आमीन - शैलेन्द्र सागर Aameen - Hindi book by - Shailendra Sagar
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आमीन

शैलेन्द्र सागर

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2919
आईएसबीएन :81-7055-938-0

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इसमें जीवन के प्रति तरल कृतज्ञता का सहज समावेश है......

Aameen a hindi book by Shailendra Sagar -आमीन - शैलेन्द्र सागर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘पूर्वन्त’ कहानी में वाक्य है कि, ‘‘पचास मीन मेख निकालने वाली मम्मी अब ऐसे निर्लिप्त भाव से खाती हैं कि लगता ही नहीं कि खाने का कोई स्वाद उनके अन्दर शेष है।’’ शैलेन्द्र सागर जीवन के ‘आपत्तिग्रस्त आस्वाद’ की अचूक पहचान करने वाले कहानीकार हैं। उनकी कहानियाँ बिना किसी औपचारिक भूमिका के विस्तार पाती हैं। इस विस्तार में अनुभव, स्वप्न, विश्लेषण और निष्कर्ष एक दूसरे से समृद्ध होते देखे जा सकते हैं। कहानी में ‘कहानीपन’ बचा रहे, शैलेन्द्र सागर का रचनात्मक संकल्प प्रतीत होता है। दीवार, टैडीबियर, गाँठ, आमीन, इसके बावजूद, अग्निपूर्व जैसी कहानियों से समकालीन हिंदी कहानी में कुछ सार्थक पन्ने जुड़ते हैं।’ ‘प्रयोग’ शैलेन्द्र सागर की कहानियों का उद्देश्य नहीं, उनका लक्ष्य है जीवन और जीवन के संवेदात्मक उत्थान-पतन। उत्थान में उपस्थित अंतर्द्वंद्व और पतन में प्रकट होती दुश्चिंता को शैलेन्द्र सागर पूरी ऊर्जा के साथ रेखांकित करते हैं। उनकी भाषा बिना अनुकरण के अपना रूपकार गढ़ती है। स्पंदित होते वाक्य, साँस लेते शब्द और कई बार अपूर्ण दिखते हुए भी संपूर्णता से सिहरते संदर्भ शैलेन्द्र सागर की कहानी कला का प्रमाण देते हैं।

‘आमीन’ शैलेन्द्र सागर की उन कहानियों का संग्रह है जिनमें जीवन के प्रति तरल कृतज्ञता का सहज समावेश है।

लेट्स प्रे


प्रार्थना की घण्टी के साथ ही दौड़ते-भागते बच्चों के पैर क्षणांश के लिए जैसे पावर ब्रेक से जकड़ गए हैं। खिलखिलाते-किलकते, चीखते-चिल्लाते, खेलते-कूदते, ऊर्जा व उत्साह से सराबोर बच्चों के चेहरों पर कुछ पलों के लिए आघात, पीड़ा, आशंका, भय व थकान के लक्षण उभरते हैं। और फिर अपने-अपने मोटे बैग पीठ पर लादे वे प्रार्थना सभा की ओर दौड़ जाते हैं। कक्षा की पंक्ति में आगे खड़ा होना भी तो दैनिक प्रतियोगिता का अंग है।
थोड़ी देर के लिए आई अराजकता बहुत जल्दी एक अनुशासित और गम्भीर माहौल में तरमीम हो गई है। बीच में एक मंच स्थित है जिसके दोनों ओर अध्यापक अध्यापिकाएँ एक पंक्ति में खड़े हैं-अपनी-अपनी कक्षा के सामने जिससे प्रार्थना के समय छात्रों पर निगरानी भी की जा सके। सफेद चोगा पहने फादर लम्बे व तेज कदमों से मंच की ओर चले आ रहे हैं। चारों ओर एक निस्तब्धता व्याप्त है, एक आतंक भरी चुप्पी...। लगता ही नहीं कि परिसर में लगभग डेढ़ हजार बच्चे जमा हैं। बच्चों के पैर जुड़े हैं, हाथ दोनों ओर खिंचे हैं और चेहरे तने हुए। कुछ बच्चे अपने जूते पतलून के पीछे रगड़कर साफ करते हैं, तो कोई टाई की ढीली नॉट कसता है। पता नहीं आज किसका नंबर आ जाए, किसकी वर्दी या बैग चैक हो जाए और फिर बच्चे के साथ पूरे परिवार की सार्वजनिक भर्त्सना...
‘‘तुम्हारे पेरेण्ट्स कितने लापरवाह हैं। यूनिफॉर्म पर कोई ध्यान नहीं है। बस अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने का शौक है। अपना स्टेटस जो बढ़ाना है। बच्चा सैंट मैरीज में पढ़ता है-भले ही तमीज रत्ती भर की न हो...।’’
कल ही अंकित को मंच पर बुलाकर फादर डाँट रहे थे। अपमान, शर्म, क्षोभ, करुणा से धँसा महसूस किया उसने। पूरे दिन बुझा-बुझा रहा वह। इण्टरवल में खेलना दूर अपना टिफिन तक न खोला उसने।
‘‘खूसट आ गया। अब कहेगा लेट्स प्रे...।’’
पीछे से अविरल फुसफुसाया है। आगे खड़े कार्तिक के अन्दर एक गिलगिली सी उठी है पर अपने को जब्त किए रहा वह। हँसने का जोखिम भला वह कैसा उठा सकता है। हर छात्र को लगता है कि फादर की आँखें उस केलेण्डर के फोटो की तरह है जो सब तरफ से अपने पर पड़ती महसूस होती हैं।
अवर फादर इज इन हैविन
होली बी योउर नेम
...................................
चारों ओर प्रार्थना का स्वर गूँज रहा है जिसका अर्थ न किसी बच्चे के हृदय में है और न ही मस्तिष्क में। प्रवेश के एक माह के अन्दर प्रार्थना कण्ठस्थ करना अनिवार्य है।
‘‘धप्प...।’’ अविरल आगे खड़े कार्तिक के धीरे से धौल जमाता है।
‘‘अब साले, मैम से कह दूँगा...।’’ उसने दबे स्वर में कहा है।
‘‘चींटा चल रहा है।’’
‘‘मर गया न ?’’
‘‘हा, नीचे गिर पड़ा है। ई.ई.ई.ऽऽऽ...। तन्मय नोच मत, मैम से कम्पलेंट कर दूँगा...।’’
कुछ बच्चे दबी-सी हँसी में फि फि कर हँस दिए हैं। प्रार्थना के समय फादर व अध्यापकों की बन्द आँखों का पूरा लाभ उठाते हैं बच्चे..। खेल का विकल्प है यह..।
...आमीन...का स्वर चारों ओर से उठा है। सभी को क्रास बनाने के निर्देश हैं। हालाँकि इसका मतलब न वे समझते हैं और न ही जानना चाहते हैं। कम्प्यूटर, वीडियो गेम, साइबर कैफे, डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. क्रिकेट व केबिल से मदमस्त इन छात्रों का धर्म से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। उस दिन अविरल से पूछने लगा कार्तिक, ‘‘आमीन से क्या होता है यार...?’’ ‘‘मुझे क्या मालूम, फादर से पूछ,’’ अविरल ने लापरवाही से उत्तर दिया। ‘‘अच्छा तू कभी घर पर पूजा करता है...।’’ कार्तिक ने आगे पूछा। ‘‘नेवर यार...। बस दीवाली पर पापा-मम्मी कुछ करते हैं। मुझे तो याद ही नहीं कभी मन्दिर भी गया हूँ मैं...।’’ अविरल ने बतलाया था। ‘‘और यहाँ, ओ गॉड गिव मी...।’’ कार्तिक मुँह बिगाड़कर बोला जिस पर वे दोनों देर तक हँसते रहे थे।
फादर का सम्बोधन चल रहा है। सब बच्चे सतर्क हैं अब। ये ही खतरे के क्षण हैं। कोई हरकत हुई नहीं कि फादर के सामने पेशी...। आँखें जमी हैं किन्तु मस्तिष्क वाचाल..। आज मैथ्स का टेस्ट है, कुछ याद ही नहीं आ रहा, कुछ से सी.डी.लेनी है, इण्टरवल में कौन-कौन टीम बनेगी, मैं किस तरफ रहूँगा, लाइब्रेरी की किताब वापस करनी है, सामर्थ्य की बर्थडे है आज, कल छुट्टी में अर्पित ने मेरा बैग खींचा था, आज देखूँगा साले को...।
-आमीन...।
फादर ने कहा है जो प्रार्थना सभा की समाप्ति का संकेत है। समूह उमड़ पड़ा है। भाग-दौड़, शोर-शराबा, नोचा-खोसी, छेड़खानी...।

बर्थडे बैश


पहला घण्टा गणित का है। मिस श्रीवास्तव इस कक्षा की क्लास टीचर हैं। गजब का आतंक है उनका। छात्रों को एक निर्धारित स्थिति में बैठना है, दोनों हाथ मेज पर टिके, गर्दन सीधी और आँखें मैम की ओर गड़ी..। किसी भी प्रकार की गति निषिद्ध है।
‘‘गुड मार्निंग मैम’’ उनके प्रवेश पर बच्चे एक स्वर में बोलते हैं।
‘‘गुड मार्निंग ब्वायज...।’’
चटख लाल रंग का चमकीला सूट पहने हैं वह। आँखों में काजल की लकीर खासी गहरी है। माथे पर बिन्दी चमचमा रही है। होठ गहरे रंग से लिपे हैं।
अविरल अपना पैर पास बैठे शाश्वत को छुआता है। पर वह क्या, पूरे क्लास को ही जैसे साँप सूँघ गया है। फौज के अनुशासित जवानों की तरह तने बैठे हैं बच्चे। मैम के निर्देश हैं कि उनके आदेश के बाद ही कॉपी किताब निकाली जाए। कॉपी भी कई किस्म की हैं-क्लास रूम कॉपी, होम वर्क कॉपी, टेस्ट कॉपी, रफ कॉपी। आज तो टेस्ट लिया जाना है उसी की प्रतीक्षा में हैं छात्र। पर यह क्या ? आज मिस श्रीवास्तव के चेहरे पर मुस्कान व कोमलता थिरक रही है।
बच्चे हैरत में हैं। कनखी आँखों से एक-दूसरे को देखकर जानने की कोशिश कर रहे हैं। यह बदलाव सचमुच अजूबा है। वरना आते ही एकाध की शामत आ जाती है-चुनिन्दा शब्दों की बरसात, यू रास्कल, यू स्काउण्ड्रेल, इडियट, डल हैडड ब्वॉय।
‘‘ब्वॉयज, नो टेस्ट टूडे...।’’
मैम की घोषणा से बच्चों की तनी मांसपेशियाँ ढीली हुई हैं। घुटन भरे माहौल में हवा का एक झोंका-सा आया है। एक-दूसरे को कौतुक व अचरज से देखा है उन्होंने।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि आज मैम को उनकी तमाम गतिशीलता पर कोई आपत्ति नहीं है...।
मिस श्रीवास्तव की नजरें इधर-उधर घूम रही हैं, खोजी दस्ते की मानिन्द, अजब-सी बेचैनी के साथ..। बहुत जल्दी उनके चेहरे की रंगत बदलने लगी है। चहक मुस्कान के स्थान पर तनाव व खीझ की परछाईं देखी जा सकती है।
‘‘लड़को, क्या तुम्हें कुछ भी याद नहीं ....?’’ कठोर स्वर में अंग्रेजी में पूछती हैं वह।
उनके स्वर के बदलाव से छात्र सतर्क हो चले हैं। एक-दूसरे को देखकर इस रहस्यमयी पहेली को बूझना चाहते हैं वे। तनाव का साया उनके इर्द-गिर्द मँडराने लगा है।
‘‘हैप्पी बर्थडे मैम, हैप्पी बर्थडे मैम...।’’
तनाव के गुब्बारे में जैसे एक छेद हो गया हो, मानो उसमें से फूल झर रहे हों।
कुछ बच्चे आकर्षक कागजों में लिपटे उपहार मैम को दे रहे हैं-पैन, पर्फ्यूम, पर्स आदि-आदि।
‘‘ओह थैंक्यू, प्यारे बच्चो...।’’ मिस श्रीवास्तव का चेहरा महक रहा है- स्नेह व आत्मीयता की सुगन्ध से...। उनका वह रूप सच में चौंकाने वाला है।
पीछे से एक बच्चा मेज पर केक लाकर रख देता है-मेरी प्यारी क्लास टीचर के लिए-सौरभ।
‘‘ओह सौरभ, आयम सो प्लीज्ड, सो प्राउड आफ यू...।’’
‘‘मैम, केक काटिए प्लीज...।’’ बच्चे चीखते हैं।
‘‘ओह नो, इसे घर ले जाऊँगी..।’’
उदास शाश्वत अविरल का चेहरा देखता है। मिस श्रीवास्तव ने परसों बतलाया था कि सोमवार को उनका जन्मदिन है और वह उनसे शुभकामनाओं की अपेक्षा करती हैं। विद्यालय में नया है वह, यहाँ की परम्पराओं से अनभिज्ञ..।।
‘‘तूने बतलाया क्यों नहीं यार, मैं भी कोई गिफ्ट ले आता..।’’ वह शिकायत करता है।
‘‘हाँ यार, पर मुझे भी कहाँ याद रहा..।’’
शाश्वत शान्त है। पराजय की पीड़ा है उसमें। विद्यालय में प्रवेश लिए अभी उसे एक महीना ही बीता है। लगभग दो माह की भागदौड़ तनाव और जलालत के बाद कहीं प्रवेश हो पाया था। पहले पन्द्रह दिन तो पापा को मिलने का समय ही नहीं दिया फादर ने। किसी प्रकार भेंट होने पर दो टूक उत्तर, ‘‘कोई वेकेंसी नहीं है। कहीं और ट्राई कीजिए।’’
‘‘फादर, कृपया दया कीजिए। ट्रांसफरेबुल जॉब है। हर एक, दो साल में तबादला हो जाता है। क्लास सेवेन्थ में अब यह पाँचवें स्कूल में जाएगा..।’’ पापा ने याचना भरे स्वर में कहा था, ‘‘आप बड़े कृपालु हैं। कृपया मदद कीजिए। उनका चेहरा सचमुच दयनीय था, लगा अभी पैरों पर गिर पड़ेंगे।
‘‘मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। शहर में इतने स्कूल हैं, कहीं और ट्राई कीजिए।’’ फादर शिलाखण्ड बने रहे। उनका स्वर सपाट व संवेदनशून्य था।
‘‘फादर, मेरा बच्चा काफी बुद्धिमान है। कक्षा छ: की मार्कशीट देखें। एक बार टेस्ट ले लीजिए, अगर आपके विद्यालय के स्तर का न हो तो बेशक प्रवेश न दें।’’ पापा की आँखों में करुणा की भीख थी।
‘‘आयम सॉरी। कोई स्थान नहीं है। अब आप जा सकते हैं।’’ कहकर फादर ने घण्टी बजा दी, ‘‘नेक्स्ट...।’’ चपरासी के प्रकट होने पर कहा उन्होंने।
सलाह-मशविरे का दौर था अब। किससे कहें, किससे कहलवाएँ। नेता, अधिकारी, स्थानीय दरोगा, चर्च के पदाधिकारी। मित्रों की सलाह थी कि कम से कम पाँच बार मिलने पर ही फादर पर कोई असर नजर आता है। यह सच साबित हुआ। आगामी दो सप्ताह में आठ चक्कर लगाने पर जब पाँचवीं बार फादर से भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो आशा की धीमी किरण चमकी थी।
‘‘समर ब्रेक के बाद मिलिए..।’’
लगा बाधा दौड़ का एक लैप पार हो गया है। किन्तु डेढ़ माह का ग्रीष्मावकाश नारकीय हो गया। टेस्ट की जोरशोर से तैयारी कराई गई। पापा-मम्मी में विषयों का बँटवारा हुआ। एक ट्यूटर अलग रखा गया। मौज-मस्ती, नाना-नानी के घर जाने तक के सारे कार्यक्रम स्थगित। उस पर जो परिचित आता उसका एक ही प्रश्न, ‘‘बेटे का एडमिशन हुआ’’ जैसे स्कूल में प्रवेश न होकर जवान बेटी के विवाह की सार्वजनिक चिन्ता हो...।
पापा-मम्मी के चेहरे क्षोभ से मुरझा जाते। तनाव की झाइयाँ नजर आने लगतीं। उस पर तरह-तरह के सुझाव-हॉस्टल में भेज दो इसे, लखनऊ में फैमिली को सेटिल कर दो, हर रविवार को चर्च जाना शुरू करो, जिससे फादर से मेल मुलाकात हो फील्ड पोस्टिंग का लोभ छोड़कर मुख्यालय पर रिसर्च  व प्लानिंग विंग ज्वाइन कर लो।
परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था यह। मम्मी ताने मारा करतीं, ‘‘जमकर क्यों नहीं रहते एक जगह। और लोग कैसे तीन-तीन साल काट लेते हैं। ऐसी भी मरी क्या नौकरी..।’’ कभी कहतीं, ‘‘इत्ते सीधेपन से क्यों बात करते हो। कोई इम्प्रेशन ही नहीं बनती। मिसेज गुप्ता कह रही थीं कि गुप्ताजी तो बस एक बार मिले फादर से और हो गया था एडमिशन। तुम पता नहीं कैसे बात करते हो....?’’
धधकती नजरों ने पापा उन्हें देखते। लगता न जाने कब बौखला पड़ेंगे। कलह की आशंका से शाश्वत सहम जाता।
ग्रीष्मवकाश बीता तो प्रवेश लेने वालों का झुण्ड टूट पड़ा स्कूल पर। एडमिशन तो दूर स्कूल के बाहर स्कूटर खड़ा करने तक का स्थान पाना दूभर था। मुख्य द्वार पर ही मोटे अक्षरों में लिखा था-‘‘किसी कक्षा में कोई रिक्ति नहीं है। इस सम्बन्ध में प्रधानाचार्य किसी से नहीं मिलेंगे।’’
इस समय तो विद्यालय परिसर तक में प्रवेश निषिद्ध था। द्वारपाल से चिरौरियाँ होतीं, प्रलोभन की कोशिशें की जातीं और सबसे अधिक सतर्कता यह कि कौन अन्दर गया। अन्तत: एक-दूसरे का दुख बाँटकर लोग लौट जाते।
अब पापा की दिनचर्या में सुबह तैयार होकर स्कूल जाना सम्मिलित था। एक सप्ताह बाद भीड़ छँटने लगी। तब चपरासी से प्रार्थना की पापा ने, ‘‘फादर ने मिलने को कहा था। बस एक बार मिलने दो।’’
‘‘फादर ने हमें सख्ती से मना किया है। वह किसी से नहीं मिलेंगे।’’
‘‘मेरा कार्ड पहुँचा दो उन तक...।’’
‘‘माफ करें साब। हमें कोई हिदायत नहीं है।’’
पापा कसमसाकर रह गए। प्रधानमन्त्री से लेकर मुख्यमन्त्री और आला अफसरों तक के मिलने के समय निर्धारित हैं और यहाँ सेकेण्डरी स्कूल का प्राचार्य। हजारों बेताब आँखें भेंट के लिए व्याकुल...। लोकशाही के युग में अजब हिटलरी व्यवस्थाएँ...। मनमाने नियम, एकतरफा निर्णय, पादर्शिता का पूर्ण अभाव..।
अड़ोस-पड़ोस के बच्चे रोज सुबह तैयार होकर जाते तो मम्मी बड़ी उदास हो जातीं। रुआँसे स्वर में कहतीं, ‘‘भइया की जगह तुम स्कूल जाने लगे। उस बेचारे के पढ़ने का ही तय नहीं है। कहीं साल खराब न हो जाए। आधी जुलाई बीत गई। अगस्त में क्वार्टरली टेस्ट होते हैं। बताओ, कोर्स कैसे कवर कराऊँगी।’’
‘‘पहले एडमिशन तो हो...।’’ पापा झुँझलाकर कहते। घनघोर हताशा व छटपटाहट लेकर स्कूल से लौटते पापा। रोज दफ्तर को देर अलग होती। बॉस की नजर टेढ़ी होने लगी। एक बार टोका और डांट दिया। आखिर सोचा कि पन्द्रह दिन का उपार्जित अवकाश लेकर इसमें जुटूँ। किन्तु अवकाश के कारण का कॉलम अफसर भड़क उठा, ‘‘बेटे के एडमिशन के लिए ईएल। एब्सर्ड।’’
प्रार्थना पत्र अस्वीकृत हुआ, किन्तु बॉस की नाराजगी की कीमत पर भी पापा ने घर बैठे तीन दिन के आकस्मिक अवकाश का प्रार्थना पत्र भिजवा दिया जिसे तीन दिन बढ़ाना भी पड़ा।
दोस्त की सलाह के मुताबिक सौ का एक करारा पत्ता उसने चपरासी की जेब में खिसकाया था।
‘‘कल स्कूल टाइम के बाद आना।’’ मुस्कराकर चपरासी फुसफुसाया।
पापा से हुई पाँच मुलाकातों को पूरी तरह नकार गए फादर उसे गहरा आघात लगा। लम्बे साँप ने काटकर एकाएक पीछे धकेल दिया हो जैसे। उसे तो फादर की जेब में लगे दोनों पेन के रंग और कम्पनी के नाम की स्पेलिंग तक याद हो गई थी। बस पलकों के बाल गिनने की कसर बाकी थी।
‘‘परसों आइए।’’ अनुनय, समर्पण, दया बेचारगी के खासे प्रदर्शन के बाद फादर ने धीरे से कहा। अन्दर तक चहक उठा वह। कृतज्ञता ज्ञापन का कोई शब्द नहीं छोड़ा उसने। टेस्ट सम्पन्न हुआ और फिर माता-पिता का साक्षात्कार...। मम्मी ने उस दिन अपनी सबसे पसन्दीदा साड़ी पहनी। खूब मेकअप किया। पापा ने टोका तो लिपिस्टिक के रंग को थोड़ा हल्का जरूर किया। रात से ही दोनों अंग्रेजी बोलने का रियाज करते रहे।
‘‘बच्चा मैथ्स में कमजोर है। आपको काफी मेहनत करनी होगी...।’’ फादर ने कहा।
‘‘यस सर...।’’ लगा पापा अपने बॉस के सामने खड़े हैं जो उनकी किसी त्रुटि को इंगित कर रहा है, ‘‘फादर, मैं, इंजीनियर हूँ। इन्होंने भी इण्टर तक साइंस पढ़ी है।’’
‘‘क्या यह केवल इण्टर पास है ?’’ फादर ने बड़ी तुच्छता भरी दृष्टि मम्मी पर डाली।
‘‘नहीं फादर, इण्टर के बाद आर्ट्स साइड ली थी। साइकोलोजी में एम.ए.हूँ।’’ मम्मी ने परेशान होकर स्पष्टीकरण दिया। अन्दर उठी तिलमिलाहट को अपने चेहरे की बेस्ट मुखमुद्रा से ढांपने का प्रयास किया। कॉलिज में सहपाठी कहते थे कि मुँह बन्द कर उसका मुस्कराना बड़ा ‘मारू’ है।
किस्सा कोताह यह कि प्रवेश हो गया। प्रवेश फार्म हाथ में लेकर मम्मी उसे इस तरह चूमने लगीं जैसे आई.ए.एस.में चयन का प्रमाण पत्र हो..। उस दिन घर में जश्न मना। दिन में किताबें, वर्दी की तैयारी अपूर्व उत्साह से चली। शाम को पहले मन्दिर में प्रसाद चढ़ा, फिर होटल में रात्रिभोज हुआ-इतनी तृप्ति के साथ मानो नवदुर्गे के नौ दिनों के उपवास के बाद मुर्गा खाने को मिला हो...।

पनिशमेण्ट


अध्यापन आरम्भ हो गया है। कुछ देर के लिए हुआ हलका-फुलका माहौल फिर गम्भीर हो चला है। मेज पर उपहार जमा हैं। शाश्वत की नजर बार-बार उन पर जाती है और वह बड़ा संकुचित और कहीं हीन सा अनुभव करता है। नए विद्यालय में छात्रों के साथ अध्यापकों से समायोजन भी इतना सरल कहाँ है। अजनबीपन व गुमनामी का दंश हर पल सालता है। मिस श्रीवास्तव उसकी मन:स्थिति को ताड़ जाती हैं।
‘‘तुम्हारा ध्यान पढ़ाई में नहीं है।’’ वह डाँटती हैं, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’
‘‘शाश्वत मैम...।’’
‘‘इधर आओ। अभी जो प्रॉब्लम समझाई थी उसे बोर्ड पर हल करो..।’’
अन्दर ही अन्दर काँप गया है शाश्वत। बोर्ड पर लिखने का कोई अभ्यास भी नहीं है। पैर जकड़े हुए हैं उसके।
‘‘समय नष्ट मत करो। चलो, जल्दी आओ।’’
भारी कदमों से वह चाक लेकर बोर्ड पर प्रश्न हल करने लगता है। अन्दर तक घबरहाट भरी है। मस्तिष्क के तन्तु अस्त-व्यस्त हो चले हैं। एक चरण, दूसरा तीसरा, और ठप्प। बड़ी कातर दृष्टि से मैम की ओर देखता है वह।
‘‘क्लास में अटेन्टिव नहीं रहते हो..। पता नहीं कैसे-कैसे बच्चे प्रवेश पा लेते हैं। इडियट। अपनी डायरी लाओ। तुम्हारे पेरेण्ट्स को बुलाती हूँ।’’
शाश्वत की आँखें डबडबा उठी हैं।
‘‘डोंट क्राई..। चलो अपनी बेंच पर जाकर खड़े हो जाओ। यही तुम्हारा दण्ड है।’’
बेंच पर खड़ा होकर वह कनखियों से सहपाठियों को देख रहा है। कुछ मुस्करा रहे हैं। एकाध ने आँख मारी हैं, कुछेक ने अजीब-सी हरकतें की हैं।
‘‘कहो न प्यार है...।’’ अचानक एक महीन सी स्वरलहरी कक्षा में गूँजी है। बच्चे हँस दिए हैं।
‘‘कौन है यह...?’’ मिस श्रीवास्तव फुफकारी हैं।
सभी बच्चे नीचे मुँह किए बैठे हैं।
‘‘मैं पूछती हूँ किसने किया है यह...?’’
बच्चे चुप हैं।
‘‘ओके ब्वॉयज, तुम सबको पनिश करूँगी। पैण्ट-शर्ट उतारकर मैदान के दो चक्कर लगवाती हूँ। वरना बतलाओ यह तानसेन कौन है ?’’
बच्चे आतंकित अनुभव कर रहे हैं। अभिनव का नाम कैसे लें। कई बार इस तरह के गाने अथवा स्वर अनायास मुँह से निकल ही पड़ते हैं।
‘‘तुम लोग दोषी को बचाना चाहते हो। ठीक है। आज इण्टरवल में दण्ड के लिए तैयार रहो।’’
एकाएक एक बच्चे की धीमी सिसकियाँ उनके कानों में पड़ने लगी हैं।
‘‘यह कौन है ?’’
‘‘मैम राहुल बंसल..।’’ कई बच्चे चीखे हैं।
‘‘राहुल खड़े हो। तुम क्यों रो रहे हो ? क्या तुमने गाया था ?’’
‘‘नहीं मैम...।’’ सिसकियों भरे स्वर में कहता है वह।
‘‘फिर..?’’ मिस श्रीवास्तव झुँझलाकर पूछती हैं।
उसका रुदन तीव्र हो चला है। आँसुओं की धाराएँ फूट पड़ी हैं।
‘‘मैम..।’’ वह अटकते स्वर में बोला है, ‘‘मैं अण्डरवियर नहीं पहने हूँ आज..।’’
पूरी कक्षा में हँसी का फव्वारा फूट पड़ा है।
मिस श्रीवास्तव नीचे मुँह किए हँस रही है।

नैनसी मैम इज सो रोमांटिक


अगले घण्टे की प्रतीक्षा सभी को गुदगुदाती है। अंग्रेजी की अध्यापिका नैनसी के प्रति सभी आकर्षित महसूस करते हैं। गेहुआँ रंग, तीखे नाक-नक्श, चटख रंगों के आधुनिक कपड़े, गहरी लिपिस्टिक और उनके इर्द-गिर्द मँडराती भीनी सुगन्ध। कक्षा में आने से पूर्व टीचर्स रूम में अपना मेकअप रीटच करती हैं। किसी के लिए दिव्या भारती हैं तो किसी के लिए सुन्दर एश। रोमांटिक, सेक्सी, ब्यूटी क्वीन जैसी उपाधियाँ मिली हैं उन्हें। पीड़ा केवल इतनी है कि उनका एक ब्वॉय फ्रैंड भी है, जो प्रतिदिन मोटरसाइकिल पर उन्हें छोड़ने आता है।
‘‘शिट्ट..। एकदम चिपककर बैठती हैं उससे।’’
किशोरवास्था के छात्रों पर अपने प्रभाव से वह बेखबर हैं अथवा लापरवाह, बच्चे नहीं जानते। वे तो उनकी हर अदा पर बस फिदा हैं। गजब की लचीली चाल, चेहरे पर लुभावनी मुसकान, बोलने का मोहक अन्दाज और चेहरे पर गजब का खिंचाव। उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए बच्चों में होड़ सी लगी रहती है। और विषयों का होमवर्क भले ही पिछड़े किन्तु नैनसी मैम का सारा काम पूरा। अगले दिन के विषय की तैयारी भी जिससे प्रश्न का उत्तर देने के लिए खड़ा होने का अवसर मिले। जिस छात्र से प्रश्न पूछ लें वह धन्य। उस दिन गौरव का गाल सहलाते हुए ‘‘हाउ क्यूट’’ क्या कहा कि पूरा क्लास जलभुन उठा। मित्रों ने उससे ट्रीट तक ले डाली।
लेकिन गौरव का दिवास्वप्न जल्दी ही भंग हो गया। पिछले दो वर्षों से अनुतीर्ण शशांक ने उसे छुट्टी में धमका डाला, ‘‘खबरदार जो मैम की तरफ आँख उठाकर देखा तूने। मैं उन्हें प्यार करता हूँ। मेरी बिलव्ड है वह।’’
अन्य बच्चों की तुलना में लम्बे-चौड़े शशांक से सभी भयभीत अनुभव करते हैं। गुटके के पाउच लेकर आता है, नशे की गोली खाने का भी दावा करता है। फादर ने एसेम्बली में एक दिन कहा था कि ऐसी शिकायतें उन्हें मिली हैं। अगले दिन ही कक्षा नौ के दो छात्रों के पास से ड्रग्स बरामद हुई थी। पर शशांक की शिकायत कौन करे ? मॉनिटर तक डरा रहता है।
पर यहाँ तो सवाल भावनाओं का है। सभी छात्र एक घुटन-सी महसूस करते हैं।
आफटर आल नैनसी मैम इज सो रोमांटिक, सो सेक्सी।



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