लाल कोठी अलविदा - शरत् कुमार Lal Kothi Alvida - Hindi book by - Sharat kumar
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लाल कोठी अलविदा

शरत् कुमार

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :173
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3066
आईएसबीएन :81-8143-087-5

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स्वतंत्रतापूर्व उसके बाद लगभग पचपन वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश के एक शहर में आये परिवर्तनों का चित्रण...

Lal kothi Alvida

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


स्वतंत्रता पूर्व और उसके बाद, लगभग पचपन वर्षों के दौरान उत्तर-प्रदेश के एक शहर में आये परिवर्तनों का बेबाक चित्रण। आजादी के बाद की उपलब्धियों द्वारा एक सीमित वर्ग की बढ़ती सम्पन्नता और अन्य वर्गों की ऐसी उत्कंठाओं का समाज की मान्यताओं, सामूहिक जीवन, और व्यक्तिगत भावना स्तर पर पड़ते प्रभाव की कथा। एक ओर स्वतन्त्रता संग्राम से प्रेरित भावनात्मक शुचिता है तो दूसरी ओर दिशाहीन उच्श्रृंखला मनोस्थिति और सांस्कृतिक खोखलापन। एक परिवार की दो पीढ़ियों की कहानी जिसमें बदलती सामाजिक परिस्थितियों में अपने भौतिक और मानसिक जीवन में मूल्यों को बनाये रखने का सतत प्रयत्न है। अलविदा एक इमारत, लाल कोठी को सम्बोधित नहीं करती है। विदाई है एक जीवन प्रणाली से जो वापिस नहीं आने वाली। यह एक नये जीवन के स्वागत के लिए पुराने इतिहास और वर्तमान की उथल-पुथल से अलविदा कहने की कहानी है।


1
अक्तूबर-1989



समर के पिता का देहान्त ब्राह्म मुहुर्त में एक स्थानीय नर्सिग होम में हुआ। उसके पिता को नर्सिंग होम ले जाते समय समर दिल्ली से बाहर दौरे पर था और तीन दिन बाद ही उससे सम्पर्क स्थापित हुआ। आख़िरी दिन ही समर नर्सिंग होम पहुँच सका था। समर को ख्याल आया कि अगले महीने उसके पिता का नब्बेवां जन्मदिन था। पिछले वर्ष के जन्मदिवस पर उनके अनेक पूर्व विद्यार्थियों ने जीवेम् शरदः शतम् कह कर उनका अभिनन्दन किया था। "नहीं !" समर के पिता ने उसकी बात सुधारी थी, "मैं जब तक अपनी देखभाल स्वयम् कर सकूँ, केवल उतने ही वर्ष जीना चाहता हूँ।"
नर्सिंग होम के गलियारे में एक युवती नर्स समर की ओर बढ़ आयी। "डॉक्टर की बात अनसुनी कर वे किसी को ग्लूकोज की बोतल वाली सुई नहीं लगाने देते, "नर्स ने कहा। "कल जब मैंने सुई लगाने की कोशिश की तो उन्होंने मेरा हाथ जोर से झटक दिया। कुछ खाते पीते भी नहीं। मुझे लगता है कि अब उन्होंने जाने का मन बना लिया है।"

समर को देखकर उसके पिता मुस्कराये। उनकी आँखों की चमक सदा के समान थी। उन्होंने समर को ग्लूकोज़ बोतल की सुई अपनी बाँह में लगाने दी। पिछले चार दिन की अपेक्षा अच्छी तरह सूप पिया। शायद वे जानते थे कि अब इस सब से दूर जा चुके हैं। देर शाम को समर ने स्पंज से उनका शरीर पोंछा। जीवन में पहली बार उस दिन उसने अपने पिता का शरीर छुआ। उसको आश्चर्य हुआ कि उनकी त्वचा कितनी नरम और स्वस्थ थी। देर रात को नर्सिंग होम के डॉक्टर का अन्तिम निरीक्षण पूरा होने के बाद वे आसानी से सो गये। सुबह सवेरे जब नर्स आयी तो नाड़ी स्प्न्दन रुक चुका था। हृदय की धड़कन बन्द थी। उन्होंने निद्रावस्था में शान्तिपूर्वक प्राण त्याग दिये थे।

समर के पिता का पार्थिव शरीर लाल कोठी लाया गया। कार की पिछली सीट पर अपने पिता का शव रखकर जब समर गाड़ी चला रहा था तो उसे दो वर्ष पूर्व की एक सुबह याद आयी। उस दिन उसके पिता को काफी बुखार था और वह उन्हें काफी दूर शहर के दूसरे सिरे पर एक प्रसिद्ध डॉक्टर को दिखाने ले जा रहा था। शहर से लगभग तीसमील दूर बहती गंगा नदी की ओर जाती बड़ी सड़क से वे शहर के अन्दर की ओर मुड़े ही थे कि गाड़ी के पीछे लेटे उसके पिता सीट पर उठ बैठे। खिड़की से बाहर झांक कर वे बोले थे, "अरे ! तुम मुझे अभी से गढ़मुक्तेश्वर ले जा रहे हो।" और फिर वे दोनों हँस पड़े थे।
उसके पिता के अध्ययन कक्ष में उनके शरीर को बर्फ की सिल्लियों पर रखा गया। दोपहर बाद शरीर को दिल्ली के विद्युत दाह गृह ले जाया जायेगा। कालेरंग की महोगनी वाली स्टडी टेबल की निचली दराज़ों में पड़ी उसके पिता की पीतल की सील और लाख और मोमबत्ती के टुकड़े अब कभी काम में नहीं आयेंगे। गर्मी की छुट्टियाँ आरम्भ होते ही डाकिये द्वारा विभिन्न कॉलेजों की उत्तर-पत्रिकाओं के मोटे-मोटे पैकेट लाना तो एक अरसे से बन्द हो चुका था। जीवन और संसार की हर प्रक्रिया कभी-न-कभी समाप्त हो जाती है।

समर ऊपर की मंजिल पर नहाने और कपड़े बदलने गया। लौटकर वापिस नीचे कमरे में जाते समय माथे पर तिलक लगाये एक लम्बा आदमी, जो संभवतः स्थानीय आर्य समाज से था, उसके पास आया।
"आप अन्दर न जायें", उस आदमी ने समर से कहा। "आप के लिये उस कमरे में रहना उचित नहीं है।"
"हाँ, है।" समर ने अवज्ञा भाव से कमरे में जाते हुए कहा।

चार घन्टे वह अपने पिता के शरीर के निकट उस कमरे में चुपचाप बैठा रहा। लोग फूल और मालायें चढ़ाने आते-जाते रहे। उसने न किसी को देखा, न पहचाना। वार्तालाप से दूर। एक शून्यता भरी भावना। अन्तिम सानिध्य में। किताबों की अलमारी से ऊपर उसके पिता की एक फ़ोटो टंगी है। प्रोफेसर सिन्हा के कॉलेज से रिटायर होने के अवसर पर आयोजित विदाई समारोह में वे अपने विद्यार्थियों के साथ कॉलेज की लाईब्रेरी के सामने खड़े हैं। अजीब चीज़ है फ़ोटोग्राफी उसने सोचा। लोग बड़े होते हैं, वृद्ध होते हैं, मर जाते हैं, पर इन चित्रों में समय स्थिर रहता है। लगता है कि वे कभी भी कदम उठा कर अपने पूर्व रूप में फोटेग्राफ से बाहर आ जायेंगे। समर के एलबम में एक फ़ोटोग्राफ़ है। बहुत वर्ष पहले, राजगीर में गृद्धकूट पहाड़ी की गुफ़ा के सामने खड़े एक बच्चे का, उसका अपना, जिसमें वह अपनी माता और पिता के मध्य खड़ा मुस्करा रहा है। उस फ़ोटोग्राफ़ को देखते हुये वह हमेशा अचम्भे में डूब जाता है। इतने वर्षों बाद भी उस समय की अपनी मनःस्थिति उसके स्मरण में उभर आती है। अपने माता और पिता, दोनों से मिली सुख-सुरक्षा की सुखद भावना जो कितना भी प्रयत्न करने पर वे अकेले व्यक्तिगत तौर पर उसे नहीं दे सकते थे। जैसा करने की कोशिश बाद के वर्षों में उसके पिता ने हमेशा की थी।

बाहर की आवाज़ों की ध्वनि कमरे के अन्दर आ रही है। लॉन में, और कमरे के सामने भी, बहुत लोग हैं। कोलाहल है। लोग बातें कर रहे हैं। दो-चार रिश्तेदारों को छोड़ सब बाहर के लोग हैं। कितनी बातें करते हैं लोग। समर सुनता रहा। शब्दों को नहीं, उनसे ऊपर उठती सामूहिक ध्वनि को। कम्पनी बाग में, पेड़ों पर अपने घोंसलों के पास बैठी चिड़ियाओं की तरह का कोलाहल।

समर के पिता ने एक बार कहा था कि मनुष्य और अन्य प्राणियों का अन्तर मुख्यतः शब्द और भाषा का है। मनुष्य समूह में भी शब्द और भाषा का उचित प्रयोग ही एक मनुष्य को दूसरे से श्रेष्ठ बनाता है। "शब्द, चाहे वे मौखिक हों या लिखित, ही मनुष्य सभ्यता को परिमार्जित करते हैं। सवाल चाहे कला का हो या विज्ञान का, चाहे भावना का या आपसी मानवीय सम्बन्धों का।"

"पर संसार में जो होता है, केवल कर्म से ही होता है," समर ने आपत्ति उठायी थी।
"तुम ठीक कहते हो", उसके पिता का उत्तर था। "पर कर्म का स्रोत है विचार, और विचार शब्दों द्वारा ही आकार लेते हैं। तुमने कभी गौर किया है कि मनुष्य द्वारा प्रयोग की गयी भाषा उसके मन की बनावट की द्योतक है ? चतुर लोग कई बार जानबूझकर अपने प्रतिद्वन्दी को क्रोधित कर उसके मन को असन्तुलित करते हैं। सतही आत्म-अनुशासन का मुखौटा हट जाने पर जो भाषा वह बोलता है वह उसके मन के असली स्तर को प्रदर्शित करता है। वही वास्तविक स्तर जो संकट और विषम परिस्थितियों में उभर कर सामने आता है। कम्प्यूटरों इस युग में मुझे लगता है कि मनुष्य का मस्तिष्क उसके मन के कम्प्यूटर का हार्डवेयर है और भाषा उसका सॉफ्टवेयर।"

दिल्ली के विद्युतदाह गृह के साथ बने हॉल में हवन कुण्ड के सामने बैठे पण्डित जी वैदिक मन्त्र पढ़ रहे हैं। ऋग्वेद के दसवें मण्डल का चौदहवां सूक्त। युर्जुवेद की एक सूक्ति। फिर अर्थर्ववेद। समर की मौसी, मुक्ता, पण्डित जी के उच्चारण से सन्तुष्ट नहीं थीं। उन्होंने समर के पिता के एक पूर्व विद्यार्थी, जो अब एक स्नातकोत्तर कॉलेज के प्राचार्य थे, से पाँच बार मृत्युन्जय मंत्र पढ़ने को कहा। फिर अर्थी को विद्युत दाह गृह की भट्टी में सरकाने से पहले, शान्ति पाठ।
"इन मन्त्रों को पढ़ने का अभिप्राय क्या है ?" समर ने मुक्ता से पूछा।

मुक्ता कुछ क्षणों तक संस्मरणशील भाव में मौन रहीं। फिर बोलीं, "जो लोग यहाँ उपस्थित हैं, उनके मन को शान्ति देने के लिये। कोई नहीं जानता कि मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाती है। पर जीवन की धारा तो बहती रहनी चाहिये। मन्त्र पढ़ने का अभिप्राय है जीवित शोक सन्तप्त प्राणियों के दुःख का भार हल्का करना।"

समर की विमाता के एक सन्बन्धी, जो अनेक वर्ष पहले अपनी पुत्री का विवाह समर से हो जाने के इच्छुक थे, अपनी पत्नी के साथ आये थे। समर के पास आ कर कुछ क्षण उसके कन्धे पर हाथ रख कर वे खड़े रहे। समर की विमाता के देहान्त के समय भी समर ने उन्हें इसी तरह अपने पिता के कन्धे पर हाथ रख कर खड़े देखा था। फिर उसके पिता पुनः अकेले रह गये थे। अपने तीसरे विवाह में जिस भी स्तर की सहचारिता उन्होंने ढूँढ़ी थी, उसे न मिलने पर अपने जीवन दायरे में एक सह-यात्री के भौतिक अभाव का वीरानापन फिर से उनके साथ था। तब समर अपने पिता को अपने साथ रहने के लिए दिल्ली ले आया था। पर वे कुछ ही दिन उसके साथ रहे। उनका जीवन, उनकी भावनाओं, के संस्मरण और पृथ्वी से उन्हें जोड़ते सम्बन्ध लालकोठी में थे, पर उन दिनों, और उसके बाद के वर्षों, में अपने पिता से उसके सम्बन्धों में एक मैत्रीपूर्ण परिपक्वता बढ़ती गयी थी। अनेक व्यक्तिगत प्रश्नों और विषयों पर वे बिना किसी झिझक, सरल रूप से चर्चा करने लगे थे।
एक दिन शाम को लॉन में घूमते हुये समर ने अपने पिता से पूछा था, "आपने तीसरा विवाह क्यों किया ? मुझे नहीं लगता कि उससे आपको बहुत सुख शान्ति मिली।" फिर अपने सवाल को आगे बढ़ाते हुए वह कहता गया था, "उस विवाह के समय आपको जीवन का व्यापक अनुभव था, आपने अवश्य देखा और समझा होगा कि आप दोनों की जीवन प्रणालियाँ और रुचियाँ कितनी भिन्न थीं। पर फिर भी, बहुत सोच-समझकर, पूर्ण स्वतन्त्रता में, आपसी सहमति से, आपने ऐसा निर्णय क्यों लिया ?"

उसके पिता सोचते रहे थे। फिर बोले, "कई बार मैं सोचता हूँ, और एक निर्णय के कार्यान्वित हो चुकने के बाद यह सोचने के लिए बहुत समय मिलता है कि हर घटना के कितने पहलू होते हैं। मुझे लगता है कि असली स्वतंत्रता भौतिक जीवन की नहीं, आन्तरिक भावनात्मक स्तर की है। परिपक्वता का जो कुछ भी अर्थ हो, मुझे नहीं लगता कि हम कभी भी भावनात्मक स्तर की परिपक्वता प्राप्त करते हैं। मनुष्य की आकांक्षायें सदा उसी स्तर की बनी रहती हैं-वही प्रेम, लालसा, वही स्पर्शाकांक्षा, वही भाव आतुरता। मन में उठती भावनाओं का द्वन्द्व कभी समाप्त नहीं होता, जीवन-भर हम उनके बन्दी बने रहते हैं। क्या भविष्य पूर्व निर्धारित होता है ? क्या जीवन के घटनाक्रम हमारे चुनावों, हमारे दृढ़ निश्चयों पर निर्भर करते हैं ? क्या भावनायें घटनाओं से नहीं, हमारे अन्तर्मन द्वारा उनकी समझ और व्याख्या, उनको दिये अर्थ से पनपती हैं ? तो फिर सफलता, सुख-दुःख, भावनायें, क्या हमारे अपने मन का खेल मात्र नहीं है ?"

फिर वे कहते गये थे, "तुमने स्वयं अनुभव किया होगा कि किसी भी घर का वातावरण वहाँ सुनी और गूँजती ध्वनियों, शब्दों और भाषा से बनता है। उसी पर निर्भर करता है कि किस स्तर के विचार उस घर में रहने वालों के मन में अंकुरित हों। किसी शालीनता रहित वातावरण में कल्पनाशील विचार प्रस्फुटित नहीं होते। तुम्हारे विमाता के साथ रहने का यही मेरा अनुभव था। तुमने कहा कि हमारा विवाह असफल रहा। यह सच है। हम दोनों के पास कोई और विकल्प नहीं था और हमारी परिस्थिति का आग्राह था कि हम अपने सम्बन्ध को सुखी रखें। पर अनुचित भाषा और कठोर शब्दों के प्रयोग में गहरी विनाशात्मक शक्ति होती है। कुछ ही क्षणों में बोले कुछ सख्त शब्द लम्बे समय तक मन में गूँजते रहते हैं और आपसी सम्बन्धों को गहरी ठेस पहुँचाते हैं। फारसी में एक कहावत है : जबान के घाव सबसे गहरे होते हैं। मैंने एक दूसरे स्तर का जीवन देखा था और हर समय मैंने अपने आप को समझाने की कोशिश की थी कि वह समय अब बीत चुका है। अनजाने में तुम्हारी विमाता मेरे मन को उस बीत चुके समय की स्मृतियों में लौट जाने पर बाधित कर देती थीं। बहुत प्रयत्न करने पर भी मैं उनके साथ अपने जीवन को जोड़ने में असमर्ख रहा।"


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