आज बाजार बन्द है - मोहनदास नैमिशराय Aaj Bazar Band Hai - Hindi book by - Mohandas Naimish Rai
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आज बाजार बन्द है

मोहनदास नैमिशराय

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :150
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3078
आईएसबीएन :81-8143-110-3

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इस पुस्तक में आज के समाज की स्त्रियों की दीन-हीन दशा का वर्णन है....

Aaj Bazar Band Hai a hindi book by Mohandas Naimish Rai - आज बाजार बन्द है - मोहनदास नैमिशराय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विश्व में आदिकाल से समाज पर संभोग दर्शन काबिज रहा है जिसके सामने सभी दर्शन फीके रहे हैं। भारतीय समाज और आध्यामिकता का दर्शन भी इससे अछूता नहीं रहा बल्कि धार्मिक परम्पराओं ने देह दर्शन की ओर भी अलौकिक तरीके से शुरुआत की है। मंदिरो ने नारी उत्पीड़न की उसी परम्परा को विकसित किया। देवदासियों से लेकर वेश्याओं का मार्मिक कथा ‘‘आज बाजार बन्द है’’ है। देह व्यापार से देह उत्सव की रंगरलियों की भूल-भुलैया में फंसी महिलाओं की दारुण कथा का जैसे सजीव चित्रण हुआ है।

देह सम्मोहन से तनाव के बीच छटपटाती राष्ट्र की बेटियों के जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर सटीक और बेबाक टिप्पणी की गई है। उनकी अस्मिता तथा भटकाव के दोराहे से उनके उभरने के प्रयास को सामाजिक सरोकारों का दर्शन भी कहा जा सकता है। वरिष्ठ दलित कथाकार मोहनदास नैमिशराय को देह व्यापार की अँधेरी और तंग गलियों के उमस और तमस से भरे परिवेश की गूँज से असीम सम्भावनाओं की तलाश है। देह बेचने वालियों के जीवन रंगों से उभरती बयार और उमस पर आधारित रचना की सार्थकता भी तभी होगी। खोई हुई अस्मिता की तलाश में संघर्ष करती राष्ट्र की बेटियों के जीवन की घटनाओं/दुर्घटनाओं के हर पहलू को उजागर करती यह सशक्त रचना है।

मन की बात

वेश्याओं के जीवन, संघर्ष तथा उनकी समस्याओं पर लिखने का लंबे समय से मन था। इसलिए कि राष्ट्र की बेटियों पर वैसा उपन्यास नहीं लिखा गया। हालाँकि उन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुछ लेखक/कथाकारों ने तो बहुत करीब से उनके दुख-दर्दों को देखा और समझा हुआ है। वाबजूद इसके उनके जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर नये सिरे से लिखने की आवश्यकता थी। वेश्या वृत्ति से जुड़े फिल्मों और किताबों में वेश्याओं तथा रक्कसाओं के पात्रों को ग्लेमराइज्ड करके प्रस्तुत करने की परम्परा रही है। उनकी अपनी यह व्यवसायिक मजबूरी हो सकती है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि वेश्याओं पर लिखने के लिए पात्रों के द्वारा पीड़ा झेलने की कल्पना हम सिर्फ फिल्में देख कर ही कर सकते हैं। अधिकांश के पास ऐसे अनुभव ही नहीं हैं। रचनाधर्मिता में शार्टकट अपनाने का भी एक कारण है। जबकि देश की कुछ वेश्याओं की दिनचर्या से रात्रि क्रियाओं के बीच का उन्हें टुकड़ा-टुकड़ा होते हुए महसूस किया है।

पुरुष की शारीरिक भूख मिटाने के लिए भारतीय समाज और विशेषरूप में हिंदू समाज ने वेश्यावृत्ति को जायज माना है। देश में बहुत कम ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिए आन्दोलन किये। यहां तक कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कभी ऐसा प्रयास नहीं किया। उनके अनुयायी भजन कीर्तन करते हुए उन्हें भोगते रहे। अगर हम ओशो के संभोग से समाधि दर्शन को सही माने तो हिंदुओं का एक संप्रदाय समाधि से संभोग की ओर उत्तेजित हुआ तो दूसरे से संभोगरत रह कर समाधि की बात की। राष्ट्र की बेटियां कोठों पर बैठ गाती/नाचती/सिसकती रहीं और राष्ट्रपिता के हृदय से आह तक नहीं निकली। पर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने उनके बीच जाकर उनके भीतर अस्मिता का भाव जगाया। बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ. अम्बेडकर के धर्म परिवर्तन आन्दोलन के समर्थन में 16 जून, 1936 को देवदास ठक्कर से हाल में बंबई की वेश्याओं ने एक सभा की थी। इस सभा में देवदासी पत्राजे, भूते, आराधी एवं जोगति पंच से सम्बन्धित स्त्री-पुरुषों ने बड़ी संख्या में भाग लिया था। इस सभा में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, ‘‘आप हमारे साथ धर्म परिवर्तन करें अथवा न करें यह मेरे लिए अधिक महत्व का विषय नहीं है। परन्तु मैं आग्रह करता हूँ यदि आप हमारे साथ आन्दोलन में रहना चाहती हैं तो आपको अपना यह अपमानित जीवन त्यागना चाहिए।’’

‘‘आप मुझसे पूछोगी। तुम अपनी जीविका कैसे चलाओगी ? उसके लिए सैकड़ों रास्ते हैं। मैं आपसे पुनः आग्रह करता हूँ कि तुमको इस अपमानित जीवन को त्याग देना चाहिए। आपको चाहिए कि अन्य महिलाओं की तरह शादी कर सामान्य जीवन जीयें, न कि ऐसी परिस्थितियों में रहें जो आपको वेश्यावृत्ति की ओर अनिवार्य रूप से घसीटती हों।’’
इस तरह के भाव बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के मन में वेश्याओं के प्रति थे। वे उनके सम्मान और अस्मिता के सवालों से पूरी तरह वाकिफ थे। उनकी पीड़ा को जानते थे। उन्हें वेश्यावृत्ति से मुक्ति दिलाना चाहते थे। इसलिए दलित आन्दोलन के साथ उन्होंने उन साथिनों को भी जोड़ा। ब्रिटिश उपनिवेश तथा सभी रियासतों से मिलकर कहलाने वाले भारत में उस समय वेश्याओं की संख्या लाखों में थी, जो हिंदू धर्म की परंपराओं, प्रथाओं तथा कुरीतियों के दबाव वश यह सब कर रही थीं।

जहाँ तक मुझे जानकारी है, बंबई में रहते हुए दलित पेंथर के कुछ जुझारु कार्यकर्ताओं ने बंबई के रेड लाइट क्षेत्रों में जाकर वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिए बाबा साहेब के आंदोलन को आगे बढ़ाया था। जिसकी आज अत्यंत आवश्यकता है। इसी बारे में यह दुःखद आश्चर्य की बात है कि नये सिरे से एन.जी.ओ. के साथ वेश्याओं को ‘सेक्स वर्कर्स’ के रूप में परिभाषित कर सरकार ने भी अप्रत्यक्ष रूप में ‘‘एड्स से बचते-बचाते हुए संभोग’’ की स्वीकृति दे दी है। विशेष रूप से बंबई और देश के लगभग सभी महानगरों में हमें एन.जी.ओ. द्वारा प्रकाशित लोकल ट्रेन के भीतर, बस स्टेण्ड के बाहर मूत्रालयों में, पार्कों में लगे होर्डिंस पर या फिर सिनेमा हॉल के आसपास ऐसे पोस्टर्स और स्टीकर्स चिपके हुए मिल जाएंगे, जिनमें गैर स्त्री से संभोग करने की सनातनी प्रवृत्ति को समाप्त करने या कम करने के लिए सन्देश नहीं होते हैं बल्कि ‘गैर स्त्री से संभोग करिये लेकिन सावधानी पूर्वक अर्थात निरोध आदि-आदि के साथ...‘एड्स से बचाव, यानी यह सब बेशर्मी से अश्लीलता से भरे महिलाओं के चित्रों के साथ होता है। अब तो स्थिति यहां तक आ गई है कि वेश्याओं के बीच जाकर एन.जी.ओ. से संबंधित सोशल वर्कर्स आदि निरोध भी बांटने लगे हैं।

समय-समय पर वेश्यावृत्ति को कर्मवाद और भाग्यवाद के सनातनी विचार से जोड़ा जाता रहा है। गांधी स्वयं सनातनी विचारों के थे। ज्ञान-विज्ञान से थोड़ा अलग रख हिंदू धर्म, परंपराओं को देखा करते थे। जैसा चल रहा है, वैसा ही आगे भी रहे। यह सनातनी विचार हैं। हमारे देश में वेश्यावृत्ति थी, है और रहेगी। ऐसे ही संस्कारों के बीच पले बढ़े गांधीवादी वेश्यावृत्ति जारी रखने के लिए नये-नये तर्क दिया करते हैं। कुछ के अनुसार अगर वेश्याएं न हों तो समाज दूषित हो जाएगा। शरीफ घरानों की लड़कियों का जीना मुश्किल हो जाएगा। हालांकि समाज दूषित बहुत पहले ही होता रहा है।
कुछ लोगों के कुतर्कों का हवाला देते हुए मैं कहना चाहूंगा कि क्या सभी वेश्याएं कपड़े उतारने और रुपये-पैसे छीनने वाली होती हैं ? लोगों के भीतर यह आम धारणा होती है। जबकि ऐसा नहीं है। मैं इस बारे में दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा। पहली इलाहाबाद स्थित मीरगंज की घटना और दूसरी जी.बी.रोड नई दिल्ली की। मीरगंज बाजार में उन दिनों पुलिस द्वारा वेश्याओं की नाकेबंदी की हुई थी। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के सिपाही मौजूद थे। ‘‘कोई ग्राहक ऊपर न जाने पाये। सड़ने दो स्साली रंडियों को। पेट की आग नहीं बुझेगी तो ये स्साली पेट के नीचे की आग का कैसे बुझा पाएंगी ?’’
उसी बाजार में अपनी ड्यूटी पुरी करते हुए एक पुलिस कांस्टेबिल का बेबाकी से दिया गया बयान था। जाहिर बात थी कि इस तरह के बयान के पीछे रंडियों का पुलिस वालों से पंगा लेता रहा होगा या फिर उन्हें हफ्ता या माहवारी देना बंद कर दिया होगा। वैसी स्थिति में भी मैं एक वेश्या के कोठे पर पहुंचने में सफल हो गया था। फरवरी का माह और गुलाबी मौसम की दस्तक। बीस वर्षीय युवती साथ में दो अन्य पुरुष साथी कोठे पर मौजूद थे। वे तीनों अंगीठी के पास बैठे हुए चाय पी रहे थे। बिल्कुल जैसा आम परिवारों में होता है। उसके माथे पर किसने लिखा था कि उनमें से मादा साथी वेश्या है। उसका स्वभाव भी दूसरी लड़कियों जैसा ही था। मुझे यह सब देख और महसूस कर अच्छा लगा। मन में रहा सहा भय भी जाता रहा। वापसी में मैं जब सीढ़ियां उतरने लगा तो मुमताज अपनत्व के स्वर में बोली थी,
‘‘भाईजान कोई पुलिस वाला पूछे तो कह दीजिएगा कि आप मेरे रिश्तेदार हैं।’’

दूसरी घटना जी.बी.रोड की है। तब मैं रंगमंच से जुड़ा था और बीच-बीच में रेडियो स्क्रिप्ट के साथ दूरदर्शन के लिए डाक्यूमेंट्री भी लिखता था। मंडी हाउस में अक्सर शाम को रंगकर्मियों के साथ बैठकें हुआ करती थीं। एक शाम एक फिल्म निर्माता ने चाय पीते हुए कहा,
‘‘चलो यार कहीं चलते हैं।’’
मेरे पूछने पर ‘कहां’ जवाब न देकर और मुझे सस्पेंस में रखते हुए फुटपाथ पर खड़ी कार तक वह मुझे ले आया था। लगभग पन्द्रह मिनट में हम जी.बी.रोड आ गये थे। मुझे अहसास हो गया था। पर पूछा नहीं। सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गये। लगा कि मेरे मित्र फिल्म निर्माता की कोठे पर कोई प्रतीक्षा ही कर रही थी। लगभग बाइस वर्षीय युवती गोरा रंग तीखे नयन नक्श। बिना समय बर्बाद किये वह मेरे मित्र को लेकर भीतर चली गई थी : पर जाने से पहले मेरे लिए केम्पा कोला मंगाने के लिए किसी से कह गई थी। जल्द ही नीचे से कोई केम्पा कोला की बोतल ले आया था। मैं धीरे-धीरे ठंडा पेय पीते हुए वहां की गर्म स्थितियों को देख रहा था। हर युवती अपने आप में स्वतंत्र, बाल बनाने से लेकर पान खाते हुए। वह कोठा भी मुझे घर लगा। वैसा ही आम घरों जैसा परिवेश था। कोठे पर बैठे हुए भी मेरे भीतर किसी तरह का कोई भय नहीं था।
थोड़ी देर में हल्का होकर मेरा मित्र आया। साथ में हसीना भी थी। मुस्कुराते हुए वह बोली थी,
‘‘आइए आप भी।’’
मेरे इंकार करने पर उसे हैरानी हुई थी। फिर होठों पर अजीब तरह की मुस्कान लाते हुए कहा था उसने,
‘‘बाबा साहेब हिंया तो सब अपनी मां बहन करने आते हैं। आप...।’’
मुझे यह बात बेचैन करती रही थी कि ये सब तो परिवार की मां, बहिन और बेटियां हैं। आखिर कोठेवालियां कैसे बन गयीं ?
वेश्याओं के मनोभावों का सशक्त वर्णन सहादर हसन मंटो ने जो अभिव्यक्त किया है, वह प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद भी नहीं कर पाये। फिर मेरा तो सिर्फ प्रयास है। अंधेरी और सीलनभरी कोठरियों में कैद राष्ट्र की बेटियों के बारे में मेरी अनुभूति कहाँ तक सार्थक हुई, इसका निर्णय स्वयं पाठक करेंगे या फिर आलोचक/समीक्षक और उनसे बढ़कर स्वयं राष्ट्र की मां, बहन तथा बेटियां।
-मोहनदास नैमिशराय

थाने पर पथराव किया रंडियों ने’’ शहर के लगभग सभी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर दो कॉलम में छपी इसी खबर ने गर्म हवा बनकर समूचे शहर की शालीनता को झुलसा दिया था। तथाकथित श्रेष्ठ संस्कृति के अलग-अलग मुखौटे लगाए श्रेष्ठ लोगों के माथे पर बल पड़ने जरूरी थे। वे शहर की नाक समझे जाते थे। शहर के राजनीतिज्ञों से लेकर उद्योपतियों तक उनकी उठ-बैठ थी। कुछ के भीतर से आक्रोश फूट कर बाहर आ गया था। उनके भीतर से गालियां भी उभरने लगी थीं। जिनमें से कुछ शहर की रंडियों के लिए तो कुछ पुलिस अधिकारियों के हिस्से में थीं। शेष देश के कर्णधारों के लिए थीं। गालियां देने वालों में अफसर भी थे और वकील भी। लेखक और पत्रकार के साथ अपने-अपने अखबारों के प्रचार-प्रसार में लिप्त संपादक भी थे। शहर के नागरिकों के सामने शहर की रंडियों के बारे में इस तरह का खुलासा पहली बार नहीं हुआ था। फिर भी जिन्हें इस शहर के वेश्याओं के अड्डे के बारे में मालूम न था, उन्हें भी इन चकलों का पता चल गया था। शहर के कुछ सजग नागरिकों की जानकारियों के भंडार में प्रति पल बढ़ोत्तरी होती जा रही थी। शरीफ लोगों को जहां उनके अस्तित्व की जानकारी परेशान करने लगी थीं वहीं लुच्चे-लफंगों के बीच रंडियां अच्छी खासी चर्चा का विषय बन गई थीं। वे अपने-अपने इंची-टेपों से उन्हें नापने लगे थे। हां शहर की औरतों में रंडियों के प्रति अजीबोगरीब जिज्ञासाएं उभरने लगी थीं। अपने-अपने घरों/आंगनों तथा घरों की छतों पर जवान लड़कियां चोरी छुपे परस्पर गुफ्तगू कर रही थीं। पत्नियां अपने पतियों को हिदायतें देने में लगी थीं। माएं अपने जवान होते बेटों के बारे में सशंकित थीं। बुजुर्ग अपने-अपने अनुभवों से आस-पास की सीली हुई आग को दहकाने में लगे थे। हालांकि सुप्त आग के भड़कने या भड़काने की इच्छा अभी उनके भीतर भी शेष थीं।

सिवाय बच्चों के शहर के नागरिकों के बीच इस खबर का हड़कम्प पैदा हो गया था। पान की दूकानों से लेकर भांग के अड्डों तक यही खबर थी, जो रस ले लेकर कही सुनी जा रही थी। इन सेक्स कथाओं का न कोई आरम्भ था और न कोई अंत। जिस किसी को कोई भी सिरा मिलता वह उसमें अपनी तरफ से कुछ जोड़े बिना नहीं रहता। नवाबों तथा अय्याशों की ऐतिहासिक रंगरलियों को दोहराया जाने लगा था। रंडियों का छिनालपन तथा मस्तानी अदाओं का बढ़ा-चढ़ा कर कहने में न पुरुष पीछे थे और न शहर की अनुभवी महिलाएं। बस्तियां में पुरुष और महिलाओं के अपने-अपने जमघट लगे थे, जहां जुटने वाले अकबर के नवरत्नों से कम न थे।
शहर के सभी थानों में यह खबर चर्चा का विषय थी। पुलिस कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों के बीच रंडियों के कोठों से सटे इबादपुर थाने में तैनात कर्मचारियों के बीच लेन-देन पर अच्छी खासी चर्चा थी। कौन कितनी रिश्वत देकर ऐसे कमाऊ थानों में अपनी पोस्टिंग कराता है, इस बात पर विशेष तूल दिया जा रहा था। वे चाय पीते हुए एक दूसरे से मजाक भी कर रहे थे। मुख्य रूप से जो इंस्पेक्टर अभी तक कुंवारे थे उनसे देह शास्त्र के बोर में अधिक हो रही थी। कुछ को तो वेश्याओं के नाम के साथ उनके समूचे भूगोल की भी जानकारी थी। वैसे कर्मचारी बिस्तर बिछाने से लेकर सजाने की बात कर रहे थे। पुलिस मुख्यालय में उतनी अफरा-तफरी तो नहीं थी, लेकिन टेलीफोन पर बार-बार जो स्वर उभर रहे थे, उनसे उच्च अधिकारी चौंक अवश्य उठते। ट्रांसफर और पोस्टिंग्स विभाग में कुछ फाइलों को तेजी के साथ उलटा-पलटा जा रहा था। अलबत्ता डी.आई.जी. का कक्ष वैसी ही चुप्पी में डूबा था। मेज पर चार-पांच अखबार पड़े थे। लगता था उन्हें बारी-बारी से पढ़ा गया था। अखबारों के पृष्ठ-दर-पृष्ठ अस्त-व्यस्त थे। पुलिस के उच्च अधिकारियों को इस बात का अच्छी तरह से अहसास हो गया था कि शहर के चप्पे-चप्पे में यह खबर जाकर अवश्य ही रच बस गई होगी। जो आज की आम घटना नहीं बल्कि शहर की शालीनता को झकझोरने वाली दुर्घटना थी।

कुछ लोगों के द्वारा इसे वेश्याओं के जुझारू दस्तों की ओर क्रांन्ति की दस्तक भी कहा जा रहा था। कमिश्नर की टेबल पर रखे फोन बार-बार बज उठते थे। फोन करने वालों में संसद सदस्यों से लेकर विधायक अधिक थे। विपक्ष के राजनीतिज्ञों ने तो तूफान खड़ा किया हुआ था। अधिकांश ने कमिश्नर से मिलने का समय मांगा था। मुलाकात को किसी न किसी बहाने टालने के प्रयास कर रहे थे वे। वे जानते थे कि अति विशिष्ट लोगों से मुलाकात होगी तो वे पुलिसवालों को हजार-हजार लानतें देने में पीछे न रहेंगे। हालांकि वे ही खासम खास लोग बीच-बीच में फोन कर अपना गुस्सा कलक्टर पर उतार रहे थे और कलक्टर एसएसपी पर। प्रत्येक फीतदारी और स्टारधारी पुलिस अधिकारी अपने मातहत अधिकारी को डांटने-डपटने में लगे थे।
शहर में अखबार वालों से पहले इस खबर को फैलाने का अभियान छेड़ा था रिक्शा और तांगे वालों ने। जितनी भी सवारियां उन्हें मिलतीं, वे उन्हें यह खबर बतलाए बिना नहीं रहते। सवारियां भी रस ले-लेकर और आगे पूछ-ताछ करतीं। रिक्शा-तांगे वाले जैसे सवारियों का बोझ ढो-ढोकर अपने मन का बोझ हल्का करते। सवारियों के भीतर अनगिनत जिज्ञासाएं उभरतीं। ऐसी स्थिति में कुछ उन्हें पुलिस थाने का रास्ता बतला देते तो कुछ चकलाघरों का रास्ता दिखा देते। चटपटी बातें सुन सवारियां अपने-अपने दांत दिखा देती। बदले में वाहन चालक भी पीछे न रहते। सब्जियों से लेकर औरतों के भाव के बारे में पूछताछ होने लगती। सच कहा जाए तो सवारी ढोने वाले हरकारे/डाकिये/और खबरनवीस सभी कुछ थे। वे इस तरह की खबरों को अपने-अपने ढंग से गढ़ते थे। इस कार्य में उन्हें खूब महाराथ हासिल थी। इस काम में वे संवाददाता का कार्य बखूबी करते थे। हालांकि उनके पास किसी भी पत्रकारिता विद्यालय/महाविद्यालय का डिप्लोमा न था। उनके पास अपने अनुभव थे। कुछ के पास रिस्ते हुए जख्म भी थे। तो कुछ के भीतर बियाबान जंगल उगे हुए थे। पुराने शहर की विरासत के उत्तराधिकारी थे।

निश्चित ही उनसे यह शहर धड़कता था। उनके पड़ोसी कुंजड़े/भड़भूजे/नाई/तेली/खटबुने/मोची/धोबी/खटीक/सांसी/आदि-आदि थे। सभी मिल जुल कर इस शहर को सजाते-सवांरते थे। पर समाज की संरचना में वे सब दलित और पिछड़े माने जाते थे। उनमें अधिकांश पुराने शहर के वाशिंदे थे। इबादतपुर का थाना और वेश्यालय दोनों पुराने शहर में ही थे। जितना पुराना वेश्यालय था उतना ही पुराना थाना। रंडियों का बाजार और पुलिस स्टेशन दोनों ही नये और पुराने शहर के बीच में थे। पुराने शहर और नये शहर की गंध में फर्क था। अस्मिता और पहचान में रद्दोबदल हो गयी थी। नये शहर की बसापत तेजी के साथ हो रही थी। भूगोल भी बदल रहा था। जबकि पुराने शहर के गली-कूंचे अभी भी वैसे ही थे।
सुबह लगभग सभी अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर यह समाचार छापा गया था। चूंकि संध्याकालीन अखबारों के छपने के बाद यह घटना या दुर्घटना हुई थी और शहर में रात्रिकालीन कोई अखबार नहीं छपता था। इसलिए अगले दिन की सुबह इस खबर का छपना जरूरी भी था। पहले ही पृष्ठ पर अलग-अलग समाचार पत्रों में दो और तीन कॉलम सिलसिलेबार खबर थी। हैडिंग था-हिन्दुस्तान की तवायफें, आइये हम शोषण के खिलाफ एक जुट हों। जिस थाने को कल रात रंडियों ने घेर लिया था आज दोपहर होते-होते उसे खबरनवीसों ने घेर लिया था। थाने के भीतर खाकी वर्दी पहने सजगता में तत्पर फीताधारियों को अखबार वालों ने और अधिक सजग कर दिया था। उनके पेट का पानी अजीबोगरीब तरह से हिलडुल रहा था। जिसे और अधिक हिलाने पर पत्रकार तुले थे। खाकी वर्दी वालों पर चारों तरफ से सवालों की झड़ी लगी थी। एक के सवाल खत्म होने से पहले दूसरा शुरू हो जाता। थाने के भीतर एस.एच.ओ. का कमरा अलग था। जिसमें उनके अलावा दो इंस्पेक्टर और बैठे थे। सभी के चेहरों पर बदहवासी के चिह्न मौजूद थे। पर पुलिस वाले काईयां थे। घबराहट होते हुए भी वे अपनी इस कमजोरी को छुपा रहे थे। उनके होठों पर झूठी मुस्कान थी। सच तो यह था कि कल रात थाने पर हुए हल्ले ने उन्हें उनके अपने ही इलाके में शेर से गीदड़ बना दिया था। अब वे गीदड़ धमकी दे रहे थे। जबकि पत्रकारों की ओर से भी बेखौफ होकर ताबड़तोड़ तरह से सवाल पूछे जा रहे थे :
‘‘हम पूछते हैं कि कल रात थाने पर वेश्याओं ने घेराव क्यों किया ?’’ यह सवाल पत्रकारों की ओर से सामूहिक रूप से उठाया गया था।

‘‘हमें क्या मालूम, उन्हीं से पूछो जाकर।’’ एस.एच.ओ. ने नपे तुले शब्दों में जवाब दिया था।
‘‘उन्हीं से यानी...।’’ घुटनों तक ढीला ढाला कुरता पहने एक दढ़ियल पत्रकार ने उस पुलिस अधिकारी की टोह ली थी।
‘‘अरे भाई उन्हीं से जिन्होंने रात में आकर यहाँ नारेबाजी की।’’ पुन। एस.एच.ओ. ही बोला था। शेष अभी चुप थे और एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे।
‘‘आपका आश्य वेश्याओं से है।’’ फिर वही कम्युनिस्टनुमा अखबारनवीस बोला था,
‘‘हाँ भई हाँ उन्हीं स्साली रंडियों से...।’’ न जाने कब से रुकी हुई एस.एच.ओ. की भड़ास आखिर निकल ही गई थी।’’
पुलिस अधिकारी की ओर से गाली जैसा जवाब सुनकर अब तक साथी पत्रकारों के बीच चुपचाप खड़ी महिला पत्रकार जैसे तैश में आ गई थी। उसका नाम रश्मि था। वह प्रजातंत्र में रिपोर्टर थी। उसने तुरंत अपनी शिकायत दर्ज की थी,
‘‘आप जैसे जिम्मेदार पुलिस अफसर के मुँह से इस तरह से उन्हें गलियां देते अच्छा नहीं लगता।’’
एस.एच.ओ. के बजाय इस बार दूसरी ओर से जवाब आया था,
‘‘उन्हें गालियां न दे तो क्या हम उनकी आरती उतारें, वे ऐसा काम ही क्यों करती हैं ?’’ उनका नाम दीपक कुमार शर्मा था। वे इसी थाने में सब इंस्पेक्टर थे।

‘‘पर उनसे यह काम कौन कराता है ?’’ उसी महिला पत्रकार ने फिर सवाल दागा।
‘‘हम नहीं कराते।’’ दो टूक जवाब दिया था सब इंस्पेक्टर ने,
‘‘पर उनकी उसी कमाई में से हिस्सा तो लेते हैं आप !’’ अबकी तीसरा पत्रकार बोल उठा था।
‘‘कौन हिस्सा लेता है ?’’ इस बार वर्दी पहने हुए सभी पुलिसये एक साथ बोल उठे थे। उनके सामूहिक स्वर में जोरदार ढंग से गुस्सा भरा था। उनकी आंखों में किसी हिंसक जानर के जैसी चमक तैर उठी थी।
‘‘हम सभी को नहीं कह रहे हैं।’’ दो पल की चुप्पी के बाद पत्रकारों की टोली से एक सुर में तभी जवाब मिला था।
‘‘आप प्रेस वाले नाहक ही पुलिस वालों को बदनाम करते हैं !’’ इस बार दोनों इंस्पेक्टर बोले थे।
‘‘देखिये, जहाँ धुआं उठता है आग भी वहीं लगती है’’ अबकी दार्शनिक से लगने वाले चश्माधारी पत्रकार ने कहा था। वह गंगा-यमुना दैनिक का रिपोर्टर था।
‘‘आप प्रेस वाले तो वहाँ भी आग लगा दें जहाँ धुआं न हो ! इंस्पेक्टर ने व्यंग्य में कहा।
साथ में बैठे दोनों इंस्पेक्टरों को जैसे हवा मिली थी। वे मुस्कराते हुए बोले थे,
‘‘पत्रकार का काम ही क्या है। कुछ भी छापना और आग लगाना।’’
तभी नया सवेरा दैनिक के संवाददाता का स्वर उभरा था,
‘‘ऐसी बात नहीं है इंस्पेक्टर साहब।’’
‘‘यार कम टू द प्वाइंट।’’ रश्मि को बीच में कहना पड़ा था।

‘‘हाँ तो बताइए, रात में उन्होंने थाने पर हल्ला क्यों किया ?’’ दढ़ियल पत्रकार ने फिर से बात शुरू की। इस बार उनके स्वर में थोड़ी उदारता थी। तभी बाहर से एक बारह वर्षीय लड़का चाय ले आया। वह नंगे पांव था और गंदी से कमीज पहने था। सभी ने उसकी ओर देखा। चाय के साथ मटमैली प्लेट में नमकीन भी था। पत्रकार साथियों को अजीब-सा लगा यह देखकर।
‘‘लीजिए चाय पीजिये।’’ एस.एच.ओ. का स्वर भी नरम हो गया था।
चाय के नाम पर पत्रकार साथियों ने एक दूसरे की तरफ देखा। जैसे चाय लेने के लिए एक दूसरे से पूछना चाह रहे हों। तभी उन सब में अधिक उम्र के पत्रकार ने जिन्हें दादा भी कहते थे, थोड़ा नाराजगी के स्वर में कहा था।
‘‘हमें नहीं पीनी पुलिसवालों की चाय। कौन जाने यह भी रिश्वत के पैसे से मंगाई गई हो या किसी गरीब चाय वाले को धमका-डरा कर।’’
यह सीधे-सीधे पुलिस वालों की अस्मिता पर हमला था। जिससे विचलित हुए बिना वे नहीं रह सके थे।
‘‘देखिये आप हमारी तौहीन कर रहे हैं।’’ पुलिस वालों के बीच से उत्तेजित स्वर उभरा था। इस बार हवलदार ने भी साथ दिया था।
‘‘हम आपसे सज्जनता से पेश आ रहे हैं और आप...।’’ फिर दूसरा बोला था।
‘‘आपको हमसे नाराजगी हो सकती है, चाय से तो नहीं।’’ स्टेशन आफिसर के स्वर में अनुनय और विनय था। ‘‘आप जो भी सवाल पूछेंगे हम उसका जवाब देने का प्रयास करेंगे। पहले चाय ले। ये सवाल-जवाब तो चलते ही रहते हैं।’’ पर चाय के लिए किसी ने भी हाथ न बढ़ाया
शायद इससे अधिक अपमान और क्या हो सकता था। सभी वर्दीधारियों के चेहरे देखने लायक थे। उनके चेहरे पर बनती-बिगड़ती रेखाएं बहुत कुछ कह रही थीं।
‘‘अच्छा यह बताइये कि आप वेश्याओं को रात में थाने में भी बुलाते हैं।’’ वही कम्युनिस्ट छाप पत्रकार ने अचानक यह सवाल पूछ लिया था।
‘‘कौन कहता है ?’’ वे फिर अपने बचाव के लिए एक सुर में बोले थे।
‘‘हमने सुना है।’’ इस बार दो पत्रकार एक साथ बोले थे। उधर पुलिस वाले कुछ बोलना ही चाहते थे कि रश्मि बीच में बोल पड़ी थी।
‘‘यह तो और भी गलत है। महिलाओं को रात में थाने बुलाना सरकारी नियम के खिलाफ है।’’


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