सर्जना पथ के सहयात्री - निर्मल वर्मा Sarjna Path ke Sahyatri - Hindi book by - Nirmal Verma
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सर्जना पथ के सहयात्री

निर्मल वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3017
आईएसबीएन :81-267-1139-6

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इस पुस्तक में देश के लगभग तमाम महत्त्वपूर्ण रचनाकारों-प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, रेणु... इत्यादि पर आलेख

Sarjana Path Ke Sahyatri

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निर्मल वर्मा निश्चय ही हिन्दी के उन रचनाकारों में आते हैं जिन्होंने साहित्य के माध्यम से अपना आत्मीय, जादुई और निराला संसार रचा है। उन्होंने समय-समय पर अपने प्रिय लेखकों-कलाकारों पर लिखा है। इन लेखों में उन्होंने ‘आलोचन की लगी-बँधी खूँटी से अपने को छुड़ाकर’ आत्मीय प्रतिक्रियाओं के प्रवाह में स्वयं को बहने दिया है।

भाषा के नैतिक और आध्यात्मिक आयामों को विकसित करती उनकी ये आत्मीय और पारदर्शी गद्य रचनाएँ मूर्धन्य व्यक्तियों के आलोक और अँधेरे को जिस सजीवता के साथ प्रकट करती है वह दुर्लभ साधना और अनिवार्य जिज्ञासा से अर्जित की जा सकती हैं।

इस पुस्तक में देश के लगभग तमाम महत्त्वपूर्ण रचनाकारों-प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, रेणु, मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती, मलयज और चित्रकारों-कलाकारों-हुसेन, रामकुमार, स्वामीनाथन पर तो आलेख हैं ही बोर्खे़ज, नायपाल, नाबोकोव, राब्बग्रिये और लैक्सनेस पर भी बेहद संजीदगी और तरल संवेदना से लैस रचनाएँ संकलित हैं।
निश्चय ही पाठकों को यह पुस्तक निर्मल जी की अन्य पुस्तकों की तरह बेहद पठनीय और मननीय लगेगी।

 

भूमिका

 

 

मैं समय-समय पर अपने प्रिय लेखकों-कलाकारों पर लिखता रहा हूँ। आलोचना की लगी-बँधी खूँटी से अपने को छुड़ाकर—इन लेखों में मैंने अपने को आत्मीय प्रतिक्रियाओं के प्रवाह में मुक्त बहने दिया है। अब तक ये लेख मेरी निबन्ध पुस्तकों में बिखरे पड़े थे। उन्हें एक जिल्द में एकत्रित करने के पीछे यदि कोई आकांक्षा थी, तो सिर्फ यह कि उन पर पाठकों का ध्यान एकाग्र रूप से अवस्थित हो सके।

साहित्य के बाद चित्रकला और सिनेमा के ‘स्वप्निल यथार्थ’ को मैं अपने सबसे निकट पाता रहा हूँ। अतः जब हुसेन साहब ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं उनकी आत्मजीवनी की भूमिका लिखना चाहूँगा, तो मैंने बहुत खुशी से उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। स्वयं उनकी जीवनी हिन्दी में पढ़ना मेरे लिए एक असाधारण अनुभव था। उसी तरह कुछ वर्ष पूर्व जब राजकुमार के चित्रों की एक एकल पुनरावलोकन प्रदर्शनी वढेरा आर्ट गैलरी में हुई थी, तब मुझे एक ऐसे चित्रकार के काम पर लिखने का दुर्लभ अवसर मिला, जिसकी सृजन-यात्रा के विभिन्न पड़ावों का मैं साक्षी रहा था।

मुझे इस बात का दुख है, कि मैं आत्मीय मित्र स्वामीनाथन् पर अधिक विस्तार से नहीं लिख सका। यदि मुझे मौका मिला तो मैं अकबर पदमसी, नसरीन मुहम्मदी और गायतोंडे के कृतित्व के बारे में भी लिखना चाहूँगा। वे बरसों से मेरे प्रिय चित्रकार रहे हैं, और उसके काम को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला है। खुद अपने लेखन में मैंने उनकी पवित्र सादगी, गहन चिन्तनपरक अन्तर्दृष्टि और कठोर संयमति ऋजुता से बहुत कुछ सीखा है। शायद उनके प्रति अपना ऋण चुकाने का कभी सौभाग्य मिले।

 

15 सितम्बर, 2005 नई दिल्ली

 

निर्मल वर्मा


प्रेमचन्द की उपस्थिति

 

 

प्रेमचन्द की मृत्यु को चार दशक से अधिक बीत चुके हैं। हर दशक के कथाकारों ने उन्हें अपनी-अपनी कसौटी पर परखा है, स्वीकारा है या अस्वीकारा है। ऐसे समकालीन लेखक भी हैं, जिन्हें शायद प्रेमचन्द का नाम ही निरर्थक जान पड़े- क्योंकि उनकी सृजन-यात्रा में वह उन्हें किसी भी रूप में प्रासंगिक नहीं जान पड़ते; किन्तु ऐसे कथाकारों की रचनाओं में भी हमें प्रेमचन्द की अदृश्य छाया मिल जाती है। एक क्लासिक लेखक की यह अद्भुत विशेषता है कि हम उसके आविष्कार को बिना उसके प्रति आभारी महसूस हुए भी अपना लेते हैं- शायद सबसे गहरा प्रभाव वह होता है, जब हम यह तक भूल जाएँ कि इस प्रभाव को हमने कहाँ से, किस स्रोत से प्राप्त किया है। हम अपनी स्वतन्त्रता में एक ऐसी परम्परा का अनुकरण करते हैं, जो हर जगह है और किसी जगह दिखाई नहीं देती।

 क्या आज भी प्रेमचन्द हमारे बीच अदृश्य-रूप से उपस्थित हैं ? मैं आपका ध्यान इस प्रश्न की ओर आकर्षित करना चाहूँगा और यह भी एक लेखक की उपस्थिति से हमारा क्या अभिप्राय है ?

यहाँ सबसे पहले मैं उस भ्रान्ति की ओर संकेत करना चाहूँगा, जिसे एक अर्से से हमारे आलोचकों ने पोषित किया है- वह है किसी लेखक की उपस्थिति या प्रभाव को उसके विचारों या विश्वासों में खोजना, जबकि सत्य यह है कि साहित्य में किसी लेखक के विश्वास उसकी रचनाओं से अलग कोई हैसियत नहीं रखते। मैंने जान-बूझकर ‘साहित्य में’ कहा है, क्योंकि उसके बाहर उसके विश्वासों का अवश्य महत्व होता है, लेकिन बाहर भी अलग से उनके बारे में हमारी जिज्ञासा नहीं जाग पाती, यदि पहले से ही हम उसकी रचनाओं में एक विशिष्ठ यथार्थ से साक्षात्कार नहीं कर पाते। शायद मैं अपनी बात को उलझाकर कह रहा हूँ, वास्तव में बात बहुत सरल है- यदि आज हम अपने बीच प्रेमचन्द की उपस्थिति महसूस करते हैं- तो उनके प्रगतिशील विचारों या यथार्थवाद आदर्शों (या आदर्शवादी यथार्थ- आप जो भी कहना चाहें) के कारण नहीं- बल्कि उनकी रचनाओं में निहित मनुष्य, एक भारतीय मनुष्य की मानसिक बनावट के कारण, जिसे पगने, फूलने में सैकड़ों वर्ष लगे थे- एक स्थिर व्यक्तित्व का चेहरा, जिसका दर्शन हमें पहली बार उनकी कहानियों-उपन्यासों में हुआ था।

एक चेहरे का सत्य नहीं, बल्कि ऐसे सत्य का चेहरा, जिसे उन्होंने शहरी, ग्रामीण, कस्बाती चेहरों के बीच गढ़ा था- औपनिवेशिक स्थिति में रहने वाले एक हिन्दुस्तानी की एक आर्कीटाइप छवि जो उनसे पहले हमारे साहित्य में नहीं थी। किन्तु इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह हैं कि प्रेमचन्द के बाद के कहानीकारों के लिए भी वह छवि अपनी उड़ानों के लिए एक स्थायी आधार-बिन्दु, एक ज़मीन, एक तरह की ‘बेस-कैम्प’ बन गई थी। इस कैम्प के ऊपर जाते हुए अनेक लेखक-पर्वतारोही अपने भीतर प्रेमचन्दीय संसार की तस्वीरें अपने साथ ले गए थे; यात्रा के दौरान इन तस्वीरों में अनेक मोड़-सलवटें, विकार और विकृतियाँ दिखाई दी थीं- बड़े घर की बेटियां अकेली पड़ती गईं, पंच-परमेश्वर की जगह नकली ‘जूड़ास’ आ विराजे, बेकारी और बेरोजगारी के दिनों में बड़े भाई साहब का उत्साह इतना मन्द पड़ गया कि अपने छोटे भाई के साथ गुल्ली-डंडा खेल सकें; प्रेमचन्द का विश्वास कि एक भारतीय मनुष्य- वह किसान हो या निम्न मध्यवर्गीय कस्बाती अर्धशिक्षित क्लर्क या कर्मचारी- अपनी पुरानी खोई हुई खुशी को खोज सकता है- वह बाद के वर्षों में धीरे-धीरे एक मरीचिका-सा बनता गया। यह एक भारतीय लिबरल बुद्धिजीवी की मरीचिका थी, जिसकी झलक पहली बार बीसवीं शती में शुरू में दिखाई दी थी।

हमें हैरानी होगी कि प्रेमचन्द ही नहीं, भारत के अनेक शहरी बुद्धिजीवी- जिनमें स्वयं गांधीजी शामिल थे- (उनके ‘हिन्द स्वराज’ के बावजूद) एक समय में भारतीय समाज की मुक्ति बाहर के दुश्मनों से छुटकारा पाने में खोजते थे- वह चाहे गांधी की आँखों में विदेशी सत्ता हो, या प्रेमचन्द की आँखों में समाज की कुरीतियाँ और अन्धविश्वास हों; आशा यह थी, एक बार इनसे छुटकारा पाने के बाद हम दैन्य और दरिद्रता के आँसू भारतीय चेहरे से पोंछ सकेंगे। यह कुछ वैसा ही भ्रम था, जैसे कोई बीमार आदमी यह सोचे कि उसके रोग का कारण उसके मैले-कुचैले कपड़ों से जुड़ा है- एक बार हिम्मत जुटाकर वह अपने चीथड़ों को उतार फेंके और तब अचानक पहली बार देखे, कि समूची देह कोढ़ के जख्मों से अटी है; रोग कपड़ों में नहीं था, उलटे उन्होंने रोग को अपने भीतर छिपा रखा था। वे सिर्फ बाहर से ही ‘दुश्मन’ प्रतीत होते थे, भीतर का दुश्मन कहीं और बैठा था।

 


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