पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नजर - मनोहर श्याम जोशी Paschimi Germany Per Udti Najar - Hindi book by - Manohar Shyam Joshi
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पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नजर

मनोहर श्याम जोशी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :119
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3011
आईएसबीएन :81-8143-587-7

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मनोहर श्याम जोशी की पश्चिमी जर्मनी की यात्रा का जीवंत दस्तावेज....

Pashchimi Jarmany Par Udti Najar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नजर’ मनोहर श्याम जोशी की पश्चिमी जर्मनी की यात्रा के दौरान देखे-भोगे अनुभवों का जीवंत दस्तावेज है। इस यात्रा संस्मरण की विशेषता यह है कि वर्णन करते हुए लेखक कहीं भी अपनी विद्धता को हावी नहीं होने देता। लेकिन साथ ही कहीं भी वह वर्णन को सूचना मात्र होने से भी बचाता चलता है।

जोशी जी की पारखी नजर पश्चिमी जर्मनी के बहाने पश्चिमी जगत के सम्पन्न देशों प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुँध दोहन पर आधारित उपभोक्ता संस्कृति का बारीकी से उद्घाटन करती चलती है। लगे हाथ वे भारतीय परिदृश्य से उसकी तुलना भी करते चलते हैं। जाहिर है कि यह एक तटस्थ सैलानी की नहीं बल्कि एक सुधी निरीक्षक की नजर है, जिसमें जोशी जी के साहित्यकार और पत्रकार दोनों व्यक्तित्व एकाकार हो गये हैं।

 

प्रकाशकीय

मनोहर श्याम जोशी हिन्दी के गिने-चुने लोकप्रिय लेखकों में से थे। लाजवाब किस्सागोई के साथ अचूक व्यंग्यात्मकता में पगी उनकी कृतियाँ पाठकों को तत्काल अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। यही कारण है कि पाठक वर्ग उनकी हरेक रचना का इन्तजार करता है और प्रकाशित होते ही उनकी रचनाएँ सहज ही चर्चा के केंद्र में आ जाती थीं।
जोशी जी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ सक्रिय थे और एक साथ कई रचनाओं पर काम कर रहे थे। उनका  अचानक गुजर जाना काफी दुखद रहा।

जोशी जी की अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। आज जब वे नहीं हैं, उनके प्रति श्रद्धांजलिस्वरूप उनके जन्म दिन (9 अगस्त) पर हम उनकी अप्रकाशित कृतियों का प्रकाशन कर रहे हैं। इसी क्रम में उनके यात्रा संस्मरणों की दो पुस्तकें-‘क्या हाल हैं चीन के’ और ‘पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नज़र’ तथा अंतिम महत्वाकांक्षी उपन्यास ‘कौन हूँ मैं’ प्रस्तुत हैं।
हमें विश्वास है कि पाठक समुदाय इन कृतियों का व्यापक रूप से स्वागत करेगा।
प्रकाशक

पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नजर

 

 

जब मैं पश्चिमी जर्मनी की यात्रा के लिए जाने लगा, तब नई दिल्ली में एफ.आर.जी. के दूतावास ने मुझे एक पतली-सी पुस्तिका दी-‘ये विचित्र जर्मन रीति-रिवाज’।  जर्मनी में नियुक्त अमेरिकियों की सुविधा के लिए लिखी गई यह पुस्तक कार्टूनों के सहारे जर्मन तौर तरीकों के बारे में निहायत ही रोचक ढंग से जरूरी जानकारी देती है। इसे पढ़ने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि जर्मन लोग बहुत गम्भीर, औपचारिकता-विश्वासी और थोड़े रूखे होते हैं।
इसी पुस्तिका को उलटते-पलटते मैं लुफ्टहांजा के उस विमान में सो गया जो पेइचिंग से दिल्ली के रास्ते फ्रांकफुर्त्त जाता है। पौ फटने से बहुत पहले जबर्दस्त ठहाके सुनकर नींद खुल गई। देखा गैली में जर्मनी इंजीनियरों का वह दल जर्मन विमान-सुन्दरियों के साथ कहवे और कहकहे का सुख लूट रहा है जो चीन में एक प्रसिद्ध जर्मन फर्म की ओर से कारखाना लगाकर स्वदेश लौट रहा था।

मैं भी चाय का तलबगार होकर गैली में पहुँचा। चाय की घूँट लेकर मैंने उस दल के सबसे हँसोड़ सदस्य से, जो एक विमान-सुन्दरी विशेष से कौतुक प्रीतिनिवेदन में बहुत उत्साह से व्यस्त था, कहा, ‘‘गुस्ताखी माफ, मगर आप जर्मन मर्द की सरकारी छवि बिगाड़ने में कोई कसर उठा नहीं रख रहे हैं।’’
वह बोला, ‘‘जर्मन मर्द की कोई सरकारी छवि भी है क्या ?’’
मैंने उसे वह पुस्तिका दिखा दी।

हँसोड़ इंजीनियर पुस्तिका पढ़ता जाए और मुझे निशाना बनाता हुआ कोई टिप्पणी करे। उदाहरण के लिए पुस्तिका में एक जगह लिखा है कि जर्मनी में हाथ चूमने का रिवाज है और हाथ चूमने के परम्परागत ढंग में कोई चूक नहीं की जानी चाहिए। परम्परागत ढंग में ओंठ हाथ पर छुलाए नहीं जाते हैं, ओंठ और हाथ के बी बारीक-सा फासला छोड़ना होता है। इसे पढ़कर वह हँसोड़ बोला, ‘‘यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूचना है मिस्टर योस्सी। इसे हृदयंगम करें आप। जब आप अस्सी वर्ष की स्त्रियों से शुरू होंगे तब यह सूचना काम आएगी और मिस्टर योस्सी, आप इतने शरीफ आदमी मालूम होते हैं कि अट्ठारह वर्ष वालियों से तो क्या ही शुरू होंगे। और हाँ, मिस्टर योस्सी, इस पुस्तिका में लिखा है कि आपके ओंठों और स्त्री की हथेली के बीच कागज जितनी मोटाई का फासला रहे। आप टायलेट पेपर का एक रोल साथ रखा करें मिस्टर योस्सी, सूक्ष्म, नाप-जोख अन्दाजे से करना निरापद नहीं।’’

ठहाके का भागीदार बनने के बाद मैंने इसी पुस्तिका से प्राप्त सूचना के आधार पर फतवा दिया, ‘‘आप लोग बवेरिया के हैं, जर्मनी के नहीं।’’
इस बार ठहाका नहीं लगा। केवल मुस्कराहटें खिलीं। सब तो नहीं, अधिकतर बवेरिया के ही थे और वह हँसोड़ तो बवेरिया के भी हृदय-देश का। बवेरिया, जर्मनी का आल्प (हिमपर्वत) क्षेत्र है और इसके निवासी ज्यादा बोलने वाले, ज्यादा रंगीले, ज्यादा नाटकीय माने जाते हैं।

किसी भी देश के मन और मानस का परिचय देने के लिए जब भी कोई पुस्तक लिखी जाती है, देशवासियों को वह विचित्र अथवा पूर्वाग्रहग्रस्त मालूम होती है। लिखने वाला उस देश के अजनबीपन को रेखांकित करता है, खांटी और परम्परागत को उभारता है। उधर औसत नागरिक यह मानता है कि बाबा आदम के जमाने की इन बातों को हम भुला चुके हैं।
फिर भी किसी भी देश की यह औसत परम्परागत सच्चाई किसी हद तक वहाँ के हर नागरिक पर लागू होती है। जर्मनी की यात्रा में मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ कि ‘दीज स्ट्रेंज जर्मन वेज’ नामक यह पुस्तिका जर्मनों और उनके देश को समझने के लिए बहुत उपयोगी है।

आज जब एक खास तरह की पाँच सितारा उपभोगवादी संस्कृति सारे विश्व में फैल चुकी है, जबकि अंग्रेजी अपने अमेरिकी मुहावरे में विश्व-भाषा बन चुकी है, किसी देश की परम्परागत संस्कृति की बात करना निरर्थक मालूम हो सकता है। जर्मनी के, जो केवल 1871 से लेकर 1945 तक ही एक-राष्ट्र-एक-देश रहा है, जर्मनपन की बात करना तो और भी असंगत प्रतीत होता है। फिर जब हम यह देखते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी का बँटवारा होने पर कुल मिलाकर एक करोड़ सत्तर लाख लोग पूर्व जर्मनी से पश्चिम जर्मनी आ गए, युद्ध के दौरान और युद्धोत्तर आर्थिक चमत्कार के दौरान करोडों और लोग अपना प्रदेश, अपना जिला छोड़कर अन्यत्र बस गए, तब जर्मनी के विभिन्न अंचलों की अपनी अलग संस्कृति की चर्चा करना तो परम मूर्खता ही मानी जा सकती है। विचित्र किन्तु सत्य कि जर्मनी के जर्मनपन की, उसके विभिन्न अंचलों की आंचलिकता की चर्चा करने वाली पुस्तिका में दी गई जानकारी सही है।

उदाहरण के लिए इसमें लिखा है कि जर्मनी में मर्द, औरत की बायीं ओर रहते हुए चलता है। इसलिए कि किसी को अपनी दायीं तरफ रखना, सम्मान देने का ढंग है, इसलिए कि दिल बायीं तरफ होता है और इसलिए भी कि किसी जमाने में मर्द तलवार लेकर चलते थे और तलवारें उनकी बायीं ओर लटकती रहती थीं। यद्यपि पुस्तिका में कहा गया है कि यह परम्परागत रिवाज है और नए जमाने के लोग इसे नहीं मानते तथापि मैंने अनुभव किया कि नए जमाने के लोग भी अधेड़ होते ही परम्पराप्रिय होने लगते हैं। पुस्तिका के अनुसार ही जर्मन रिवाज के मुताबिक सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, किसी भी जगह भीतर जाते हुए मर्द को आगे रहना चाहिए क्योंकि पहले जवांमर्द जाकर देख ले कि स्थिति ठीक-ठाक है तब ही अबला जा सकती है। यह नियम ‘पहले आप’ मार्का विश्व-व्यापी शिष्टाचार के प्रतिकूल है। इसीलिए दो एक बार मैं इसे भूल गया मेरी मेजबान ने इस ओर ध्यान दिलाना जरूरी समझा।

हमारे यहाँ भी लोग-बाग बूढ़े होकर ‘धार्मिक’ होते देखे जाते हैं लेकिन अधेड़ होते ही, पैसा-टका बनते ही ‘सांस्कृतिक’, ‘आंचलिक’ वगैरह-वगैरह हो जाने का जैसा आग्रह जर्मनी में है वैसा शायद दुनिया में कहीं और नहीं। जर्मन आज अपने जर्मनपन की बात नहीं करना चाहता। इस जर्मनपन के चलते वह दो दो विश्वयुद्धों में पिट चुका है। वह इस जर्मनपन के राजनीतिक सैनिक आयाम को भुला ही देना चाहता है। बच रहती है संस्कृति। इसमें भी वह आंचलिकता का आग्रह करता है ताकि कहीं फिर हिटलरी मनःस्थिति की लपेट में न आ जाए। इस सबका एक चमत्कारी परिणाम हुआ है। आधुनिक जर्मन के साहित्य, सिनेमा मंच और रेडियो दूरदर्शन में बोलियों का महत्त्व सहसा बढ़ गया है। हर क्षेत्र में आंचलिक स्थापत्य, तीज-त्योहार रस्मोरिवाज की जबरदस्त वापसी हुई है। आंचलिक स्थापत्य का तो पश्चिम जर्मनी में कुछ ऐसा बोलबाला है कि केवल मकान देखकर आप बता सकते हैं कि आप किस अंचल के हैं। गाँवों-कस्बों के पुराने मकान तो थे ही ऐसे, अब नए मकान भी उन्हीं नमूनों के बनाए जा रहे हैं और सर्वत्र नई पीढ़ी गगनचुम्बी रिहाइशी मकानों का, फ्लैट की जिन्दगी का विरोध कर रही है।

संक्षेप में यह कि पुस्तिका सही है। अगर आप किसी जर्मन स्त्री का हाथ चूमना चाहें तो ध्यान रखें कि यह अनुष्ठान केवल तब किया जाता है जब सिर पर छत हो। (खुले में नहीं) और आपके ओंठों के तथा सुन्दरी की उल्टी हथेली के बीच कागज की मोटाई भर जगह छूटी रहे ऐसा शास्त्रोक्त विधान है। और हाँ यह सूचना दिए जाने पर कोई ठहाके बुलन्द करता है, फब्तियाँ कसता है तो वह बवेरिया का होता है जिस अंचल के लोगों में से जिन्दादिली उसी तरह उठती रहती है जिस तरह उनकी विश्वविख्यात बीयर से झाग।

रात में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप पार करके दिल्ली से आया विमान बदली और फुहार वाली जाड़े की एक सुबह फ्रांकफुर्त्त हवाई अड्डे पर उतर रहा है। विराट हवाई अड्डा जहाँ रोजाना छह सौ फ्लाइट आती-जाती हैं। जिसे और बढ़ाने की योजनाएँ हैं। योजनाएँ, जिनके विरोध में जर्मन युवक प्रदर्शन कर रहे हैं।
पतली लम्बी एक अधेड़ प्लेटिनम ब्लाण्ड (सफेद से सुनहरे से बालों वाली स्त्री) श्रीमती एरिका न्यूबर्ट मुझे लिवाने आई हैं। वह विवाहित हैं कि नहीं यह पूछना पड़ा है क्योंकि जर्मनी में किशोरावस्था पार की हुई किसी भी औरत को कुमारी कहने का रिवाज नहीं है। विवाहित-अविवाहित वे सब ‘फ्राउ’ होती हैं, फ्राउलीन नहीं। और इधर नारी-मुक्ति आन्दोलन के प्रभाव में वहाँ भी औरतों ने नाम के आगे केवल एम.एस. लगाना शुरू कर दिया है-उच्चारण म्यूज। एरिका हवाई अड्डे के विस्तार का विरोध करने वाले ‘इन नाशुक्रों’ से बहुत खफा हैं।

उनका कहना है कि इन्हें समाजवाद के नाम पर बैठे-बिठाए रोटी तोड़ने को मिल गई है। इन्होंने जाना नहीं है कि दुःख किसे कहते हैं, यन्त्रणा कैसी होती है। बस गाँजे का दम लगाया, एक झण्डा उठाया और प्रगति का विरोध करने निकल पड़े। मुझे इनसे नफरत है मिस्टर योस्सी। क्षमा करेंगे मैं बहक गई। और आपकी यात्रा कैसी रही ?

फ्रांकफुर्त्त से रेलगाड़ी में हाइडलबर्ग जाते हुए एरिका से बातें हुईं। युद्ध से पहले या युद्ध के दौरान जन्मे हर जर्मन की कहानी की बुनियाद में पीड़ा होती है। एरिका के पिता एरिका की आँखों के सामने बमबारी में मारे गए। एरिका की माँ ने अपनी बच्ची की खातिर दुबारा विवाह नहीं किया और फिर युवती एरिका ने काफी अर्से तक अपनी बीमार माँ की खातिर अपना विवाह टाले रखा। विलम्ब से उसने विवाह किया एक ऐसे समझदार और सुयोग्य व्यक्ति से जो उसकी माँ की देखभाल करने के लिए तैयार था, किन्तु माँ उनके साथ नहीं आई। एरिका को कोई बच्चा नहीं हुआ। उसके पति रासायनिक इंजीनियर हैं और वह स्वयं अब विशुद्ध गृहिणी है क्योंकि ‘शादी करने मगर गृहिणी न बनने का कोई मतलब नहीं होता मिस्टर योस्सी।’ एरिका अपना फालतू समय क्रिश्चेन डेमोक्रेट दल का काम करने, साहित्य पढ़ने (नहीं लिखा कभी नहीं, मुझे अपनी प्रतिभा के बारे में कोई मुगालता नहीं मिस्टर योस्सी) और विभिन्न संस्थाओं के लिए दुभाषिए, अनुवादक और होस्टेस का काम करने में लगाती हैं। कोई बच्चा गोद क्यों नहीं ले लिया ? ‘गोद ही लेना हो, मातृत्व का इतना ही शौक हो तो एक क्यों मिस्टर योस्सी ? कम से कम आधा दर्जन। अभी इतना पैसा नहीं कि आधा दर्जन बच्चे पाल सकूँ। होगा तो जरूर गोद लूँगी।’

एरिका ने साहित्य का विस्तृत अध्ययन किया है। और उसकी विचाराधारा ऐसी है जिसे ‘अनुदार’ अथवा ‘दक्षिणपन्थी’ कहा जाता है। इससे कुछ अचरज होता है क्योंकि दक्षिणपन्थी व्यक्ति आमतौर से पोंगे और अनपढ़-से होते आए हैं। आधुनिकता और उदारता हमारे लिए पर्यायवाची रहे हैं। किन्तु इधर पश्चिमी देशों में ऐसी भी बिरादरी पनपी है जो आधुनिक होते हुए भी अनुदार है, बुद्धिजीवी होते हुए भी दक्षिणीपन्थी है। एरिका इसी ‘नव-अनुदारवादी’ बिरादरी की सदस्या निकलीं। इस बिरादरी को जैसे समाजवाद के अन्तर्गत निठल्ले लोगों की सहायता करना और फिर उनका प्रगति-विरोध सहना बुरा लगता है, वैसे ही मानवीयता के अन्तर्गत तीसरी दुनिया के काहिल लोगों की मदद करना और फिर उनकी पश्चिम-विरोधी बातें सुनना।

जाहिर है कि एरिका से बहुत बहस होनी थी और हुई। ‘तीसरी दुनिया’ बनाम ‘सम्पन्न पश्चिम’ इस बहस का जर्मनी और यूरोप के दो अन्य देशों की यात्रा में मुझे कई बार सामना करना पड़ा। मेरी यह धारणा बनी कि तेल की कीमतें बढ़ाए जाने के बाद पश्चिमी देशों को जिस आर्थिक संकट’ का सामना करना पड़ा है उसमें तीसरी दुनिया के प्रति उनकी सहानुभूति बहुत कम हो गई है। बहस में हम तमाम तर्क तीसरी दुनिया की ओर से दे सकते हैं-आप हमें लूट कर ही सम्पन्न बने हैं, आप हमारी मदद करते हैं तो मानवीयता के नाते नहीं, शुद्ध व्यावसायिक कारणों से अपना तैयार माल खपाने के लिए, हमारा कच्चा माल लेने के लिए, आपने अपने उद्यमों के लिए हमारा श्रम, हमारी प्रतिभा हमारे प्राकृतिक साधन लिए हैं। लेकिन सारी बहस के बाद यह अकाट्य तथ्य रह जाता है कि सहायता लेने हम ही पहुँचे हैं।

फ्रांकफुर्त्त से हाइडलबर्ग की रेलयात्रा एक घण्टे की है। फ्रांकफुर्त्त जर्मन वाणिज्य-व्यवसाय का विराट केन्द्र है उधर हाइडलबर्ग शान्त एकान्त मध्ययुगीन विद्यापीठ और यह वापसी कुल साठ मिनट में होती है लेकिन इतने क्रमशः कि पता नहीं चलता कब हो गई। जर्मनी के अन्य भागों में भी रेलयात्रा करते हुए मुझे यह प्रतीति हुई कि शहर-गाँव-कस्बा खेत कारखाना जंगल सब यहाँ एक दूसरे से सटा हुआ है और इनमें कोई इतना भारी भेद नहीं है कि सहसा आपको बोध हो। भारत में केरल में यात्रा करते हुए आपको कुछ-कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है। केरल की तरह पश्चिम जर्मनी भी घना बसा हुआ है। (कुल आबादी 6 करोड़ 13 लाख घनत्व 247 प्रति वर्ग किलोमीटर) और पश्चिम जर्मनी के निवासी भी मुख्यतः मध्यमवर्गीय हैं। इतनी आबादी के बावजूद वहाँ की आधी से ज्यादा जमीन कृषि में लगी हुई है (जबकि आबादी का कुल 6 प्रतिशत कृषि-वन जीवी है और सो भी सरकारी प्रोत्साहन से) और बीस प्रतिशत जमीन आज भी जंगलों से ढकी है। जिस जर्मन के भी मकान के आसपास थोड़ी जमीन होती है वह उसमें बागवानी जरूर करता है और हर जर्मन गृहिणी अपने घर की खिडकियों-झरोखों पर छोटे बड़े गमलों से अलग बगीचा बनाती है।

 महानगरों के फ्लैटों तक में भीतर दस-बारह गमले होना आम-सी बात है। कोई आश्चर्य नहीं जो इतनी हरियाली में औद्योगिक केन्द्र भी औद्योगिक न लगते हों। प्रदूषण के प्रति जर्मनी के लोग बहुत चिन्तित और सजग हैं। उन्हें दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हर चीज नए सिरे से बनाने का अवसर मिला है इसलिए वे अपने कल-कारखानों को ऐसा रूप दे सके हैं कि उनसे गन्दगी न फैले और वे सैरे में बहुत खूबसूरती से खप जाएँ। फ्रांकफुर्त्त हाइडलबर्ग रेलमार्ग के इर्द-गिर्द ट्रैक्टर और ट्रकबनाने वाला विख्यात मानहाइम उद्योग-केन्द्र है लेकिन उसके पास से गुजरते हुए यह अनुभूति ही नहीं होती कि धुएँ और लोहे-लक्कड़ की सनीचरी दुनिया से होकर निकल रहे हैं।

हाइडलबर्ग बाहनहोफ (स्टेशन) में ही अच्छा-खासा बाजार है। एरिका यहाँ की किताबों की दुकान में डोरिस लेसिंग का उपन्यास ‘समर बिफोर डार्क’ ढूँढ़ने लगीं जिसका मैंने उनसे जिक्र किया था और जिसे लेसिंग की प्रशंसिका होने के नाते वह तुरन्त खरीदना-पढ़ना चाहती थीं। उपन्यास उन्हें मिला नहीं। वह गुलदस्ता अलबत्ता मेरे लिए खरीद लाईं। मैंने उनसे कहा कि मैं आपके लिए कोई उपहार नहीं लाया हूँ क्योंकि मुझे बताया गया था कि जर्मन लोग उपहार देने लेने में विश्वास नहीं करते। वह बोलीं, ‘‘यह उपहार मैं आपको उस संस्था की ओर से दे रही हूँ, जिसने मुझे आपकी मेजबानी के लिए नियुक्त किया है, इसलिए जवाबी उपहार की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जर्मनों के बारे में आपको और क्या-क्या बताया गया है यह मैं जरूर जानना चाहूँगी।’’

जवाब में मैंने एरिका को ब्रीफकेस में से वही पुस्तिका निकालकर दी। पलट-पढ़कर वह बहुत हँसीं। फिर बोलीं, ‘‘किसी भी देश के लोग स्वयं अपने को कितना कम जानते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने को कितना कम जानता है ! दूसरों को बताना होता है और दूसरे बताते हैं तो लगता है अरे हाँ ऐसा तो है लेकिन फिर भी मन हठ करता है कि ठीक ऐसा नहीं है, गलत समझे हैं वे।’’
स्टेशन से होटल जाते हुए नेकार नदी के दोनों ओर वनाच्छादित पहाड़ियों पर बसे हुए हाइडलबर्ग कस्बे का नजारा किया। जाड़ों की शुरुआत का जंगल-ललछौहें-सुनहरे पत्ते, कुछ टँगे हुए, कुछ गिरे हुए। पतली-सी नदी पुराना सा पुल। मध्ययुगीन इमारतें। घुमावदार सड़कें। पत्थरों से पटे प्रांगण वाले बाजार। एक भव्य दुर्ग-प्रासाद। सब कुछ बहुत साफ-सुथरा धुला-खिला (सफाई के खब्त में जर्मन लोग सड़कें बाकायदा धोने वाले स्वीडनवासियों के भाईबन्द हैं)।
‘‘कैसा लग रहा है हाइडलबर्ग ?’’ एरिका ने जिज्ञासा की।

‘‘बहुत सुन्दर है।’’ मैंने कहा, ‘‘पढ़ा-लिखा होता तो यहीं विश्वविद्यालय में नौकरी ढूँढ़ लेता।’’
‘‘सुन्दरता देखने के लिए वसन्त में आए होते।’’
‘‘पतझड़ का भी तो अपना एक सौन्दर्य है।’’
‘‘हाँ !’’ एरिका मुस्कराईं, ‘‘और आप अधेड़ों को तो वह नजर आना ही चाहिए।’’

घुमावदार सड़क से ऊपर चढ़ते हुए हम एक मध्ययुगीन हवेली में पहुँचे यहाँ कभी छात्रावास और विद्यालय थे। जिन्होंने इसे होटल का रूप दिया है उनकी कोशिश यही रही है कि अब भी यह अगले जमाने का विद्यालय ही नजर आए। वही बेंचें, कुर्सियाँ, डेस्क। वही जगह-जगह सजावटी आखरों में लिखे आप्त वचन। छोटा सा होटल। सराय वाली आत्मीयता। यूरोप में सर्वत्र ऐसे परम्परा परोसने वाले छोटे होटल हैं जिनमें परम्परा के नाम पर सैलानी से लगभग उतना ही पैसा ले लिया जाता है जितना तीन-तारा पाँच-तारा होटलों में। एरिका का प्रस्ताव था कि आप आराम कर लें और दो बजे मुझे लाबी में मिलें। मेरा आग्रह था कि जब यहाँ कुल दो दिन रहना है और इसी बीच फ्रांकफुर्त्त भी घूमना है तब आराम करने की कोई जरूरत नहीं। आध घण्टे बाद चलते हैं।

‘मगर मुझे जरूरत है !’’ एरिका बोलीं, ‘‘मैं सवेरे चार बजे उठी थी कि पति के लिए खाना बनाकर रख दूँ। अपने गाँव से हाइडलबर्ग पहुँचूँ कार से और फिर ट्रेन पकड़कर फ्रांकफुर्त्त पहुँचूँ। चलिए-आपकी बात पर इस जरूरत को अनदेखा भी कर दूँ, लेकिन आध घण्टे में मैं नहाकर तैयार नहीं हो सकती। अगर मर्द को तैयार होने में आध घण्टा लगता है तो सामाजिक गणित के अनुसार एक औरत को कितना लगेगा ? घण्टा ?’’
नहा-धोकर तैयार हुआ और कपड़े पहनने से पहले थोड़ी देर आराम करने के इरादे से बिछौने पर लेट गया। कमरे की दीवार पर टँगे कजरारे मूँछों वाले किन्हीं महानुभाव का फोटो देखते-देखते मुझे झपकी आई फिर नींद तभी टूटी जबफोन की घण्टी बजी। मालूम हुआ कि एरिका आधे घण्टे से लाबी में मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं।

एरिका ने मुझे कुछ इस नजर से देखा मानो कहना चाह रही हों कि आप लोग भी बस हद ही करते हैं। घूमने के लिए वह बेहद सजी-सँवरी थी। सम्पन्न देशों की स्त्री साज-सज्जा और पहनावे पर कितना समय साधन खर्च करने को बाध्य हैं।
सवाल यह था कि मिस्टर योस्सी (जोशी का यह जर्मन उच्चारण मुझे तब तक मान्य हो चुका था) कहाँ का भोजन पसन्द करते हैं ? एरिका के (और पुस्तिका के भी !) अनुसार जर्मन लोगों को जर्मन भोजन विशेष प्रिय नहीं है और जर्मन नगरों में दुनिया के सभी प्रमुख देशों का भोजन परोसने वाले रेस्तारां मिल जाते हैं-भारतीय भोजन भी कई जगह उपलब्ध है। इतालवी फ्रांसीसी, चीनी और मेक्सिकोई भोजन जर्मनों को विशेष प्रिय है। एरिका को मिस्टर योस्सी का यह जवाब कतई पसन्द नहीं आया कि भोजन के मामले में मेरी कोई पसन्द नापसन्द नहीं है, जैसा आप चाहें। एरिका ने जानना चाहा कि पुरबिया लोग इतने अज्ञेय क्यों बनना चाहते हैं ? एरिका के अनुसार भारतीय तो फिर भी गनीमत है कि कभी हाँ-ना ऐसा कह देते हैं, चीनी-जापनी तो बस लगातार मुस्कराकर और सिर हिलाकर काम चलाते हैं !





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