जल टूटता हुआ - रामदरश मिश्र Jal Tootata Hua - Hindi book by - Ram Darash Mishra
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जल टूटता हुआ

रामदरश मिश्र

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :365
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3054
आईएसबीएन :81-8143-383-1

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इस पुस्तक में एक गरीब टीचर की कथा वस्तु का वर्णन हुआ है...

jal tootta huaa

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जल टूटता हुआ

एक दिन बाबूजी बौखलाए हुए आए...देखो न इस मास्टर की हिमाकत, मेरी लड़की से शादी करेगा। यह मुँह मसूर की दाल...मैंने यहाँ उसकी नौकरी लगाई, लोगों के उपद्रव के बावजूद उसे यहाँ लगाये रखने की बार-बार कोशिश की तो इसका मन बढ़ गया। मैंने अपनी लड़की को थोड़ा पढ़ा देने को कहा तो समझता है कि मैंने अपनी लड़की ही दे दी उसे। कमीना, जिस पत्तल में खाता है उसी में छेद करता है...हेंह, शादी करेंगे मेरी लड़की से ! शीशे में मुँह नहीं देखा है। मेरी शारदा से शादी करेंगे, दरिद्र कहीं के। घर का बेंवत नहीं देखते। डेढ़ सौ रुपल्ली पाते हैं। वो भी मेरी मरजी से तो मेरी बेटी से शादी पर उतारू हो गये।...पाठक-साठक कोई बाम्हन होते हैं, ‘बभने में नान्ह जात पाठक उपधिया’। मैं नहीं जानता था कि ये मेरी बेटी को पढ़ाते हैं तो बदले में मेरी बेटी ही मांग लेंगे। पढ़ाया है तो फीस ले लें। फीस देने की बात कही थी तो लगा था आदर्श झाड़ने, मैं नहीं जानता था कि यह सारा आदर्श इसलिए है। अब स्कूल से निकलवाता हूँ और ऐसी चिट्ठी लिखता हूँ कि बच्चू याद करेंगे।

मास्टर सुग्गन तिवारी का पाँव जोर से फिसला, कीचड़ में गिरे और उनका सपना टूट गया ! आज 15 अगस्त है, आजादी की वर्षगाँठ ! सुग्गन तिवारी-पड़ोसी गाँव-भाटपार के प्राइमरी स्कूल में हेडमास्टर हैं। स्कूल इंस्पेक्टर का आदेश है कि आजादी की वर्षगाँठ बड़ी शान से मनाई जाए। मास्टर सुग्गन ने कल स्कूल के सारे लड़कों को तीन बार आदेश दिया था कि कल साफ कपड़े पहनकर आना। टोपी जरूर लगा लेना-नंगे सिर आना असभ्यता है और टोपी तो देश की इज्जत है। अगर लोगों ने टोपी ही उतार दी तो क्या बचेगा ? कल राष्ट्रीय पर्व है, सभी लोग हँसी-खुशी के साथ आना।
हाँ आज राष्ट्रीय पर्व है, सदियों की गुलामी की जंजीर टूटी थी आज ही। गुलामी, जो गरीबी, हीनता, फूट, अनैतिकता की जड़ है। आजादी आज ही मिली थी, आजादी, जो सुख-समृद्धि प्रेम आशा विश्वास की भोर है ! इसी भोर के लिए देश के नेताओं ने बलिदान किया। स्वयं वह भी दो बार जेल हो आया। आह ! कितना उन्माद था उस बलिदान में ! बलिदानी की आँखों के आगे एक रंगीन भोर डहडहा उठती थी। एक बड़ी चट्टान जैसे सर से उठ गई। आकाश में अंधकार उगलते हुए बड़े-बड़े बादलों के पहाड़ जैसे पिघल कर बह गए। मास्टर सुग्गन की आँखों के सामने हरे भरे खेत, बाढ़ की छाती पर दौड़ती सड़कें, खोहों-खाइयों की पीठ पर बैठे हुए अस्पताल, स्कूल आदि चमक उठते थे। आज भी मास्टर का वह सपना हारा नहीं था।

कहने वाले लोग देश के शत्रु हैं, कहते हैं कि देश को आजाद हुए कई साल हो गए, मगर कहीं कुछ नहीं हुआ। नेता लोग कहते हैं कि ऐसा कहने वाले देश के दुश्मन हैं, जनता को बहकाकर उनके मन से आशा और विश्वास को दूर करते हैं। ठीक ही कहते हैं नेता लोग। सचमुच ये देश के दुश्मन हैं। दुश्मन नहीं होते, तो क्यों यह कहते कि नेता लोग स्वार्थी हो गए हैं-पद  के लोभी हो गए हैं ! भला यह भी कोई बात है।  नेता लोग ठीक ही कहते हैं कि पाँच बरस पर तो आम का फल आता है; फिर इतने बड़े देश रूपी वृक्ष में इतने ही समय में कैसे फल आ जाएगा ? हाँ, जरा सोचने की बात है। सदियों का अज्ञान, गरीबी बेकारी इतनी जल्दी कैसे खत्म हो जाएगी ? सचमुच देश के लोगों में निराशा भरने वाले देश के विरोधी हैं। इन नेताओं के हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित है।

मास्टर सुग्गन तिवारी की आँखों के आगे फिर खुल पड़ी हैं-नई-नई तस्वीरें, आजादी की भोर की तस्वीरें-लहलहाते हुए खेत, बाढ़ की छाती पर दौड़ती हुई सड़कें, अभयदान की मुद्रा में खड़े अस्पताल, प्रेम के रस से सिंचे हुए देश के गाँव-गाँव से उठते हुए समवेत-कंठों के गान, दूर दूर तक फैली हुई जड़ता की चट्टानों को बेध-बेध कर जगह-जगह से झरते हुए ज्ञान और विद्या के झरने...आज उसी आजादी की भोर की वर्षगाँठ है...!
छपाक...! मास्टर सुग्गन कीचड़ में गिरे, तो उनके सपने छिटा गए, उनके सामने जल और कीचड़ से बोझिल पगडंडी साकार हो उठी और पगडंडी के अगल-बगल खेतों के बलबलाते हुए मास1 की तीखी अनुभूति उन्हें चौंका गई।
मास्टर ने ऐसी आँखों से अपने कपड़ों को देखा, जो रोना चाहकर भी रो न सकती हो। क्या करें, घर लौट जाएँ ? मगर घर जाकर क्या करेंगे, दूसरा कपड़ा कहाँ है ? सोडा से धो-धोकर बड़ी मुश्किल से सुखाया था इसे। यह कमबख्त पानी सात दिनों से लगातार बरस रहा है बंद होने का नाम ही नहीं लेता। कितना कुछ किया गया ? गाँव भर के कानों2 को रस्सी में बाँध कर मारा गया। पता नहीं यह पानी क्या करेगा ? सुना है राप्ती नदी जोर से बढ़ रही है; नाले भी उफन रहे हैं। पता नहीं क्या हो ?

उसकी इच्छा हुई कि वह घर लौट जाय, मगर स्कूल का हेडमास्टर जो ठहरा ! नहीं जाएगा तो इंस्पेक्टर तुरंत ही बरखास्त कर देगा। उसने फिर एक बार कीचड़ से सने अपने कपड़ों को देखा, उसे रुलाई आ गई। परसाल भी उसके पास एक ही कुर्ता था, इस साल भी एक ही कुर्ता है। उसे याद आया-उसके पास कभी भी दो कुर्ते और तीन धोतियाँ नहीं हुईं !
वह तालाब की ओर बढ़ गया। बचा बचा कर कीचड़ को साफ किया। चलो गीला हो गया तो क्या, अब कोई यह तो नहीं कहेगा कि मास्टर गिर गया था-कपड़े बारिश में भीग ही सकते हैं।
उसके मन ने फिर एक बार सपनों का तार जोड़ना चाहा; किंतु कीचड़ की आशंका ने सारे तारों को छिन्न-भिन्न करके बिखेर दिया था।
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1.    कीचड़।
2.    गाँवों में ऐसा विश्वास है कि यदि गाँव भर के कानों के नाम ले-लेकर एक रस्सी में गाँठें मार दी जाएँ और उन गाँठों को पीटा जाय, तो पानी बंद हो सकता है।

उनकी आँखों के आगे दूर दूर उफनते हुए नालों का सफेद जल दिखाई पड़ रहा था। बाढ़ की छाती पर लोटती हुई सड़कें सुख-समृद्धि, फूलती-फलती हरियालियाँ और...
और क्या ? मास्टर को लगा जैसे उसके पेट में कहीं एक तीखी ऐंठन हो रही है...हाँ यह ऐंठन ही है, खाली अंतड़ियाँ ऐंठेंगी नहीं तो क्या करेंगी ? उनकी आँखों में बीता हुआ कल उतरा गया। हाँ, पाँच दिन पहले वह बाजार से कुछ मटर और जौ ले आया था, जो कल शाम को खत्म हो गया। बच्चों के लिए तो कुछ अँट भी गया, उसे और उसकी पत्नी को भूखे पेट सो जाना पड़ा तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली, खेत में कुछ हुआ ही नहीं, उधार कब तक देगा बनिया ?
‘भारतमाता की जै !’’ मास्टर सुग्गन को देखते ही लड़के चिल्ला उठे।
स्कूल क्या था एक पुराना मकान था दूर के एक कस्बे के चौधरी का मकान, जिसे जिला बोर्ड ने किराए पर ले लिया था। बरामदे में कुछ गाँव के नागरिक और लड़के इकट्ठा थे। बाहर धीरे धीरे पानी बरस रहा था और बारमदे के किनारे एक बाँस में टँगा हुआ भारतीय ध्वज पानी से भीग कर लथपथ हो गया था ! मास्टर ने पहुँचते ही लड़कों से पूछा-‘अभी बाबू साहब नहीं आए ?’
‘नहीं मास्टर साहब, नहीं मास्टर साहब !’

मास्टर साहब ने एक बार लड़कों पर दृष्टि फेरी-सबके सिरों पर टोपियाँ थीं, जिनके पास टोपियाँ नहीं थीं, उन्होंने कागज की टोपियाँ बना ली थीं, लड़कों के कपड़ों में कोई फर्क नहीं था, हाँ पानी में धो लिए गए थे। जिन्होंने नहीं धोए थे, उनके कपड़ों को बरसात ने धो दिया था। लड़कों की गंदी देह पर बरबस हँसता हुआ चेहरा टँगा था। हाँ, मास्टर जी ने कल कहा था न कि हँसी-खुशी के साथ आना। किंतु हँसी को पहने हुए चेहरों के भीतर गीली-गीली आँखें छिप नहीं पाती थीं। उन आँखों में अकथ कहानियाँ भरी हुई थीं-ये आँखें बहुत रोई हैं साफ कपड़ों के लिए, टोपी के लिए और इन्हें और कुछ मिला हो या न मिला हो, घरवालों के तीखे थप्पड़ जरूर मिले हैं। ये हँसते हुए चेहरे बरबस मास्टर साहब पर हँसी उछाल रहे थे। उन हँसियों की चोट लगते ही मास्टर को एक तीखी वेदना हो रही थी। उन्हें लगता था हर हँसी के पीछे एक उपवास है, एक बेबसी है और मास्टर के सामने बाजार...कल की सूनी साँझ, उधार आदि के चित्र उभर आते। मास्टर अपने गीले कपड़ों के स्पर्श में हर लड़के के गीले कपड़ों की चुभती हुई अनुभूति झेल रहे थे।

लड़के एकाएक जोर से चिल्ला उठे-‘बाबू साहब आ रहे हैं-भारत माता की जै...!’’
मास्टर अपने ख्यालों से चौंक पड़े-उन्होंने देखा कि बाबू साहब का इक्का कच्ची सड़क को धीरे-धीरे कुचलता चला आ रहा है।
मास्टर साहब ने लड़कों को सावधान कर दिया कि बाबू साहब के आते ही खड़े हो जाएँ और स्वागत गीत गा उठें।
सभी लोग सावधान हो गए थे। भारी भरकम देह वाले बाबू महीपसिंह हाथ जोड़े हुए, हँसते हुए उतरे और लड़के गा उठे-
स्वागत है, हे लाल भारत के....!
महीपसिंह ने आज फर्स्ट सफेद खादी का कुर्ता, जाकेट, धोती और टोपी पहन रखी थी। इस शुभ्र वेश में देवता लगते थे। लोग उन्हीं को निहार रहे थे। वे एक पुरानी आराम-कुर्सी पर पसरे हुए बैठे थे ! और लड़के गा रहे थे-


छोड़ दिया सारा सुख अपना
तोड़ दिया फूलों का सपना
हे मुसकाते भाल, भारत के


मास्टर सुग्गन तिवारी मुग्ध होकर यह सारा दृश्य देख रहे थे। बाबू महीपसिंह लड़कों के स्वागत-गान के ताल-ताल पर स्वीकृतिसूचक सिर हिला रहे थे।
गाना खत्म हुआ। मास्टर सुग्गन उठ खड़े हुए-
‘भाइयों !
कौन नहीं जानता है कि आज पंद्रह अगस्त है, आज ही के दिन देश आजाद हुआ था। हमारा खोया हुआ भाग्य आज ही वापस लौटा था। हम गुलामी में कैसे अभागे, बेवकूफ और नीच हो गए थे...’
(लड़कों ने जोर से ताली बजाई। मास्टर ने निरीह नेत्रों से लड़कों की ओर देखा) लड़के कुछ समझे नहीं। मास्टर आगे बढ़े-‘और आज ही के दिन हमने अभाग्य, अशिक्षा गरीबी, फूट का सारा भार उठाकर फेंक दिया था, आज हम आजाद हैं। आज के दिन इस जर-जवार के नामी जमींदार भारतमाता के सपूत, दानवीर बाबू महीपसिंह ने पधार कर जो कृपा की है, उसके लिए हम लोग बड़े ही खुश हैं। आज के दिन के लिए बाबू साहब से बढ़कर और कौन नेता हमें प्राप्त हो सकता था। आप सब जानते हैं कि बाबू साहब डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य भी हैं, हमारे स्कूल के सबसे बड़े हितैषी ! अब बाबू साहब आपसे कुछ कहेंगे।’

मास्टर बैठ गए। बाबू साहब धीरे धीरे उठे और खाँस-खूँस कर बोले, ‘भाइयों ! आप लोगों ने मुझे आज सभापति का काम सौंपा है, मैं तो एकदम इसके अयोग्य हूँ..’
(लड़के जोर से तालियाँ पीटने लगे। एक मास्टर जोर से बोल उठे : ‘अरे हाँ-हाँ, यहाँ नहीं ताली पीटते हैं !’ पर लड़के कुछ नहीं समझे।)
‘खैर कोई बात नहीं, मैं तो जनता का सेवक हूँ। आपने बुलाया, चला आया। (कुछ खाँस कर) आप जानते हैं आज पंद्रह अगस्त है, आज के दिन को लाने के लिए हमारे नेताओं ने कितनी कुर्बानी की थी। हमारा फर्ज है कि हम लोग त्याग और बलिदान से मिलने वाली आजादी की रक्षा करें। आपस में प्रेम रखें, गाँवों का सुधार करें।...जय हिंद !’

बाबू साहब बैठ गए। लेकिन फिर उठ गए-‘भाइयो, बच्चों के लिए मैं सरकार की ओर से ये मिठाइयाँ लाया हूँ, बाँट दी जाएँ।’ इतना कहकर उन्होंने नौकर की ओर संकेत किया। नौकर ने बड़ी-सी टोकरी (जो कि बाबू साहब के साथ ही इक्के से उतारी गई थी) लाकर वहाँ रख दी। बच्चों की जीभ चटर-पटर करने लगी। दो तीन-मास्टर आगे आए और लड्डू बाँटने लगे। लड़के लपक-लपककर शोर करने लगे। और मास्टर थप्पड़ों से उन्हें संयत करने लगे। बाबू साहब इक्के पर बैठे और चले गए। यहाँ मास्टर लोग बच्चों के लिए मिठाइयाँ बाँटते समय अपने घरों के बच्चों को नहीं भूल सके। गाँव के नागरिक ललचाई आँखों से लड्डू की टोकरी की ओर देखते धीरे-धीरे वहाँ से सरक गए।
धीरे धीरे पानी बरस रहा था। लड्डू खा-खाकर लड़के घर की ओर भागे। मास्टर सुग्गन तिवारी अपने अँगोछे में दो-तीन सेर लड्डू बाँधकर टूटा छाता लिये। बाहर निकले, तो पानी से लथपथ भारतीय ध्वज बाँस पर टँगा हुआ उन्हें दिखाई पड़ा। उन्हें एकाएक होश आया कि अरे ‘जन-गन-मन’ तो हुआ ही नहीं। उन्होंने चाहा कि एक बार जोर से लड़कों को पुकारें कि जन-गन-मन गाकर जाओ, किंतु सभी लड़के भागते हुए घरों की ओर जा रहे थे।

मास्टर सुग्गन का मन आज अजीब ढंग का सूनापन महसूस कर रहा था। वे धीरे-धीरे ताल के खेत की ओर बढ़ गए। रास्ते में धान, कोदों के पौधे निःशंक भाव से हरी-हरी आभा फेंक रहे थे...और नाले नदियों, का सफेद जल क्रूर हँसी का हाहाकार लिये इधर को चला आ रहा था। मास्टर सोच रहे थे-कितने सुखी हैं पौधे जो अपने करीब मौत के हाहाकार को सुनकर भी इतनी निश्चित हँसी हँस लेते हैं ! आदमी तो अपने सुखों की चरम स्थिति में भी दुःख की आशंका से काँप-काँप उठता है। मास्टर अपने ताल वाले खेत के पास पहुँच गए। कितना कीचड़ है रास्ते में चलना मुश्किल है !
किंतु इसी ताल के कीचड़ में ये धान के पौधे कैसे लहरा रहे हैं। बादलों की सघन सजल छाया के नीचे ये पौधे कैसी मस्ती से झूम रहे हैं। मास्टर की आँखों में एक सपना तैर गया-उमड़ते हुए धान, सुनहली बालियाँ, भरा हुआ खलिहान। भगवान् ! ठाठें मारती हुई यह धान की फसल यदि पार लग जाती, तो ‘गितवा’ की शादी इस साल कर देता। कितनी सयानी हो गई है ! सत्रहवाँ साल चल रहा है, उसका, गाँव के लोग भी लुके-छिपे व्यंग्य कर देते हैं; यद्यपि घर-घर यही हाल है, कोई भी 17-18 के पहले अपनी लड़की की शादी नहीं कर पाता। कन्यादान का पुण्य तो किसी को नहीं मिल पाता। शास्त्र में लिखा है कि चौदह वर्ष तक की लड़की के कन्यादान से पुण्य मिलता है। अब कौन इस पुण्य के फेर में पड़कर लड़की को किसी कसाई के हाथ बेचे ! वर ससुरे तो सीधे मुँह बात नहीं करते। मगर यह फसल लग जाए तो कुछ हाँ !...
हवा बह गई, जोर से धान के बिरवे कुनकुना उठे, जैसे कोमल स्पर्श से किसी बछड़े के रोंए। मास्टर सपने में डूबे थे। एक चील बड़े जोर से टें करके ऊपर से उड़ गई। उसके पंजे में एक मछली छटपटा रही थी। मास्टर का ध्यान भंग हुआ और फिर उनके सामने दूर-दूरके नालों का उफनता हुआ जल लोटने लगा।

भारी पैरों से मास्टर सुग्गन घर को लौटने लगे। उन्हें थोड़ी-थोड़ी ठंडक बेंध रही थी वे हल्के हल्के सिहर रहे थे। आज पंद्रह अगस्त का सारा उत्सव उनकी सिहरन में जैसे डूब गया था। इतने साल हो गए आजादी मिले हुए। यह अभागी जिंदगी टस से मस नहीं हुई। पानी की फुंकार वैसे ही हमारी फसलों पर पछाड़ खाती लोटती रहती है। इस साल भी यह पछाड़ खेतों का हाड़ तोड़कर रहेगी। रबी की फसल को भी जाने क्या हो गया है ! जब खरीफ लुट जाती है तो रबी भी रूठ जाती है। जेठ गुजरे अभी तो दो मास भी नहीं हुए कि सारा अन्न साफ ! उसे लगा फिर अंतड़ियों में दर्द हो रहा है, हाँ भूखी अंतड़ियाँ दर्द नहीं करेंगी तो क्या करेंगी ? उसे याद आया, आज घर पर कुछ खाने को नहीं होगा। बाजार से लाया हुआ अन्न तो कल ही खत्म हो गया था। उसने बड़े दर्द से दो लड्डू निकाले और मुँह में डाल लिए। फिर जल्दी-जल्दी घर की ओर बढ़ाने लगा।

उसे लगता था कि आज का जलसा पानी में भीग गया था। भीग ही नहीं गया था। छितराकर काँप रहा था। खुले आसमान में बेचारा झंडा कैसा लथपथ हो रहा था ! उसकी आँखों में स्कूल के बच्चों के करुण चेहरे, उदास आँखें फिर एक बार तैर गईं। लड्डू पाने पर उनमें एक चमक सी आ गई थी। पता नहीं कब इस इलाके का भाग्य जागेगा, कब इन उदास आँखों में स्थायी चमक भर उठेगी, कब इन...एकाएक बाबू महीपसिंह आकर अटक गए। उसे लगा जैसे बाबू महीपसिंह की भारी-भरकम देह यहाँ से वहाँ तक पसर गई है और अपने भारी बोझ के नीचे जमीन की सारी ऊग को दबोचे हुए है। वह जानता है महीपसिंह को; और कौन नहीं जानता महीपसिंह को ? इस इलाके के भारी जमींदार, ब्रिटिश सरकार के पक्के हिमायती, प्रजा के बड़े दुश्मन, अपनी झक के अंधे, कौन नहीं जानता उन्हें ? जनता सोचती थी कि आजादी मिलने पर इन देशद्रोहियों को फाँसी मिलेगी, इनकी जमीन गरीबों को बाँट दी जाएगी; मगर इन वर्षों में कुछ और ही तस्वीर सामने आई। बाबू महीपसिंह काँग्रेस के मेम्बर हो गए नेताओं की निगाह में काँग्रेस के प्रिय व्यक्ति। यही नहीं जिला बोर्ड के सदस्य भी बन गए। पहले ब्रिटिश सरकार के अफसरों को फलों की डालियाँ भेजते थे, अब आजादी के दिन स्कूल के बच्चों के बहाने काँग्रेस सरकार को लड्डू की डालियाँ भेजते हैं। मगर यह भी कौन समझे कि ये लड्डू सरकार की ओर से हैं या महीपसिंह की ओर से। हो सकता है जिला बोर्ड ने बच्चों को मिठाइयाँ बाँटने के लिए पैसे दिए हों और महीपसिंह ने कुछ बचा भी लिए हों।

जिला बोर्ड के पास लड्डू बाँटने को पैसे हैं; मगर तीन-तीन चार-चार महीनों से मास्टरों की तनख्वाह बाकी है, उसे चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं...महीपसिंह इस अवसर पर ऐसे लगते थे, जैसे किसी की शादी में कोई और दूलहा बनकर आए ! मगर महीपसिंह को उसी ने तो बुलाया था अध्यक्षता करने के लिए। हाँ, उसी ने बुलाया था; मगर उसने महीपसिंह को नहीं बुलाया था। बुलाया था काँग्रेस सरकार के प्रिय नेता और जिला बोर्ड के प्रभावशाली सदस्य महीपसिंह को। कैसे न बुलाता ? उन्हीं की कृपा से तो इस जवार में सारे पाप-पुण्य होते हैं, उन्हीं की कृपा से उसकी बदली हुई है, चाहें तो तराई की ओर फेंक दें।

मास्टर सुग्गन को लगा कि जैसे अपनी ही बात का विरोध कर रहा है ! स्कूल जाते समय वह सरकार के खिलाफ सोचने वालों को देश का दुश्मन कह रहा था, नेताओं की पवित्र वाणी उसके अंतर्मन में गूँज रही थी कि इतने थोड़े वर्षों में इतने दिनों के कूड़ा-करकट को साफ कर इतना बड़ा निर्माण कैसे हो सकता है। इस मकान देश को पुनर्जीवन देने में तो अनेक वर्षों का प्रयास जरूरी है। हाँ फिर भी इन वर्षों में सरकार ने बहुत कुछ किया है-जमींदारी तोड़ने जा रही है, स्कूलों का प्रसार करने जा रही है, सबको बोलने की स्वातंत्रता दी है, सबको समान अधिकार दिया है। मताधिकार तो सबसे बड़ा अधिकार है, सबको व्यक्तित्व प्रदान किया जा रहा है, पंचायत-राज की स्थापना हो रही है, लोगों के मन से भय को दूर किया जा रहा है। भय सबसे बड़ा पाप है। गाँवों के सुधार की योजना बड़े जोर-शोर से कार्य कर रही है, खेतों के विकास के लिए बिजली के कुओं का इंतजाम हो रहा है....हाँ, ठीक ही तो कहते हैं नेता लोग, ये सारे कार्य हो रहे हैं, एक साथ ही सब कुछ थोड़े न हो जाएगा। कोई जादू की लकड़ी तो नहीं है सरकार के पास कि छुलाया और काम बन गया ! आलोचना करने वाले अब तक कहाँ थे ? अंग्रेजी सरकार को तो सह लिया इतने दिनों; किंतु अपनी सरकार को लोग इतने ही दिनों में भला बुरा कहने लगे। यह वाणी की आजादी नहीं तो और क्या है ? मजाल थी कि कोई ब्रिटिश सरकार के खिलाफ इस कदर बोलता। तब तो ये निंदक कहीं कोने में मुँह छिपाए पड़े थे और आज चाहते हैं कि सरकार इन्हें थोड़े ही सालों में स्वर्ग दे दे...!

उसकी अंतड़ी में फिर दर्द हुआ। उसकी आँखों के सामने फिर छा गए बाढ़, लुटती फसल, नेता महीपसिंह, तीन महीने की बाकी तनख्वाह, विद्यार्थियों के उदास गंदे चेहरे...लोग आलोचना करते हैं सरकार की, आखिर...वे भी क्या करें ? गलत तो नहीं कहते !

मास्टर को लगा जैसे वह कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। उसके भीतर दो धाराएँ एक-दूसरे को काटती हुई बही जा रही हैं, लगता है वह कहीं बहुत गहरे उलझ गया है, बिखर गया है अपने ही भीतर ! वह अपने को समेट नहीं पा रहा है...। मास्टर सुग्गन के सामने ही सोशलिस्ट नेता राजकुमार का मकान है। उनके बड़े से ओसारे में गाँव की छोटी जातियों के लोग इकट्ठा थे। गाँव के लोग उसे अधार्मिक समझते, मगर राजकुमार यही मान कर हँस देता कि ये सब अभी जमाने से बहुत पीछे हैं, राजकुमार घर आया हुआ था। उसने गाँव भर के लोगों को बुलाया 15 अगस्त की सभा करने के लिए; किंतु बहुत थोड़े लोग आए। किंतु छोटी जातियों के काफी लोग जुटे, क्योंकि वे जानते थे कि रामकुमार गोरखपुर से आता है, तो उनके लिए कुछ नए शिगूफे लाता है। राजकुमार ने पुराने काँग्रेसी कार्यकर्ता जग्गूराम हरिजन को अध्यक्ष बनाकर सबको चौंका दिया। जग्गूराम के बहुत हाथ-पाँव जोड़े कि राजकुमार बाबू बामनों के इस गाँव में मुझे क्यों काँटों में घसीटते हैं ? किंतु राजकुमार नहीं माना और जग्गूराम को ईंट के ऊँचे आसन पर बैठाकर अपना कार्य शुरू कर दिया। मास्टर सुग्गन अपने दरवाजे पर हारे-थके बैठ गए थे।



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