क्या मैंने गुनाह किया - स्वाति तिवारी Kya Maine Gunah Kiya - Hindi book by - swati tiwari
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क्या मैंने गुनाह किया

स्वाति तिवारी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3067
आईएसबीएन :81-7055-669-4

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नारी पात्र पर आधारित कहानियाँ.....

Kya Maine Gunah Kiya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मन की बातें तो बहुत हैं आपसे करने के लिए। कुछ बातें करती भी रही हूँ, लेखन के माध्यम से। अपनी बात अपनों से न हो तो मन में सालती रहती है और लेखक का सबसे अपना तो उसका पाठक ही होता है। जब से पढ़नासिखना सीखा शायद तभी से लिखने की प्रक्रिया से भी बँध गयी हूँ। स्थिति यह है कि जब कभी लंबे समय तक लिख नहीं पाती एक बेचैनी सी महसूस होती है। यूँ तो कई विद्याओं में कलम चली है-कविता, लेख, व्यंग्य, स्तम्भ आदि। बहुत कुछ लिखा है पर कहानी के लेखन ने मन की सन्तुष्टि दी। अपने स्कूली छात्र जीवन से ही लिखने से जुड़ाव रहा है प्रखर वक्ता के रूप में मुझे एक पहचान इसी माध्यम से प्राप्त हुई थी।

जब भी लिखा कल्पनाओं के आधार पर कभी नहीं लिखा। मेरी कहानी के पात्र काल्पनिक कभी नहीं रहे। हर पात्र को मैंने समाज में कहीं न कहीं जीवन्त पाया है। यह सच है कि कहानी के मूल में नारी पात्र ही केन्द्रित है, पर मैंने पुरुष या नारी के साथ पक्षपात नहीं किया है। जो जैसा कहीं देखा, महसूस किया या तलाशा है उसी रूप में आप तक पहुँचाया है। इन कहानियों के मात्र अपने अस्तित्व को तलाशते हैं। कहानियों में कविता का निर्णय हो या रमा का छुटकारा भाग्यवती का भाग्य हो या चन्द्रा का विद्रोह दुलारी की विदाई हो चाहे मालती की एकाधिकार व्यथा, हर पात्र समाज से प्रश्न करता है-क्या मैंने गुनाह किया ? ऐसी ही कुछ भावुकता भरी अभिव्यक्तियाँ कथा संग्रह के रूप में आपके हाथों में हैं। मेरे पहले प्रकाशन में प्रस्तुत ये कहानियाँ अंतरंग को छूने की विनम्र कोशिश हैं।

चिर ऋणी हूँ पूज्य माता-पिता की जिन्होंने मेरे बालपन को उच्च साहित्यिक कथाओं को सुनाकर संवारा। मैं सबसे ज्यादा ऋणी हूँ जीवन सहचर, मित्र, सखा, आलोचक, प्रशंसक और पहले पाठक मेरे पति श्री सुरेश तिवारी की, जो जीवन में सबकुछ सह सकते हैं पर मेरी संवेदनशीलता को मरने नहीं दे सकते। सच कहूँ तो उन्हीं का प्रोत्साहन विचारों की अभिव्यक्ति बनकर लिखने के लिए उत्साही बनाता रहा है। लेखने से संपादक तक और सम्पादन से निर्माता-निर्देशक होने तक कभी हतोत्साहित नहीं होने दिया। एक अनकहा सहयोग हमेशा देते रहे हैं जो मेरा संबल बन जाता है। आभारी हूँ उन सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं की जिन्होंने स्थान देकर मुझे लिखते रहने का संदेश दिया है। ऋणी को अपने नन्हे बच्चों रुचि, पल्लवी और बंटी की भी हूँ जिन्होंने जीवन को पूर्णता दी।

पीड़ा से मुक्ति....या मुक्ति की पीड़ा...?

कितने दिन, कितने महीने, कितने वर्षों तक इस पीड़ा को सहा है मैंने। कई बार महसूस किया था कि यह दर्द जान लेकर ही रहेगा। क्या कहूं मैं मुक्त होना चाहती थी, पर आज लगता है मैं मुक्त होना नहीं चाहती थी ? एक सुखद भावनाओं का दर्द भी समाहित था उस पीड़ा में।
बाबूजी ने अस्पताल से लौटकर जब बताया कि अर्जुन की हालत ठीक नहीं है, तो मिलने की चाह से कराह उठी थी मैं। मन चाह रहा था अभी बाबू जी को चलने को कहूं। चलो बाबूजी मुझे मेरे बच्चों के साथ उस वार्ड तक ले चलो, जहाँ अर्जुन को भर्ती किया गया है। पर कह नहीं पा रही थी। उस पर मां की बद्दुआ सुनकर हिम्मत ही नहीं हुई अपने पति से मिलने जाने की। भाभी ने खाना खाते वक्त कहा भी था जीजी तुमको भी जाना चाहिए था। अरे एक बार के झगड़े में कोई इस तरह अपना पति, अपना संसार छोड़ देता है क्या ? पर वहीं मां की तेज आवाज ने भाभी की सीख को दबा दिया था। मां भाभी को डांटते हुए बोली थी, कोई जरूरत नहीं है—कल-वल जाकर तबीयत देख आना, और बच्चे अस्पताल में क्या करेंगे, तू तेरे बाबूजी के साथ थोड़ी देर के लिए चली जाना।

पर कहां, मेरे जीवन की खुशियां तो सुरंग में जा बैठी थीं। ऐसी सुरंग में, जिसमें दूर-दूर तक कहीं भी रोशनी का नामोनिशान नहीं था। इतना स्याह अंधकार था और ऊपर से मैं भी रोशनी की किरण ले जाने के बजाय काली अमावसी रात का अंधेरा बटोर कर उस सुरंग में भरती चली गयी। काश मैं हिम्मत कर उस घुटन भरे अंधेरे को काटते हुए सुरंग के उस छोर तक पहुंच जाती, तो वो चेहरा जो इस छोर पर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था, मेरा प्यार, मेरा सुहाग, मेरा संसार, मेरा सर्वस्व था वह मुझे मिल सकता था।
रात के दो बज रहे होंगे। सब गहरी निद्रा में थे, पर मेरी आंखें सुबह का इंतजार कर रही थीं। आकाश भी मेरे पास ही सोया था, पर वह भी थोड़ी देर में डरकर जाग रहा था। शायद उसे उसके पापा याद आ रहे होंगे । मन बार-बार डर भी रहा था—पता नहीं कैसी आवाज ने बाबूजी को भी जगा दिया था। वे पानी मांग रहे थे। अचानक आंगन में बिल्ली के रोने की आवाज ने सभी को जगा दिया। अनहोनी का आभास उन्हें भी हो गया था। उनका गला सूख रहा था और आंखें नम हो रही थीं। एक घंटा गुजरा होगा कि स्कूटर की आवाज आई और रुक गयी। फिर कॉलबेल के बजते ही सब डर गये थे। बाबूजी ने उठकर दरवाजा खोला, तो ननद का लड़का रो रहा था, बोला मामा नहीं रहे। मैं न कुछ कह सकी न रो सकी, पर बाबूजी रो रहे थे। मां निर्विकार भाव से बैठ गयी थीं बाबूजी के पास। बाबूजी मां से कह रहे थे, ले अब तो हो गयी शांति। बेटी का तो सारा संसार ही उजाड़ दिया तूने।

मेरा मन भी यही कहना चाह रहा था—हां मां तुम दोषी हो, हर बार तुमने अपने रूखे स्वभाव से, अपने घमंड से मुझे रोके रखा। कई बार तो मैं चाहकर भी नहीं जा पायी सिर्फ तु्म्हारे डर से।
नारी होकर भी तुम नारी के मन की व्यथा को समझ नहीं पा रही थीं। हां, शायद इसमें बाबूजी की ही महानता है, जो तुम्हारे जैसे रूखे, कठोर, असामाजिक स्वभाव को तमाम उम्र झेलते रहे हैं।
मां तुम मेरे घर संसार को लेकर निष्ठुर कैसे हो गयी थीं। मां, भाभी को मायके न जाने देने वाली तुम, अपनी बेटी को क्यों मायके में रोके रहीं। आज जब अर्जुन के मरने की खबर मिली है, तो तुम ज्वाला जैसी गरम मिजाज मां अब बरफ सरीखी हो गयीं। अब क्या रखा है ? एक आस, एक उम्मीद थी जीवन में, शायद हमारी गाड़ी फिर चलने लगेगी  हमारा मिलन फिर हो जाएगा, पर नौ साल की इस लंबी यात्रा में जब भी अर्जुन लेने आये तुम मेरी दीवार बन खड़ी हो जाती थीं। शर्तों के जाल में फँसा गांव के सीधे-सरल दामाद पर न जाने कौन से मंत्र फूँक दिये कि वह चाहकर भी पत्नी पर हक जता नहीं पाता था हां मां तुम तो दोषी ही हो, पर मैं भी कम दोषी नहीं हूं। अगर मैं आगे आकर तुम्हारे विरोध का बंधन तोड़ चली जाती तो आज यह सब नहीं होता।

पर नियति का लिखा कौन मिटा सकता है। सच ही तो कहती रहीं सासू मां—घर की दहलीज लांघते वक्त औरत को बहुत सोचना चाहिए। बाहर गया पैर कई बार चाहकर भी अंदर नहीं आ पाता है। पर तब मां तुम्हारे रूखे स्वभाव की आदी मैं उसे उपदेश समझ ग्रहण नहीं कर पायी थी। एक अकेली सासू मां से तंग आ पति से रोज ही लड़ना और ताने देना मेरी आदत बनती जा रही थी। मायके का सब रुपया-पैसा आज मुझे अर्थहीन लग रहा है, जिसके घमंड में मैं चूर रही थी और मध्यमवर्गीय खाते-कमाते पति से झगड़ा कर मायके भाग गई थी। उसने अगर मेरी बेवकूफी और नादानी पर एक थप्पड़ मार भी दिया था, तो कोई ऐसा अपराध नहीं किया था, जिसका दंड मैंने उसे मृत्यु तक दिया।

अर्जुन नौ वर्ष के वियोग में जितना तड़पे होंगे, अपमानित हुए होंगे, उसका एहसास मुझे आज हो रहा है, जबकि मेरी नैया किनारा छोड़ डूब गयी है। हां अर्जुन, तुम्हारी लायब्रेरी में रखी अपनी पुस्तक में, फ्रांस के लेखक और महान् समाजशास्त्री इमाइल दुर्खिम ने अपनी पुस्तक में आत्महत्या को एक सामाजिक घटना बताया है। मैंने जिज्ञासावश उस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करते हुए पढ़ने-समझने का जो प्रयास किया था, उसका सारांश यही था कि आदमी आत्महत्या के लिए तभी विवश होता है, जब उसे उसके प्रियजन ने कोई गहरी पीड़ा दी हो। पर यह बात मुझे पहले याद आ जाती, तो मैं आज शायद अपने सुंदर संसार में होती, पर भाग्य का चक्र उलटा ही हो गया।

ननद का बेटा मेरे पास आकर बैठ गया था। बोला, मामीजी मामा ने पूरे समय टकटकी लगाकर आपकी और बच्चों की राह देखी थी। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि आप उन्हें क्षमा कर देंगी और जहर खाने की खबर सुनकर तो लौट आयेंगी, पर ऐसा नहीं हो पाया। काश, आप अस्पताल तक आ जातीं। मेरे मामा की आत्मा शांत हो जाती।

कालचक्र घूमते देर नहीं लगती। देखते-देखते अर्जुन को गये दस वर्ष हो गये। बेटा अर्जुन की तरह ही सुन्दर नाक-नक्श का है, पर स्वभाव से खामोश, अन्तरमुखी हो गया है। मेरे साथ उसका व्यवहार तो सामान्य है, पर फिर भी लगता है मन ही मन वह मुझे पिता की हत्या का दोषी समझता है। आकाश ने तो अपनी बहन की शादी भी अपने बलबूते पर अपने दोस्त से तय करवाकर मुझे इस जवाबदारी से भी मुक्त कर दिया, पर जब मैंने विवाह के निमंत्रण कार्ड पर पिता के नाम को न देखकर विरोध किया तो उससे रहा नहीं गया। उसके अंदर का लावा ज्वालामुखी की तरह फूटकर बाहर आ गया था। उसका कहना था, उसके नाम की बात करती हो ? जिसे तुमने जीते जी मरने को मजबूर कर दिया ? उस पिता के नाम की बात कर रही हो ? जो तुम्हारी याद में नौ साल तक मर-मरकर जिया ? औरत द्वारा ठुकराये गये पति का उलाहना लेकर जिन्दा रहा, किस पिता की बात करती हो ! जिसके सुख-चैन में तुम दीमक बन बैठी थीं ? आज उसके नाम की बात तुम्हारे मुँह से अच्छी नहीं लगती ! और पिता ने हमारे बारे में सोचे बगैर आत्महत्या कर हमें अनाथ कर दिया। वह कुछ अंश तक हम भाई-बहन के दुर्भाग्य के दोषी हैं, रहा सवाल तुम्हारे नाम का तो तुमने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, इसलिए ? पर मां मेरे पिता ने मरकर तुम्हें नौकरी का हकदार बनाया था, अतः एक तरह से तो हम पिता की कमाई से ही पले हैं, वरना तमाम उम्र यह अहसास हमें खाये जाता कि हम नाना और मामा के टुकड़ों पर पले हैं।

नाना-नानी के नाम न लिखने का कारण भी सुन लो ? वे नाम ऐसे ही हैं, जिनकी छाया सघन रही है, पर वे वटवृक्ष की तरह हैं, जिसके तले में पौधा उगे तो वो पनप नहीं पाता। हां मां, तुम ऐसा ही पौधा रही हो, जो अपना अस्तित्व बना ही नहीं पायी। नहीं, हमें ऐसे किसी नाम की आवश्यकता नहीं है।

बँटा हुआ सुख

 

 

कमला को मेरे यहाँ काम करते लगभग एक वर्ष हो गया था। यूं तो वह काम अच्छा ही करती थी पर जब भी उसका पति घर पर रहता उसका काम में अनमनापन बराबर बना रहता था। वह या तो बेमन से काम करती थी या फिर बार-बार घर जाती थी। शक तो मुझे उसके काम पर लगने के हफ्ते-भर में ही हो गया था पर मुझे तो काम से मतलब था। शहरों में काम-काज के लिए हजार रुपये देने पर भी वैसे भी बाई नहीं मिलती, ऐसे में, इस बाई को खोना नहीं चाहती थी।
जब प्रमोशन लेकर मेरे पति ने इंदौर ज्वाइन किया तो मैं खुश नहीं थी क्योंकि मैं यह तो जानती थी कि उनके विभाग की श्रेष्ठ पोस्टिंग इंदौर ही है पर मुम्बई की तर्ज पर बढ़ता इंदौर और ऊपर से छोटे-छोटे तीनों बच्चे, कैसे सुव्यवस्थित हो पाएगा ? मकान भी मिलेगा या नहीं ? ऊपर से रोज की रिश्तेदारी, क्योंकि उसी इलाके के हैं इसलिए ससुराल और मायके सब में व्यवहार पास में रहो तो ज्यादा निभाना पड़ता है। पति का कहना था सब हो जायेगा यार। डोंट वरी। थोड़ा समय तो लगता है पर व्यवस्थाएं भी तो हो जाती हैं। फिर जरा से नौकर-चाकर के आराम के लिए कैरियर की बलि तो नहीं चढ़ा सकते न। कल को बच्चे भी बड़े हो रहे हैं और उनकी एजूकेशन के लिए भी इंदौर या भोपाल ही रहना पड़ेगा।
मैंने भी मन को समझाया चलो इसी बहाने मां-बाबूजी के पास भी रहने को मिलेगा। फिर जब एक बहुत ही अच्छा क्वार्टर मिल गया तो मेरी चिन्ता का पचास प्रतिशत हल तो हो ही गया था पर महरी के मामले में मेरा दुर्भाग्य हमेशा रहा है। मिलती तो हमेशा है पर चार-छः महीने की खोजबीन के बाद, और जो मिलती है वह चार-छः महीने में ही चली जाती है। पर जब से मैंने बंगले का सर्वेन्ट क्वार्टर दे दिया है एक साल से मेरी इस समस्या का भी हल हो गया है।

हां कमला सांवले रंग की गोलमटोल कद-काठी की कोई सत्ताइस-अट्ठाइस वर्ष की है। जब काम पर रखा तो उसने बताया, उसके तीन बच्चे हैं जो गांव में सास के पास रहते हैं। मेरी जिज्ञासा ज़रा ज्यादा ही तेज चलती है, मैंने बातचीत में जानना चाहा कि बच्चों को साथ में क्यों नहीं रखती तो उसका उत्तर था बच्चों को शहर में अच्छा नहीं लगता। मेरे अन्दर की लेखिका फिर पूछ बैठी—और तू बच्चों के साथ नहीं रहती ? इस पर कमला कहने लगी, नहीं मैडमजी। मुझे गाँव में अच्छा नहीं लगता।
वाह। क्या बात है मां को गांव और बच्चों के शहर में अच्छा नहीं लगता ? मैं चुप कर गई, मुझे क्या करना है ? पर उसकी बात मेरे हलक से  नीचे नहीं जा रही थी।

मां और बाबूजी भी आए हुए थे। किचन में बच्चों के लिए पूरनपोली बनाती मां ने मेरी उत्सुकता पर इशारा किया कि चुप कर। फिर जब कमला मांजने के बर्तन लेकर आंगन में गई तो मां ने मुझे आवाज लगाई क्यों कुरेदती रहती है, अगर उसको बच्चों की याद दिलाई तो वो घर चली जायेगी और परेशानी होगी तुझे। अगर नहीं गई और बच्चे यहाँ ले आई तो भी तेरी परेशानी बढ़ना है। चार बच्चों की धमा-चौकड़ी तुझसे बर्दाश्त हो पाएगी। चुप रहा कर। तू अपने काम से काम रख क्या करना तेरे को।
मां की सलाह मुझे भी सही लगी फिर सब ठीक चलता रहा। मेरी व्यस्तताएं बढ़ने लगी थीं। घर का काफी काम कमला और हमारा पुराना नौकर शंकर निपटा लेते थे। एक दिन फुर्सत थी तो हाट बाजार से ढेर सारी सब्जी लाकर सुधारने बैठ गयी। वैसे लाती तो मैं ही हूं पर सुधारने का काम कमला करती थी। मटर छील रही थी। ढाई किलो मटर छीलना बड़ा ही बोरियत का काम है। थोड़ी ही देर में चाय की तलब होने पर मैंने सर्वेन्ट क्वार्टर की घण्टी बजा दी। कमला आई तो उसके चेहरे पर उदासी थी, आँखें भी लाल हो रही थीं। मुझे लगा शायद वो बहुत देर तक रोई थी। मैंने सहज ही पूछ लिया क्या हुआ तेरे को ? रो रही थी क्या ?

झगड़ा हुआ क्या रामलाल से ? भावुक हो मेरे स्नेह भरे सान्निध्य में वह बोल पड़ी नहीं मैडमजी। किससे झगड़ूंगी वो पांच दिन से गांव पर ही हैं आए ही नहीं। ये घर मिला था तो मुझे लगा था अब वो मेरे साथ रहेंगे पर भाग्य को कौन बदल सकता है।
कमला चाय बनाकर ले आयी मेरे लिए भी और खुद के लिए भी। मैंने चाय का कप उठाया तो देखा कमला के चेहरे पर उदासी के बादल तो छाये थे पर वह कुछ कहने को भी मन ही मन छटपटा रही थी। चाय की चुस्की के साथ मैंने उसे छेड़ा था, क्यों क्या बात है ये रामलाल इतने दिन गांव जाता है तू नहीं जाती ? बच्चों की याद नहीं आती क्या ? तत्काल टालने वाले अंदाज में बोली, जाते हैं तो जाएं ? मेरी बला से ? मुझे क्या फर्क पड़ता है मैडमजी मुझे कमाना भी अकेले है और खाना भी अकेले है। हाँ आ जाते हैं तो मन को खुशी होने लगती, अपुन को भी कोई है। मैंने फिर प्रश्न दागा था क्यों दूसरी कर ली है क्या ? अब की बार उसके मन में उबल रही बात उफन कर बह निकली।
कहने लगी हां मैडमजी है मैंने ही तो करवाई इनकी दूसरी लुगाई।

क्यों ?
मुझे बच्चे नहीं हुए हैं और घर में कोई लड़का था ही नहीं देवर-जेठ में भी।
अच्छा। फिर साथ में क्यों नहीं रहती ? अरे तेरी तो सेवा करनी चाहिए उसे। मैंने कहा तो वह फूट पड़ी—भाड़ में गई सेवा ? मेरी कमाई की रोटी ही मुझे सुख से शांति से खाने दे वईज भोत हैं। मैडमजी। उसके एक-एक कर तीन लड़के हो गए और मेरा मन तरसता रहा, पर मैंने उसके जापे जज्जके किये बच्चे संभाले पर बाद में वो कहने लगी। बच्चों को तू मत उठाया कर बाँज बजट्टी है तेरा क्या भरोसा ? मेरे तो मेहनत से पैदा किए छोरे हैं। फिर तो खूब झगड़ा हुआ। मैंने भी साली की चोटी पकड़ कर घसीटा मारा। गाली देती है अरे तेरा खसम मेरा ही छोड़ा हुआ है नहीं तो कहाँ से पैदा करती छोरे ? बड़ी आयी बच्चों वाली ? फिर मेरा आदमी भी उसकी तरफ ही बोलने लगा। उसने भी मुझे मारा। एक तो बच्चे जने नहीं ऊपर से रौब दिखाती है। चल हट बाहर निकल। बस मैडम जी। मैंने घर छोड़ दिया मामा के घर आ गई। साल भर रही फिर ये आपका काम मिल गया तो कमरा भी मिला, इनको भी आने-जाने में सोहलियत हो गई। मामा के घर भी आते थे पर वहां मन मरजी तो नहीं कर पाते थे ना ? बोले यहां का काम कर ले पर अब पांच दिन से सकल नहीं बता रहे हैं क्योंकि पगार मिली होगी ना, कहीं मैं सामान भरने का बोल दूं इस डर से। हे बहुत शाना। रुपया उस पर ही खरचता है। बच्चे हैं ना उसके। पर भाग बिना कुछ नहीं होता। कभी-कभी आ जाते हैं इतना ही बहुत है नहीं तो जिते जी का रण्डापा क्यों भुगतूं मैं ? अकेलापन तो नहीं रहा कम से कम।

हफ्ते के कुछ दिन वहां कुछ दिन यहां दोनों बांट दिये हैं। पैसे का क्या ? मैं ही सामान लाकर बच्चों के लिए भेजती हूं, इनको बोल रखा है बताना मत। पिछले दो साल खेत पर मजूरी करती थी तीन हजार जमा किये थे मैंने। उसका छोटा टी.वी. लायी पर देखती तो लगता वहां छोटे देखने जैसे बच्चे हैं सो एक दिन इनके साथ गांव भेज दिया पर उसको क्या ? मैं ही लायी थी अपने पति के वंश का चिराग जलाने ? पर मैडमसाब मेरा ही करम खोटा था वरना जिस आंगन को लीपा-पोता मैंने हां उसे सजाया उसके बच्चों ने और आज उस आंगन से मैं बाहर खदेड़ दी गयी।
उसकी आंखों में फिर ममता का सागर उमड़ पड़ा था। बात खत्म कर हम अपने-अपने काम निपटाने लगे। कुछ देर बाद दरवाजे की घण्टी बजी। वह उठकर गयी। लौटी तो उसके रोये उदास चेहरे पर अचानक रौनक और प्रसन्नता थी।
मैंने पूछा कौन आया है ?

उसने शरमाते हुए कहा मैडम ये आए हैं। बोल रहे हैं एक घण्टे बाद साब के साथ दौरे पर जाना है, रात का खाना बनाकर देना पड़ेगा ? मैं जल्दी काम निपटा लूं ? मुझे लगा इसे जाने देना चाहिए ? बेचारी को बच्चे तो मिले नहीं। एक ही सुख मिला है सौभाग्यवती होने का, वह भी हफ्ते के बंटे हुए दिनों में। मुझे इसे रोकने का कोई हक नहीं। अचानक मैं बोल पड़ी, कमला तू जा। अभी शंकर आता ही होगा, आज का सारा काम वो कर लेगा। नहीं तो तू कल कर लेना। वह खुश होकर फटाफट काम निपटाने लगी और जो काम वह घण्टों में करती थी उसे उसने मिनटों में निपटा लिया। फिर चली गयी पति को खाना बनाकर देने का और पत्नित्व का सुख पाने के लिए।

एकाधिकार

 

 

आज जब देवर का फोन आया तो मालती समझ नहीं पायी कि उसे क्या करना चाहिए ? सासू मां की मृत्यु का समाचार यूं कोई छोटी खबर नहीं थी। पर क्या करती मालती की आंखें रोने को तैयार नहीं थीं। एक ऐसी स्त्री की मृत्यु पर वह क्यों रोए जिसने उसके हंसते-खेलते संसार में जानबूझकर शक का जहर घोलने का प्रयास किया था। लेकिन जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि लोक-लाज के चलते कई रस्में हम केवल समाज के दिखावे के लिए ही तो करते हैं। यही तो नारी की विडम्बना है कि उसे सामाजिकता के दायरे में बंधकर कैसी-कैसी मर्यादाओं को निभाना पड़ता है चाहे उसका मन माने या न माने।
विनय को भी शायद दफ्तर में फोन पर सूचना मिल गई थी। उन्होंने मालती को चलने की तैयारी करने के लिए फोन कर दिया था।

मालती ने पन्द्रह दिनों के हिसाब से तैयारी कर ली थी। इतने दिन तो लगने ही थे। तेरहवीं के बाद ननदें/बुआएं चली जाएंगी तभी तो वह वापस आ पाएगी। फिर शायद बरसी छः मासी भी साथ ही करनी पड़े ? विनय तब तक घर से दफ्तर आ गए थे। बिटिया के स्कूल में भी सूचना दे दी थी। सारे लैटर मालती ने टाइप करके तैयार रखे थे। विनय ने साइन करके ड्राइवर को बिट्टू के स्कूल एवं दफ्तर भी अवकाश आवेदन देने के साथ कुछ और निर्देश देकर भेज दिया था।
अन्दर आकर विनय ने मालती से पूछा क्या तुम पूरे समय वहां रहोगी ? या फिर उठावने के बाद एक बार यहां आना चाहोगी ? उसने सहज होते हुए कहा था देखेंगे जैसा होगा ?

मां को ले जाने की लगभग सभी तैयारी पूरी हो गई थी। मालती जब पहुंची मां के शव को देखकर उसकी रुलाई फूट पड़ी थी। वह देवर के कंधे का सहारा लेकर फूट-फूटकर रोने लगी थी। रुलाई खुशी की हो तो भी और गम की हो तब भी यादों के चक्रव्यूह में उलझाने लगती है। यादों के ये दरख्त बहुत घने और डरावने लगते हैं जब इनके साये आदमी का पीछा करते हैं। शांत गौरवर्णी झुर्रियों से भरा सासूमां का चेहरा देख-देखकर उसे याद आ रहा था—
जब गुड्डे-गुड़ियों से खेलने वाली उम्र से ही विनय से प्यार करने लगी थी। फिर जब विनय ने उससे शादी करने का फैसला अपनी मां को सुनाया तो शायद मां उतनी खुश नहीं हुई थी जितनी विनय ने कल्पना की थी। माँ चाहती थी एक बड़े घर की बेटी को बहू के रूप में। पर मालती एक साधारण स्कूल मास्टर की अति योग्य और सुन्दर लड़की थी जिसने एम.ए. अंग्रेजी साहित्य से प्रथम श्रेणी में पास किया था।

बस यहीं आकर मां को लगा था इतनी गुणवान लड़की जब उसकी पत्नी बनेगी तो समझो बेटा हाथ से गया। मां शायद अन्दर ही अन्दर उससे कटने लगी थी। विनय को लेकर उसके अलग अरमान थे पर इसमें मालती का क्या दोष था।
लोग सासूमां की अर्थी को उठा रहे थे—चरण स्पर्श करते हुए मालती को लगा क्या जो जहर उनके दाम्पत्य में सासू माँ ने छोड़ा था वह क्षमा करने योग्य अपराध था ? नहीं। तो फिर चरण स्पर्श क्यों ? परम्पराओं के निर्वाह और भावनाओं के प्रवाह में उसने मां के चरणों को पकड़ अपना मस्तक उस पर टिका दिया था। अर्थी जा चुकी थी। देवरानी पीछे की रस्मों की अदायगी में लगी थी। नाते-रिश्तों की और आस-पड़ोस की औरतें वहीं बाहर सड़क पर बैठ अपने-अपने समूह में चर्चारत हो गयी थीं। मौसी सास और ननदें सासूजी के गहनों पर तो पास की कमला चाची सासूजी के शक्की स्वभाव पर अपने विचार सार्वजनिक रूप से प्रकट कर रही थी।
 


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