दो शरण - दूधनाथ सिंह Do Sharan - Hindi book by - Doodhnath Singh
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दो शरण

दूधनाथ सिंह

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3023
आईएसबीएन :81-267-1216-3

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वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह द्वारा संकलित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की कवितायें

Do Sharan Suryakant Tripathi Nirala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निराला की महत्वपूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपति-भाव के गीतों से सम्बद्ध हैं। भक्ति,प्रार्थना और शरणागति के गीत परिमल संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह अनामिका की माया कविता में हमें सुनाई देती है। या कि ले कर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना-कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी, खिन्नता,मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्ततः शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है।

आराधना और अर्चना में उनकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले अर्चना में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संग्रहीत हैं। गीत-कुंज और उनके अंतिम संग्रह सांध्य काकली में भी यह प्रार्थना क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला प्रार्थना की व्यर्थता की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फैण्टेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आस-पास पहुंचती है। इस तरह निराला के अन्तःसंगीत का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है।

वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने निराला की कविताओं को संकलित किया है। इन कविताओं में मनुष्य की उस आत्मिक मुक्ति की जद्दोजहद को सहज ही परिलक्षित किया जा सकता है, जो दरअसल सम्पूर्ण मानवमुक्ति का एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है।

पहले पुनश्च


आगे जो भूमिका दी गई है, वह आज से लगभग पैंतीस वर्ष पहले लिखी गई थी। लेकिन भूमिका के बतौर नहीं, अपनी किताब ‘निराला: आत्महन्ता आस्था’ के अन्तिम अध्याय के रूप में। हर किताब अपने लेखक को मुक्त करती है, जब वह उसके हाथों से छूटकर बाहर आती है। तब निराला को लेकर एक उछाह था। वह अब भी कम नहीं हुआ, लेकिन किताब से अब एक दूरी बन गई है। दरअसल किताब निराला की कविताओं पर एक रचनात्मक गायन है उसके तर्क में एक संगीत है, जो आलोचना के ‘धर्म’ से थोड़ा अलग है। इसीलिए उसमें पुनरावृत्तियाँ हैं, बात को खूब-खूब बखानने की ललक है। कुछ शब्दों से इतना कमज़ोर किस्म का लगाव है कि उनका साथ छूटता ही नहीं। जैसे ‘उच्छल’। निराला के विश्लेषण में चला गया, और कहीं नहीं चलेगा।..लेकिन इस चयन की भूमिका के रूप में देने के लिए वर्षों बाद अपना ही लिखा हुआ वह आलेख मैंने जब फिर पढ़ा तो मैं यह भूल गया कि इसे मैंने ही लिखा है। उन बातों को दुहराना अब सम्भव नहीं। मुझे लगा कि निराला की इस ‘विनय पत्रिका’ का एक विनम्र आख्यान होने के लायक यह आलेख अभी भी है।

वैसे मैंने सोचा था कि इस चयन के बारे में और कुछ नया लिखूँगा। मैं सदा से नास्तिक हूँ लेकिन इन कविताओं से कभी पीछा नहीं छूटा। वह कवि का आत्म-चीत्कार और अकेलापन है, जो मुझे यूँ खींचता है, या मेरे भीतर संस्कारत: बैठा कोई आस्तिक चोर ? मैं कुछ नहीं कह सकता। जिन चीजों को मैंने वर्षों पहले झाड़-पोंछकर फेंक दिया, वे अकसर एक ‘हेलुशिनेशन’ की तरह लौटती हैं। अपने से निपटना बड़ा कठिन है। तब क्या वह विभोर और विस्मित और आतंकित कर देनेवाला कवित्व है, जो पीछा नहीं छोड़ता ? या कवि का वह शब्दों, लय-वितानों से बच्चों की तरह खेलना है, जो हमें विमुग्ध करता है ? खेलने का कोई नियम नहीं, और फिर भी नियम। एक शब्द, एक लय, एक धुन और एक कलाकृति। कहीं से भी उठाओ और कहीं खत्म कर दो, एक अनहोनी कविता। हर नई कविता में एक नया प्रयोग। एक नया शब्द-कोष। एक नई स्मृति। एक नया वर्तुल वितान।

निराला इतने अनायास कवि कभी नहीं रहे,जितने सन् पचास के बाद अपनी मृत्यु तक। शब्दों के साथ इतने खेल पहले कभी नहीं किए :

अनियारे दृग चपल उपान्तों
झरी रेणुएँ क्लान्तों प्रान्तों
खसे खेल उपवन के शान्तों....
क्या यही बातें हमें आकर्षित करती हैं ?

या परम्परा द्वारा कवि को अकेले छोड़ दिए जाने की जो एकान्तिक पीड़ा है, वह हमारे आगे-पीछे छाया-सी चलती है ?
या कवि का दिन काटे नहीं कटता और वह उसे काटने के लिए बार-बार (एक ही दिन में कभी सात-सात बार) कलम उठाता है ?

वह क्या है ? क्या है वह, जो ‘कुछ नहीं ’ को कविता बनाता है ?

दरअसल निराला की ये प्रार्थनाएँ मध्यकालीन भक्ति-पदों से अलग हैं। वे मध्यकालीन ‘शरण’ को निरूत्तर करती हैं। क्योंकि उनका कोई बँधा-बँधाया पैटर्न नहीं, उसके पीछे कोई निश्चित दार्शनिक अन्तर्धारा नहीं। उनका वैविध्य ‘देवताओं’ का नहीं, ‘अन्तर्वस्तुओं’ का है। यही फर्क इन प्रार्थनाओं को ‘आधुनिक’ बनाता है, क्योंकि वे ‘ट्रेजिक’ हैं, ‘साधनापरक’ नहीं। वे आधुनिक मनुष्य के अन्तर को बेधती हुई दुख-गाथाएँ हैं, जिनके पीछे कोई ‘निर्वाण’ नहीं। वे वैराग्य से नहीं, धरती के राग से उत्पन्न अनुपलब्धियों, आकांक्षाओं, अवहेलनाओं, आसक्तियों और शुभेच्छाओं की बोलती करुणाएँ हैं। उनमें जो आर्त्त-स्वर है, वह आज की दुनिया से समझौता करने में असफल कलाकार की एक बीहड़ चीख़ है, बावजूद इसके निराला के अलावा ये पंक्तियाँ कौन लिख सकता था :

आलिंगित बान्धवता आये
वैभव विपुल परांडमुख जाये
जीवन को यौवन नहलाये
कोई अविनश्वर सर दो।

इलाहाबाद
9.12.2005

- दूधनाथ सिंह

भूमिका
प्रपत्ति-भाव


दुरित दूर करो नाथ अशरण हूँ गहो हाथ।
हार गया जीवन-रण,छोड़ गए साथी-जन,
एकाकी, नैश-क्षण, कंटक-पथ विगत-पाथ।
देखा है प्रात किरण, फूटी है मनोरमण,
कहा, तुम्हीं हो अशरण-शरण, एक तुम्हीं साथ
जब तक शत मोह-जाल, घेर रहे हैं कराल
जीवन के विपुल व्याल, मुक्त करो विश्वगाथ !

निराला की सम्पूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपत्ति-भाव के गीतों से सम्बद्ध है। भक्ति, प्रार्थना और शरणागति के गीत ‘परिमल’ संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह ‘अनामिका’ की ‘माया’ कविता में हमें सुनाई देती है। ‘या कि लेकर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना’-कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी खिन्नता, मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्तत: शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है। आगे चलकर सिर्फ ‘कुकुरमुत्ता’ और ‘नए पत्ते’ में शरणागति सम्बन्धी कोई रचना हमें नहीं प्राप्त होती। लेकिन ‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में उसकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले ‘अर्चना’ में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संग्रहीत हैं। ‘गीत-गुंज’ और उनके अन्तिम संग्रह ‘सांध्या काकली’ में भी वह प्रार्थना-क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला ‘प्रार्थना’ की व्यर्थता’ की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फैंटेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आसपास पहुँचती है। इस तरह निराला के अन्त:संगीत का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है। ‘अन्त: संगीत’ के पिछले अध्याय में निराला के गीतों का विश्लेषण करते हुए मैंने यह बताने की कोशिश की है कि निराला की रचनात्मकता का केन्द्रीय भाव अपनी रचनाओं द्वारा निजत्व की समीपतम पहचान है। यही, निजत्व की समीपतम, पहचान, उनके प्रार्थना-क्रम के इन गीतों में भी अभिव्यक्त हुई है।

अपने समकालीनों में निराला अकेले कवि हैं, जिन्होंने शरणागति के इतने उच्छल और पवित्र गीत लिखे हैं। ‘प्रभु’ की अमर फैंटेसी में कवि का यह करुणा अवसान शुरू-शुरू में आश्चर्यजनक लगता है। ईश्वर की तर्कातीत आस्था से तर्काश्रित अनास्था में लौटने की मनुष्य की विचार-यात्रा का आधुनिक साक्ष्य निराला भी अपनी रचनाओं द्वारा प्रस्तुत करते हैं। खासकर तब, जब वे मृत्यु की अनन्त शक्तिमन्तता का सहज स्वीकार अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करते हैं। इस रूप में निराला बिलकुल आधुनिक चेतना के कवि सिद्ध होते हैं। यही नहीं, जब वे ‘प्रार्थना की व्यर्थता’ की बात उठाते हैं तब भी लगता है कि वे मनुष्य की मरणाशीलता की सीमा से ऊपर ‘प्रभु’ की अनाम, असीम, अमर अर्थवत्ता में अन्तत: शंका व्यक्त करते हैं। यह शंका निश्चय ही मनुष्य के आधुनिक मन की शंका है, जो मृत्यु की सर्वान्त विनाश-लीला के ऊपर किसी भी तर्कातीत आशय में शरण लेने की बात नहीं सोच सकता। इसीलिए निराला की मृत्यु सम्बन्धी रचनाओं की चर्चा करते हुए मैंने कहा कि मृत्यु-भय की तद्वत-स्वीकृति के कारण निराला आधुनिक चिन्ता के कवि ठहरते हैं और मृत्यु के ऊपर ‘प्रभु’ या जीवन की अनश्वरता का चित्र खींचने वाले रवीन्द्रनाथ एक परम्पराबद्ध, पुराने मानस के कवि लगते हैं।

लेकिन धीरे-धीरे निराला फिर मृत्यु के इस सहज स्वीकार से ‘प्रभु’ की उसी तर्कातीत आस्था की ओर बढ़ते हुए दिखाई देने लगते हैं। इस रूप में वे अतिशय पुरातन और परम्पराबद्ध कवि लगते हैं। आस्था और अनास्था के बीच की उनकी यह भटकन आधुनिक मनुष्य की सच्ची ट्रैजेडी का प्रतीक है, जिसके सामने कोई विकल्प नहीं रह गया है। न तो वह सम्पूर्णत: ‘प्रभु’ की आस्था को पकड़कर सुरक्षित बच जाने की मन:स्थिति को अपने आधुनिक मन के अनुकूल पाता है और न ही वह तर्काश्रित अनास्था को अपनाकर अस्तित्व के रहस्यों से भय-मुक्त हो पाता है। यहीं पर आकर निराला के इन शरणागति के गीतों को लेकर, मन में उठा हुआ आश्चर्य समाप्त हो जाता है और उनकी वास्तविकता समझ में आने लगती है। सम्भवत: इसी नुक्ते-नज़र से निराला के शरणागति के गीतों का महत्व समझा जा सकता है। दरअसल निराला का सम्पूर्ण जीवन आधुनिक मनुष्य की जीवन-त्रासदी का प्रतीक है। उनके सारे निजी दुखान्त, आधुनिक संवेदनशील मनुष्य के दुखान्तों के प्रतीक बन जाते हैं। धीरे-धीरे उनके जीवन की व्यक्तिगत दुर्घटनाएँ झीनी पड़ती हुई तिरोहित हो जाती हैं और वे एक अमूर्त दुखान्त के प्रतीक के रूप में बाकी रह जाते हैं। उनकी आत्म-पराजय, उनका निरन्तर बना रहने वाला, आत्म-रक्षण, उनका ‘नैश एकाकीपन’ उनका मृत्यु-भय और उनकी कारुणिक आत्म-जर्जरता-ये सभी आधुनिक मनुष्य की त्रासदी का रूप ले लेती है। जिसे अल्बेयर कामू मनुष्य की एक कुदान (Leap) कहते हैं-वैसी ही कुदान निराला लेते हैं। मृत्यु के सहज-स्वीकार से अस्तित्व विनाश से उत्पन्न अनन्त भय के घटाटोप को फाड़कर वे जितनी बार बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, शायद वह घटाटोप उन्हें फिर उसी तरह चारों ओर से घेरकर अपने अन्दर बन्द कर लेता है। इसी को निराला कभी ‘घिर गए हैं मेह, प्रलय के प्रवर्षण’ कभी ‘केवल छाया विशाल,’ कभी ‘गुहा-गर्त्त-प्राचीन रुद्ध’ कहकर बार-बार व्यक्त करते हैं। भय की इसी अनिवार स्थिति से निराला प्रार्थना भूमि पर उतरते हैं :

शरण में मरण का मिट गया महादुख
मिला आन्नद-पथ पाथ, संसृति सजी।

निराला के इन प्रार्थना गीतों का गहराई से अध्ययन करने पर उनमें एक सूक्ष्म विकास-क्रम परिलक्षित होता है। प्रारम्भ में यह प्रार्थना एक प्रकार से अपने अन्धकार से मुक्ति के लिए है। दैन्य और हल्की करुणा की शुरूआत यहाँ दिखाई देती है। ये प्रार्थनाएँ बहुत कुछ अमूर्त हैं। कवि अपने आराध्य को टटोलता-सा नजर आता है। उसकी आस्था स्पष्ट नहीं दिखाई देती। सांसारिक असफलता की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप ही ये प्रार्थनाएँ प्रकाश में आई हैं। इनमें टूटकर शरण खोजने का भाव अभी उतना प्रबल नहीं है। इसके अतिरिक्त ये प्रार्थनाएँ अपनी ऊर्जस्वित काव्य-गरिमा को पुन:पुन: उपलब्ध करने के लिए भी की गई हैं।

फिर धीरे-धीरे उत्तरोत्तर शरणागति की गहनता शुरू होती है। यहाँ से आत्म-जर्जरता और दैन्य का प्राबल्य दिखाई देने लगता है। फिर पूर्ण शरण की प्रार्थनाएँ बार-बार लौट-लौट आती हैं। अन्तत: कवि को यह अनुभव होता है कि उसकी प्रार्थना सफल हुई है। इस अनुभूति के बाद उसका दैन्य, उसकी आत्म-जर्जरता, आत्म-क्षय की निरन्तर बनी रहनेवाली उसकी कारुणिक अनुभूति धीरे-धीरे तिरोहित होने लगती है। और ‘प्रभु’ की अनन्त कृपा के प्रभाव से उत्पन्न अपने मन की स्नेहिल पावनता और निष्काम भाव का बड़ा ही भावमय वर्णन वह करता है। इसी भूमि पर आकर निराला परम्परागत भक्ति के विचार से अलग हो जाते हैं। अपनी मुक्ति के पश्चात् वे उस ‘अखिल कारुणिक मंगल’ का प्रसार सारी प्रकृति में, सारे जीवन और जगत में देखते हैं। यही नहीं, वे अपनी प्रार्थनाओं में भी बार-बार वरदान और आशीष सिर्फ अपने लिए ही नहीं माँगते। वे सारे ‘जाति-जीवन की निरायमता’ के आकांक्षी हैं। जहाँ वे ‘सिर पर स्वर्गाशिप टूटने’ की बात भी करते हैं, वहाँ भी सिर्फ वे अपने को ही आशीष-युक्त नहीं देखते, बल्कि संपूर्ण प्रकृति में उसका अनन्त प्रसार देखते हैं। इस प्रकार निराला अपने इन प्रपत्ति-भाव के गीतों में भी दैन्य, आत्म-क्षय, भय और कारुणिक जर्जरता से पुन: आस्था, विमुक्ति, आत्म-शक्ति, निष्कामता और नि:संशय मन: स्थिति की ओर लौटते हैं।

निराला की प्रारम्भिक प्रार्थनाएँ मुख्यत: अपने अँधेरे से मुक्ति की प्रार्थनाएँ हैं। लेकिन यहाँ भी कवि मात्र अपने निजी अन्धकार से ही मुक्ति की इच्छा नहीं व्यक्त करता। वह अन्धकार, वह जड़ नैराश्य जो सम्पूर्ण प्रकृति सारे मानव जीवन, सारे राष्ट्र के जीवन को आच्छादित किए हुए हैं-उससे भी मुक्ति का इच्छुक है। वह सिर्फ अपने को ही नहीं, सारे संसार को ज्योतिर्मय देखना चाहता है। वह अपने निजी नैराश्य के अँधेरे से इतना टूटा हुआ नहीं है कि शेष सब कुछ से अपने को काट ले। इसीलिए शुरू में वह अक्सर सूर्य और उषा की प्रार्थना करता हुआ दिखाई देता है। ‘परिमल’ की ‘प्रार्थना-1’ ‘भर देते हो’ और ‘विस्मृत भोर’ में प्रकाश की यही प्रार्थना व्यक्त हुई है। इसमें प्रार्थना के आवाहन और आशीर्वाद की प्राप्ति-ये दोनों अनुभूतियाँ व्यक्त हुई हैं। इन प्रार्थनाओं में कवि का भीतरी और बाहरी अन्धकार एकमेव हो गया है। इसीलिए मुक्ति की यह प्रार्थना निजी और सार्वजनिक-दोनों ही है :

(1)

जग को ज्योतिर्मय कर दो !
प्रिय कोमल-पद-गामिनी ! मन्द उतर
जीवन्मृत तरु-तृण गुल्मों की पृथ्वी पर
हँस-हँस निज पथ आलोकित कर,

नूतन जीवन भर दो !-
जग को ज्योतिर्मय कर दो।

(2)

भर देते हो,
बार-बार प्रिय करुण की किरणों से
क्षुब्ध हृदय को पुलकित कर देते हो।
अन्धकार में मेरा रोदन
सिक्त धरा के अंचल को करता है क्षण-क्षण
कुसुम-कपोलों पर वे लोल शिशिर-कण
तुम किरणों से अश्रु पोंछ लेते हो
नव प्रभाव जीवन में भर देते हो।

(3)

जीवन की गति कुटिल अन्ध-तम-जाल
फँस जाता हूँ, तुम्हें नहीं पाता हूँ प्रिय,
आता हूँ पीछे डाल-
रश्मि-चमत्कृत स्वर्णालंकृत नवल प्रभात
हरित ज्योति-जल-भरित सरित, सर, प्रखर-प्रपात
बढ़ जाता-
प्रति-श्वास-शब्द-गति से उस ओर
जहाँ हाय, केवल श्रम, केवल श्रम
केवल अन्धकार, करना वन पार
मुझे फेर दो प्रभो, हेर दो
इन नयनों में भूला भोर।

यहाँ पहली बार ‘प्रभो’ सम्बोधन निराला की कविता में आया है। कविता अपने क्षेत्रों के सघन अँधेरे को फिर से प्रकाश से उद्भासित करने की प्रार्थना करता है। जीवन के ‘कुटिल अन्ध-तम-जाल’ में वह बार-बार घिर जाता है। उसे मालूम है कि इस अँधेरे से बाहर एक सुनहला नया प्रभात भी है; नदी, तालाब, झरने हरे-भरे जल से लबालब भरे हुए हैं। कवि इस कर्म-संकुल संसार में बार-बार इस प्रकाश को पीछे छोड़कर कठोर श्रम और असफलता के अँधेरे वन की ओर चला जाता है। जहाँ केवल ‘हाय-हाय’ मची है-दुख, विनाश मृत्यु और कर्म-संकुलता का घनघोर अँधेरा-यहीं पर आकर कवि पुन: प्रकाश को लौटालने की प्रार्थना करता है। ‘जीवन्मृत तरु-तृण-गुल्मों’ वाली माँ धरती के पग-पग पर फैले घने अँधेरे को ‘ज्योति प्रपात’ से नहला देने की प्रार्थना करता है। यहाँ आकर उसके और फूलों के कपोलों पर बिखरे आँसू अलग-अलग नहीं रह जाते। कवि अपने अँधेरे को सम्पूर्ण पृथ्वी के अँधेरे से एकमेव कर देता है। उसे अन्तत: वह प्रकाश की किरण सम्पूर्ण जीवन-जगत, उसके सम्पूर्ण भीतरी-बाहरी अँधेरे को आलोकित करती हुई दिखाई देती है। प्रकाश की उज्जवल और पवित्र अनुभूति से घनीभूत-वह गद्गद, आत्म-तुष्ट और कृतज्ञ हो उठता है। उसे ऐसा नहीं लगता कि अँधेरे से मुक्ति सम्भव नहीं है। बावजूद इसके कि एक हल्का सा दैन्य यहाँ से उसके अन्दर पनपता हुआ दिखाई देता है अँधेरे से मुक्ति का आत्म-तोष और कृतज्ञता ही इन प्रार्थनाओं में अधिक व्यक्त हुई है। निराला के इन भक्ति-गीतों में प्रारम्भ से ही यह विशेषता दृष्टिगोचर होती है। उनकी प्रार्थना निजी होते हुए भी सार्वजनिकता की ओर सदा उन्मुख है।

अँधेरे से मुक्ति के लिए सूर्य-प्रार्थना का यह क्रम ‘परिमल’ तक ही सीमित नहीं रहता। आगे चलकर ‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में भी सूर्य प्रार्थना के बीच दिखाई पड़ते हैं। यहाँ भी अपने स्वर-संगम को पुन: प्राप्त करने के लिए की जानेवाली प्रार्थना के साथ ही, सम्पूर्ण जीवन-जगत और प्रकृति को अन्धकार से मुक्त करने की प्रार्थना कवि ने की है। अन्दर और बाहर दोनों की जड़ता, नैराश्य, जर्जरता और अवसाद-एक ही साथ दूर हो जाएँ, यह उसकी उत्कट इच्छा है। उसके कृपा-भाव की माँग किसी व्यक्तिगत मोक्ष या शरणागति से ही परिचालित नहीं है। वह इन प्रार्थनाओं में उतना विरक्त और एकाकी भी नहीं दिखाई देता, जिससे वह अपने एकान्त आत्म-समर्पण द्वारा व्यक्तिगत मोक्ष की इच्छा जाहिर करे। अभी वह जीवन्तता और रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ लगता है। बस, जैसे किसी बड़े पत्थर के सामने पड़ जाने से उसकी अबाध सृजन-धारा रुक गई है। वह उसे फिर से गतिवान बनाने के लिए व्याकुल है। इसीलिए वह बार-बार अपनी कविता को ओजस्वी बनाने के लिए, अपने ‘हृदय-निकेतन’ को स्वरमय कर देने’ को लिए प्रार्थना करता है। इसीलिए वह ‘अन्धता में खोए हुए जीवन’ पर किरणों का उत्थानमय स्पर्श पाने को व्याकुल है। जो प्रवाह, जो गीत, जो रचना-ऊर्जा रुक गई है उसे सहज-प्रवाहित होने देने के लिए वरदान माँगता है।

(1)

सविते, कविता को यह वर दो
हृदय-निकेतन स्वरमय कर दो।
एक दिवस के जीवन में जय
जरा-मरण-क्षय हो नि:संशय
जागे करुणा अक्षतपश्चय
काल एक को सुकराकर हो।

(2)

तिमिरदारण मिहिर दरसो।
ज्योति के कर अन्ध कारा-
गार जग का सजग परसो।

खो गया जीवन हमारा,
अन्धता से गत सहारा;
गात के सम्पात पर उत्थान
देकर प्राण बरसो।

क्षिप्रतर हो गति हमारी
खिले प्रति-कलि-कुसुम क्यारी,
सहज सौरभ से समीरण पर
सहस्त्रों किरण हरसो।

इसी को कवि ‘खग को ज्योति: पुंज प्रात’ कहता है, कभी अपने लिए ‘कविता के प्रपात’ के रूप में तो कभी ‘अविरत मारण-मरण हाथ’ के रूप में माँगता है। इस तरह की प्रार्थनाओं में शरणागति का भाव अभी नहीं झलकता है। इसीलिए उसकी प्रार्थनाएँ अभी एक तरह से अरूप-अमूर्त हैं। सूर्य भी यहाँ परम्परागत सूर्य-देवता के रूप में नहीं आया है, बल्कि वह अमूर्त प्रकाश-देवता का प्रतीक ही अधिक है।

प्रार्थना के इसी अमूर्त क्रम से निराला मातृ-वन्दना की मूर्त और उच्छल प्रार्थनाओं की ओर उन्मुख होते हैं। मातृ-वन्दना का यह प्रारम्भ ‘परिमल’ की ‘आवाहन’ कविता को माना जा सकता है। यह गीत सीधे-सीधे ‘माँ काली’ की प्रार्थना है। निराला ने स्वामी विवेकानन्द के एक गीत ‘नाचुक ताहाते श्यामा’ का अनुवाद भी किया है, जो ‘अनामिका’ में संग्रहीत है। ‘आवाहन’ में भी ‘श्यामा’ के नाचने का ही जिक्र आया है। इस गीत में निराला ने तान्त्रिक बिम्बों का बड़ा ही खूबसूरत प्रयोग किया है। ‘मेखला-मुंड’ ‘भैरव-भेरी’, खड्ग और खप्परधारिणी काली का सजीव चित्र इन बिम्बों के भीतर से कवि ने खड़ा किया है। ‘श्यामा’ की प्रार्थना से सम्बन्धित एक और गीत ‘अर्चना’ में ‘श्यामा-श्यामा के युगल पद’ के रूप में मिलता है। अन्तर यही है कि यहाँ ‘श्यामा’ के साथ ‘श्याम’ के पदों की वन्दना भी कवि ने की है। निराला के सारे संग्रहों से मातृ-वन्दना के इन गीतों को एकत्र करने के पश्चात् उनका अध्ययन करने पर मुझे उनके ‘जननि’ सम्बोधन में बहुत विविधता मिली। यह सिर्फ बंगाल की दुर्गा-पूजा या शक्ति की आराधना के प्रभाव-स्वरूप ग्रहण किया सम्बोधन मात्र नहीं है। यद्यपि यह भी सच है कि उनकी मातृ-वन्दना सम्बन्धी कई गीतों की प्रेरणा दुर्गा या शक्ति की आराधना से ही मिली है। लेकिन इस संबोधन के विविध रूप उनके इन गीतों में मुझे देखने को मिले। मातृ-वन्दना सम्बन्धी कई गीत तो सरस्वती की प्रार्थना से सम्बन्धित हैं। कई गीत ऐसे भी हैं, जिनमें ‘भारत-माता’ की प्रार्थना की गई है। जैसा ‘भारती, जय, विजय करे’ में। इन विविधताओं के अतिरिक्त बहुत सारे मातृ-वन्दना के गीत ऐसे भी हैं जिनमें ‘जननि’ या ‘माँ’ सम्बोधन एकदम अमूर्त है। उसे किसी भी अर्थ में ग्रहण किया जा सकता है। जैसे ‘अनगिनत आ गए शरण में जन, जननि,‘ ‘प्रात तव द्वार पर,’ ‘मां,’ ‘एक ही आशा में सब प्राण,’ ‘हे जननि, तुम तपश्चरिता’ इत्यादि गीत। इस प्रकार निराला के मातृ-वन्दना सम्बन्धी गीतों को, अध्ययन की सुविधा के लिए निम्नलिखित उप-वर्गों में विभाजित किया जा सकता है :

1. दुर्गा या शक्ति की आराधना सम्बन्धी मातृ-वन्दनाएँ।
2. भारत-माता की प्रार्थना के रूप में लिखी गई मातृ-वन्दनाएँ।
3. सरस्वती की उपासना सम्बन्धी वन्दनाएँ।
4. सरस्वती और भारत-माता को एकमेव मानकर की गई प्रार्थनाएँ।
5. ऐसी मातृ-वन्दनाएँ जिनमें ‘जननि’ सम्बोधन बहुत कुछ अमूर्त है।









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