अंधेरे से परे - सुरेन्द्र वर्मा Andhere se Pare - Hindi book by - Surendra Verma
लोगों की राय

अतिरिक्त >> अंधेरे से परे

अंधेरे से परे

सुरेन्द्र वर्मा

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1980
पृष्ठ :181
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2999
आईएसबीएन :000000

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

129 पाठक हैं

आज की मजबूर भागती-हाँफती जिन्दगियों का बहुआयामी कथानक...

Andhere Se Parey

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

युवा पीढ़ी के प्रख्यात नाटककार सुरेन्द्र वर्मा का पहला उपन्यास है- अँधेरे से परे।

वैसे,किसी भी रचना के लिए पहला विशेषण बहुत बार गलतफहमी भी पैदा करता है- लेकिन कम से कम सुरेन्द्र वर्मा के साथ ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है। यह बात बेसाख्ता कही जा सकती है कि अँधेरे से परे एक समर्थ रचनाकार का अत्यंत सशक्त उपन्यास है, जो उनके सही अर्थो में सचेत कथाकार होने का एक मजबूत प्रमाण है।

आज की मजबूर भागती-हाँफती जिन्दगियों के आस-पास का बहुआयामी कथानक, उसकी तेज-टटकी बेलौस भाषा और उसका शिल्पहीन शिल्प और कुल मिलाकर पूरे उपन्यास की बहुत भीतर तक बजती हुई गूँज अँधेरे से परे के एक महत्वपूर्ण सार्थक उपन्यास होने-कहने के लिए काफी है।....
नींद सुबह धीरे-धीरे टूटी, एक तरह से तीन अवस्थाओं में। सबसे पहले सांस लेने का बोध हुआ और देह के स्पंदन का। फिर आस-पास के सन्नाटे का आभास हुआ। इसके बाद लगा कि आज जागने में शायद कुछ देर हो गई।
करवट बदली। कुछ क्षण आंखें मूंदे पड़ा रहा। फिर तकिये के नीचे हाथ डाला-पौने आठ।...पल भर की खुशी हुई कि रोजाना के विपरीत पैंतालीस मिनट ज्यादा काटने के बोझ से बच गया।
उठकर बैठा। एक निगाह कमरे में देखा। सब कुछ हमेशा जैसा था। पहचाना। बेतरतीब।...एक लंबी सांस अपने-आप निकली और कहीं कोने में ऊंघता भीगे कंबल-सा बोझ जैसे लपक कर ऊपर छा गया।
चप्पलों में पैर फंसा कर बाहर निकला। बाथरूम में आ, बेसिन पर झुका। मुंह पर ठंडे पानी के पंद्रह-बीस छींटे मारे। आईंने में चेहरे व बालों पर फिसलती नन्ही-नन्ही बूंदें देखीं।...वही जाने-पहचाने नक्श। वही सूनी आंखें।..होंठों के कोनों पर अनजाने ही मुस्कराहट आ गई-अच्छा, तो आज की सुबह तुम फिर जिंदा पाए गए !
दबे पांव किचिन में आया। गैस के एक चूल्हे पर अंडे उबल रहे थे। केटिल में थोड़ा पानी था। जल्दी-जल्दी गिलास में चाय बनाई और कमरे में आ गया। खिड़की के सामने आ, आहट ली। फिर चुपचाप बाहर निकला और बरामदे में मेज पर पड़ा अखबार झपट लिया। बिस्तर पर आ, चाय की पहली चुस्की। तेज। गर्म।...पहला ही समाचार दुखद था। एक बड़ी हवाई दुर्घटना में सौ से ऊपर लोग मर गए थे। दायें-बायें, ऊपर-नीचे भी ऐसा कुछ नहीं था, जिससे जिंदगी पर आस्था होती। देश के एक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगा हो गया था, तो दूसरे में, अकाल पड़ गया था। एक बड़े शहर में बाढ़ आ गई थी और एक छोटे गांव में अछूत शिशु की बलि दे दी गई थी। बढ़ती महंगाई की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए महिलाएं संसद के सामने धरना देने वाली थीं और एक बैंक के मैनेजर को तीन लाख के गबन के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया था। एक ओर वन्य पशु तेजी से विलुप्त होते जा रहे थे, तो दूसरी ओर एक अकेली युवती के साथ टैक्सी ड्राइवर ने बलात्कार किया था।
घटनाओं और स्थितियों में कोई संगति, रूप या तारतम्य नहीं था। सब कुछ तेजी से विश्रंखलित होता जा रहा था। पल भर के लिए मेरा मन सिहर उठा।...इस दुनिया का क्या होगा ? क्या बनेगा ?
अगले पृष्ठ पर महरौली के निकट गुलाबों के फार्म की निगरानी के लिए किसी अवकाशप्राप्त फौजी अफसर की सेवाएं चाही गई थीं-बाक्स नंबर 2663...एक गेहुएं रंग की सुंदर, ग्रेजुएट, सरकारी मान्यताप्राप्त स्कूल में पढ़ाने वाली तेईस वर्षीय खत्री युवती के लिए उपयुक्त वर की तलाश। दिल्लीवासी युवक को प्राथमिकता। शादी बहुत अच्छी और बहुत जल्दी। बाक्स नंबर 2664...
जब संसार विनाश के कगार पर खड़ा है, तब लोगों को गुलाब सूंघने की पड़ी है। जब सारी व्यवस्था ध्वस्त हुई जा रही है, तब भी एक जोड़ी मां-बाप लाड़ली बेटी के प्यार में ऐसी असंगत मांगें कर सकते हैं...कि शालू दिल्ली नगर की सीमा से बाहर न जा पाए ! इस पर शादी भी जल्दी..जबकि उम्र अभी मुश्किल से तेईस साल है !
...बारह-तीस पर बहनें दिल्ली ‘ए’ से अपने पत्रों का उत्तर सुनेंगी..आठ-पचास पर टेलीविजन पर स्पोर्ट्स पत्रिका ‘खेल-खिलाड़ी’ ...इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पांच बजे सूचना प्रसारण मंत्री द्वारा कॉमनवैल्थ एसोसिएशन ऑफ प्लैनर्स के वार्षिक सत्र का उद्घाटन...अब क्या प्लैन करोगे दोस्तो ! जो बचे हैं संग, समेट लो...और फेंको उन पर, जो अभी भी अपनी जिंदगी में उम्मीद बांधे हैं।
पर इस सबसे बेखबर लोग अपनी-अपनी योजनाओं में लगे हैं... एक लाभप्रद व्यवसाय के लिए कुछ पूंजी की आवश्यकता..दीपचंद डिपार्टमेंट स्टोर द्वारा सिल्क की कमीजों की रिडक्शन सेल..वयोवृद्ध संगीतकार का अभिनंदन...
अब किसी को संतोष का अधिकार नहीं है। अब किसी का सुकून पर दावा नहीं हैं।
इतनी बेइंसाफी क्यों होती है दुनिया में ?...शालू को गेहुआं रंग मिला है, वह सुंदर भी है और पढ़ी-लिखी भी। उसके पास अच्छी नौकरी भी है, और मां-बाप का गहरा स्नेह भी पाए है और सिर्फ तेईस साल की आयु में वह अपने ही शहर में एक भले-से युवक के साथ व्यस्थित होने जा रही है। यह गलत है ! यह सरासर धांधली है शालू ! जब तक तुम्हारी उम्र के मेरे जैसे लोग जिंदा हैं, तब तक तुम्हें इस तरह आबाद होने का कोई हक नहीं पहुँचता।...तुम अपने बाप के यहां से रामचंद्र कृष्णचंद्र स्टोर की सुनहरे काम वाली ब्राइडल साड़ी का पल्लू संभालते हुए निकलोगी और अपने सजे-सजाए कालकाजी के फ्लैट में चली जाओगी, जो अब तुम्हारा होगा, तुम्हारा अपना, तुम्हारा बिल्कुल अपना...जिसकी दीवारों में तुम्हारे लिए लगाव है, जिसकी फिजां में तुम्हारे लिए सरोकार है।
एकटक अपने कमरे की चारों दीवारें देखता हूं...आठ बाई दस का फैलाव, पीछे खुलने वाली काली सलाखों की खिड़की...एक बिस्तर, एक मेज, एक आलमारी..बाईं दीवार में बनी आलमारी में किताबों की कतारें...और गंध...बोझिल अतीत की गंध। दुष्कर वर्तमान की गंध। सूनापन...वीरानी...चौबीस सालों के अनचाहे, असह्य बोझ की बूं...
जब दूसरी बार बाहर निकला, तो दस बजने को थे। जाने वाले जा चुके थे, इसलिए किचन में घुसते ही झिझक नहीं हुई..पर अपने इस अहसास पर शर्मिन्दगी, हल्की-सी...कोई देखने वाला हो, तो शर्म ज्यादा। न हो, तो कम।
अंडे थे। पर नहीं लिए। सिर्फ दो स्लाइसें सेंकी। मक्खन थोड़ा-सा ताकि बस गले से उतर जाए। जैम बाहर ही रखा था। पर नहीं लिया और कुछ भी नहीं उठाया। न बिस्किट, न कार्न फ्लैक्स।...मग में एक चम्मच काफी डाली। उबला हुआ पानी। थोड़ा-सा दूध। एक चम्मच चीनी।
बाहर बरामदे में निकल आया। बेंत की कुर्सी पर बैठा। एक घुटना दूसरे घुटने पर रख, पांव मेज पर टिका लिया।...एक घूंट। गर्म तल्ख। मिठास कुछ कम लगी। पर स्वाद के सुख से लोभ को मन से निकाल दिया।
सामने सड़क पर ट्रैफिक था। सुबह का ताजा, गतिशील ट्रैफिक। बीच—बीच में हॉर्न। उतावले। व्यग्र।
अहाते में धूप बिखरी थी। हवा की थिरकन से अस्त-व्यस्त होती। पौधों की पत्तियों पर तितली की तरह चौकन्नी।...गेट तक के कच्चे रास्ते पर टायरों के निशान। जहां-तहां सूखी पत्तियां।
मौन। ठहराव।
टन्न्-टन्न्...टन्न्...दो बार। तीन बार।
आखिरी घूंट लेकर अंदर घुसा। रिसीवर उठाया।
‘हैलो....!’
‘मिसेज बत्रा हैं क्या ?’
‘जी नहीं, दफ्तर चली गईं।’
‘ओह...’ क्षणिक विराम, ‘गुल्लू हो न ?’
‘जी।’
‘मैं मिसेज माथुर बोल रही हूं। कैसे हो ?’
‘जी, ठीक...शुक्रिया...।’
क्लिक।
रिसीवर रखा। पैड पर लिखा-मिसेज माथुर का फोन। दस-दस पर।
बस नंबर नौ-ए ने कृषि भवन के स्टॉप पर उतार दिया। शेड के नीचे से दो-चार लोग निकले और डूबते हुओं जैसी व्यग्रता से पायदान पर चढ़ गए।
पचासेक कदम सामने की तरफ चला और फाइन आर्ट्स के गेट के सामने ठिठका। आधे मिनट के लिए खुली सड़क पर चलने से ही माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं।...ऊपर सूरज जल रहा था। धूप की तपिश से सड़क के दोनों किनारों पर कोलतार पिघलने लगा था। ऊपरी सतह की सपाट फिनिशिंग मिट चुकी थी और दलदले लिजलिजेपन पर मोटर-टायरों के निशान थे।
लम्बे कदमों से सड़क पार करके कंपाउंड में दाखिल हुआ। लाइब्रेरी की खिड़कियों के कांचों में तपती चमक थी। सामने हरी घास की लंबी पट्टियों पर निगाह दौड़ाई, लेकिन जर्द हरियाली तनिक भी ठंडक नहीं पहुँचा सकी।
कांच का दरवाजा खोलकर अंदर घुसा। एयरकंडीशन की सर्द लहर आलिंगन की तरह बांधने लगी...वे कुछ क्षण, जब देह पर चुन-चुनाहट की सिहरन को यह जगह कोमल, नम उंगलियों के समान छूती, सहलाती है। त्वचा सोख्ते की भांति इन स्पर्शों को अंदर जज्ब करती है...और फिर बदन में स्वर-लहरियों के जैसी थिरकती शीतलता की तरंगें...।
पत्रिकाओं वाले हिस्से में आ, गिलास में ठंडा पानी भरा और छोटे-छोटे घूंटों में खाली कर लिया।
वापस आ सामने ईशु-काउंटर पर लगी घड़ी देखी-एक-चालीस। सारी दोपहर यहां काटनी है।....असहाय-सी निगाह उस गोलाकार घड़ी पर गई...जब तक छोटी सुई पांच के कुछ पहले नहीं आती, तब तक..हम हैं, कफस है, और मातम बालो-पर का है !...डडमडमडा, डडमडमडा, डडमडमडा, डडमडमडम...पपमपमपम, पपमपमपम, पपमपमपम पपमपमपम...इपिपपिप्पा, इपिपपिप्पा, इपिपपिप्पा, इपिपपिप्पा। अजी हम हैं, कफस है और मातम डमडमाडमडम...
खट्...बगल में ऊंची आहट से एक युवती ने कुर्सी पीछे खींची और बीटल बूट की खट्-खट् के साथ दरवादे के निकट चैकिंग काउंटर तक पहुंची। उसकी अधपड़ी पत्रिका के पन्ने सरसरा रहे थे...वीमेन्स वीकली...
सामने की तीन मेजों पर दस-त्यारह लोग पत्रिकाएं पढ़ रहे थे-दो वृद्धा तीन अधेड़, तीन लड़कियां, एक स्त्री और एक बच्चा...
टहलता हुआ सामने के हिस्से में आ गया।...एक कार्य-दिवस में ग्यारह बजे बाहर की सारी भाग-दौड़ से कटकर पैंतालिस व्यक्ति इस द्वीप में विद्यमान हैं। नौ-दस विद्यार्थियों को छोड़ दें, जिन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल बनाना है तो शेष लोगों की मौजूदगी का कारण क्या हो सकता है ? क्या सभी को दूर-दराज के कोनों से यहां आने के लिए ‘ज्ञान की पिपासा’ ने प्रेरित किया है ?
यकायक महसूस हुआ कि सामने की युवती पढ़ नहीं रही है-हथेली पर चिबुक टिकाए एकटक देख जरूर रही है पृष्ठ की ओर, पर उस दृष्टि में विषय की तन्मयता नहीं, ध्यान कहीं और चले जाने का साक्ष्य है और पन्ना भी देर से पलटा नहीं गया है।
दूसरे क्षण आशंका हुई कि मैं अपना खालीपन दूसरों पर आरोपित कर रहा हूं।...अच्छा, पचास तक गिनता हूं। अगर पृष्ठ बदला नहीं गया, तो...
....दो...छह...आठ...युवती ने सहसा पर्स से रूमाल निकाला और आंखों पर दबा लिया। सफेद जमीन पर फीरोजी चौखाने वाला कोना होंठों तक के भाग को ढंके हुए था, इसलिए मालूम नहीं हुआ कि चेहरे पर आवेग का प्रतिशत कहां तक है।
एक क्षण के लिए मन में इस अचानक भावोद्वेलन का कारण जानने की उत्सुकता जागी। फिर अगले ही पल इस असभ्य इच्छा के सुगबुगाने पर शर्मिन्दगी हुई...।
दुख का सम्मान करो। दुख को एकांत दो।...निःशब्द उठा और बगल के शेल्फों से घिरे गलियारे में आ गया। मेज पर बैठा। सामने एक पत्रिका थी। मुखपृष्ठ पर व्हाइट हाउस और उस पर सुपर-इंपोज टेप रिकार्डर....। स्थिति बिगड़ गई है। इस्तीफे की मांग हर तरफ से जोर पकड़ रही है। पर मजबूरी है।..क्यों ? राष्टपति का भाषण-लेखक की छुट्टी पर है।
मैं ?...मैं क्या करूं ? क्या विश्व-नागरिक की हैसियत से अपना कर्तव्य निभाऊं ?
मेरे प्रिय देशवासियो,
अपने देश की स्थितियों के बारे में पहले भी मैंने व्हाइट हाउस से आपसे बातें की हैं। आज मैं आपसे कुछ भिन्न कहने जा रहा हूं। मैं आपको एक निर्णय के बारे में बतलाने जा रहा हूं, जो मैंने लिया है।
लेकिन इससे पहले कि मैं आपको इस निर्णय के बारे में बतलाऊं, मुझे कहने दीजिए कि राष्ट्रपति पद का भार आसान नहीं है, जैसा कि मुझे विश्वास है कि आप अच्छी तरह समझते हैं। इसके साथ वे दैनिक कार्य-कलाप जुड़े हुए हैं, जिनका असर घर और बाहर के करोड़ों लोगों पर पड़ता है।
राष्ट्रपति पद के सामान्य दायित्वों-जो वैसे असामान्य हैं-के साथ-साथ इस वर्ष मुझे वाटरगेट की क्लांति भी झेलनी पड़ी है, अनेकानेक जांच समितियों की मांगें व दबाव सहने पड़े हैं और व्हाइट हाउस को निरंतर बढ़ते आक्रमणों का शिकार होते देखना पड़ा है। मुझे बताया गया है कि दूर दर्शन के एक कार्यक्रम में मेरे चेहरे पर थकान के चिह्न स्पष्ट थे। घेराव की ऐसी स्थिति में इस जगह के कार्य को संभालना बहुत कठिन है। लेकिन राष्ट्रपति की मुश्किलें उन दबावों और प्रतिरोधों के सामने कुछ भी नहीं हैं, जो वाटरगेट ने देश को दिए हैं। बाहर हमारी प्रतिमा खंडित हो रही है और अंदर देश टूटता जा रहा है।
अगर मैं आपसे कहूं कि वाटरगेट को लेकर मेरी अंतरात्मा बिल्कुल साफ है, तो मैं आपको पूरी सच नहीं बतलाऊंगा। गलतियां हुई हैं दूसरों के द्वारा-और मेरे द्वारा भी। कहने की जरूरत नहीं कि मुझे उनके लिए दुख है, क्योंकि राष्ट्रपति को नैतिक लांछनों से परे होना चाहिए।
इसलिए, मेरे प्यारे देशवासियो, बहुत सोच-विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि राष्ट्रपति पद का भार अब मैं और नहीं संभाल सकता। इस प्रसारण के बाद मुख्य न्यायाधीश उपराष्ट्रपति श्री फ्रेंक सिनाट्रा को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के अड़तीसवें राष्ट्रपति की हैसियत से शपथ दिलवाएंगे और उसी क्षण से राष्ट्रपति पद की कार्यकारी शक्ति उनके हाथ में होगी।
इस प्रकार, मेरे प्यारे देशवासियो राष्ट्रपति के रूप में मैं आपको आखिरी बार संबोधित कर रहा हूं। मेरे लिए यह बहुत दुख का क्षण है। पच्चीस से अधिक वर्षों तक मैंने भरसक आपकी सेवा की है। मेरे शब्द व मेरे काम सुरक्षित हैं और मैं उन्हें इतिहास के निर्णय पर छोड़ता हूं।
मैं जानता हूं कि अपने राजनीतिक विचारों के बावजूद आप नये राष्ट्रपति को वही सद्भावना और सहयोग देंगे, जो आपने मुझे दिया है, क्योंकि अंततोगत्वा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रपति का पद है, व्यक्ति नहीं।
धन्यवाद ! शुभरात्रि और विदा !
एक गिलास पानी पिया। मनोविज्ञान का एक लेख पढ़ा। फिर एक गिलास पानी पिया और शेल्फ के पास खड़ा सोचता रहा कि कौन-सी पत्रिका देखूं नारी-सौंदर्य की एक पत्रिका में अलग-अलग देशों की युवतियों का प्रतिनिधित्व था- जापान, ब्रिटेन, रूमानिया, स्वीडन, रूस...अचानक प्रेमिका की याद आई।....
उतावले कदमों से संदर्भ के एक शेल्फ तक आया। दूसरे खाने के कोने में सुनहरी धारियों के साथ काली जिल्द वाली एनसाइक्लोपीडिया रखी थी। चेख़व की जीवन-कथा वाले भाग में पृष्ठ चार सौ पैंतालीस...बड़ा-सा चित्र, शीर्षक ‘परिवार और मित्र’ तिथि 1890, स्थान सादोव्या कुद्रिन्स्क्या स्ट्रीट, अंगूरके बड़े-बड़े पौदों के नीचे..युवा चेख़व, उसकी बहन, बहन के दोस्त, तीन भाई, सफेद दाढ़ी वाले पिता, बड़े रिबन वाली टोपी में कान बाहर निकाले मां, स्कूल की पोशाक में जरूरत से ज्यादा बड़े हैट के साथ सरयोझा...और वहीं, दूसरी पंक्ति के दूसरे बायें कोने में, वह थी-मेरी प्रेमिका...बड़ा माथा, तराशी हुई चिबुक, संवरे बाल। तनिक मुस्कराती हुई। शीर्षक में उसका नाम था-अज्ञात मित्र। तस्वीर में वह उन्नीस-बीस, की दिखाई देती थी-लाइका मिजिनोवा, चेख़व की बहन की सहेली के बगल में बैठी, होंठों के कोनों से नामालूम-सी मुस्कराती निगाहें-गलत अंदाज से मुझे देखतीं....।
यह प्रेम-व्यापार साढ़े चार साल चला था।
पीले पड़े पन्ने से समय की गंध आई।...अगर जीवित है, तो अब लगभग सौ वर्ष की होगी-सोवियत यूनियन के किसी कोने में कृशकाय वृद्धा, अगर विवाह हुआ हो, तो परनानी....अन्यथा मास्को के एक आधुनिक फ्लैट में शाम के नीम अंधेरे में दुबली, लंबी उंगलियों से प्यानो बजाती अकेली, एकाकी...मेरी तरह...
चेहरे की ऐसी कमनीय बनावट, निर्दोष ठोड़ी, संकरी स्लाविक आंखे, तातारी गर्दन का खम, सफेद स्कार्फ से ढंके कंधों का आकर्षक कटाव...
‘त्रिवेणी’ की टैरेस। एक कोना। बगल के खंभे पर लगातार दो चिड़ियों की चूं-चूं। सामने थियेटर की नीचे चली गई सीढ़ियों पर जगह-जगह गद्दियों के ढेर।
वेटर कॉफी छोटी मेज पर रख जाता है।...एक घूंट। गर्म। तलख।...सिगरेट का एक कश। लंबा। तीखा।
बाईं ओर न दिखाई देने वाली स्टेज पर कोई रिहर्सल चल रही है। नृत्य की। घुंघरुओं की छम-छम और तबले की छाप बीच-बीच में सुनाई दे जाती है।
एक घंटा हो गया।
पैसे मेज पर रखता हूं।
एक कॉफी के सहारे और कितनी देर बैठ सकता हूं !
धीरे-धीरे बंगाली मार्किट तक आता हूं। कोने की दूकान से सिगरेट लेता हूं। सुलगाता हूं।...अब कहां जाया जा सकता है ? कहीं नहीं। अब किससे मिला जा सकता है ? किसी से नहीं।
ढलती शाम। गहरा चुका अंधेरा। काले शून्य में लटके लैंप-पोस्ट। कुछ दूर तक दिखाई देती सड़क की सतह।
...अपने ही कैनवास के जूतों की हल्की आहट। किताब बगल में दबी। दोनों हाथ जेब में।
कच्चा रास्ता। कहीं-कहीं घास-फूस।
गहरी पृष्ठभूमि में मकान की कुछ हल्की काली रूपरेखा। एक खुले दरवाजे से रोशनी। हल्की। पीली-सी।
गेट से भीतर दाखिल हुआ। तुरंत गीली घास की गंध। फूलों की महक से मिलीजुली। पाइप से पानी के बहने की मद्धिम आवाज। झिल्लियों की निरंतर झन-झन। आहट से चौंक कर दो-चार कड़ियाँ कटीं। फिर वही अनवरत बुनावट।
एक बार लगता है, जैसे इस अंधेरी शाम को इस घर में, अभी-अभी, पहले भी प्रवेश कर चुका हूं, बाहर से भीतर जाने का यह सिल-सिला बहुत आवृत्तिमय है..जैसे मैं होश संभालने से लेकर अब तक बस, यही करता रहा हूं-आना और जाना, जाना और आना...
बरामदे में दाईं और ममा थी। मेज और बायां हिस्सा खंभे की ओट में, इसलिए तीन-चार कदम चलने के बाद ही बिंदो दिखाई पड़ी।
‘हैलो...!’ उसने देखते ही पुकार लगाई। ताजी-ताजी लग रही थी, कहीं जाने को तैयार।
बिंदो के लिए हल्की मुस्कान के साथ सामने बैठ गया।
ममा की निगाह पहले की तरह अखबार पर थी।
‘कहां से आ रहे हो ?’ बिंदों ने एक दूसरे कप में पानी डालते हुए पूछा।
ममा के होंठों के कोने व्यंग्यभरे ढंग से तनिक सिकुड़ते लक्षित हुए। मन ही मन थोड़ा संकुचित हुआ। बिंदों को अवसर ख्याल नहीं रहता कि कहां क्या कह रही है।





अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book