तावीज - शीला रोहेकर Taveej - Hindi book by - Shila Rohekar
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तावीज

शीला रोहेकर

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :285
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2994
आईएसबीएन :81-8143-141-3

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हिन्दू-मुस्लिम आन्तरिक सम्बन्धों के गहरे दस्तावेज के रूप में...

Tavij

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सामाजिक संस्कृति में समाज में साम्प्रदायिक विरूपताओं की जटिलता ही इस उपन्यास का विषय हैं जो अन्त में अनन्त सिद्धीक़ी के गले में पड़े ‘तावीज़’ के खुलने से उजागर होता है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों धाराएँ किस तरह एकमेक और किस तरह एक दूसरे की जानलेवा हो जाती है, यही तावीज़ का विन्यास है। भीषण दंगे की चपेट में मुस्लिम पति को खोकर फिर से अपने बेटे के साथ हिन्दू पति महेश के घर में प्रवेश करती है और यहाँ फिर सम्बन्धों का दंगा शुरू हो जाता है।

कथाकार शीला रोहेकर का ‘दिनान्त’ के बाद यह दूसरा उपन्यास है, जो सीधा अपने संवेदनशील मुहावरे में समाज की अंतःक्रियाओं में प्रवेश करता है। इसमें पिछली दो सदियाँ और अहमदाबाद लखनऊ और अयोध्या की ज़िंन्दगी और उसकी विडम्बनाएँ समाहित है। लगातार चाकू की धार पर चलती हुई सी। दरारों को छिपाती नहीं। दरारों को देखती-देखाती हुई।
अपने समाज में यह परिवार और समुदाय की इकाइयों के टूटने या उनके स्वयंभू हो जाने का समय है। तावीज़ हिन्दू समाज के आन्तरिक सम्बन्धों के गहरे दस्तावेज़ के रूप में विकसित होता है जिसका चरम बिन्दु बाबरी मस्जिद विध्वंस है-जिसमें अनंत सिद्धीक़ी की अस्मिता संदिग्ध है। उसके अपने भीतर भी। इसी खोज की त्रासदी का अंत उसकी मौत में होता है। इसे बाबरी मस्जिद विध्वंस का रूपक भी कह सकते हैं।
‘तावीज़’ इतिहास की समकालीनता रेखांकित करता है।

चुप रहो, मुझे सब कहने दो
फिर नहीं मिलेगा वक़्त
ज़माना और-और नाज़ुक होता है
और-और वह सख़्त।

-मुक्तिबोध

एक


गोल कमरे की मेज पर पड़ा अखबार निहारिका ने उठाया। उसके बाएँ हाथ में चाय का प्याला था। अखबार उठाकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ी। सीढ़ियों से पहले नैना का कमरा था। कमरा भी बंद था। बंद किवाड़ों को देख नैना ने मुँह बिचकाते फुसफुसाहट में ‘कुतिया’ कहा और सीढ़ियाँ चढ़ गई। नीरज उचटती नींद में था और रजाई के नीचे करवट बदल रहा था। पार्श्व में गर्माहट के लिए लगाया तकिया खिसक गया था। निहारिका के पास बैठते ही उसने आँखें खोलीं और मुस्कराया।
‘‘देर हो गई क्या ?’’ उसने अँगड़ाई लेते हुए पूछा।

‘‘अभी तुम्हारी बहन नहीं उठी है इसलिए सूरज महाराज नहीं उगे हैं।’’ निहारिका ने रूखे स्वर में कहा।
‘‘क्यों ?’’ व्यंग्यात्मक हँसते हुए नीरज ने पूछा। ‘‘गुस्सा क्यों हो ?’’
‘‘जब भी वह आती है इस घर का पूरा व्याकरण बदलकर रख देती है। पता है न ?’’
नीरज चुपचाप उसे देखता रहा। वह कुछ सकुचाई।
‘‘अच्छा छोड़ो। उठो अब।’’ निहारिका ने नीरज की बाँह पकड़कर उसे उठाते हुए कहा।

भारी पर्दों के पीछे वाले शीशों से सर्दी की धूप सुबह की जगती कच्ची-पक्की धूप छनकर आने की राह देख रही थी। ब्लोअर ने कमरे में गुनगुनाहट भर दी थी। निहारिका ने अपनी टाँगें नीरज की रजाई में दुबकाईं और चाय का घूँट सुड़कते हुए अखबार पलटा। सन् तिरानवे के जनवरी माह की बारह तारीख का अखबार देशभर के दंगों के समाचार सा पटा पड़ा था। समाचार तथा चित्रों के बारे में तफसील से दिए हुए थे। शहर के रकाबगंज, चौक, कैसरबाग, अमीनाबाद और डालीगंज जैसे इलाकों में स्थिति तनावपूर्ण थी कि कहीं फिर से कोई छोटी-सी वारदात दंगे का रूप न ले, इसलिए पुलिस के जत्थे रात-दिन पेट्रोलिंग कर रहे थे। हालाँकि लखनऊ शहर में गोमती के इस पार यानी निराला नगर, अलीगंज या न्यू हैदराबाद जैसे इलाकों में इन दंगों का कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसे में निराला नगर की सी—एक सौ सत्रह नंबर नगर की सी-एक सौ सत्रह नंबर की दोमंजिला कोठी के भव्य बेडरूम में बैठी निहारिका भी दंगों, तकलीफों तथा माहौल में उठी दहशत की खबरें ऐसे पढ़ रही थी जैसे इतिहास के पन्नों पर व्यतीत के गर्भ में गुम हो चुके उबाऊ ब्यौरे। शहर के सूखे नल, बुनियादी जरूरी चीजों का अभाव, अभावों से पनपते रोग तथा सहमा-सहमा जन-जीवन उसके लिए ऐसा ही था जैसे सुदूर चलता खाड़ी-युद्ध ! निहारिका के मुँह के गर्माती चाय किंचित भी ठंडी नहीं हुई। उसे नीरज का चेहरा से कहीं से भी धुँधला नहीं दिखा। कोख में पहले अपने शिशु की कोई कसमसाती करवट उसे महसूस नहीं हुई।

चुटकुले, किस्सागोई, स्कैंडल और गपशपों की भरमारवाले रसडुबाऊ घर में निहारिका का बचपन गुजरा था इसलिए उसकी दिलचस्पी अखबार की चटपटी खबरों में अधिक होना स्वाभाविक था। उसने अखबार के पृष्ठ इधर-उधर पलटे, मुख्य खबरों पर सरसरी नजर फेंकी और अपने पसंदीदा तीसरे पृष्ठ पर आकर अटकी।

उस दिन के तीसरे पृष्ठ पर चोरी-चकारी की खबरों के अलावा प्रदूषण पर एक लेख, सड़क हादसों में तीन ने जान गँवाई, नकली पान-मसाला बनाने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़, फलाँ लेखक को फलाँ-फलाँ साहित्यिक सम्मान और ग़ालिब पर लेख के अलावा कुछ छोटे-मोटे विवरण थे। निहारिका ने अपने प्रिय कालम पर नजरें दौड़ाईं। अपराध बुलेटिन। पाँच रपटें।

विविध गटरों से तीन युवकों के शव मिले। सिंचाई विभाग का क्लर्क रिश्वत लेते रँगे हाथ पकड़ा गया। इंदिरा नगर की आलीशान कोठी में चलता जिस्म-फरोशी का व्यापार। शहर के हज़रतगंज इलाके से एक मारुति और दो मोटर साइकिलें उठीं। और अंत में पाँचवी रपट थी, शव की शिनाख़त की अपील। यह पाँचों रपटें एक कालम में छपी थीं।

निहारिका सारे ब्यौरे अति ध्यान से पढ़ती रही। बीच-बीच में वह मुँह उठाकर नीरज से भी कुछ-कुछ कहती रही। अंतिम रपट पढ़कर वह मजाकिया हँसी। नीरज जो अब तक उठ चुका था और अपनी चाय गुटक रहा था—उसे देखकर मुस्कराया।
‘‘नीरज, देखो कैसी अजीब खबर है !’’
नीरज को कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करते देख, वह नीरज के करीब खिसकी और उसका चेहरा अखबार की ओर मोड़ते बोली,
‘‘देखो न कितनी अजीब खबर है ! मैं पढ़ रही हूँ।’’
शव की शिनाख़त की अपील।
लखनऊ, 12 जनवरी। लखनऊ रेलवे पुलिस ने पचास-पचपन वर्षीय एक बुजुर्ग महिला के शव की शिनाख़त के लिए जनता से मदद माँगी है। यह महिला दो दिन पूर्व रेलवे लाइन पर कटी पाई गई है। चेहरा और टाँगे कुचली हुई हैं। करीब 5.4 फीट की इस महिला ने सफेद पेटीकोट, और काला, पूरी बाँह का स्वेटर पहना हु्आ है। कल भी जनता से शिनाख़त की अपील की गई थी। और अगर मर जाइए, नौहः ख्वाँ कोई न हो।

‘‘यह क्या अंटसंट पढ़ रही हो ?’’ नीरज ने निहारिका के हाथ से अखबार लेते हुए कहा।
वह हँसी, ‘‘यही तो मैं भी कह रही हूँ। है न मजेदार ख़बर ? जिस बेचारी की शिनाख़त भी नहीं हो पा रही हो, उस पर भला कौन रोने वाला होगा ?’’
फिर नखरे से बोली, ‘‘अलबत्ता पुलिस ज़रूर रोएगी कि अंतिम संस्कार करने पड़ेंगे और अलमारी में एक और फाइल को ठूँसना पड़ेगा।’’
निहारिका खिलखिला रही थी और नीरज रपट पढ़ने में व्यस्त था। उसने पति की ओर देखा और बोली,

‘‘बुद्धू, देखो ! ग़ालिब पर छपा यह लेख ‘अपराध बुलेटिन’ कालम के अंत तक आता है। लेख के आखिरी पैरे में लिखा है—निराशा का स्वर ग़ालिब की अनेक ग़ज़लों और शेरों में मिलता है। उनकी ऐसी रचनाएँ संवेदनाओं की चूलें झकझोर कर रख देती हैं। सभ्यता, विश्वास, निष्ठा, भाईचारा, राजनीति तथा धार्मिक सद्भाव से ह्रास होते ऐसे अंधकारमय समय में जब कुछ शेष बचने की उम्मीद छूटती जा रही हो और अवसाद की हूक में सब कुछ डूबता-सा लगता हो तो ऐसे समय में ग़ालिब की तलखी ज़बान पर आकर मानो कहती हो,

        रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो,
        हमसुखन कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो।
        पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार,
        और अगर मर जाइए, तो नौहः ख्वाँ कोई न हो।।

अब इस शेर की जो अन्तिम पंक्ति है वह कालम के इधर वाले हिस्से में यानी कि शिनाख़त अपील के अंत में छप गई है। मुद्रण भूल, किंतु कैसी अजीब !’’ नीरज अखबार फेंकता बोला, ‘‘वैरी फन्नी !’’
निहारिका प्यार से नीरज की गोदी में लुढक गई। पति के चेहरे को दोनों हथेलियों से ढँककर बोली,
‘‘क्यों ?’’
नीरज ने उसे उठाते हुए कहा,
‘‘अच्छा चलो, उठो अब महारानी, नौ बज रहा है।’’
‘‘तो मैं क्या करूँ ? प्रमोद और चंद्रावती आ चुके हैं और अपना काम निपटा रहे हैं।’’ बनावटी रोष दिखाती वह बोली।
नीरज ने निहारिका की नकल उतारते हुए कहा, ‘‘क्या करूँ ? अभी दादी होतीं तो पता चलता। नहा-धोकर, सिर पर हाथभर का पल्लू खींचे रामजी की त्रिमूर्ति निहारिका पति की गोद से उठ बैठी। गंभीर होते बोली,
‘‘अच्छा नीरज, दादी क्या बहुत कर्मनिष्ठ थीं ?’’

पिछले तीन-चार दिनों के बाद धूप की लहर थी। पर्दों की फाँक से दिखते शीशे के पारवाले ‘बाहर’ में कोहरा छाया-सा तैर रहा था। कमरे की गुनगुनाहट में सर्द हाथ का स्पर्श बाकी था। सड़क पर जाती किसी गाड़ी का हार्न जब-तब सुनाई दे जाता था। नीरज कुछ देर यह सब देखता-सुनता रहा। वह निहारिका के साथ नहीं था, इसलिए उसने दोबारा पूछा,
‘‘कैसी थीं दादी, नीरज ?’’
वह उसे देखता और उसकी अँगुलियों को छूता बोला,
‘‘पता है, जब हम तीनों बच्चे थे तब भी बिना स्नान किए न तो दादी को छू सकते थे और न तो हमें प्रसाद मिलता था, और न वह कहानियाँ सुनाती थीं।’’
‘‘तीन कौन ?’’ निहारिका ने अनजान बनते पूछा।
‘‘तीन...’’ नीरज चुप हो या। निहारिका उसके कंधे पर सिर रखती बोली,
‘‘तीन कौन ? एक तुम, दूसरी नैना और तीसरा ?’’

निहारिका के होंठों पर एक वक्र मुस्कान तैरी। लड़की के अभिभावक खूब चौकन्ने रहते हैं। पूरी छानबीन करने के पश्चात ही वे लड़की की जिम्मेदारी से हाथ धोते हैं। निहारिका नीरज के अतीत के उस तीसरे के बारे में जानती थी फिर भी अनजान और भोली बनते उसने पति से पूछा,
‘‘तुम किसकी बात कर रहे थे नीरज ?’’
नीरज ने तीखी दृष्टि अपनी प्रगल्भा पत्नी पर फेंकी और उसकी धृष्ट आँखों में सीधे देखते कहा,
‘‘अन्नू की। तीसरा अन्नू था।’’

निहारिका को प्रत्युत्तर मिलने की अपेक्षा नहीं थी इसलिए उत्तर मिलने पर वह सकुचाई और चुप रही। नीरज भी चुप था। निहारिका ने जान लिया कि वह उखड़ गया। दरवाज़ा खोलकर वह कमरे की सामने की बालकनी में आ गया। कुम्हलाई सुबह की ठंडी हवा थी। पिछले दिनों से छाया घना कोहरा, और बादल छँट रहा था। बदली थी किंतु सूर्य भी निकल रहा था। उसने बालकनी की मुँडेर से नीचे लॉन में देखा।
निहारिका कुछ देर लेटी-लेटी छत देखती रही। उसे पता था कि उसका ढीठपन नीरज को कभी अच्छा नहीं लगता था। उसने करवट बदली। दीवार पर बड़ी सी फ्रेम में दपदप माथे वाली दादी चौखट में अटकी हुई दिखी। दाहिने हाथ पर नीरज के दादा की तसवीर थी और बाएँ हाथ नीरज के पिता श्री महेश अवस्थी मुस्करा रहे थे। कुछ सोचते वह उठी और बालकनी में पति के करीब जाकर खड़ी रही।

‘‘नाराज़ हो मुझसे ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘मैंने कौतूहलवश यूँ ही पूछा था।’’
‘‘ठीक है।’’
निहारिका ने मनुहारी स्वर में पति को छूते पूछा,
‘‘नीरज, तुम इतने उखड़ क्यों गए ?’’
माँ-पिता के खाली कमरे में, पर्दे के पीछे, नीम अँधेरे उजाले में नैना को कसकर भींचे हुए अन्नू के हाथ अँगारे से दहके। पंद्रह वर्षीया नैना का दीर्घ चुंबन लेता अन्नू किसी हिन्दी फिल्म के घिनौने से घिनौने खलनायक से भी अधिक घिनौना और लिजलिजा दिखा। नैना और अन्नू के चेहरे पर छाया स्वर्गीय सुख नीरज के उजाले की तिमिर की आखिरी घनी पर्त से ढँकता चला गया। गले में कुछ बहुत कड़ुआ फँसा आँखों में धुआँ-सा अटका। मन के गहनतम से कोई कर्कश चीखा।
अन्नू !

यू बास्टर्ड ! यू सन ऑफ अ बिच !!
नीरज की आँखे देर तक नीचे हरी-पीली घास की लॉन पर, गेंदे, गुलदाऊदी, गुलाब की क्यारियों पर और सूरज से आती ठंडी धूप को देखती रही। नज़र उठाकर उसने पास खड़ी अपनी पत्नी को देखा। सूर्य की सुनहरी, गुनगुनी रोशनी में निहारिका का यौवन से परिपूर्ण चेहरा चमक रहा था। भाल पर लाल सुर्ख बिंदी दमक रही थी और नाक के नथुने तेज़ चलती साँसों की वजह से फड़क रहे थे। उसके उन्मत्त उरोज हर साँस के साथ लहरों से बल खाते उठ-गिर रहे थे। किंचित उभरा और तना पेट नाइट-गाउन के अंदर उभार दे रहा था। नीरज को पत्नी के ढीठपन के पीछे छिपा यह मोहक रूप भला और भोला दिखा। हाथ बढ़ाकर उसने निहारिका को सटाया और भीतर की ओर मुड़ते हुए कहा, ‘उखड़ नहीं जाता हूँ। बेचैन हो जाता हूँ। अच्छा नहीं लगता मुझे सब याद करना क्योंकि अन्नू की याद करते ही मुझे अपना मातृहीन बचपन याद आता है, विमाता का आना और जाना याद आता है, पिता का अचानक धूसर हो जाना दिख पड़ता है, दादी का दपदप माथा और यशोदा मैया-सा रूप सामने आता है और....

नीरज कुछ देर रुका रहा। फिर थकी आवाज़ में बुदबुदाया, ‘‘नैना का धीरे-धीरे घर की चौखट से बाहर आना याद आता है। मैं अस्थिर हो जाता हूँ निकी, बेचैनी से तड़पने-सा लगता हूँ। मुझे तुम उस तीसरे की याद मत दिलाओ।’’
निहारिका चुप रही। कुछ क्षण वह बिना बोले चलता रहा। बिस्तर पर बैठा। दादी की तसवीर एकटक निहारता रहा और निहारिका का हाथ पकड़ उसे पास बिठाते कहा,
‘‘जानती हो निकी, दादी कितनी सुंदर थीं ? नैना का रूप बिलकुल दादी पर गया है। और स्वभाव, प्रकृति....? और मैं ?’’
‘‘मैं ? मैं अपने पिता और माता का मिश्रण हूँ, और स्वभाव दादी का पाया है।’’

कुछ देर बारीबारी से वह दीवार पर टँगी तीनों मुखाकृतियों को देखता रहा। उदास होकर बोला,
‘‘जानती हो, संस्कारों का खेल है यह ! बिसात पर पड़ती गोटियों के मायाजाल जैसा ! गोटियों के जोड़ से बनता खाता ! मैं....? और नेना...!’’
नीरज चुप हो गया। निहारिका ने अपने पति को देखा।
नीरज का चेहरा बुझा-सा था और वह एकटक दीवार की तीनों तसवीरों के परे देख रहा था। उसके माथे पर उस ठंड में भी पसीने की महीन बूँदें झलक रही थीं और चेहरे पर आते-जाते भावों के साये थे।
‘‘तुम्हें मालूम है दादी कहाँ की थीं ?’’
‘‘कहाँ की ?’’ निहारिका ने नीरज को छूते पूछा।
‘‘अयोध्या की। इस छह दिसम्बर की ढहायी गई विख्यात बाबरी मस्जिदवाले ऐतिहासिक शहर की !’’
वह सन् उन्नीस सौ तिरानवे का जनवरी माह था। चारों ओर आग थी और मौसम ठंडा हो रहा था। मौसम गीला भी था। सनसन हवा बजती थी और टपटप पत्तियाँ गिरती थीं। ठंडी, पीली, कोहराभरी धूप में कोई आँच नहीं थी और देश के लोग जिरह ओढ़कर जंगल बन गए थे।

दो


जंगल झाँय-झाँय बोल रहा था। धीरे-धीरे तारे अपनी रौशनी खो रहे थे। नींद से जगे किसी पक्षी की पाँख अब-तब फड़फड़ा जाती, तो रतकीड़ों के लगातार होते शोर पर कुछ देर खामोशी छा जाती थी। ऐसी रात के तीसरे प्रहर पगला बाबा जग गया। प्रतिदिन से काफी पहले जगा वह। आषाढ़ का सूरज अभी दूर था। हवा में उमस थी। आसपास के घने जंगल में रात थी। पक्षियों के घोंसलों में ऊष्मा थी। नभ में आसाढ़ के काले-सिलेटी बादल छाए हुए थे। दूर कहीं भरी बदली गरजी।

बाबा ने सोने की फिर से कोशिश की। पौ फूटने में भी अभी प्रहर भर रात शेष थी। उमस के घटाटोप अँधेरे में बाबा जग रहा था। कभी कथरी ऊपर खींचता, कभी पाँवों से लतियाता, कभी करवट बदलता तो कभी उठकर बैठ जाता और हँसता। उनकी हँसी या बेचैनी देखने के लिए कोई वहाँ मौजूद नहीं था। सूने और विरान पड़े उस जीर्ण-शीर्ण मंदिर के भीतर जहाँ न कोई मूरत थी, न बाहर कोई द्वार, बाबा तड़प-सा रहा था।

पगला बाबा देर तक बेचैन करवटें बदलता रहा। जी को चैन नहीं था। दिल के ऊपर जंगल से गुज़रते धब-धब कदमों का धड़कारा था, और दिमाग में गहरे डूबते जाने का एहसास। रात के अँधेरे को चीरते बाबा ने बाहर देखा। कहाँ से, कब से चला था वह ? पीछे कोई राह नहीं दीख रही थी और अब सामने दिखता रास्ता भी मटमैला हुआ जा रहा था। बाबा ने कथरी को एक लात मारकर दूर फेंका और निर्जन मंदिर के अँधेरे शून्य में खड़े-खड़े सूने देवस्थान को देखता रहा। फिर हँसने लगा। हँसी की ध्वनि एकाकी मंदिर में गूँजी। रिक्त देवस्थान में सोये दो कबूतरों ने गर्दन उठाकर अँधेरे को निहारा। अभी तारे नहीं छिपे थे। अभी पंछी नहीं चहके थे। अभी सुनहरा प्रकाश नहीं खिला था। कबूतरों ने दो-तीन बार गुटरगू बोला और चुप जगे रहे। बाबा द्वारहीन द्वार पर आया। प्रकृति झिम-झिम बोल रही थी। मंदिर से चलती पगडंडी और सामने पड़ने वाला ओसार रात और पौ के संगम में मटमैले धब्बे से दिखे। बाबा शांत पगडंडी को देखता रहा और लंबी उसाँस छोड़ी।

कब निकला था घर से ! ठौर-ठौर भटका-कहीं जी नहीं अटका। जहाँ बचपन खेला था और उसी सरजू किनारे शांति दिखी। चिर-परिचित सरजू के पानी में खड़ा रहा। किंतु पिछले कुछ दिनों से बादलों के साथ-साथ डर भी उमड़ रहा था। जंगल की पगडंडियों से आती पदचापों से पृथ्वी के गहन गहराई में बैठे शेषनाग डोलने लगे थे। बाबा के स्थिर मन पर पत्थर का प्रहार हो रहा था।
क्या था ?
संन्यासी ?
बैरागियों ने खदेड़ दिया था ?
क्यों ?
राम उपासक बैरागी और वैष्णव पंथी शिव उपासक संन्यासी से बेहतर !
देवी-उपासकों ने वैरागियों से मिलकर उपहास किया ?
कौन बड़ा ?
शिव ? राम ? देवी ? निराकार ?
पश्न। भटक गया। भटकता रहा।

बाल जब धूप की भाँति चमकने लगे, आँखें जब सच-झूठ के आरपार भेदने लगीं, समंदर की उछालें लेता मन भल-भल झरने-सा बहने लगा और विस्मित करती प्रकृति ही आराध्य और अनुध्याय होने लगी तब....इतने वर्षों बाद, फिर वही सरजू का किनारा और प्रकृति। निरंतर किंतु अलिप्त। पगला बाबा, विश्वंभर प्रसाद तिवारी उम्र के दसवें साल में सौतेली माँ की मार से बचता संन्यासियों की टोली में जा छिपा था। चिलम भरता, मालिश करता, पानी व भिक्षा माँगता बिसु एक दिन स्वयं जटाजूड़ संन्यासी बन गया। शिवभक्त बिसू श्मशानों में सोता, भभूत और राख रचाता और भाँग चढ़ाता।

जिस अयोध्या का निवासी था उसी में रामानंदी साधु और वैरागियों का ऐसा प्रभाव बढ़ा कि बाद धर्मयुद्ध पर आकर टिक गई। वैरागियों ने संन्यासियों को खदेड़ दिया, उनके धर्मस्थानों को हथिया लिया और ताकतवर (राजकीय संरक्षण) होकर ऐसे झपटे कि संन्यासी अपनी बिरादरी की सारी पहचान छिपाते यहाँ-वहाँ बिखर गए।
बिसू दर-दर भटका। वाचाल, गुस्सैल और विद्रोही बिसू ठौर-ठौर के जल-प्रवाहों से शांत होता भीतर पैठता गया।
बाबा हँसा। बुदबुदाया—सबसे बड़ी आराधना...मौन. किंतु वह भी नसीब कहाँ ?
दूर से आती बादल की गड़गड़ाहट बादलों को चीरती मद्धम सुर में गूँजी। आवाज़ सुन बाबा फिर विचलित हुआ। फिर शुरू हो गया क्या ?
मटियामेट हो जाएगा।
सटे जंगल से सियार रोया। बाबा गंभीर हुआ। स्वगत बड़बड़ाया। ‘‘अब कहाँ जाओगे पगले ? हो गई शुरूआत !’’  

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