अठारह उपन्यास - राजेन्द्र यादव Atharaha Upanyas - Hindi book by - Rajendra Yadav
लोगों की राय

विविध उपन्यास >> अठारह उपन्यास

अठारह उपन्यास

राजेन्द्र यादव

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :222
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3021
आईएसबीएन :9788171194421

Like this Hindi book 16 पाठकों को प्रिय

187 पाठक हैं

स्वातंत्र्योत्तर उपन्यासों का मूल्यांकन....

Atharaha Upanyas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो दशक से भी अधिक समय गुजर जाने के बावजूद आज अठारह उपन्यास की प्रासंगिकता बनी हुई है तो इसके कुछ खास कारण हैं। इसमें एक प्रतिष्ठित कथा-लेखक की प्रतिक्रियाएँ भर नहीं हैं, अपने समय की कतिपय महत्वपूर्ण कृतियों को परखने की विशिष्ट समीक्षा दृष्टि भी मौजूद है। एक सर्जक की रचना दृष्टि से लैस समीक्षा इस अर्थ में अलग होती है कि वह रचना और उसकी प्रक्रिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर भी पूरी संलग्नता से विचार करती है। इस रूप में राजेन्द्र यादव, सुमित्रानन्दन पंत, अज्ञेय और मुक्तिबोध के क्रम में एक जरूरी समीक्षा लेकर आते हैं। अठारह उपन्यास के बहाने दरअसल यहां राजेन्द्र यादव इसकी नई समीक्षा दृष्टि लेकर उपस्थित हुए हैं।
उनकी यह समीक्षा दृष्टि,उस समय की कथा-समीक्षा के सिर्फ तत्कालीन या फौरी सरोकारों और मूल्यांकन कर डालने की सीमा में बँधे होने और व्यक्तिगत राय या पसंद बनकर रह जाने के विरोध में ही नहीं, उनके सर्टिफिकेट बन जाने और इतिहास दृष्टि से अछूते रह जाने के कारण भी प्रारंभ हुई थी। जाहिर है ऐसे में रचनाकार, समीक्षक राजेन्द्र यादव ने रचना की जरूरत के मुताबिक नए औजारों की तलाश करते हुए कथा-आलोचना में एक नई शुरूआत की थी। रचना में प्रवेश के लिए राजेन्द्र यादव ने तो कई-कई युक्तियों का इस्तेमाल किया है, पत्र-शैली की सीधी-सरल शैली में भी वे रचना के भेद खोलने में सफल रहे हैं। समीक्षा से रचना प्रक्रिया तक के इस क्रम में राजेन्द्र यादव स्वयं को भी इस तरह शामिल कर लेते हैं जैसे अपने रचनाकार को भी वे एक खास दूरी से देख रहे हों।

औज़ारों की तलाश

पिछले दसियों वर्षों से हमारे यहाँ उपन्यास-समीक्षा की दो-तीन प्रणालियाँ ही प्रचलित हैं; कथासार देकर उसकी स्वाभाविकता-अस्वाभाविकता पर विचार; लेखक की दृष्टि की प्रशंसा-भर्त्सना, कुछ दार्शनिक या राजनीतिक मुहावरों में उसका मूल्यांकन, भाषा-शिल्प पर समीक्षक की प्रतिक्रिया। निष्कर्षतः ‘उपलब्धि’ या ‘दस्तावेज’ जैसे किसी विशेषण की घोषणा। यह समीक्षा विश्वविद्यालयों के आस-पास मँडराती है और एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर के उपन्यासों पर इसका अभ्यास करता है। इस प्रकार की समीक्षाओं को बाद में एक जिल्द में समेटकर कोई भारी-भरकम, डरावना नाम दे दिया जाता है। संपादक होते हैं कोई उपन्यासकार-समीक्षक ‘डॉक्टर’ इस तरह की ‘कृतकृत्यवादी’ समीक्षा अब इतनी पेशेवर हो गई है कि प्रकाशकीय फ्लैप-मैटर लिखने का भ्रम देती हैं। इधर अपने व्यक्तिगत द्वैमासिक-त्रैमासिकों के विशेषरूप से निकाले गए ऐसे विशेषांकों को पुस्तकाकार चला देने की कारीगरी भी जोर पकड़ रही है; एक भूमिका और एक लेख, बाकी संपर्कों के आधार पर एक बड़ी पुस्तक, यानी ‘अपनी रचनाओं’ की सूची में नया कुछ जुड़ने का गर्वीला सुख।

दूसरी प्रणाली के पुरोधा ऐसे लोग हैं, जिन्हें कभी ‘कृति की राह गुजरने’ का सूत्र हाथ लग जाता है, कभी ऋषि और मुनि का भेद। एक बार उन्हें सूझा ‘आर्केस्ट्रा’; तो दर्जनों समीक्षाओं में वे बताते रहे कि कौन साहित्यकार किस वाद्य-यंत्र का माहिर है। नायक-नायिका के किसी संवाद के आधार पर वे कुछ भी सिद्ध कर सकते हैं कभी आधुनिकता-बोध, कभी अलगाव-चेतना और कभी अभिनिवेश; ठीक उसी तरह जैसे रीतिकालीन कविता में अलंकार खोजे जाते थे, उपमाएँ, उत्प्रेक्षा फिट की जाती थीं और उसे ही कविता का मूल्यांकन मान लिया जाता था। यहाँ रचना का बाहरी रूप ही अपने-आपमें अंतिम सत्य है, और यहीं से वे शास्त्रीय कथातत्त्व खोजनेवालों की तरह मशीनी ढंग से और चीजें खोज लेते हैं।
इनसे अलग एक और वर्ग है जो अधिक संवेदना और अंतर्दृष्टि के साथ रचना को समझना चाहता है, मगर हमेशा ही उसका यह साक्षात्कार अधूरा रहता है। शुद्ध अपनी पसंद और मनःस्थिति रचना की कसौटी बनती है। छायावादी तरल भाषा, अश्रु-उच्छ्वासी अनुभव, शरच्चन्द्रीय संबंध-गंधी प्रेम, आध्यात्मिक सरहदों को छूता हुआ ओस-भीगा शरीर; बेसाख्ता मुँह से ‘आह’ निकाल देता है। उर्दू शायरी की तरह ‘वाह क्या बात है’ या ‘बात कुछ बनी नहीं’ के तर्ज पर, साक्षात्कार यहाँ मन को झकझोरता या अछूता छोड़ जाता है।

‘जिंदगी की सचाइयों‘ या ‘जनजीवन की पकड़’ वाली समीक्षकों का आग्रह सिर्फ उतनी ही जिंदगी के लिए होता है जो समीक्षक चाहता है या जैसी जिंदगी का नुस्खा ‘धर्मशास्त्रों’ में दिया गया है। ‘जिंदगी की सचाई’ इस समीक्षक के लिए दुधारा तर्क बनकर आती है उसके न होने का फतवा देकर रचना को दो कौड़ी का बताया जा सकता है और होने की दुहाई देकर महान् सिद्ध कर दिया जाता है। ये दोनों तर्क एक ही रचना की ‘जिंदगी’ पर फ़िट हो जाते हैं। इसमें ‘समीक्षक’ अपने अंदर झाँकने या प्रश्न करने की ज़रूरत बिलकुल नहीं महसूस करता कि जिस जिंदगी की सूचना उसे है, उससे अलग और बाहर भी कहीं कुछ है। जो कुछ ‘रचना में नहीं’ है, उन बहुत-सारी बातों के हवाले देना इस समीक्षाशास्त्र का एक और हथियार है। ‘कुछ है जो रचना में नहीं है, मगर वह है क्यों नहीं ?’ की दलील एक ओर तो रचना को छोटा साबित करती है, दूसरी ओर समीक्षक की जानकारी का आतंक स्थापित करती है। तीसरी ओर, रचना से बच निकलने की अपनी चालाकी को समीक्षक बौद्धिक तेवर प्रदान कर देता है।

मैं सोचता हूँ कि कथा-समीक्षा ने आज अपने को सिर्फ तत्कालीन या फौरी सरोकारों और मूल्यांकन कर डालने की सीमाओं में ही बाँध लिया है। हम सिर्फ़ चौखटाबद्ध प्रवृत्तियों और सद्यःप्रकाशित कृतियों तक ही सिमटकर रह गए हैं। इसमें न तो कभी भी समीक्षा का सही मुहावरा उभर पाता है, न पद्धति का मानकीकरण होता है। हमारी समीक्षा केवल व्यक्तिगत राय या पसंद बनकर रह जाती है; आधार वहाँ रचना नहीं होती, पीछे के व्यक्ति या व्यक्तिगत संबंध होते हैं। इसीलिए बहुत स्वाभाविक है कि आतंकित करने, अपनी बात मनवाने और एकैडैमिक या तटस्थ होने के हथकंडे चाहे जितने अपनाए जाएँ, समीक्षा सर्टिफ़िकेट से आगे नहीं बढ़ पाती। मैं उसे सद्यःप्रकाशित कृतियों का केवल तात्कालिकता में ही उलझ जाने की मजबूरी मानता हूँ; ऐसे में किन्हीं भी पूर्व कृतियों का ज़िक्र वकील के तैयार गवाहों की तरह ही किया जाता है। इतिहास-दृष्टि के अभाव में इससे अधिक कुछ हो भी नहीं सकता। इसे यह भी कह सकते हैं कि कथा-समीक्षा का मानकीकरण तब तक नहीं होगा जब तक काव्य-समीक्षा की तरह कुछ विधा-गत सैद्धांतिक प्रश्नों या पुरानी कृतियों पर नए सिरे से विचार नहीं किया जाएगा। काव्य-समीक्षा में आज भी सूर-तुलसी से लेकर ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘कामायनी’ पर नए दृष्टिकोण से व्याख्याएँ होती हैं, नए-से-नए अर्थ-संदर्भ तलाशे जाते हैं और भाषा से लेकर शैली-विज्ञान, मिथक, बिंब, रसास्वाद की प्रक्रिया और प्रकृति पर विचार किए जाते हैं। कथा-समीक्षा में ऐसी शुरुआत हुई जरूर थी, लेकिन आज दसियों वर्षों से उसके दर्शन कहाँ होते हैं ? परंपरा से न जुड़ने के कारण ही आज हमारे पास न तो समीक्षा की समझ का मानकीकरण है, न मुहावरे का; शायद औज़ार तो हैं ही नहीं। इसीलिए सर्वज्ञ आलोचक अनेक हैं, कथा-विशेषज्ञ समीक्षक एक भी नहीं। हम या तो काव्य-शास्त्र के औज़ारों से काम चला रहे हैं, या दर्शन या अन्य शास्त्रों की बारीक़ियों में घुस जाते हैं। मानवीय अस्तित्व और नियति को समझने के लिए हम शास्त्र या ज्ञान अनिवार्य है, लेकिन हर विधा का अपना एक मुहावरा या अनुशासन होता है और वह पूरे परिप्रेक्ष्य के विचार-पुनर्विचार से ही उभरकर आता है। दार्शनिक प्रतिपत्तियाँ, राजनीतिक स्थितियाँ, समाजशास्त्रीय सूक्तियाँ समझ को धार और शक्ति तो दे सकती हैं, खुद साहित्य की स्थानापन्न नहीं हो सकतीं।

मेरे ख़याल में इलाचंद्र जोशी, शांतिप्रिय द्विवेदी, नंददुलारे बाजपेयी, डॉ.देवराज, भगवतशरण उपाध्याय, शिवदानसिंह चौहान, प्रकाशचन्द्र गुप्त, देवीशंकर अवस्थी, नेमिचंद्र जैन इत्यादि की कुछ उपन्यास-समीक्षाएँ गहरी अंतर्दृष्टि और संवेदना से लिखी गई हैं, कम-से-कम मेरी प्रिय और प्रेरणास्पद समीक्षाएँ रही हैं।

मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मेरी ये समीक्षाएँ भी ऊपर की इन सारी स्थितियों से गुजरी हैं क्योंकि वे 25-30 वर्ष की कच्ची-पक्की अवधि में लिखी गई हैं। हाँ, मैं सिर्फ वहीं रुका नहीं रहा हूँ।

कुछ मनचाही कृतियों पर मैंने लिखा है, कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाएँ छूट गई हैं और कुछ पर लिखने में मैंने अपने को अक्षम पाया है। त्याग-पत्र, गोदान, चित्रलेखा, निर्वासित, संन्यासी, शेखर, बाणभट्ट की आत्मकथा, झूठा-सच, नदी के द्वीप, अजय की डायरी, मैला आँचल, कब तक पुकारूँ ?, मुर्दाघर, आपका बंटी, जिंदगीनामा, रागदरबारी इत्यादि ऐसी कृतियाँ हैं जिनकी अनुपस्थिति खुद मुझे भी खटकती है, मगर हिन्दी-उपन्यास का इतिहास लिखना मेरा प्रयोजन कभी नहीं रहा।
हाँ, संकोच होता है कि 18 उपन्यासों में तीन मेरे खुद अपने हैं। इसीलिए बाकी समीक्षाएँ प्रचलित ‘आयोजन’ जैसी लग सकती हैं। मगर मैं विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि न तो अपने उपन्यासों की समीक्षाएँ इस दृष्टि से लिखी गई थीं, न औरों की। उनके लिखने के अवसर और पीछे के दबाव बिलकुल दूसरे थे। औरों के संदर्भ में भीतरी और अपने संदर्भ में बाहरी। इसीलिए एक लेखक की एक से अधिक कृतियाँ भी हैं। हर बार एक ही तरह के सवाल-जवाबों से बचने की सुविधा के कारण ही वे यहाँ हैं। हाँ, कुछ उपन्यासों पर टिप्पणियाँ या पत्र मैंने परिशिष्ट में दिए हैं।

हो सकता है, और अधिक समर्थ, दृष्टिसम्पन्न समीक्षकों के लिए यह पुस्तक अधिक संपूर्ण लिखने की प्रेरणा बन सके।

-राजेंद्र यादव

 

समीक्षकों को संबोधन

 

‘‘The soul, Peter, is that which can not be ruled.
it must be broken. There are many ways. Make
Man feel small. Make him feel guilty. Kill his
aspiration and his integrity…kill his integrity by
Internal corruption…since the supreme ideal is
beyoud his grasp. he gives-up eventually all the
ideals, all aspiration and sense of his personal
values. He feels himself obliged to preach what
he can not practice..Kill man’s sense of values.
Kill his capacity to recognize greatness or to
achieve it…Don’t deny the concept of greatness.
destroy it from within. Don’t set-out to raze all
Shrines-you will frighten men. Enshrine
mediocrity and shrines are razed. Kill reverence
and you have killed the hero in man.’’

दयनीय महानता की दिलचस्प दास्तान : चंद्रकांता संतति

 

(देवकीनंद खत्री)

 

अक्सर यह प्रश्न बाहर और खुद मेरे भीतर से आया है कि आज जब इतना सब कुछ आस-पास हो रहा है तो मैंने सौ-साल पुरानी चंद्रकांता जैसी किताब पर अपने छः महीने क्यों लगा दिए ? आज उस गड़े मुर्दे को उखाड़ने की क्या मजबूरी या प्रासंगिकता है ?

सबसे बड़ा कारण तो मुझे यही लगता है कि जैसा कैओस, मूल्यों का जैसा घपला, सही-गलत की पहचान का जैसा एक सिरे से गायब हो जाना, उस समय के समाज में या कम-से-कम इस उपन्यास में आया है, लोग जिस आसानी से खैमे बदलते हैं; शायद आज आस-पास की स्थिति एकदम वैसी ही है। और इस बात की पड़ताल मेरे अपने लिए बहुत जरूरी हो गई थी कि उस चतुर्दिक व्याप्त कैओस में वे क्या सूत्र, युक्ति, जिद या आस्था थी जो लेखक को साधे हुए थी; क्या था जो छः हजार पन्नों तक लेखक को चलाए रख सका ? इसके बहाने संभव है, वही चीज मैं अपने भीतर भी खोज सकूँ ! कभी यह भी लगता है कि एक बहुत बड़ा कारण शायद यह भी होता है जब घुटते और जलते हुए मकान से भागकर आदमी भीड़ में आता है, हो सकता है, अपने और समाज के भीतर के शून्य, घुटन और विश्वासों के ढहने से घबराकर देवकीनंद खत्री इस भीड़ में आए हों- पाठकों तक पहुँचे हों और वहीं से उन्होंने शक्ति या धीरज अर्जित किए हों। क्या ऐसा नहीं होता कि बहुत जीवंत संग-साथ देनेवाले, अत्यंत लोकप्रिय लोग अपने भीतर बहुत अकेले होते हैं और तब अभिव्यक्ति और संप्रेषण ही एकमात्र रास्ता रह जाता हो...

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि उस समय का आदमी, चंद्रकांता के कथ्य की तरह बिना अपनी जमीन और जीवन-पद्धति छोड़े हुए ही आधुनिक सुख-सुविधाएँ पा लेना चाहता हो या कहें- सामंती मूल्यों, विश्वासों और व्यवस्था से चिपके रहकर उन्हें पूजते या उनका समर्थन करते हुए ही औद्योगिक सभ्यता के सारे उपकरणों और उपलब्धियों को हथिया लेना चाहता हो। शायद वह यह भूल गया था कि उपलब्धियाँ और उपकरण केवल वस्तुएँ और मशीनें ही नहीं होतीं-एक संपूर्ण व्यवस्था, सभ्यता या मूल्य-पद्धति का सतह पर दीखनेवाला छोटा-सा हिस्सा, आइसबर्ग होती हैं। उनकी अपनी शर्ते या अपने तर्क होते हैं-खेल के नियम। बहरहाल, इसी द्विधा ने उस समय के आदमी को मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक धरातल पर दो हिस्सों में बाँट दिया है-अंदरूनी तिलिस्मी-तिकड़मों और बाहरी छीना-झपटी, आपाधापी में। वे भयानक दिवास्वप्नी लोग हैं जो इन सपनों की कोई एक चाबी तलाश करने के लिए ज़मीन-आसमान एक किए हुए हैं। उनके लिए सही-गलत, वफादारी, विश्वासघात, नैतिक-अनैतिक का कोई भेद नहीं रह गया है या सारे मूल्य एक-दूसरे के स्थानापन्न हो गए हैं। मूल्यहीनता के इस शून्य को आज के आदमी से ज्यादा और कौन महसूस कर सकता है ?

इतिहास जहाँ मोड़ लेता है, वहाँ सामाजिक शक्तियों और समय के दबावों को जबान देनेवाली कोई घटना, आंदोलन या व्यक्ति होते हैं। ये सामाजिक शक्तियाँ विस्फोट से पहले जन-मानस में बहुत धीरे-धीरे और गहराई में पनपती-फैलती हैं और अपनी परिणति में ही जबान पाती हैं। कभी-कभी तो समाज को खुद ही अपने भीतरी दबावों का पता नहीं होता, वह उन्हें सिर्फ महसूस करते हुए अनजाने ही कुछ अलग दिशाओं की ओर देखने लगता है। या कभी-कभी यह भी होता है कि हम पीछे घूमकर देखते हैं कि हाँ, उस बिंदु से समाज का सारा सोच, सरोकार या रुचियाँ एक मोड़ ले रही हैं...फिर और गौर से देखते हैं तो पाते हैं कि वहाँ एक किताब है। अस्पष्ट और बेनाम शक्तियों को दूर से ही ‘सूँघ’ कर पकड़नेवाला कोई संवेदनशील एरियल अपनी निहायत ही व्यक्तिगत परिधि से घिरा, कुछ अनपहचानी आवाजों को पकड़ता है। अकसर उसे खुद भी नहीं पता होता है कि जिस रचना को वह जन्म दे रहा है, उसकी ‘भूमिका’ क्या होने जा रही है ! शायद यही कारण है कि ‘बड़ी किताबों’ के घोषित लेखकीय लक्ष्य आज बहुत अजीब, निर्विशिष्ट और हास्यापद लगते हैं। कम-से-कम उतने महान नहीं लगते, जितने उनके लेखकों ने बताए थे। केवल एक अपवाद है, और वह है-कार्ल मार्क्स; उसे पता था कि वह अपनी किताब से दुनिया के नक्शे को कहाँ और किस आधारभूत स्तर पर बदलने जा रहा है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत या बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में उत्तर-भारतीय या कहें हिंदी-भाषी समाज के मोड़ पर भी एक ऐसी ही किताब है-चंद्रकांता संतति, भूतनाथ-यानी सब मिलाकर एक ही किताब। हम लोगों की पिछली तीन-चार पीढ़ियों का शायद कोई ही पढ़ा-बेपढ़ा व्यक्ति होगा जिसने छिपाकर, चुराकर, सुनकर या खुद ही गर्दन ताने, आँखें गड़ाए इस किताब को न पढ़ा हो। ‘इस किताब के लिए न जाने कितने लोगों ने हिंदी सीखी’ से आगे इस किताब का वास्तविक मूल्यांकन कभी नहीं किया गया। रस-सिद्धांत में यह फिट नहीं होती थी और साहित्यिक उन्नासिक (स्नॉब) वर्ग ऐयारी-तिलिस्मी और घटाटोप घटना-प्रधान शुद्ध मनोरंजनाग्राही उपन्यास को अपनी चिंता के लिए अछूत समझता था।
हम लोगों के संस्कार, रुचियों या मानसिकता को इस किताब ने अच्छी दिशा दी या बुरी, हमें बनाया या बिगाड़ा, इसका जायजा लेना तो आज मुश्किल है, मगर यह सच है कि इतिहास और समाज के मोड़ पर यह किताब है और अपने सारे प्रभाव के साथ दसियों वर्ष मौजूद रही हैः समानांतर तीन-तीन संस्करणों में। यह कहना भी बेहद सरलीकरण है कि इसने पढ़ने के लिए रुचि पैदा की और प्रेमचंद जैसों ने उस रुचि को दिशा दी। हो सकता है इस पुस्तक के हलचल, हरकत और हंगामे-भरे कथानक ने हमें मानसिक सक्रियता में उलझाकर रखा हो, चमत्कार-विश्वासी, आत्मगरिमा-मुग्ध मन में कुछ और अंध-श्रद्धा की परतें डाल दी हों। मगर यह सच है कि इस उपन्यास की जाँच केवल साहित्य के औजारों से नहीं की जा सकती। उस पूरे परिवेश और माहौल को समझना होगा जिसमें इसे लिखा-पढ़ा गया था। कह सकते हैं कि जो जिस तरह का समाज होता है या जिस भीतरी बुनावट में वह साँस लेता है, अपने लिए उसी तरह की किताब चुन लेता है।

सुनते हैं, गेटे के उपन्यास, ‘युवा वेर्देर की अंतर्व्यथा’ उपन्यास ने भी तत्कालीन जर्मन-समाज को इसी तरह पकड़ा था और बंकिमचंद्र के ‘आनंदमठ’ ने भी बंगाली युवा-मन को वैसा ही झकझोरा था। इसी तरह की दूसरी किताब थी ‘देवदास’। अगर अपने समय की कुछ अत्यंत ही लोकप्रिय पुस्तकों के आधार पर किसी समाज के मनोविज्ञान के बारे में नतीजे ही निकालने हों तो मैं कहूँगा कि आंतरिक घुटन और कुंठा में छटपटाते मन को ‘आनंदमठ’ ने आशा और कर्म की उँगलियों से पकड़कर बाहर निकाला था तो दूसरी ओर, बाद में, ‘देवदास’ युवा-मानस की रोमानी निराशा की मृत्यु का शोक-गीत बनकर आया था-अर्थात् अपनी निष्क्रियता और परास्तवृत्ति का जयगान..या कह सकते हैं, सामंती-रूढ़िवाद के दरवाजे पर व्यक्तिगत विद्रोह का टूटकर बिखर जाना। पारो के गाँव की सड़क, बैलगाड़ी, बीमार मरता हुआ देवदास। क्या ये मानवीय तड़प और आग की अकाल मृत्यु से उत्पन्न करुणा से आगे भी कुछ कहते हैं ? इसलिए चाहे ‘वेर्देर’ हो या ‘देवदास’-इन्हें सिर्फ आत्महत्याओं या लेखकों की चरम-निराशा की कहानियाँ मानना जल्दबाजी होगी। रुमानियत की इन्हीं अंधी गलियों के आखिरी छोर पर पहुँचकर हर सामाजिक-मानसिकता की ‘वापसी-यात्रा’ शुरू होती है। इसीलिए शायद ये पुस्तकें-‘दास कैपिटल’, ‘गीता-रहस्य’, ‘मीन-कैम्फ’, ‘टाम काका की कुटिया’ या एकदम ताजी पुस्तक ‘रूट्स’-की तरह समाज की सारी चेतना को दिशा देनेवाली पुस्तकों के मुकाबले नीची नजर से देखी जाती हैं। फिर भी पीछे मुड़कर अपने-आपको पहचानने और समझने की दृष्टि से इनका महत्त्व कम नहीं होता...

मुझे तो अपने स्रोतों को पकड़ने, जानने के प्रयास में बार-बार ‘चंद्रकांता’ या उसकी अगली कड़ी के उपन्यास ही दिखाई देते हैं, वरना बाकायदा उर्दू का आलिम-फाजिल मैं.....

कैसा लगता है, चालीस साल बाद उन्हीं पहाड़ों, गुफाओं, नालों, सुरंगों और जंगलों में घूमना...उन्हीं पेड़ों, मकानों, गलियों और खँडहरों के चक्कर लगाना, तिलिस्मी पुतलों, खटकों और चमत्कारों के बीच अपने-आपको पाना..पिछले दिनों संयोग से मैंने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ और रोहतासमठ के 54 हिस्सों को करीब साढ़े पाँच-छः हजार पन्नों में पढ़ा। याद नहीं पड़ता कभी बीच में पढ़ने का अवसर मिला हो। कुछ तिलिस्मी वर्णनों को छोड़कर प्रायः कहीं भी ‘छलाँग’ नहीं लगाई...इन पन्नों को पढ़ते हुए उस सारी दुनिया को ही अपने भीतर जागते नहीं पाया, साथ-साथ सुरीर-(मथुरा जिले का एक कस्बा) के बचपनवाले दिनों को भी स्मृति छिड़ककर अपने भीतर जीवित कर लिया...जिनके साथ आपके आसंग और स्मृतियाँ सब जुड़े हों, उन्हें फिर से छूना केवल इतना ही भर नहीं होता, अपनी चेतना के उन जाले लगे झरोखों को झटके से खोल देना भी होता है, जहाँ से आपको अपना सारा कुछ छूटा और भूला हुआ दीखने लगे-डॉक्टर के क्वार्टर का बाहरी वरांडा और वहाँ सीढ़ियों, मूढ़े या कुरसी पर आँखों से उपन्यास के पन्नों को जल्दी-जल्दी निगलता लड़का..झुकती साँझ के घिरते अँधियारे में तब तक वह पढ़ता रहता जब तक कि अक्षर एकदम धुँधले होकर धब्बे-से न रह जाते। जैसे ही एक हिस्सा समाप्त होता कि अगला पढ़ने की बेचैनी पागल बना देती,कब मिलेगा ? उसे लेने तीन-चार फर्लांग दौड़कर कस्बे के पुस्तकालय में जाना या केशी महाराज को दौड़ाना और जब तक अगला हिस्सा न मिल जाए तनी हुई नसों में अजीब-सी बेचैन झनझनाहट महसूस करते रहना...तब समझ में आने लगा था कि पिताजी रात को देर-देर तक लालटेन की रोशनी में क्या और क्यों पढ़ते रहते थे ? माँ क्यों नहाना, खाना भूलकर सारे दिन उन पन्नों से चिपकी रहती थीं और उन्हें पता ही नहीं लगता कि हम लोग कहाँ, कितना ‘बिगड़’ रहे हैं...

दूसरा महायुद्ध शुरू हो रहा था और अस्पताल का पच्चीस बीघे का हाता तरह-तरह की गहमा-गहमियों से भरा रहता था। शाम की मोटर से ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ आता था और फिर कंपाउंडर, महाराज, मास्टर साहब या कस्बे के दो-चार महत्त्वपूर्ण व्यक्ति लालटेन के चारों तरफ बैठकर पिताजी से अखबार सुनते रहते कि किस देश का भाग्य बना-बिगड़ा, और उन्हीं के बीच रोशनी की कोई किरण पकड़े मैं सुरंगों और तिलिस्म में भटकता रहता...कहीं कुछ गड़बड़ है और जर्मन-अंग्रेजों में लड़ाई है, जर्मन आर्य हैं और अंग्रेजों को पीसकर रख देंगे-इस खुशी के अलावा ज्यादा कुछ समझ में नहीं आता था।

हर समय दिमाग में भरे रहते थे-किशोरी, कमलिनी, माधवी, दारोगा और भूतनाथ...उसके बाद बरांडे में मेज को खंभे के सहारे डैस्क की तरह टेढ़ा करके, हरी स्याही से अस्पताल के पीले लाइनदार कागजों पर ‘देवगिरि’ को केंद्र बनाकर मैंने अपना उपन्यास लिखना शुरू कर डाला था-नायक का नाम था हेमेंद्र। पता नहीं, वे उपन्यास और नायक आज कहाँ हैं; हाँ अपने छोटे भाई का नाम जरूर हेमेंद्र रख दिया। उस समय लिखना कैसे पागलपन का अजटिल और सहज स्वाभाविक काम था- कल्पना कैसी मन-चेतना पर छा-जानेवाली और सर्वव्यापी दृष्टि में बदल जाती थी। आज तो कोशिश करके भी समय को क्रमबद्ध ढंग से जोड़ नहीं पाता। शायद वह लिखना पाँव की हड्डी टूट जाने के बाद था-‘39’-40 की बात है। आज से शुरू करके वहाँ पहुँचता हूँ तो सभी कुछ उलट-पलट जाता है। बस, सामने आ जाते हैं आस-पास के जंगल,बंबे से लगे फरास के कतार-बद्ध झुंड सरसों और अरहर के मीलों फैले खेत, कुएँ-सब कुछ किसी-न-किसी तिलिस्म से जुड़ा हुआ। हम लोग अकसर ही लाल स्याही से लिख-लिखकर केशी महाराज की कोठरी में धमकी-भरे पत्र छोड़ आते कि अगर हमारी फलाँ शिकायत की या अमुक काम नहीं हुआ तो तुम्हारा सेफ्टीरेजर गायब कर दिया जाएगा। किस तरह सजीव था तब किशोर कल्पना में ‘चंद्रकांता’ का संसार और कितनी ईमानदार थी ऐयारी के बटुए या बेहोश कर डालनेवाली बुकनी की तलाश...

‘बहरहाल, इन दिनों ‘क्राइम एंड पनिश्मैंट’ और ‘ईडियट’ को दुबारा पढ़ने के बीच ‘चंद्रकांता’ के साथ रहना उतना ही आश्वस्तिदायक लगा, हलके-से अवसाद के साथ...अब शायद इस दोस्त से जिंदगी में इतनी आत्मीय मुलाकात न हो पाए...हालाँकि यह भी सच है कि दोस्त के लिए अब निगाह उतनी निर्व्याज और निर्दोष नहीं रह गई है।

सबसे पहला सवाल तो यही सामने आया कि यह इतना बड़ा, साढ़ें पाँच-छः हजार पन्नों का उपन्यास (यहाँ मैं देवकीनंदन खत्री और इस माला में लिखनेवाले उनके पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री-दोनों को मानसिकता की दृष्टि से लगभग एक ही रचनात्मकता के क्रम में रखना पसंद करूँगा) क्या केवल और केवल मनोरंजन के लिए ही लिख डाला गया ? ठीक उसी दृष्टि से जैसे दुनिया का सबसे बड़ा उपन्यास, ‘दास्तान-ए-अमीर-हम्जा’ तैयार हुआ था ? वह समय, समाज दूसरे थे और वहाँ शुद्ध मनोरंजन के लिए राज-दरबारों में इंतिहा फुरसत थी। फिर वे लोग सहज विश्वासी लोग थे और सुननेवाले अमीर या बादशाह न सिर्फ अपने-आपको हम्जा के रूप में सोच सकता था, किसी हद तक उस स्वप्न को जी भी सकता था।

इसीलिए हम्जा के शौर्य, पराक्रम और चामत्कारिक क्षमताओं के पीछे बहुत मोटी और स्पष्ट दृष्टि थी-इस्लाम का प्रचार। हम्जा, उमरू ऐयार की मदद से बड़े-बड़े तिलिस्म तो़ड़ता है, बड़े-बड़े सूरमाओं को रण-क्षेत्र में परास्त करता है और तलवार, खंजर या नेज़ा गले या छाती पर रखकर इस्लाम कुबूल कराता है, कल्मा पढ़वाता है और छोड़ देता है। उसकी बहन-बेटी से शादी करके उसे वहाँ का गवर्नर बनाकर आगे चल देता है। इस प्रकार की दिग्विजय के दौरान तरह-तरह के चित्र-विचित्र मुल्क, राज्य, समुद्र, पहाड़ और भौतिक या दैवी बाधाओं, जादुओं, तिलिस्मों जिन-आसेबों या देवों से मुठभेंड़ करता है। कहानी अनंतकाल तक चलती चली जा सकती है। उपलब्ध 46 भागों को आठ दफ्तरों या जिल्दों में समेटा गया है और इसी हम्जा-दास्तान की पाँचवीं जिल्द का नाम है ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’। कहा जाता है कि खत्रीजी ने इसी से प्रेरणा ली थी। बहरहाल, यह कहानी चाहे कभी से और कितने ही देशों या शासनों की जमीन का रस लेती चली आ रही हो और इसमें कल्पना या खयाली पुलावों के चाहे जितने कुलाबे मिलाए गये हों, अनेक अध्येताओं का विश्वास है कि होशरुबा के सारे पात्र, उनके आपसी आचार-व्यवहार, आदाब-अल्काब अवध और लखनऊ या वहीं के आस-पास के हैं और दुश्मनों या जादूगरों के रूप में भारतीय पात्रों को पहचाना जा सकता है-अपना देव वहाँ राक्षस या दानव का पर्याय हो जाता है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book