विद्यापति की कहानियाँ - नागार्जुन Vidyapati ki Kahaniyan - Hindi book by - Nagarjun
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विद्यापति की कहानियाँ

नागार्जुन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :91
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3036
आईएसबीएन :00000

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महाकवि विद्यापति की तेरह नीतिपूर्ण कथाएँ....

Vidhyapati Ki Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कविता, निबन्ध, कहानी आदि की भाँति कुछ ऐसी पुस्तकें भी हैं जो कभी छपीं और आज जाने कहाँ दबी पड़ी हैं। ‘नागार्जुन -साहित्य’ की सूची में उनका उल्लेख तक नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक भी उनमें से एक है। इसका प्रथम संस्करण 1964 में हुआ और द्वितीय 1966 में। परन्तु समुचित प्रचार-प्रसार न होने से यह पुस्तक मेरे लिए अब तक ‘दुर्लभ पुस्तकों’ में से एक रही है।

पिद्यापति की कहानियों का छाया-रूपांतर उन्हीं दिनों किया गया, जिन दिनों ‘विद्यापति के गीत’ का गद्य रूपान्तर हुआ था, अर्थात् 1963 में।
पुस्तक को उपलब्ध कराने का श्रेय बंधुवर बहादुर सिंह सोलंकी (पटना) को है।

 

शोभाकान्त

 

दो शब्द

 

 

महाकवि विद्यापति अपने मधुर गीतों के लिए विश्वव्यापी कीर्ति प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन गीतों के अतिरिक्त काव्य, नीति कथाओं की रचना भी उन्होंने की है।
महाकवि विद्यापति मिथिला अंचल में एक अतिसम्पन्न ब्राह्मण-कुल, में सन् 1350 ईसवी के लगभग, दस-बीस वर्ष बाद, पैदा हुए थे। कहा जाता है कि इन्होंने बड़ी लम्बी उम्र पायी थी, कई राजघरानों के हेर-फेर अपनी आँखों से देख थे। बूढ़े राजाओं, बूढ़ी रानियों से लेकर विकसित, अर्धविकसित राजकुमारों-राजकुमारियों तक से कवि का अति निकट का संपर्क रहा।

 राजपुरुषों के कूटनीतिक दाँव-पेंच उन्हें भली-भाँति मालूम थे। व्यवहारिकता की कसौटी पर विद्यापति शत-प्रतिशत चतुर व्यक्ति–रहे होंगे, यह उनकी रचनाओं से स्पष्ट है। केवल विरह-श्रृंगार वाली सरल पदावलियाँ ही नहीं, उन्होंने संस्कृत के माध्यम से दसियों नीतिग्रंथ और शिक्षाग्रन्थ भी तैयार किये थे। एक राजा पड़ोसी देश के राजा को किस प्रकार पत्र लिखेगा, एक सेनापति एक एक अधिकार-प्राप्त युवराज को किस तरह अपनी बातें सूचित करेगा, दासों के लिए मुक्तिपत्र किस प्रकार लिखे जायेंगे—इस प्रकार के व्यवहारिक पत्र-लेखन के दर्जनों नमूने विद्यापति अपनी पुस्तक ‘लिखनावली’ में हमें दे गये हैं। कुत्ता-बिल्ली, कबूतर-गीदड़ जैसे जन्तुओं को पात्र नहीं बनाकर विद्यापति ने राजकुमारों की नीति-शिक्षा के लिए समकालीन ऐतिहासिक-सामाजिक पात्रों के आधार पर नीति-शिक्षा की पुस्तक तैयार की थी। यह पुस्तक ‘पुरुष-परीक्षा’ पाश्चात्य विद्वानों को बेहद पसन्द आयी थी।

यहाँ हमने ‘पुरुष परीक्षा’ से कतिपय कथाओं का छाया-रूपांतर तैयार किया है। मूल पुस्तक संस्कृत में है। उसमें बीच-बीच में बहुत-सारे पद्य आये हैं। कुछ कहानियाँ पंडिताऊ ढंग की हैं। प्रस्तुत कथाओं में नयी जान लाने के लिए मैंने उन्हें छोड़ा है।

 

-नागार्जुन

 

चोर की कथा

 

 

एक बार विक्रमादित्य के मन में चोरों की करतूत जानने की इच्छा हुई।
विक्रमादित्य ने भिखारी का वेष धारण किया और उज्जैन के बाहर पुराने मन्दिर में छिपकर बैठे।
अँधेरी रात थी।
लोग सो चुके थे।
चार चोर वहाँ आकर बातें करने लगे।
वे अपने साथ खाना भी लाये थे। पोटली खोलते-खोलते एक चोर बोला—‘अब यहाँ सुस्ता भी लें और खाना भी खा लें। फिर ताजा-दम होकर शहर के अन्दर चलेंगे।’
औरों ने कहा—‘ठीक तो है।’
भिखारी सामने आ गया, —‘जूठन मुझे दे देना।’
‘कौन है तू ?’ चोरों ने चौंककर पूछा।
‘मैं कंगाल हूँ—’ उस नकली भिखारी ने कहा—‘भूखों मर रहा हूँ। चला नहीं जाता, इसी से यहाँ पड़ा हूँ।’
चोर बोले—‘हाँ, दिन में भी हमने तुझे यहीं देखा था। हम रास्ते की टोह लेने के लिए निकले थे। तू अब तक यही क्यों बैठा रहा ?’

भिखारी ने स्वरों को मरोड़ कर कहा—‘मालिक, तो फिर कहाँ जाता ? देवता के दर्शनों के लिए सारी दुनिया यहाँ आती है। भीख पाने की आशा में यहाँ बैठा रहता हूँ । आज कुछ नहीं मिला। सारा दिन भूखा रहना पड़ा। अब इस वक्त उठा भी नहीं जाता, सरकार !’
‘तुझे जूठा खाना देंगे तो हमारा काम करेगा ?’ एक चोर ने उससे पूछा।
भिखारी बोला—‘मालदारों की कोठियाँ बतलाऊँगा और ढोने का काम करूँगा, सरकार।’
‘तो, ठहर जा ! तुझे जूठन मिलेगी।’ दूसरा चोर बोला।
चोर खाना खा चुके तो भिखमंगे को भी खाना मिला।
राजा विक्रमादित्य भला जूठा क्यों खाते ? जूठा खाना खप्पर में लेकर उन्होंने बेताल से गायब करवा दिया। पीछे हुलसकर बोले—‘मालिक, आपकी मेहरबानी से आज कई दिनों बाद भर पेट खाना नसीब हुआ।’


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