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दौड़

ममता कालिया

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3070
आईएसबीएन :81-7055-714-3

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आर्थिक उदारीकरण ने बाजार और बाजारवादी व्यवस्था पर आधारित उपन्यास..

Daur

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘दौड़’ को लघु उपन्यास कहें या लंबी कहानी, इसका रचनात्मक मूल्य किसी भी खांचे में रख भर देने से कतई कम नहीं हो जाता। दरअसल यह रचना उन कृतियों की श्रेणी में आती है जो बार-बार शास्त्रीय या कहें कि तात्विक किस्म की आलोचनात्मक प्रणालियों का सार्थक अतिक्रमण करती हैं।

ममता कालिया हिंदी कथालेखन में स्वयं एक स्तरीय मापदंड हैं। उनके लेखन ने स्त्री-पुरुष लेखन की निरर्थक हदबंदियों को भी तोड़ा है। हिंदी के कथा-साहित्य के पाठक इनके लेखन को बड़ी उम्मीद से देखते रहे हैं। यही कारण है कि कथा जगत् की इस बड़ी लेखिका की रचनाएँ सस्ती, तात्कालिक और पढ़ते ही नष्ट हो जाने वाली हंगामाखेज लोकप्रियता की बजाय पाठक को ऐसे रचना-संसार से अवगत कराती हैं जिसका निवासी स्वयं पाठक भी है। इसीलिए उनकी रचनाओं में बाँधकर रखने वाला वह गुण भी मौजूद है जिसे उत्कृष्ट स्तरीयता के साथ उपस्थित कर पाना बड़ी लेखकीय साधना का काम है।

‘दौड़’ आज के उस मनुष्य की कहानी है जो बाज़ार के दबाव-समूह, उनके परोक्ष-अपरोक्ष मारक तनाव, आक्रमण और निर्ममता तथा अंधी दौड़ में नष्ट होते मनुष्य के आसन्न खतरे में पड़े मनुष्य को उजागर करती है। यह रचना मनुष्यों की पारस्परिक संबंधों की परंपरा और पड़ताल करती है।

जिस कथित आर्थिक उदारीकरण ने बाजार और बाजारवादी व्यवस्था को ताकत दी है, अपने पारस्परिक नाते-रिश्तों को अनुदार, मतलबी और इतना अर्थ-केन्द्रित बना दिया है कि बिगड़े परिप्रेक्ष्य में आज संबंधों के मूल्य और अर्थ बदले नहीं बल्कि कहना चाहिए नष्ट हो गए हैं।

ममता कालिया ने यहाँ पात्रों और उनकी जीवनगत परिस्थितियों के माध्यम से इतना कुछ कह दिया है कि यह रचना आज के मनुष्य-चरित्र की प्रामाणिक आलोचना लगती है।

 

चन्द सतरें

भूमंडलीकरण और उत्तर औधोगिक समाज ने इक्कीसवीं सदी में युवा वर्ग के सामने एकदम नये ढंग के रोजगार और नौकरी के रास्ते खोल दिये हैं। एक समय था-जब हर विद्यार्थी का एक ही सपना था-पढ़ लिखकर प्रशासनिक सेवा में चुना जाना। कुछ सहपाठियों की पारम्परिक महत्वाकांक्षायें थीं। इनके अर्न्तगत डॉक्टर की बेटी डॉक्टर और इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनना चाहता था। तब बाज़ार इतना आकर्षक, विशाल और व्यापक नहीं हुआ था कि युवा-वर्ग इसे अपने सपनो में शामिल करे। तब बाज़ार का मतलब था एक ऐसी जगह जहाँ हम अपनी ज़रूरतें पूरी करते थे और थक कर घर लौट आते थे। उस वक्त का बाज़ार इतना चमकदार और चटकीला नहीं था कि आप वहाँ अपनी पूरी जेब खाली कर आते।
आर्थिक उदारीकरण ने भारतीय बाज़ार को शक्तिशाली बनाया।

इसने व्यापार प्रबन्धन की शिक्षा के द्वार खोले और छात्र वर्ग को व्यापार प्रबन्धन में विशेषता हासिल करने के अवसर दिये। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बाज़ार के नए अवसर प्रदान किये। युवा-वर्ग ने पूरी लगन के साथ इस सिमसिम द्वार को खोला और इसमें प्रविष्ट हो गया। वर्तमान सदी में समस्त अन्य वाद के साथ एक नया वाद आरम्भ हो गया, बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद। इसके अर्न्तगत, बीसवीं सदी का सीधा सौदा खरीददार एक चतुर उपभोक्ता बन गया। जिन युवा-प्रतिभाओं ने यह कमान संभाली उन्होंने कार्यक्षेत्र में तो खूब कामयाबी पाई पर मानवीय सम्बन्धों के समीकरण उनसे कहीं ज़्यादा खिंच गये, तो कहीं ढीले पड़ गए। ‘दौड़’ इन प्रभावों और तनावों की पहचान कराता है।

यह रचना ‘तद्भव’ त्रैमासिक में सर्वप्रथम प्रकाशित हुई तो इस पर व्यापक प्रतिक्रियायें आनी आरंभ हो गईं। स्वयं मेरे पास अनेक रचनाकार मित्रों और पाठकों ने राय लिख भेजी। यहाँ मात्र दो पत्र उद्धृत किये जा रहे हैं। पहला पत्र वरिष्ठ, प्रगतिशील आलोचक श्री खगेन्द्र ठाकुर का है। दूसरा, आज के प्रखर युवा आलोचक श्री कृष्णमोहन का। खगेन्द्र ठाकुर के अनुसार : ‘दौड़’ लघु उपन्यास है लेकिन आकार में ही लघु है यह, कथा, कथ्य, चरित्र, शिल्प, शैली, भाषा आदि के समन्वित रूप में यह आज की एक महान रचना है।

‘बीसवीं’ सदी के अंतिम दशक’ और ‘आरक्षण की आँधी से सकपकाये सवर्ण परिवार’ के उल्लेख मात्र से आपने आज के पूँजीवाद और परम्परागत भारतीय समाज में राजनीतिक कारण से मचे उथल पुथल को पाठकों की चेतना में सजीव करके अपने चरित्रों और उनके अपसी सम्बन्धों को समझने की पृष्ठभूमि की ओर ध्यान खींचा है। यह अच्छा है कि उनका संकेत भर है। संकेतों से संक्षिप्तता आती है। तीन जादुई अक्षरों –एम. बी.ए.- के संकेत से समाज में, उसकी चेतना में, नसों में समा रही व्यावसायिकता की महत्ता आपने अच्छी तरह प्रस्तुत कर दी है।

व्यावसायिकता से आजीविकावाद (कैरियरिज़्म) पैदा होता है और यह आजीविकावाज पारिवारिक सम्बन्धों को और सम्बन्धों की भावात्मकता, आत्मीयता आदि को नष्टप्राय कर देता है। आज के पूँजीवाद ने गत दस वर्षों में खास तौर से भारतीय समाज में जो खेल दिखाया है और राष्ट्रीयता, पारिवारिकता और मनुष्यता की मर्यादाओं को जो तोड़ा है; उसे पूँजीवाद की व्याख्या किये बिना, स्थितियों, प्रसंगों और सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में आपने सहज ढंग से सहज भाव से चित्रित किया है। पवन और सघन व्यावसायिकता और आजीविकावाद के दौर के जब जीवन अत्यंत कठिन हो गया, संवेदनशून्य और मूल्यहीन हो गया, उस दौर के चरित्र हैं और हिन्दी कथा-साहित्य में ये नये चरित्र हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े भारतीय चरित्र हैं ये। ध्यान देने की बात है कि इनके माता-पिता भी भारतीय समाज में कोई पुरातनपंथी और रूढिवादी चरित्र नहीं हैं, वे देहाती नहीं हैं। किसी ज़माने में पूर्व का ऑक्सफोर्ड समझने वाले शहर इलाहाबाद में रहते हैं। लेकिन इस दौर में इलाहाबाद पुराना पड़ चुका है। प्रेमचंद, नागार्जुन और रेणु के गाँव से तो तुलना का प्रसंग ही नहीं आता।

बाज़ारतन्त्र और उपभोक्तावाद पर हिन्दी में पिछले दिनों बहुत लिख गया है। अच्छी कहानियाँ भी लिखी गई हैं। भूमंडलीकरण पर भी लिखा गया है। हिन्दी कथाकारों की यह समय के प्रति जागरुकता प्रशंसनीय है। लेकिन आपका यह ‘दौड़’ भूमंडलीकरण, व्यावसायिकता, आजीविकावाद, विज्ञापनबाजी, उपभोक्तावाद आदि के मिश्रण से बने मनुष्यों की कहानी बहुत प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत करता है। बेशक इस दौर में ‘दौड़’ ने नव-धनाढ्य वर्ग की नयी पीढ़ी के चरित्र के माध्यम से हिन्दी कथा-साहित्य में एक प्रतिमान या कीर्तिमान कायम किया है।’

युवा समीक्षक कृष्ण मोहन लिखतें है : बीसवीं सदी के अन्त में भारतीय समाज के सबसे गहरे सांस्कृतिक संकट का आख्यान है ‘दौड़’। हमारा समाज आज ऐसे दोहारे पर खड़ा है जहाँ से एक रास्ता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चरम उपभोक्तावादी संस्कृति के अंधे कुएँ को जाता है, तो दूसरा संस्कार, सुरक्षा और सामंती सामुदायिकता की पुरानी और गहरी खाई की ओर। दोनों एक दूसरे की कमजोरियों से ताकत पाते हैं। तीसरा रास्ता मिलता नहीं। लेखिका माँ और पत्रकार पिता का बेटा पवन एम.बी.ए. करके तरक्की के लिए एक के बाद दूसरी कम्पनी बदलता हुआ ‘प्रोफेशनल एथिक्स’ की बात करता है, जबकि पिता को यह कृतघ्नता जान पड़ती है। किसी ज़माने में अपनी सास की मर्जी के ख़िलाफ प्रेम विवाह करने वाली माँ पवन की पसंद स्टैला पर खाना पकाने जैसा ‘स्त्रियोचित’ काम सीखने के लिए दबाव डालती है, लेकिन जब वह माँ की तमाम रचनाएँ कम्प्यूटर की फ्लॉपी में उतारकर उसे देती है तो वह चमत्कृत रह जाती है। पुरानी पीढ़ी की अपेक्षाएँ नयी पीढ़ी की उमंगों से टकराकर कदम-कदम पर टूटती हैं, लेकिन यह प्रक्रिया भी एक रैखिक नहीं है। एक ऐतिहासिक मुकाम को दर्ज करने वाली, तरल ओवेगो और गहरे मानवीय संस्पर्श से बुनी गयी कथा हैं ‘दौड़’। बेहद नाजुक विषय का समूची संश्लिष्टता में निर्वाह करने का रचनात्मक जोखिम उठाती हुयी, मानो ‘तलवार की धार पे’ दौड़ती हुई।’

इलाहाबाद
20 जून, 2000

 

ममता कालिया

 

दौड़

 

 

वह अपने ऑफिस में घुसा। शायद इस वक्त बिजली कटौती शुरू हो गयी थी। मुख्य हाल में आपातकालीन ट्यूब लाइट जल रही थी। वह उसके सहारे अपने केबिन तक आया। अंधेरे में मेज पर रखे कंप्यूटर की एक बौड़म सिलुएट बन रही थी। फोन, इंटरकाम सब निष्प्राण लग रहे थे। ऐसा लग रहा था सम्पूर्ण सृष्टि निश्चेष्ट पड़ी है।
बिजली के रहते यह छोटा सा कक्ष उसका साम्राज्य होता है। थोड़ी देर में आंख अंधेरे की अभ्यस्त हुई तो मेज पर पड़ा माउस भी नज़र आया। वह भी अचल था। पवन को हँसी आ गयी, नाम है चूहा पर कोई चपलता नहीं। बिजली के बिना यहा प्लास्टिक का नन्हा सा खिलौना है बस। ‘‘बोलो चूहे कुछ तो करो, चूं चूं सही,’’ ‘‘उसने कहा।’’ चूहा फिर बेजान पड़ा रहा।

पवन को यकायक अपना छोटा भाई सघन याद आया। रात में बिस्कुटों की तलाश में वे दोनों रसोईघर में जाते। रसोई में नाली के रास्ते बड़े-बड़े चूहे दौड़ लगाते रहते। उन्हें बड़ा डर लगता। रसोई का दरवाजा खोलकर बिजली जलाते हुए छोटू लगातार म्याऊं-म्याऊं की आवाजें मुंह से निकालते रहता कि चूहे यह समझे कि रसोई में बिल्ली आ पहुंची है और वे डर कर भाग जाएं। छोटू का जन्म भी मार्जार योनि का है।
पवन ज्यादा देर स्मृतियों में नहीं रह पाया। यकायक बिजली आ गयी, अंधेरे के बाद आंखों को चकाचौंध करती बिजली के साथ ही आफिस में जैसे प्राण लौट आये। दातार ने हॉट प्लेट पर कॉफी का पानी चढ़ा दिया, बाबू भाई जेरॉक्स मशीन में कागज लगाने लगे और शिल्पा काबरा अपनी टेबिल से उठ कर नाचती हुई सी चित्रेश की टेबिल तक गयी, ‘‘यू नो हमें नरूलाज का कांट्रेक्ट मिल गया।’’

पवन ने अपनी टेबिल पर बैठे बैठे दाँत पीसे। यह बेवकूफ लड़की हमेशा गलत आदमी से मुखातिब रहती है। इसे क्या पता कि चित्रेश की चौबीस तारीख को नौकरी से छुट्टी होने वाली है। उसने दो जम्प्स ( वेतन वृद्धि) मांगे थे, कम्पनी ने उसे जम्प आउट करना ही बेहतर समझा। इस समय तलवारें दोनों तरफ की तनीं हुई हैं। चित्रेश को जवाब मिला नहीं है पर उसे इतना अंदाजा है कि मामला कहीं फँस गया है, इसीलिए पिछले हफ्ते उसने एशियन पेण्ट्स में इंटरव्यू भी दे दिया। एशियन पेण्ट्स का एरिया मैनेजर पवन को नरूलाज में मिला था और उससे शान मार रहा था कि तुम्हारी कम्पनी छोड़ कर लोग हमारे यहाँ आते हैं। पवन ने चित्रेश की सिफारिश कर दी ताकि चित्रेश को जो फायदा होना है वह तो हो, उसकी कम्पनी के सिर पर से यह सिर दर्द हटे। वहीं उसे यह भी खबर हुई कि नरूलाज में रोज बीस सिलिण्डर की खपत है। आई.ओ.सी. अपने एजेन्ट के जरिए उन पर दबाव बनाये हुई है कि वे साल भर का अनुबंध उनसे कर लें।

गुर्जर गैस ने भी अर्जी लगा रखी है। आई.ओ.सी. की गैस कम दाम की है। सम्भावना तो यही बनती है कि उनके एजेन्ट शाह एंड शाह अनुबंध पा जाएंगे पर एक चीज पर बात अटकी है। कई बार उनके यहां माल की सप्लाई ठप्प पड़ जाती है। पब्लिक सेक्टर के सौ पचड़े। कभी कर्मचारियों की हड़ताल तो कभी चालकों की शर्तें । इनेक मुकाबले गुर्जर गैस में मांग और आपूर्ति के बीच ऐसा संतुलन रहता है कि उनका दावा है कि उनका प्रतिष्ठान संतुष्ट उपभोक्ताओं का संसार है।

पवन पांडे को इस नये शहर और अपनी नयी नौकरी पर नाज हो आया। अब देखिए बिजली चार बजे गयी ठीक साढ़े चार बजे आ गयी। पूरे शहर को टाइम जोन में बांट दिया है, सिर्फ आधा घंटे के लिए बिजली गुल की जाती है, फिर अगले जोन में आधा घंटा। इस तरह किसी भी क्षेत्र पर जोर नहीं पड़ता। नहीं तो उसके पुराने शहर यानी इलाहाबाद में तो यह आलम था कि अगर बिजली चली गयी तो तीन तीन दिन तक आने का नाम न ले। बिजली जाते ही छोटू कहता, ‘‘भइया ट्रांसफार्मर दुड़िम बोला था, हमने सुना है।’’ परीक्षा के दिनों में ही शादी ब्याह का मौसम होता है। जैसे ही मोहल्ले की बिजली पर ज्यादा जोर पड़ता, बिजली फेल हो जाती। पवन झुंझलाता, ‘‘माँ अभी तो तीन चैप्टर बाकी हैं, कैसे पढ़ूं।’’ मां उसकी टेबिल के चारो कोनो पर चार मोमबत्तियां लगा देती और बीच में रख देती, उसकी किताब। नये अनुभव की उत्तेजना में पवन, बिजली जाने पर और भी अच्छी तरह पढ़ाई कर डालता।

छोटू इसी बहाने बिजली घर के चार चक्कर लगा आता। उसे छुटपन से बाज़ार घूमने का चस्का था। घर का फुटकर सौदा लाते, पोस्ट आफिस, बिजलीघर के चक्कर लगाते-लगाते यह शौक अब लत में बदल गया था। परीक्षा के दिनों में भी वह कभी नयी पेन्सिल खरीदने के बहाने तो कभी यूनिफार्म इस्त्री करवाने के बहाने घर से गायब रहता। जाते हुए कहता, ‘‘हम अभी आते हैं।’’ लेकिन इससे यह न पता चलता कि हजरत जा कहां रहे हैं। जैसे मराठी में, घर से जाते हुए मेहमान यह नहीं कहता कि मैं जा रहा हूँ, वह कहता है ‘मी येतो’ अर्थात मैं आता हूं। यहां गुजरात में और भी सुंदर रिवाज है। घर से मेहमान विदा लेता है तो मेजबान करते है, ‘‘आऊ जो।’’ फिर आना।

यह ठीक है कि पवन घर से अठारह सौ किलो मीटर दूर आ गया है। पर एम.बी.ए. के बाद कहीं न कहीं तो उसे जाना ही था। उसके माता-पिता अवश्य चाहते थे कि वह वहीं उनके पास रहकर नौकरी करे पर उसने कहा, ‘‘यहाँ मेरे लायक सर्विस कहां ? यह तो बेरोजगारों का शहर है। ज्यादा से ज्यादा नूरानी तेल की मार्केटिंग मिल जाएगी।’’ माँ बाप समझ गये थे कि उनका शिखरचुम्बी बेटा कहीं और बसेगा।

फिर यह नौकरी पूरी तरह से पवन ने स्वयं ढूंढी थी। एम.बी.ए. अंतिम वर्ष की जनवरी में जो चार पांच कम्पनियां उनके संस्थान में आयीं उनमें भाईलाल भी थी। पवन पहले दिन पहले इंटरव्यू में ही चुन लिया गया। भाईलाल कम्पनी ने उसे अपनी एल.पी.जी. यूनिट में प्रशिक्षु सहायक मैनेजर बना लिया। संस्थान का नियम था कि अगर एक इंटरव्यू में छात्र का चयन हो जाये तो वह बाकी तीन नहीं दे सकता। इससे ज्यादा छात्र लाभान्वित हो रहे थे और कैम्पस पर परस्पर स्पर्धा घटी थी। पवन को बाद में यही अफसोस रहा कि उसे पता ही नहीं चला कि उसके संस्थान में विपरों, एपल और बी.पी.सी.एल जैसी कम्पनियां भी आयी थीं। फिलहाल उसे यहां कोई शिकायत नहीं थी। अपने अन्य कामयाब साथियों की तरह उसने सोच रखा था कि अगर साल बीतते न बीतते उसे पद और वेतन में उच्चतर ग्रेड नहीं दिया गाय तो वह कम्पनी छोड़ देगा।

सी.पी. रोड़ चौराहे पर उसने देखा, सामने से शरद जैन जा रहा है। यह एक इत्तिफाक ही था कि वे दोनों इलाहाबाद में स्कूल से साथ पढे़ और अब दोनों को अहमदाबाद में नौकरी मिली। बीच में दो साल शरद ने आई.ए.एस. की मरीचिका में नष्ट किये फिर कैट दे कर सीधे आई.आई.एम अहमदाबाद में दाखिल हो गया।
उसने शरद को रोका, ‘‘कहां ?’’
‘‘यार पिजा हट चलते हैं, भूख लग रही है।’’

वे दोनों पिजा हट में जा बैठे। पिजा हट हमेशा की तरह लड़के लड़कियों से गुलजार था। पवन ने कूपन लिये और काउंटर पर दे दिये।
शरद ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘मैं तो जैन पिजा लूंगा। तुम जो चाहो खाओ।’’
‘‘रहे तुम वही के वही साले। पिजा खाते हुए भी जैनिज्म नहीं छोड़ोगे।’’
अहमदाबाद में हर जगह मैनू कार्ड में बकायदा जैन व्यंजन शामिल रहते जैसे जैन पिजा, जैन आमलेट, जैन बर्गर।
पवन खाने के मामले में उन्मुक्त था। उसका मानना था कि हर व्यंजन की एक खासियत होती है। उसे उसी अंदाज में खाया जाना चाहिए। उसे संशोधन से चिढ़ थी।

मैनू कार्ड में जैन पिजा के आगे उसमें पड़ने वाली चीजों का खुलासा भी दिया था, टमाटर, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी और तीखी मीठी चटनी।
शरद ने कहा, ‘‘कोई खास फर्क तो नहीं है। सिर्फ चिकन की चार पांच कतरन उसमें नहीं होगी, और क्या ?’’
‘‘सारी लज्जत तो उन कतरनों की है यार।’’ पवन हँसा।

‘‘मैंने एक दो बार कोशिश की पर सफल नहीं हुआ। रात भर लगता रहा जैसे पेट में मुर्गा बोल रहा है कुकडूं कूं।’’
‘‘तुम्हीं जैसों से महात्मा गांधी आज भी सांसे ले रहे हैं। उनके पेट में बकरा में में करता था।’’
‘‘शरद ने वेटर को बुलाकर पूछा, ‘‘कौन जा पिजा ज्यादा बिकता है यहाँ।’’
‘‘जैन पिजा।’’ वेटर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

‘‘देख लिया, शरद बोला, ‘‘पवन तुम इसको एप्रिशिएट करो कि सात समंदर पार की डिश का पहले हम भारतीयकरण करते हैं फिर खाते हैं। घर में ममी बेसन का ऐसा लजीज आमलेट बना कर खिलाती है कि अंडा उसके आगे पानी भरे।’’
‘‘मैं तो जब से गुजरात से आया हूं बेसन ही खा रहा हूं। पता है बेसन को यहां क्या बोलते हैं ? चने नी लोट।’’
पता नहीं यह जैन धर्म का प्रभाव था या गाँधीवाद का, गुजरात में माँस और अंडे की दुकानें मुश्किल से देखने में आती हैं। होस्टल में रहने के कारण पवन के लिए अंडा भोजन का पर्याय था पर यहां सिर्फ स्टेशन के आस पास ही अंडा मिलता। वहीं तली हुई मछली की भी गिनी चुनी दुकाने थीं। पर अक्सर मेम नगर से स्टेशन तक आने की और ट्रैफिक में फँसने की उसकी इच्छा न होती। तब वह किसी अच्छे रेस्तरां में सामिष भोजन कर अपनी तलब पूरी करता।
वे अपने पुराने दिन याद करते रहे, दोनों के बीच लड़कपन की बेशुमार बेवकूफियां कॉमन थीं और पढ़ाई के संघर्ष। पवन ने कहा, ‘‘पहले दिन जब तुम अमदाबाद आये तब की बात बताना जरा।’’











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