कन्यादान - हरिमोहन झा Kanyadan - Hindi book by - harimohan_jha
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कन्यादान

हरिमोहन झा

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3069
आईएसबीएन :81-7055-282-6

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समाज की विसंगतियों और मनोवृत्तियों को बेबाक एवं मर्मस्पर्शी को उजागर करनेवाला उपन्यास...

Kanyadhan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

साहित्य आकादमी पुरस्कार द्वारा सम्मानित प्रख्यात मैथिली कथाकार हरिमोहन झा का बहुचर्चित उपन्यास है ‘कन्यादान’ जो सिर्फ एक किताब नहीं, मिथिलांचल में करिश्मा सिद्ध हुआ है। सुखद आश्चर्य यह है कि इस उपन्यास को पढ़ने के लिए गैर-मैथिली-भाषियों ने मैथिली सीखी, जिसके पाठक साक्षर ही नहीं निरक्षर भी थे, जिन्होंने दूसरों को पढ़वा कर इसे सुना। इस उपन्यास ने लोकप्रियता का नया कीर्तिमान तो स्थापित किया ही, साहित्यक उपल्ब्धियों के शिखर पर भी पहुँचा।
कथाकार स्व. हरिमोहन झा का कथा-संसार बहुत व्यापक और क्रान्तिकारी है, जिसमें जीवन की इन्द्रधनुषी भंगिमाओं को अर्थवान पहचान मिली है।- और इसका सबूत है उनका यह व्यंग्य प्रधान रोचक उपन्यास ‘कन्यादान’। अपनी भाषायी रचावट और शिल्प की बुनावट में तो ‘कन्यादन’ अप्रतिम है ही, मैथिली समाज की मनोवृतित्त्यों और विसंगतियों को बेबाक एवं मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति देने में भी यह उपन्यास अद्वितीय है।

 

समर्पण

जो समाज कन्या को जड़ पदार्थ की भाँति दान कर देने में कुंठित नहीं होता, जिस समाज के सूत्रधार लड़के को पढ़ाने में हजारों रुपये पानी में बहा देते हैं और लड़की के लिए चार पैसे की स्लेट खरीदना भी आवश्यक नहीं समझते, जिस समाज में बी.ए. पास पति की जीवन-संगिनी ए.बी. तक नहीं जानती, जिस समाज को दाम्पत्य जीवन की गाड़ी में सर्कस के घोड़े के साथ निरीह बछिया को जोतते जरा-सी भी ममता नहीं आती, उसी समाज के महारथियों के कर-कुलिश में यह पुस्तक सविनय, सानुरोध और सभय समर्पित।

प्राक्कथन
(प्रथम संस्करण की भूमिका)

 

 

आज से तीन वर्ष पहले ‘मिथिला’ नाम की एक मासिक पत्रिका निकली थी उसके प्रकाशक थे श्रीयुत बाबू रामलोचन शरण और सम्पादक मंडल में थे श्रीयुत बाबू भोलानाथ दास, बी.ए., एल.एल.बी। एक दिन शाम के समय भोलानाथ बाबू गरदन पर सवार हो गये कि ‘मिथिला’ का अन्तिम फर्मा आपके ही लेख के कारण रुका हुआ है। झटपट कुछ लिखकर दे दीजिए जिससे कल छप जाए रात में मेरी समझ में जो कुछ भी आया उसे लिख-लाखकर उन्हें दे दिया। उसे ही कहा जा सकता है ‘कन्यादान’ का श्रीगणेश। उसके बाद जब-जब भोलानाथ बाबू का तगादा आता, थोड़ा बहुत लिखकर पिंड छुड़ा लेता। यह सिलसिला चार-पाँच अंकों तक चला।

‘कन्यादान’ के कुछ भाग प्रकाशित होते ही समालोचना की आँधी उठ गयी। कोई इसकी प्रशंसा के पुल बाँधने लगा तो कोई कुदाल से इसे ढाने लगा। लेकिन एक बात हुई अवश्य। ‘कन्यादान’ अपने जन्म से ही प्रसिद्ध हो गया। जो इसके विरोधी थे, वे भी इसके आगे का भाग पढ़ने हेतु बेचैन रहने लगे।

इसी समय ‘मिथिला’ शिथिला होकर सो गयी। ‘कन्यादान’ के लिए अतिचार का समय आ गया। मगर ‘कन्यादान’ इतना लोकप्रिय हो चुका था कि उसके सम्बन्ध में प्रकाशक के नाम से चिट्ठी पर चिट्ठी आने लगी। बाध्य होकर उन्हें इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने पर विचार करना पड़ा। उन्होंने मुझसे आगे के भागों की माँग की। जब मेरी एम.ए. की परीक्षा समाप्त हुई तब जाकर तीन साल से अटकी ‘कन्यादान’ की गाड़ी फिर से सरकी और अन्ततोगत्वा स्टेशन पर पहुँचकर खड़ी हुई। अब जो कुछ भी है, सामने है। पुस्तक के विषय में मैं क्या कहूँ ? पुस्तक स्वयं अपने बारे में कहेगी।
समाज का यदि थोड़ा-सा भी उपकार या मनोरंजन यह कर सका तो समझूँगा कि इसका जन्म निरर्थक नहीं हुआ।

कनियां मां की व्यवस्था

 

 

-हां बहिना ! यही तो मुश्किल हो गई है। जहां वर भारी क्लास में अंग्रेजी पढ़ जाते हैं, वहीं वर का बाप हजार से नीचे पर तो बात ही नहीं करता। बेचारे गरीब-निर्धन कहां से इतना लाएंगे।
इतना ही नहीं। विवाह होने की देर—‘‘मोटर दीजिए, बाइसिकल दीजिए, आगे पढ़ने के लिए फीस दीजिए,’’ इन अंग्रेजियों की फरमाइश के आगे टिकना बड़ा कठिन है।
-ऐ बहिना ! सुनते हैं कि अंग्रेजियों को जात-पात का कोई भी विचार नहीं रहता।
-जात-पात अब रहा ही किसमें ? विशेष रानी का दामाद आया था। वह कौन-सा अंग्रेजी पढ़ा हुआ था। जूते पहनकर ही पानी पीता है। लोगों ने कहा कि ‘‘ओझा पानी लेकर लघुशंका के लिए जाएं’’ तो कहा कि मेरे अन्दर से आग निकल रही है क्या !

-धत् ! वह भी कोई आदमी है ! ज्योतिषी जी एक मुश्टंडे को उठा लाए। मैं तो यह बात दस लोगों के बीच में कह सकती हूं, पढ़ने को ‘सी’ अक्षर नहीं, किन्तु फिटफाट तो चाहिए ही चाहिए। रात-दिन औरतों के झुंड में बैठा रड़धुम्मस करता, वनमानुष की तरह इसे देखना उसे देखना। ऐसे भी कहीं आदमी हुए हैं भला !
इतने में ही बिलटी को आते देख लाल काकी ने झट से आवेशरानी के पैर की कानी उँगली दबा दी, जिससे वह तुरन्त ही चुप हो गई। तब लाल काकी चतुराईपूर्वक बात को बदलती हुई बोली—‘‘सचमुच अब तो चौदह दिन ही बच गए हैं ! कथा (मिथिला में शादी-ब्याह के सम्बन्ध तय करने को कथा कहा जाता है) का और अब तक कुछ अता-पता नहीं है। कैसे क्यों होगा कुछ समझ में नहीं आता।’’

आवेशरानी—‘‘आओ न बिलटी ! बैठो, खड़ी क्यों हो ? हां, बुचिया तो बिलटी के बराबर की ही होगी न ?’’
लाल काकी—यही तेरहवां चढ़ा है। इस बार कन्यादान करना परम आवश्यक है। बुचिया के पिता तो यही सोचकर गए हैं कि यह सबसे आखिरी संतान है। खुद भीख मांगकर भी इसे अच्छी जगह ब्याहेंगे। वैसे तो भाग्य सर्वोपरि है।
आवेशरानी—हाँ, तकदीर का लिखा तो सबसे ऊपर होता है। भगवती अहिबात बनाए रखें। अपना व्यवहार ठीक-ठाक रहेगा तो सबकी आंखों में बसती रहेगी।
लाल काकी—हाँ बहिना ! यही आशीर्वाद दीजिए। विवाह-दान हो, अपना घर-द्वार संभाले। ससुराल से यह उपराग नहीं दिलवाए कि मुंहजली ने पता नहीं कैसे बेटी को पाला है। यही हमारी कामना है।
इतने में ही दक्षिण दिशा से भयंकर घटा उमड़ी। चारों दिशाओं से मेघ उमड़ आए। थोड़ी ही देर में गर्जन-तर्जन के संग मूसलाधार बारिश होने लगी। ओसारे का कोना चूता देख लाल काकी कहने लगी,-‘‘क्या कहूं बहिना, इस तरह से घर में सहस्र धार चूता है। एक हाथ भी कहीं स्थान नहीं है। ये घर मरम्मत का काम पूरा करने जाते कि बीच में ही ‘भदवा’ पड़ गया। अब कोहबर कहां पर होगा, इसी के लिए झख रही हूं।’’

इतने में ही ढुनमुन काकी लदफद करती, हांफती-हांफती वहां पहुंची। आने की देर कि चिल्लाने लगी—‘‘अरे ! चटाई पर मैंने जो अदौरी (उड़द की दाल की बड़ी) सूखने डाली थी, वो सारी की सारी भीग गई। मैं क्या करूं ?’’
यह सुनते ही लाल काकी लाल पीली होने लगी—‘‘झाड़ू, मारो ऐसी बुद्धि को ! ऐसी फूहड़ ! जिस समय बादल देखा, उसी समय उठा लेती न। हाथ में क्या मेंहदी लगी हुई थी ? सारी अदौरी गीली करके अब संदेशा सुनाने आई है।’’
फिर आवेशरानी की ओर देखकर बोली—‘‘कहो तो भला ! अब क्या उपाय किया जाए ? कितनी मेहनत से ये अदौरियां बनाई थीं। सारा सत्यानाश कर डाला। पता नहीं क्यों इन्हें आज कह भी दिया सुखाने को। इनके जैसी लदगोबर (फूहड़) इस पूरे इलाके में नहीं मिलेगी। रत्ती भर भी किसी चीज का ढंग नहीं। कल जरा कहा कि अचार के बर्तन में तेल डाल दो। बस, दामाद के लिए चमेली का तेल मंगवाया था, पूरी बोतल उझल दी।’’

ढुनमुन काकी कुछ ऊंचा सुनती थी। इसलिए यह सारा वार्तालाप उन्हें सुनाई नहीं पड़ा। किन्तु हाव-भाव से समझ गई कि मेरी ही शिकायत हो रही है। ओठ पटपटाती बिदा हुई—‘‘हुंह, हुंह। आंगन में एक मैं ही हूं, जो इतना सहती हूं।’’
इतने में बिलटी बोल उठी—‘‘छिः ! हे राम छिः ! ढुनमुन काकी की साड़ी में क्या हुआ ? पूरी पीठ पर कीचड़ लगी हुई है।’’
इतने में बुचिया ने हंसते-हंसते आकर कहा—‘‘कीचड़ लगे भी तो कैसे नहीं। गई थी बाड़ी में सहजन तोड़ने। एक ही बार में दो सहिजन को दोनों हाथों से पकड़कर खूब जोर से खींचने लगी। सहिजन की डंठल तो टूट गई लेकिन खुद भट्ट से चित्त गिर पड़ीं।’’
यह सुनकर बिलटी हंसते-हंसते लोटपोट होने लगी। आवेशरानी ने आवेश दिखाते हुए कहा—‘‘ओहो, ओहो, बड़ी चोट लगी होगी। जाओ ऐ फुचुकरानी ! झट से साड़ी बदल लो। कैसा तो लग रहा है।’’

ढुनमुन काकी के जाने पर लाल काकी बोलने लगी—‘‘देखो बहिना, काम का घर है, और न तो अभी तक कोहबर लीपा गया है, न अहिबात का पातिल लिखा गया है, न उकबक बनाया गया है। मैं अकेली क्या-क्या करूं, जनेऊ-तकली कातूं या लीप-पोत करूं ? बहू है तो उसे दिन-रात किताबों से ही फुरसत नहीं है। बुचिया भी एक खर तक नहीं सरकाती है। मां पका हुआ आम ही है, कब गिर जाएंगी, पता नहीं। फुचुकरानी का हालत तो देख ही रही हो। मैं करूं तो होए, न करूं तो नहीं होए। तिलौरी-दनौरी सब वैसे ही पड़ी हुई है। अगर कहीं बादल घर गया तो प्रलय ही समझो। फिर विधिकरी कौन होगी, वह भी समझ में नहीं आ रहा है।’’
आवेशरानी—‘‘सो क्यों ? बड़का गांव वाली बहू तो है ही।’’
लाल काकी—‘‘वह पढ़ुआ रानी है। रंग-बिरंगी किताबें लिए बैठी रहती है। इसके पीछे खाना-पीना तक भूल जाती है। एक दिन पूछने लगी कि नाक-कान पकड़ने की रस्म बकवास है, मुझसे यह सब नहीं हो पाएगा।’’
आवेशरानी—‘‘तब फुचुकरानी बनेंगी ?’’

लाल काकी—‘‘तुम भी गजब करती हो। वो विधि क्या करेगी, खाक ? काजल करने जाएगी तो दूल्हे की आंखें ही फोड़ डालेगी। धरने को नाक, तो धर लेगी कान। कोहबर में जाएगी तो नाक छिड़कते ही जाएगी।’’
इतने में ही बुचिया बोल उठी—‘‘ढुनमुन काकी की तो पूरी देह में जुलपित्ती उठ गई है।’’
यह सुनते ही बड़का गांव वाली बहू गला दबाकर बोली—‘‘ठीक। कोई हर्ज नहीं। दुल्हन विधिकारी दोनों आप ही बनिए।’’
बुचिया—‘‘भाभी भी तो बस सब बातों का एक न एक माने निकालती रहती हैं।’’
लाल काकी—‘‘तो गलत क्या कहा ? तुझे बीच में बोलने की क्या जरूरत थी ? जहां शादी की चर्चा होने लगेगी कि एक कोने में खड़ी होकर कान खोलकर सुनने लगी। जा, अपना काम कर।’’
यह सुन बुचिया लजाकर वहां से चली गई। बिलटी भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ी।

धीरे-धीरे वर्षा रुक गई। किन्तु बदली छाई रही। रह-रहकर आकाश में बिजली चमकने लगती। शाम होने में कुछ देर थी। किन्तु काले-काले मेघ के कारण चारों तरफ अंधकार हो रहा था। आवेशरानी चलने के उपक्रम में थी, इतने में स्थूल शरीर से दरवाजे को ठेलती अपने वज्र विनिंदक स्वर में आंगन को कंपायमान करती, दुलारमनी बुआ पहुंची, ‘‘अरी ओ मधुरानी ! अपनी बेटी को कितने डाढ़ी (दूध के नीचे की जली मलाई) खिलाई थी कि पहले से ही इतनी वर्षा होने लगी।’’
इस प्रश्न के उत्तर में लाल काकी ने जरा बलपूर्वक हंसकर बुचिया को पुकारा—‘‘कहां गई रे बुचिया ! जल्दी से पीढ़ा ले आओ। बड़की दाई आई हैं।’’

दुलारमनी बुआ का स्वर ही ऐसा था कि बिना कहे भी बुचिया समझ जाती। किंतु वह आंगन से जा चुकी थी। लाल काकी हड़बड़ाकर खुद ही उठने लगी, तब तक बहू अन्दर से पीढ़ी दे गई।
दुलारमनी दाई फिर से अपने उदात्त स्वर से घर ओसारे को दोलायमान करती बोलीं—‘‘अरी मधुरानी ! तुम्हें टोले-मुहल्ले का जरा भी लिहाज नहीं रह गया है राम ! राम ! लड़की ताड़ होती चली जा रही है। इतनी उम्र में तो चार बार ससुराल आई गई रहती। नैहर में ही युगपाकड़ (अधेड़) हो जाएगी तो ससुराल क्या बुढ़ापे में जाएगी ?’’
लाल काकी—‘‘(सर झुकाकर)—‘‘हां, दाई, अब लड़की रक्षणीत नहीं है, किन्तु मेरा क्या वश ? अच्छा घर-वर भी तो मिलना चाहिए।’’

दुलारमनी दाई इस बार और भी जोर से चिल्लाकर बोलीं—‘‘यह तुमने क्या कहा ? अच्छा घर नहीं करोगी तो क्या कुएं में फेंक दोगी ? इससे तो भोथरे हंसुए से गर्दन रेत दो, वह बढ़िया। मेरे ममिया ससुर के परदादे महादेव झा पंजीकार, उन्तीस विवाह किए। जब एक और विवाह करने सभागाछी गए तो किसी के पूछने पर बोले कि महीने में उन्तीस दिन तो उन्तीस जगह जाऊंगा, तीसवें दिन कहां जाऊंगा, तुम्हारे कपार पर ? उन दिनों ऐसी वंश मर्यादा थी। अब तो लोग ओछे ब्राह्मण को उठा लाते हैं। सुनो, जरा जोड़न (दही जमाने के लिए थोड़-सा दही) दोगी ?’’
लाल काकी—‘‘बड़की दाई, जोड़न तो अब नहीं है। मटकी में एक ज़रा सा दही था, उसे घोल-घालकर बुचिया को दे दिया गया था। थोड़ी देर पहले आतीं तो मिल जाता।’’

सुनते ही दुलारमनी दाई हाथ की कटोरी पटक कर उठ खड़ी हुई। फिर गरजती हुई विदा हुईं कि कौन पाप लगा था कि आई। जानती कि आज इतवार को जोड़न नहीं दोगी तो क्यों छिछियाती आती ? पहले काजल के लिए घी मांगने पर घड़े का घड़ा घी ढरका दिया जाता था। अब तो चम्मच भर घोल देने में लोगों की छाती फटती है।
जब दुलारमनी बुआ के शब्द कर्णपथ से बहिर्भूत हो गए, तब लाल काकी बोल उठीं—‘‘ओह, हो, जब तक ये थीं तब तक मैं पत्ते की तरह की कांप रही थी। अब जाकर प्राण में प्राण आए।’’ आवेशरानी ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा—‘‘सचमुच ! मैंने तो इसीलिए चुप्पी साध ली। आवेशरानी ने सहानुभूति दिखाते हुए कह। कौन ठिकाना, कुछ उलटा सीधा मुंह से निकल जाता तो मुझ पर ही उलट पड़तीं।’’

लाल काकी—इन्हें जहां किसी ने जरा-सा भी टोका कि समझो हड्डे की छते में हाथ डाल दिया हो। आवेशरानी—हां बहिना ! इसके विषय में लोग भी कहते हैं, मुझे तो सच ही लगता है। (धीरे-धीरे) देखती नहीं है कि बोलते वक्त दोनों आंखें कैसी उलट जाती हैं ? गुणझिक्कू डायन के जितने लक्षण होते हैं....
लाल-काकी क्या करोगी, जाने दो। अजकल तो दिवालों के भी कान होते हैं। (ढुनमुन काकी की ओर) आओ फुचुकरानी ! झटपट रसोई चढ़ा दो। वर्षा-विकाल का समय है। कौन जाने कब क्या हो ?
आवेशरानी—अच्छा बहिना ! अब मैं भी चलती हूं। संझा-बाती का बखत हो गया। फूलमतिया अकेली होगी।
लाल काकी—तुम पर ही तो उम्मीद है। तुम नहीं सम्भालोगी तो सारा काम बिगड़ जाएगा।

आवेशरानी-आहे, कहो तो भला ! हम लोगों से जितना भी हो सकेगा, करने में कुछ कसर थोड़े न उठा रखेंगे ?
यह कह आवेशरानी खड़ी हो गई। लाल काकी उन्हें पकड़े-पकड़े दरवाजे पर के नींबू के गाछ तक ले गईं। वहां दोनों खड़ी होकर फिर बातें करने लगीं। पहले नींबू की चर्चा उठी इस रास्ते जो भी गुजरता है, वही एक नींबू तोड़ता चला जाता है। तब नीबू के अचार की चर्चा होने लगी। कि जितना बना, सब में फफूंद लग गई। तदुपरांत चर्चा उठी कि पिछले साल लाल काका पटना से स्वादिष्ट अचार लाए थे। पटना का नाम सुनते ही लाल काकी काफी झूटमूठ में आंचल से आंसू पोंछती बोलने लगी—पता नहीं, बड़का बौआ पटना से कब आते हैं ? परसों भुट्टू बाबू कह गए कि जो बी.ए. में पढ़ता है, उसे पलटन में भर्ती कर लिया जाता है। कालेज तो बन्द हो ही गया है, लेकिन वह वहीं रह गया। महीना दिन शेष रहने पर आएगा।

पलटन का नाम सुनते ही आवेशरानी की पूरी देह सिहर उठी, ‘‘बाप रे बाप ! सुनते हैं कि पलटन में दिन रात गोरों का पहरा लगा रहता है। जहां कोई निकला कि तुरन्त कि संगीन भोंक हैं।’’
पहरे की बात सुन लाल काकी को याद आया कि आजकल कोतवाल अच्छी तरह आवाज नहीं लगाता है। इस पर चोरों की चर्चा उठी। अजगैबीनाथ के घर में सेंध पड़ी थी। वहां कांसे का एक फूटा बर्तन भी नहीं छोड़ा। लाल काकी कहने लगीं—रात में पत्ता खड़कना भी सुनकर खूब जोर-जोर से रामायण पाठ करने लगती हूं। कोढ़िया चोर यह तो समझेगा कि अभी सब जगे ही हैं।’’ इस पर आवेशरानी ने कहा, ‘मैं तो कुत्ते की भूंक सुनकर ही दम साध लेती हूं। उकलगौना मुर्दा समझकर भी तो छोड़ देगा।’’

तदनंतर एक-दो चोरों की कथा-वार्ता चली। आवेशरानी जरा और भी पास सरकने लगी—‘‘परसों रात फुलमतिया ने किवाड़ खुला ही छोड़ दिया। आधी रात को देखा तो दोनों पल्ले दोनों तरफ। अब इतना साहस नहीं हो कि खाट से उतरकर दरवाजा लगा आऊं। कहीं चौखट के पास ही गर्दन दबा देता तो ! पूरी रात भगवान-भगवान करते काटी। पल-पल यही डर होता रहा कि कहीं आ तो नहीं रहा है।’’ फुलमतियाकी असावधानी सुन लाल काकी को अपनी फुचुकरानी की याद हो आई। टोकरा भर अपना दुखड़ा कह सुनाया। तब कुछ समालोचना बड़का गांव वाली को हुई। अन्त में घूम-फिर कर बात फिर कन्यादान के इन्तजाम पर पहुंच गई।

इस प्रकार पौन घंटे तक वार्तालाप का क्रम बना रहा। जब बूंदें फिर टिप-टिप कर पड़ने लगीं, तब कहीं जाकर आवेशरानी को याद आया कि अब सांझ देने का वक्त हो गया है। लाल काकी ने चिन्ता प्रकट की—‘‘ठहरो सूप ले आती हूं। वैसे भीग जाओगी।’’ किन्तु आवेशरानी ने कहा—‘‘नहीं-नहीं। इतनी दूर के लिए क्या जरूरत है ! वैसे ही झटककर चली जाऊंगी।’’ आवेशरानी के जाने के बाद पेड़ से दो नींबू तोड़कर लाल काकी आंगन में पहुंची।
आंगन में पैर रखते ही लाल काकी बोली, ‘‘सुनो भई ! आज चोर-डाकू की बातें हुई हैं। खूब सतर्क होकर रहना।’’
बुचिया बोली—‘‘यह सब कहोगी, तो ढुनमुन काकी पूरी रात नींद में ही घिघियाती रहेंगी।’’

ढुनमुन काकी ओसारे पर पटुआ का झोर बना रही थीं। बुचिया के मुंह से अपना नाम सुनते ही भुभुनाने लगीं-‘‘ढुनमुन काकी ने किसका क्या बिगाड़ा है ? क्या तो कहते हैं उसके पर। जब देखो मेरे ही बारे में कहती-सुनती रहेंगी।’’
इतने में ही झुनिया माय हन-हन, पट-पट करती पानी देने आई। पांच मिनट में ही कितनी बातें कह गई, उसका ठिकाना नहीं—घड़ा रखने की जगह पर लोगों ने फिसलन बना रखी है, कितना पानी खर्च कर डालती है। बाल्टी पुरानी हो गई है, उबहन सड़ा जा रहा है, इत्यादि। तब किसी अज्ञात नाम के व्यक्ति से लड़ने लगी—‘‘शौक में शौक मिर्चे का शौक। मैं दिन भर पैर मारती रहूं....और उधर निश्चिंत सोए पदमावती बहुरिया। उस पर से कहना कि माथे में दर्द हो रहा है। अहा हा हा ! छवि न छटा, मसूर दाल खटटा ! बदन में आग लग जाती है।’’

यह कह झुनिया माय ने चमककर घड़ा उठाया और बढ़ी दरवाजे की ओर। दिन में किसी से झगड़ा हुआ था वह याद आ गया। बस, लगी फिर चरखा ओटने—‘‘हां, आंख दिखाने से झुनिया माय डर ही तो जाएगी, जैसे ! मैं थाना-दारोगा से तो डरती ही नहीं....’’
यह कहती-कहती झुनिया माय की नजर सहसा किसी वस्तु पर पड़ गई, जिससे डरकर वह जान देकर भागी। वहां से भागती-भागती सीधे लाल काकी के पास आकर उन्हें पूरे अंकवार धर लिया और कसकसा-कर गर्दन पकड़ ली। गला रुंध गया। लाल काकी बोली—‘‘देखो जरा इसे। इसने हद तक मुझे परेशान करके रख छोड़ा है। ऐं री ! तूझे भूत लग गया है क्या जो ऐसे कर रही है ?’’

क्षणांश में आंगन में सारे लोग जमा हो गए। यह देख झुनिया माय के अन्दर थोड़ा साहस आया। पहले तो उसके मुंह से बोल ही नहीं फूटे। फिर लगी नखरे करने—‘‘अब नहीं भरूंगी किसी के घर पानी। अरे बाप रे, जीऊंगी तो करमी का साग तोड़कर गुजर कर लूंगी। ऊहूं ! अब कहां !’’
कोई कहे इसे सांप ने काटा है, कोई कहे कि आज दुलारमनी बुआ को जोड़न नहीं दिया है। उसी का फल है। अन्त में बहुत पूछने पर वह बोली—‘‘मैयां-गै-मैयां ! दरवाजे पर पांच हाथ का सिपाही बंदूक लिए बैठा है। बीच में ही रोक लिया। मैंने जैसे चौखट पर लात रखी कि झपटा मेरी ओर। मैं थैला पटककर भागी, नहीं तो आज मेरे प्राण नहीं बचते महात्माइन !’’ यह कहकर झुनिया माय हिचक-हिचककर रोने लगी।

यह सुनते ही सब सन्न रह गए। लाल काकी थर-थर कांपती बोली—‘‘कहां से छुच्छी आकर गोरे पलटन का हाल कह जाती है ? ये लोग तो चर्चा करने की देर, कि पहुंच जाते हैं।’’
अन्त में यह विचार होने लगा कि प्राण-रक्षा का कौन-सा उपाय किया जाए ? लाल काकी ने साहस बटोरकर कहा—‘‘सब कोई मिलकर सुन्दरकाण्ड रामायण का पाठ करती जाओ। बहू को कहो हनुमान चालीसा पढ़ें। (जोर से) महावीर विक्रम बजरंगी, सुमति विचार कुमती के संगी। धत् उलटा हो गया। न जाने क्या लिखा हुआ है भगवान ?’’
मैयां का विचार हुआ कि सब कोई मिलकर यदि एक ही बार शोर किया तो वह आकर सबों का गला दबा देगा। ऐसा नहीं, पिछवाड़े से कोई एक जाकर ज्योतिषी काका को बुला लाएं। इस पर झुनिया माय बोली—‘‘नहीं रे बाप ! उस तरफ भी कोई खड़ा होगा। मेरी बोटी-बोटी काटकर घर में गाड़ दीजिए। लेकिन मैं अब बाहर नहीं जा सकती।’’ यह कहकर फिर उसने राग अलापा अपना।

मैयां ने कहा कि ‘‘पहले गिन लो कि आंगन में सभी कोई है या नहीं।’’ लाल काकी सबों की देह धर-धरकर गिनने लगी। दो-तीन बार गड़बड़ा गईं। चौथी बार गिनती कर बोलीं—‘‘अरे फुचुकरानी कहां चली गई ? हे भगवान। ले गया घसीट कर।’’
इस पर झुनिया माय ने कहा कि वह तो पहले से ही जलावन वाले घर में कुंडी लगाकर बैठी है। मैयां रुद्राक्ष की माला लेकर भगवती को आह्वान करती कबूलने लगी कि ‘‘इस बार प्राण बच गए तो कन्या-भोजन कराऊंगी।’’
यह हाल देखकर बड़कागांव वाली टनककर बोली—‘‘आप लोग इतना डर क्यों रही हैं ? हम लोगों ने क्या चोरी-खून किया है कि फांसी लग जाएगी ? बुच्ची दाई को पूछने के लिए भेजिए कि वह कौन है ? बुचिया बिदा हुई कि तुम लोगों को बग्घा लग रहा है तो मैं ही जाकर देख आती हूं। डर किस बात का है ? कोई बाघ है तो नहीं कि टप् से निगल जाएगा।’’
इतने में बाहर लाठी पटककर कोई कड़क कर बोला—‘‘कोई है ?’’
मैयां ने झट से लाल काकी का हाथ दबाकर कहा—‘‘कह दो कि कोई नहीं है।’’
तब तक सिपाही बोला—‘‘पंडित भोलानाथ के नाम से एक तार आया है। कोई अन्दर से ले जाइए।’’
मैयां ने कहा—‘‘तार आया है त दरव्वजे पर रहे दीजियो। एकसरी आंगन में से उठाकर आवेगा ?’’
इतने में ही बाहर ज्योतिषी काका की आवाज सुन सबों ने फक्क से निःश्वास छोड़ा।


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