तीन एकांत - निर्मल वर्मा Teen Ekant - Hindi book by - Nirmal Verma
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तीन एकांत

निर्मल वर्मा

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :75
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3025
आईएसबीएन :81-267-1062-4

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निर्मल वर्मा की तीन कहानियाँ ‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीकएंड’।

Teen Ekant

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आमतौर पर हिन्दी की अधिकांश कहानियों में स्मृति का इस्तेमाल है निर्मल वर्मा के यहाँ स्मृति को जीने की कोशिश। यहाँ ‘रिकलेक्शन’ नहीं ‘मेमोरी’ है। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि निर्मल वर्मा की कहानियों में उनके पात्र महत्त्वपूर्ण हैं या वे दृश्य, जिनमें रोजमर्रा की जिन्दगी की बहुत छोटी छोटी चीजें एक आत्मीय लय के साथ मन के भीतर खुलती हैं।
मेरा खयाल है-बिलकुल निजी अनुभव के साक्ष्य पर यह बात कह रहा हूँ-कि अपने मन में निर्मल वर्मा की कहानियों को पाकर हम मानवीय संबंधों की गहराई में उतरते हैं। यह इसलिए मुमकिन होता है कि निर्मल वर्मा की कहानियों में व्यक्तिमत्ता है और समग्र कथा-प्रवाह को बेहद ऐन्द्रिक भाषा के सहारे, हमारे अन्तर्जीवन से जोड़ दिया गया है। यह कोई चिपकाने की कला नहीं है, बल्कि संश्लेषण है। इस अनुभव से गुजरते हुए प्रायः हम तथाकथित मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दयनीय सीमाओं से परिचित होते हैं।

 

एक अनुभव

एक बार लिखी जाने पर किसी कृति की क्या नियति होती है, इसका रहस्य शायद कोई भी लेखक नहीं जानता। बहुत वर्ष पहले बेकारी के खाली दिनों में मैंने ‘माया-दर्पण’ कहानी लिखी थी। तब यह कल्पना असम्भव थी कि एक दिन वह मेरी अन्य कहानियों को पीछे छोड़कर फ़िल्म के योग्य मानी जाएगी। इसी तरह जब हाल में मेरी इन तीन कहानियों (थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड) को नाट्य-मंचन के लिए चुना गया तो इसीलिए नहीं कि मैंने उन्हें ख़ास स्टेज के लिए लिखा था। उनके बीच एकमात्र समानता यह थी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गई थीं, जब अकेले क्षणों में व्यक्ति अपने से ही बोलने लगता है। यह वार्तालाप ‘बाहर की दुनिया’ से नहीं है, इसलिए परम्परागत अर्थ में इसे नाटकीय संवाद नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ ‘स्व’ ही लड़ाई का मैदान बन जाता है—अपनी भोगी हुई लांछना, पश्चात्ताप, विडम्बनाओं से घिरा हुआ—और इसी में इन शब्दों की लावारिस-सी नाटकीयता निहित है।

यह सोचना भ्रामक होगा कि ‘नाटकीयता’ केवल नाटक-विद्या की संपत्ति है—दरअसल कला की हर विद्या अलग-अलग ढंग से नाटकीय होती है, क्योंकि वह अलग-अलग रूपों में अपने को दुनिया से जोड़ती है (चाहे वह भीतर की दुनिया क्यों न हो)। जब किसी ने प्रसिद्ध उपन्यासकार हेनरी जेम्स से कला के रहस्य के बारे में पूछा तो उन्होंने केवल दो शब्दों में उत्तर दिया : ‘Only dramatize’। जिस तरह नाटक में परदा उठते ही प्रतीक्षा करने लगते हैं कि ‘अब कुछ होगा’, उसी तरह जब कोई अनुभूति अपने मूक अँधेरे से उठकर शब्दों के प्रदेश में रास्ता टटोलती है, तब अचानक कुछ होने लगता है। यह स्फुरण-बेलौस, गूँगे अस्तित्व में कुछ होने का कम्पन-कुछ और नहीं, सिर्फ़ वह नाटकीय तत्त्व है, जिसके बिना नाटक ही नहीं, हर कला-विद्या ममृतप्राय हो जाती है। नाटकीयता हर कला-विद्या में मौजूद रहती है, किन्तु हर विद्या नाटक नहीं होती।

इसलिए कहानी के ‘नाटकीकरण’ पर बहस एक हद तक निरर्थक है। कोई भी सार्थक कथा-प्रयोग अपने में नाटकीय होगा, यह मैं मानता हूँ। किन्तु यह मंचन के लिए भी उपयुक्त होगा, यह ज़रूरी नहीं है। नाट्य-मंचन के लिए एक कहानी की विषय-वस्तु निर्णयात्मक महत्व की नहीं, बल्कि वह फ़ॉर्म, वह तंतुजाल महतत्त्वपूर्ण है, जिसमें कहानी के नाटकीय तत्वों को बुना गया है। कहानी के फ़िल्मीकरण और नाटकीकरण के बीच यह मूलभूत अन्तर है। किसी भी कहानी का फ़िल्मीकरण महज़ उसकी विषय-वस्तु के आधार पर हो सकता है, क्योंकि फ़िल्म-निर्देशकों के लिए वह ‘कच्चे माल’ से अधिक महत्व नहीं रखता। दूसरी ओर, नाट्य-मंचन में कहानी का टेक्स्ट उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना स्वयं नाट्य-कृति का टेक्स्ट होता है—उसमें दृश्य और शब्द दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, अन्योन्याश्रित हैं। मंच की रोशनी में दोनों ही एक-दूसरे को उजागर करते हैं।

अतः कहानी को तोड़-मरोड़कर, उसके शब्दों को बदलकर, उसके फ़ॉर्म को भंग करके नाट्य-मंचन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता—तब वह कहानी का नहीं, कहानी के बहाने एक ‘नए’ नाटक का मंचन होगा। न ही उसका मंच-पाठन (जब एक अभिनेता मंच पर किसी कहानी को अपने हाव-भाव, संकेतों, स्वर के उतार-चढ़ाव द्वारा नाटकीय ढंग से पढ़ता है) कहानी के नाटकीकरण की समस्या को सुलझा सकता है, क्योंकि समस्त नाटकीय संकेतों के बावजूद, वह मूल रूप से, ‘कथा-पाठन’ ही माना जाएगा। इससे कहानी के टेक्स्ट की रक्षा तो हो जाएगी, किंतु उसके मंचन की समस्या नहीं सुलझ सकेगी। चुनौती कहीं इन दोनों के बीच है, जब कहानी के मूल स्वभाव को विकृत किए बिना उसे मंच पर इस तरह प्रस्तुत किया जाए, जहाँ वह एक ही समय में नाटक का ‘इल्युज़न’ दे सके और दूसरी ओर, कहानी की आत्यन्तिक फ़ॉर्म और लय को अक्षुण्ण रख सके। यहाँ समस्या कहानी के नाटकीय तत्वों को चुन-चुन कर स्टेज पर सजाना नहीं है, बल्कि उस समूची नाटकीय लय को मंच पर पुनर्जीवित करना है, जो कहानी के भीतर अदृश्य रूप से व्याप्त है। अतः कहानी के सार्थक मंचीकरण में अभिनेता (या अभिनेत्री) एक साथ कहानी को ‘पढ़ते’ हैं और उसे जीते हैं। हर शब्द अपने में एक एक्ट है,
महज़ एक्ट करने का माध्यम नहीं। शुद्ध नाटक के मंचन में अभिनेता शब्दों से एक स्थिति पैदा करता है और फिर स्थिति को झेलता है; किंतु कहानी के मंचन में टेक्स्ट का हर शब्द अपने में एक स्थिति है, उसे बोलना ही स्थिति को झेलना है।
यह शायद सिर्फ़ संयोग नहीं था कि जिन कहानियों को मंचन के लिए चुना गया, वे कमोबेश ‘स्मृति’ में आकार ग्रहण करती थीं। तीनों पात्र किसी-न-किसी ढंग से अपने अतीत को वर्तमान में जीते हैं, गुनते हैं, उसके साथ सुलह करना चाहते हैं। स्मृति की यह विशेषता है (और इसमें एक स्वप्न से मिलती-जुलती है) कि उसमें शब्द अन्त तक पहुँचने का महज़ रास्ता-भर नहीं है, वे घटना का अन्त जानते हैं, अतः वे उसे अपने भीतर लेकर चलते हैं। जो व्यक्ति याद करता है, वह समग्रता (totality) में याद करता है। जिस प्रकार एक बार पूरा चित्र देखने के बाद यदि हम उस चित्र का सिर्फ़ अंश या डिटेल देखें तो उस अंश में भी हम चित्र की सम्पूर्णता देखते हैं (या उसकी झलक याद रखते हैं), उसी प्रकार स्मृति का हर शब्द अपने में सम्पूर्ण है, क्योंकि वह अन्त की सम्पूर्णता का ही अंश है। इसलिए स्मृति के शब्द एक साथ अभिशप्त और मुक्त होते हैं—अभिशप्त इसलिए कि वे कहानी दुहराते मात्र हैं, उसे बदल नहीं सकते—मुक्त इसलिए कि वे उस कहानी के अन्त की अनिवार्यता जानते हैं—दुहराने के दौरान उसे वे मानते हुए भी खिल्ली-सी उड़ाते हैं। किसी आवाज़ की गूँज सिर्फ़ उसकी प्रतिध्वनि नहीं होती, पैरोडी भी होती है—और इसी में गूँज की स्वतंत्रता निहित है।

कहना असम्भव है कि ‘तीन एकान्त’ उपर्युक्त चुनौती को झेलने में कितने सफल हुए हैं—यह निर्णय दर्शकों और आलोचकों पर ही छोड़ना होगा। स्वयं मेरे लिए यह बात कि कहानियों को सुनने-पढ़ने के अलावा देखा भी जा सकता है, एक विस्मयकारी अनुभव था। जिन कहानियों को अरसा पहले मैंने अपने अकेले कमरे में लिखा था, उन्हें खुले मंच पर दर्शकों के बीच देखना कुछ वैसा ही था जैसे टेपरिकॉर्डर पर अपनी आवाज़ सुनना, जो अपनी होने पर भी अपनी नहीं जान पड़ती। कहानी लिखना बहुत अकेलेपन की चीज़ है। यह सौभाग्य बहुत कम प्राप्त होता है कि ख़ुद अलग रहकर इस अनुभव को दूसरों के साथ बाँटा जा सके। किन्तु जब कभी ऐसा होता है तो वह अनुभव ख़ुद हल्का-सा हो जाता है, अपने अकेलेपन के बोझ को उतार फेंकता है। वह उस दुःख की जगह ले लेता है जिसके बारे में ‘वीकएंड’ की नायिका कहती है—‘‘बँटने पर वह छोटा नहीं होता, बड़ा भी नहीं होता। सिर्फ़ साफ़ हो जाता है—चमकीला और साफ़।’’

 

निर्देशक का वक्तव्य
कहानियों का रंगमंचीय संसार

 

 

देवेन्द्र राज

 

निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीकएंड’) की मंच-प्रस्तुति के दौरान, एक निर्देशक के नाते यह बात शुरू से ही मेरे सामने साफ़ थी कि मुझे कहानियों के ‘नाटकीय रूपान्तर’ की ओर नहीं बढ़ना, वरन् कहानी के अपने मूल ‘फ़ॉर्म’ में निहित कथ्य, शब्द और दृश्य को ही मंच पर स्थापित करना है। कहानी को सुनते हुए अथवा—उससे भी आगे-पढ़ते हुए श्रोता अथवा पाठक के सामने जो एक पूरा दृश्य-जगत बनता चलता है, उसे मंच पर कैसे प्रस्तुत किया जाए ? इसीलिए यह प्रयोग कहानी को सुनने और पढ़ने से आगे की कड़ी तो है ही, लेकिन इसे नाटक अथवा फ़िल्म की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती। शायद यह अनुभव ‘कहानियों का रंगमंच’ जैसी अपनी कोई संज्ञा उत्पन्न कर सके, इसका अभी मात्र एक संकेत ही दिया जा सकता है।

इन तीनों की कहानियों की मंच-प्रस्तुति जिस तरह से विकसित होती चली गई—उस रचना-प्रक्रिया में से गुज़रते हुए उपर्युक्त प्रश्न, निष्कर्ष सम्भवतः और भी स्पष्ट हो सकें।
संयोग से तीनों कहानियों की भावभूमि और ‘फ़ॉर्म’ लगभग एक-जैसा लगा—तीनों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अन्त तक एक लम्बा संवाद (मोनोलॉग) बोलता है, इसके साथ ही यह एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरूआत किसी दूसरे पात्र के साथ होती है, लेकिन यहाँ उसकी स्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता, क्योंकि न जाने कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है। इस प्रकार ये कहानियाँ अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं—इस मूल थीम को रेखांकित करने के लिए ही प्रस्तुति को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड’ दिया गया था।

प्रस्तुति विशेष रूप से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्टूडियो-थिएटर को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई थी। इस तथ्य ने प्रस्तुति के दृश्य-जगत को अपने ढंग से प्रभावित किया। इसके साथ ही तीनों कहानियों को एक ही संध्या को एक के बाद एक प्रस्तुत किया जाना था, अतः इस बात का भी ध्यान रखा गया कि बीच के अंतराल में बहुत थोड़े-से मंच-उपकरणों के हेर-फेर से ही दूसरी कहानी का मंच तैयार किया जा सके। ऐसी स्थिति में यह अनिवार्य हो गया कि अभिनेता के साथ-साथ प्रकाश-सज्जा और संगीत एवं ध्वनि-संयोजन को भी पूरा महत्त्व दिया जाए। इस प्रकार एक निश्चल चौखटे में कहानियों की मंच-प्रस्तुति एक फ़िल्म के ‘चलायमान स्क्रीन’ से बहुत अलग होती गई।

 

धूप का एक टुकड़ा

 

 

कहानी का दृश्य एक पब्लिक पार्क से शुरू होता है जहाँ कई बेंचें हैं, पृष्ठभूमि में एक चर्च है और जहाँ-तहाँ फैले धूप के कुछ टुकड़े हैं। लेकिन चर्च का अहसास केवल वहाँ से आते संगीत द्वारा कराया गया, मंच के नाम पर केवल आमने-सामने दो बेंचें, लेकिन बोलती हुई नायिका के विरोध में एक मौन पात्र को भी उपस्थित रखा गया। यह पात्र एक बूढ़ा है जो एक पैरेम्बुलेटर के सामने बैठा है और संयोग से उसी बेंच पर आकर बैठ गया है जहाँ यह औरत रोज़ाना आकर बैठती रही है। इस प्रकार एक मौन, बूढ़े और अपने में ही व्यस्त पात्र की उपस्थिति ने इस औरत के अकेलेपन को भी ज़्यादा रेखांकित किया।
लेकिन एक पार्क से शुरू होकर भी कहानी का दृश्य-जगत औरत के लम्बे संवाद में उसके अतीत के प्रसंगानुसार बदलता रहता है—लेकिन उन दोनों बेंचों में किसी तरह का चेंज किए बिना ही मात्र प्रकाश द्वारा रेखांकित कुछ विशेष क्षेत्रों अथवा संगीत और अन्ततः स्वयं अभिनेत्री के दिए गए कुछ ‘मूव्स’ द्वारा ही कहानी की पूरी यात्रा को पकड़ने की कोशिश की गई।

 

डेढ़ इंच ऊपर

 

 

‘धूप का एक टुकड़ा’ जैसे फ्रेम की कहानी होते हुए भी अपने अन्तिम स्वरूप में यह उससे बिलकुल ही अलग होती गई। इसमें भी दो पात्र हैं-एक बोलनेवाला और दूसरा सुननेवाला। शुरू में पहली कहानी की तरह यहाँ भी सुननेवाले पात्र की परिकल्पना की गई, लेकिन ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती गई, सुननेवाला पात्र बिलकुल ही अनुपस्थित हो गया—केवल शुरू में एक अलग मेज़-कुर्सी पर प्रकाश के एक वृत्त द्वारा ही उसकी उपस्थिति का अहसास करा दिया गया।
कहानी एक छोटे-से पब से शुरू होती है, अतः दृश्य-बंध के नाम पर मंच के ऊपर-नीचे दो विभिन्न कोनों में रखी दो मेज़ें और चार कुर्सियाँ ही थीं—इन्हीं के बीच प्रकाश-सज्जा द्वारा बूढ़े पात्र का घर, जेल की सड़क, सड़क और बचपन के खेल बनते-मिटते चलते हैं।

संगीत एवं ध्वनि-प्रभाव को लेकर भी यह ‘धूप का एक टुकड़ा’ से काफी अलग थी—जहाँ उस कहानी में चर्च की घाटियों, आती-जाती घोड़ा-गाड़ी अथवा ऑर्गन-संगीत यानी अलग-अलग तरह का ध्वनि-प्रभाव था, वहाँ इस कहानी में पब बजते हुए के लम्बे रिकॉर्ड द्वारा ही समय-समय पर उभरते संगीत एवं ध्वनियों का वैविध्य उत्पन्न किया गया।
कहानी का बूढ़ा पात्र बियर पीते हुए स्वयं खुलता चलता है। बीच-बीच में उसे बीयर ‘सर्व’ करने के लिए एक बेयरा को रखा गया था जो उसकी आवाज़ पर जब-जब बीयर का मग रखने को आता तो अनायास ही कहानी के दृश्य को पुनः पब से जोड़ देता।

 

वीकएंड

 

 

शायद इस सम्मिलित प्रस्तुति की यह सबसे मुश्किल कहानी थी। जहाँ पहली दो कहानियाँ किसी दूसरे पात्र से सम्बोधित बातचीत हैं जो स्वकेन्द्रित होती जाती हैं, वहाँ ‘वीकएंड’ में संवाद या बातचीत को बिलकुल ही नहीं, पूरी की पूरी कहानी नायिका के ‘स्वचिन्तन’ से सम्बन्धित है। इसलिए कहानी की शुरूआत सुबह के भूरे आलोक में नायिका की ‘टेपरिकॉर्ड’ पर आती आवाज़ से की गई—‘‘यह में याद रखूँगी, ये चिनार के पेड़, यह सुबह का भूरा आलोक। और क्या याद रहेगा ? पेड़ों के बाद बदन में भागता यह हिरन, आइसक्रीम का कोन, घास पर धूप में चमकता हुआ, एक साफ़, धुली पीड़ा की फाँक जैसा, मानो अकेला अपने को टोह रहा हो।’’

फिर मुँह-अँधेरे में अलार्म की आवाज़ सुनकर ही उसके मुँह से पहले संवाद निकलते हैं।
केवल इसी स्तर पर नहीं, स्वयं कहानी की यात्रा भी पहली दोनों कहानियों से बिल्कुल अलग है—नायिका एक वीकएंड की समाप्ति पर सुबह-सुबह अपने कमरे पर जाने के लिए तैयार हो रही है, उसका प्रेमी अभी तक पलंग पर सोया हुआ है। इसी बीच पिछले दिन की घटनाओं पर पुनर्विचार करने लगती है और कहानी कमरे से निकलकर एक पार्क में पहुँच जाती है—जहाँ वह अकेली बैठी है और वह अपनी बच्ची से मिलने गया है। और इस दौरान वह कभी पार्क, कभी कमरे, कभी पुरुष, कभी उसकी बच्ची और कभी स्वयं में बिताए क्षणों के साथ जीती रहती है। अन्त में वह अपने बैग के साथ कमरे की सीढ़ियाँ उतर रही है।

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