माटी कहे कुम्हार से - हरिशंकर परसाई Mati Kahe Kumhar Se - Hindi book by - Harishankar Parsai
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हास्य-व्यंग्य >> माटी कहे कुम्हार से

माटी कहे कुम्हार से

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2902
आईएसबीएन :9788170556756

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हरिशंकर परसाई का हास्य-व्यंग्य...

Mati kahe kumhar se

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

परसाई एक खतरनाक लेखक हैं, खतरनाक इस अर्थ में कि उन्हें पढकर हम ठीक वैसे ही नहीं रह जाते जैसे उनको पढ़ने के लिए होते हैं। वे पिछले तीस वर्षों के हमारे राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन के यथार्थ के इतिहासकार हैं। स्वतंत्रता के बाद हमारे जीवन मूल्यों के विघटन का इतिहास जब भी लिखा जायेगा तो परसाई का साहित्य संदर्भ-सामग्री का काम करेगा। उन्होंने अपने लिए व्यंग्य की विद्या चुनी, क्योंकि वे जानते हैं कि समसामयिक जीवन की व्याख्या, उसका विश्लेषण और उसकी भर्त्सना एवं विडंबना के लिए व्यंग्य से बड़ा कारगार हथियार और दूसरा नहीं हो सकता।

व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी तत्कालिकता और संदर्भो से उसका लगाव है। जो आलोचक शाश्वत साहित्य की बात करते हैं उनकी दृष्टि में व्यंग्य पत्रकारिता के दर्जे की वस्तु मान लिया जाता है। और उन्हें लगता है कि साहित्यकार व्यंग्य का उपयोग चटखारेबाजी के लिए भले ही कर ले, किसी गम्भीर लक्ष्य के लिए उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। ऐसे विचारकों ने साहित्य के लिए जो आदर्श स्वीकृत कर रखे हैं व्यंग्य उनकी धज्जियाँ उड़ाता है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि व्यंग्य लेखक ऐसे मर्यादावादियों की दृष्टि में हल्का लेखक, सड़क छाप लेखक या फनी लेखक होता है। व्यंग्य को साहित्य की ‘शेड्यूल्ड-कास्ट’ विद्या मान लिया गया है, पर कबीर को भी इन मर्यादावादी विचारकों ने कवि मानने से परहेज करना चाहा था।

 

लेखक का निवेदन

हिन्दी ‘करंट’ की पहली सालगिरह पर ‘माटी कहे कुम्हार से’ का संग्रह पुस्तकाकार में प्रकाशित हो रहा है।
एक साल पहले जब ‘करंट’ का हिन्दी संस्करण शुरू हुआ था, तब लेखकों को दो जातियों में बांट दिया गया था। जनता पार्टी और सरकार के अंधे समर्थकों ने अपने को ‘ब्राह्मण’ और मुझ जैसे कई इनसे असहमत लेखकों को ‘चांडाल’ करार दे दिया गया था। अब इन ‘ब्राह्मण’ क्रांतिकारियों की गत देखकर पहले हंसी आती है और फिर दया। ऐसा है जैसे चंदन-छाप लगाये पंडितजी रंडी के यहां पकड़े गए हों। हम जानते हैं, इन्होंने इंदिरागांधी के घटिया से घटिया चमचों की कितनी बेशर्मी से चापलूसी की थी। सत्ता पलटते ही, वे पलट गये। उनका अवसरवाद क्रांति कर्म हो गया। दूसरों के बुद्धि-विवेक, कायरता और बेईमानी कहे जाने लगे। उनकी कायरता नैतिकता हो गई।

लाजमी था कि घोर प्रक्रियावादी और फासिस्टी ताकतें सत्ता में आ गईं थीं, उनकी देशघाती नीतियों और कार्यों का डटकर विरोध किया जाये। ये जो सत्ता में आ गये हैं, वे एकाएक स्वर्ग से 1977 में नहीं टपके थे। हम पचीसों सालों से इन्हें और इनके राजनैतिक चरित्र को जानते थे। यह सत्ता भारतीय प्रेस से समर्पण करवा रही थी। प्रधान मंत्री का दावा झूठा है कि प्रेस स्वतंत्र है। अभिव्यक्ति के माध्यम से स्वतंत्र हैं। यह सरासर गलत है। 1974 तक प्रेस को जो स्वतंत्रता थी, उससे बहुत कम अब है। मैंने 1975 तक कांग्रेस और उसकी सरकार की कटुतम आलोचना की है। हजारों छपे हुए पन्ने सबूत हैं। पर अब इन नये सत्ताधारियों की आलोचना करता हूं, तो इनके तेवर अलोकतांत्रिक होते हैं।

ऐसी हालत में जरूरत थी, ऐसे पत्रों की जिनमें स्वतंत्रता से लिखा जा सके। देश और लोकघाती शक्तियों का सही रूप जनता के सामने रखा जा सके। हिन्दी ‘करंट’ ने इस बड़ी जरूरत को पूरा किया। श्री अयूब मेरे पुराने मित्र हैं। असल में ये और मैं मध्य प्रदेश में एक ही भूमि के ‘रतन’ (?) हैं। भाई महावीर अधिकारी से पचीसेक साल के स्नेह और विश्वास के सम्बन्ध हैं। इन दोनों बंधुओं ने अधिकारपूर्वक खुद ही स्तंभ का नाम तय कर दिया और घोषणा भी कर दी। मुझे भी अखाड़े की जरूरत थी। तो ‘माटी कहे कुम्हार से’ स्तम्भ शुरू हो गया।
मुझे जो पूरी स्वतंत्रता लिखने की दोनों संपादकों ने दी है, उसके लिए मैं बहुत आभारी हूँ। इस स्वतंत्रता के बिना मन से लिखना सम्भव नहीं।

इस स्तंभ के छपने के बाद जो घोर गाली की चिट्ठियां मुझे आने लगीं उनसे मैं आश्वस्त हो गया कि लेखन सफल हो रहा है। ऐसे पत्र संपादकों को भी बहुत मिलते हैं। यह भी कि समर्थन में भी बहुत पत्र मिलते हैं।
इस लेखन के बारे में मुझे गलतफहमी नहीं है। अनुभव ने सिखाया है कि लेखक का अहंकार व्यर्थ है। हम कोई युग प्रवर्तक नहीं हैं। हम छोटे-छोटे लोग हैं। हमारे प्रयास छोटे-छोटे हैं। हम कुल इतना कह सकते हैं कि जिस देश, समाज और विश्व के हम हैं और जिनसे हमारा सरोकार है, उनके उस संघर्ष में भागीदार हों, जिससे बेहतकर व्यवस्था और इंसान पैदा हो।
पाठक के हाथों इस संग्रह को इस आश्वासन के साथ सौंपता हूं कि बुद्धि और विवेक ने जो कहा, वही लिखा है, डर और लोभ से कुछ भी नहीं लिखा गया।

 

अपील का जादू

 

 

एक देश है ! गणतंत्र है ! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूंक, टोना-टोटका से हल किया जाता है ! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-कांटे में कुछ गड़बड़ आ गयी है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतंत्र ठीक चलने लगता है।
सारी समस्याएं मुहावरों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया—हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई !

एक दिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के पास यह शिकायत करने गये कि चीजों की कीमतें बहुत बढ़ गयी हैं। प्रधानमंत्री उस समय गाय के गोबर से कुछ प्रयोग कर रहे थे, वे स्वमूत्र और गाय के गोबर से देश की समस्याओं को हल करने में लगे थे।
उन्होंने लोगों की बात सुनी, चिढ़कर कहा—आप लोगों को कीमतों की पड़ी है ! देख नहीं रहे हो, मैं कितने बड़े काम में लगा हूँ। मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूं। जैसे गोबर गैस ‘वैसे गोबर नैतिकता’। इस नैतिकता के प्रकट होते ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। तीस साल के कांग्रेसी शासन ने देश की नैतिकता खत्म कर दी है।
एक मुंहफट आदमी ने कहा—इन तीस में से बाइस साल आप भी कांग्रेस के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहे हैं, तो तीन-चौथाई नैतिकता तो आपने ही खत्म की होगी !
प्रधान मन्त्री ने गुस्से से कहा-बको मत, तुम कीमतें घटवाने आए हो न ! मैं व्यापारियों से अपील कर दूंगा।
एक ने कहा—साहब, कुछ प्रशासकीय कदम नहीं उठायेंगे ?
दूसरे ने कहा-साहब, कुछ अर्थशास्त्र के भी नियम होते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा—मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में, यह गांधी का देश है,, यहां हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं अपील से उनके दिलों में लोभ की जगह त्याग फिट कर दूंगा। मैं सर्जरी भी जानता हूं।
रेडियो से प्रधानमंत्री ने व्यापारियों से अपील कर दी-व्यापारियों को नैतिकता का पालन करना चाहिए। उन्हें अपने हृदय में मानवीयता को जगाना चाहिए। इस देश में बहुत गरीब लोग हैं। उन पर दया करनी चाहिए।
अपील से जादू हो गया।
दूसरे दिन शहर के बड़े बाजार में बड़े-बड़े बैनर लगे थे-
व्यापारी नैतिकता का पालन करेंगे। मानवता हमारा सिद्धांत है। कीमतें एकदम घटा दी गयी हैं।
जगह-जगह व्यापारी नारे लगा रहे थे-नैतिकता ! मानवीयता ! वे इतने जोर से और आक्रामक ढंग से ये नारे लगा रहे थे कि लगता था, चिल्ला रहे हैं-हरामजादे ! सूअर के बच्चे !

गल्ले की दुकान पर तख्ती लगी थी—गेहूं सौ रुपये क्विंटल ! ग्राहक ने आंखें मल, फिर पढ़ा। फिर आंखें मलीं फिर पढ़ा। वह आंखें मलता जाता। उसकी आंखें सूज गयीं, तब उसे भरोसा हुआ कि यही लिखा है।
उसने दुकानदार से कहा—क्या गेहूं सौ रुपये क्विंटल कर दिया ? परसों तक दो सौ रुपये था।
सेठ ने कहा—हां, अब सौ रुपये के भाव देंगे।
ग्राहक ने कहा—ऐसा गजब मत कीजिए। आपके बच्चे भूखे मर जाएँगे।
सेठ ने कहा—चाहे जो हो जाये, मैं अपना और परिवार का बलिदान कर दूंगा, पर कीमत नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता का तकाजा है।

ग्राहक गिड़गिड़ाने लगा—सेठजी, मेरी लाज रख लो। दो सौ पर ही दो। मैं पत्नी से दो सौ के हिसाब से लेकर आया हूं, सौ के भाव से ले जाऊंगा, तो वह समझेगी कि मैंने पैसे उड़ा दिये और गेहूं चुरा कर लाया हूं।
सेठ ने कहा—मैं किसी भी तरह सौ से ऊपर नहीं बढ़ाऊंगा। लेना हो तो लो, वरना भूखों मरो।
दूसरा ग्राहक आया। वह अक्खड़ था। उसने कहा—ऐ सेठ, यह क्या अंधेर मचा रखा है, भाव बढ़ाओ वरना ठीक कर दिये जाओगे।
सेठ ने जवाब दिया—मैं धमकी से डरने वाला नहीं हूं। तुम मुझे काट डालो; पर मैं भाव नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता भी कोई चीज है।
एक गरीब आदमी झोला लिये दुकान के सामने खड़ा था। दुकानदार आया और उसे गले लगाने लगा। गरीब आदमी डर से चिल्लाया-अरे, मार डाला ! बचाओ ! बचाओ !
सेठ ने कहा—तू इतना डरता क्यों है ?

गरीब ने कहा—तुम मुझे दबोच जो रहे हो  ! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?
सेठ ने कहा—अरे भाई, मैं तो तुझसे प्यार कर रहा हूं। प्रधान मंत्री ने मानवीयता की अपील की है न !
एक दुकान पर ढेर सारे चाय के पैकेट रखे थे। दुकान के सामने लगी भीड़ चिल्ला रही थी—चाय को छिपाओ। हमें इतनी खुली चाय देखने की आदत नहीं है। हमारी आंखें खराब हो जाएंगे।
उधर से सेठ चिल्लाया—मैं नैतिकता में विश्वास करता हूं। चाय खुली बेचूंगा और सस्ती बेचूंगा। कालाबाजार बंद हो गया है।

एक मध्यमवर्गीय आदमी बाजार से निकला। एक दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया। उस आदमी ने कहा—सेठजी, इस तरह बाजार से बेइज्जत क्यों करते हो ! मैंने कह तो दिया कि दस तारीख को आपकी उधारी चुका दूंगा।
सेठ ने कहा—अरे भैया, पैसे कौन मांगता है ? जब मर्जी हो, दे देना।
चलो, दुकान पर चलो। कुछ शक्कर लेते जाओ। दो रुपये किलो।




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