा ? यूरोप का लड़का इंग्लैंड के करीबवाले देश में उसका शहर ! यही लड़का पूछता है कि क्रिकेट क्या बला है ? किस खेल को क्रिकेट कहते हैं ? यह सब कुछ भी नहीं जानता ! क्रिकेट का खेल जिल ने अपने बाप के ज़माने में भी नहीं देखा। दुनि़या में क्रिकेट नामक कोई खेल भी होता है उसने तो कभी यह भी नहीं सुना। हाँ कभी, कहीं, एक बार यह ज़रूर सुना था कि अंग्रेज कोई एक खेल खेलते हैं, जिस खेल में अधिकांश खिलाड़ी, मैदान में भूत की तरह खड़े रहते हैं सिर्फ एक-दो खिलाड़ी ही दौड़ते-भागते है; उसी विकट खेल का नाम ही क्रिकेट है, यह जानकारी उसने आज की पोर-पोर उपलब्ध की।

‘‘लेकिन तुम तो पूरे एक घण्टे तक यह खेल मन्त्रमुग्ध होकर देखते रहे.....।’’
‘‘हाँ, देखता रहा ! और क्या करता ‍? तुम तो कोई बात ही नहीं कर रही थीं ! तुम व्यस्त जो थीं-’’
‘‘हाय रे अदा ....!’’
मैं तो यह सोच रही थी कि मुझसे ज्यादा जिल ही इस खेल का मज़ा ले रहा है। बरहाल, जब बातचीत का वक्त आया, तो उसके जाने का भी वक्त आ पहुँचा। वह कुछेक घण्टों का ही वक्त लेकर आया था। उसने बताया की वह कल ही मुझे फ्रेंच दूतावास में ले जाएगा। बीसा के लिए इस दूतावास में, मैं पहले भी जा चुकी थी। मुझे गए रिपोर्टस सां फ्रंटियर्स और आर्ते टेलीविजन का आमंत्रण देखकर भी दूतावास के लोगों ने सख्त लहजे में मना कर दिया कि इन सब आमंत्रण से काम नहीं चलेगा वीसा नहीं मिलेगा। क्यों नहीं दिया जाएगा, यह खबर पाकर रिपोर्टस सां फ्रंटियर्स के लोगों ने पैरिस से जिल को भेज दिया।

ढाका आकर वह मेरे लिए वीसा का इन्तजाम करें और मुझे सुरक्षित सही- सलामत साथ लेकर, पैरिस पहुँचे।
अगले दिन जिल मुझे दूतावास ले गया और उसने मुझे वीसा भी दिला दिया। दूतावास ने दो वीसा देने से बिल्कुल मना कर दिया था, वही अब कितने शानदार तरीके से मुझे थमा दिया। जिस चीज के बारे में मुझे बखूबी जानकारी होती है कि ऐसा नहीं होगा, वहीं चीज जाने किन-किन कारणों से, कभी-कभी संभव भी हो जाती है। ढाका से थाइ एयरलाइन्स से बैंकाक ! वहाँ से एयरफ्रांस से पैरिस ! जो मेरा पासपोर्ट नहीं था, वही मेरा पासर्पोट बन गया !

दुर्लभ पासपोर्ट और दुर्लभ वीसा भी जुट गया। मुझे अपना पार्सपोर्ट कभी भी वापस नहीं मिलता। अगर विदेशों के मानवाधिकार संगठन, अपनी-अपनी सरकारों पर, मेरा पार्सपोर्ट वापस पाने की उम्मीद, मैंने लगभग छोड़ ही दी थी। लेकिन अगर अमेरिका टाँग अड़ाएँ, तो हुक्म भले हिल जाए, हाकिम टस से मस नहीं होता, यह कहावत शायद अचल हो जाती। मुझे पूरा-पूरा विश्वास है कि इस असंभव को संभव करने के पीछे लेखक संगठन ‘पेन’ की भूमिका रही है। ‘पेन’ अगर पिनपिन न करता, तो अमेरिका सरकार कभी सजग नहीं होता। फतवे की खबर, मुल्लाओं के आन्दोलन की ख़बर तो खैर, उन्हें थी ही, न्यूयार्क टाइम्स में लिखे हुए, मेरे उप-सम्पादकीय ने भी अमेरिकी सरकार को मेरे लिए कोशिश करने में शायद, मेरे पासपोर्ट का इन्तजाम करते ? इस देश में जाने कितने ही लोगों के प्रति अन्याय हो रहा है; कितने ही बेकसूर झूठमूठ ही जेलों में सड़ रहे हैं,



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