रागविराग - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला Ragvirag - Hindi book by - Suryakant Tripathi Nirala
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रागविराग

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :130
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3083
आईएसबीएन :81-8031-099-x

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निराला जी की सर्वश्रेष्ठ कवितायें....

Ragvirag

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

...यह उन कविताओं का संग्रह है जिनमें जितना आनंद का अमृत है, उतना ही वेदना का विष। कवि चाहे अमृत दे, चाहे विष, इनके स्त्रोत इसी धरती में हों तो उसकी कविता अमर है।

....जैसे-‘उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पर आवै’, निराला की कविता आकाश में चक्कर काटने के पश्चात इसी धरती पर लौट आती है।
...निराला की कल्पना धरती के भीतर पैठकर वनबेला की सुगन्ध के साथ ऊपर उठती है।
...इस धरती के सौन्दर्य से निराला का मन बहुत दृढ़ता से बँधा हुआ है। आकाश में उड़ने वाले रोमांटिक कवियों और धरती के बीच निराला में यही अंतर है।

...नारी के सौन्दर्य के बिना बसन्त का उल्लास अधूरा है। निराला की श्रृंगारी रचनाएँ देखकर विरोधी आलोचक कहते थे-ये कैसे छायावादी कवि हैं, जो अपने को ही रहस्यवादी कहते हैं और नारी के सौन्दर्य के गीत भी गाते हैं।
...निराला के गतकर्म सरोज को अर्पित कर दिये, फिर नया कर्म आरम्भ किया, उन्होंने ‘राम की शक्ति पूजा’ लिखी ‘सरोज-स्मृति’ से निराला का आधा दुःख सरोज की मृत्यु के कारण है, आधा उनके अपने संघर्षों के कारण है।
....वह दुःख की कथा सरोज के जन्म से पहले शुरू हुई थी और सरोज की मृत्यु के बाद बहुत दिनों तक चलती रही। उसी की एक कड़ी है ‘राम की शक्ति-पूजा’।
...यह संग्रह निराला के सुदीर्घ कवि जीवन की सार्थकता का भी प्रमाण है।

इसी संग्रह से


भूमिका

सन् 23 में जब ‘मतवाला’ निकला, निराला ने उसके मुखपृष्ठ के लिये दो पंक्तियाँ लिखीं-

अमिय गरल शशि-सीकर रविकर राग-विराग भरा प्याला
पीते हैं जो साधक उनका प्यारा है यह मतवाला।


निराला ने सोचा था, ‘मतवाला’ ऐसा पत्र होगा जिसमें जीवन, मृत्यु, अमृत और विष, राग और विराग-संसार के इस सनातन द्वन्द्व पर रचनाएँ प्रकाशित होंगी। किन्तु न ‘मतवाला’ इन पंक्तियों को सार्थक करता था, न हिन्दी का और कोई पत्र। इन पंक्तियों के योग्य थी केवल निराला की कविता जिसमें एक ओर राग-रंजित धरती है। रँग गई पग-पग धन्य धरा-तो दूसरी ओर विराग का अंधकारमय आकाश : है अमानिशा उगलता गगन घन अंधकार !

इस कविता-संग्रह का नाम है : राग-विराग। यह उन कविताओं का संग्रह है जिनमें जितना आनन्द का अमृत है, उतना ही वेदना का विष। कवि चाहे अमृत दे, चाहे विष इनके स्रोत इसी धरती में हों तो उसकी कविता अमर है। कहते हैं कि छायावादी कवि यथार्थ की धरती छोड़कर कल्पना के आकाश में विचरण करते थे। बात सच ही होगी, क्योंकि इनमें एकाध को जब पता लगा कि उनके पैर धरती पर नहीं, आकाश में हैं, तब उन्होंने औपचारिक रूप से घोषणा की कि वह आकाश से अब धरती पर उतर रहे हैं।

कवि जो कुछ लिखता है, उसे पहले कल्पना में ही देखता है, इसलिए कल्पना को त्याग कर कविता रचना संभव नहीं। किन्तु एक कल्पना वह होती है, जिसमें कवि यथार्थ जीवन को देखता है, औरों की तुलना में ज्यादा गहराई से देखता है, दूसरी कल्पना वह होती है जो यथार्थ को धुँधला कर देती है, उस पर खूबसूरती का मुलम्मा चढ़ाती है। निराला की कल्पना इस धरती से दूर कोई मनोरम अपार्थिव लोक नहीं रचती। वह पृथ्वी की दृढ़ आकर्षण शक्ति से बँधी हुई है। जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पर आवै वह आकाश में चक्कर काटने के बाद इसी धरती पर लौट आती है।
रँग गई पग-पग धन्य धरा। यह धरती है जो वसंत में पग-पग रँग जाती है। निराला की कल्पना धरती पर उगे हुए वृक्ष के भीतर पैठती है जहाँ उसके अंतस् की लालिमा वसन्त में और भी निखर उठती है: तरु उर की अरुणिमा तरुणतर। निराला की कल्पना धरती के भीतर पैठकर वनबेला की सुगन्ध के साथ ऊपर उठती है: मस्तक पर लेकर उठी अतल की अतुल बास।1 चैत की चाँदनी रात में गंगा किनारे नर्गिस का रूप देखकर निराला की कल्पना कहती है : यह स्वर्ग से उतरती हुई चाँदनी, कुछ नहीं, यदि स्वर्ग कहीं है तो इसी धरती पर, वह नर्गिस के सौन्दर्य में है। निराला की आदर्श कविता जिसमें अमृत के निर्झर झरते हैं धरती से उठती हुई आकाश में छा जाती है-


बुझे तृष्णाशा निषानल झरे भाषा अमृत निर्झर,
उमड़ प्राणों से गहनतर छा गगन लें अवनि के स्वर।


इस धरती के सौन्दर्य से निराला का मन बहुत दृढ़ता से बँधा हुआ है। आकाश में उड़ने वाले रोमांटिक कवियों और धरती के कवि निराला में यही अन्तर है।

 
पृथ्वी का गुण है गन्ध। अपने सबसे परिष्कृत सुखद रूप में यह गंध फूलों के माध्यम से मनुष्य को सुलभ होती है। जैसे कीट्स ने नाइटिंगेल और शेली ने स्काईलार्क पक्षियों को अमर कर दिया, वैसे ही जुही, बेला या नर्गिस का नाम लेते ही निराला का स्मरण हो आता है। चाँदनी रात, मलयानिल उपवन, सर-सरित, गहन गिरि-कानन इन सबके केन्द्र में जुही की कली। गंगा के कगार, आकाश में नक्षत्र, चन्द्रमा, विश्व का तारतम्य सघन-इन सबका केन्द्र नर्गिस। धरती पर लू के झोंके, आकाश में जलता हुआ सूर्य, चारो ओर धूल, कवि का अशान्त मन और इन सबके केन्द्र में वनबेला। निराला को फूलों से ऐसा ही प्रेम था। प्रकृति के केन्द्र में धरती की सुगन्ध।
निराला के लिए फूल का खिलना संघर्ष की परिणति है। रूप हो चाहे गंध-फूल के लिए यह सहज प्राप्य नहीं है। ‘कर्म जीवन के दुस्तर क्लेश’ भेद कर वनबेला ऊपर आती है, उसके मस्तक पर पृथ्वी और आकाश की ताप और त्रास भी है। कोई आश्चर्य नहीं, निराला, कली के खिलने को क्रान्तिकारी परिवर्तनों का प्रतीक भी मान लेते थे-


टूटें सकल बन्ध
कलिके, दिशा-ज्ञान-गात हो बहे गन्ध।


फैजाबाद में प्रान्तीय साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में राजनीतिज्ञों को लक्ष्य करके निराला ने यही गीत गाया था।
रूप से अधिक निराला को फूलों की गन्ध प्रिय थी। जिस रूप में पृथ्वी का गुण-गन्ध न हो वह रूप ही क्या ? चमक-दमक वाले निर्गन्ध फूलों को ‘सीज़नल फ्लावर’ कहकर वह उन्हें भाव शून्य कोमलकान्त पदावली का प्रतीक बना देते हैं।

वसन्त निराला की प्रिय ऋतु है। शिशिर की लम्बी रातें जैसे-जैसे छोटी होती हैं, धरती के भीतर नये वर्ण, नयी गन्ध फूलों-पत्तियों में फूटने को होती है, निराला की प्रतिभा नये गीत रचने को कसमसाती है। साहित्यिक जीवन के अभ्युदय काल में जब उन्होंने ‘जुही की कली’ लिखी थी, तब से अंतिम प्रणय बेला तक यह क्रम चलता रहा। वसन्त आनन्द और उल्लास
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1. मूल पाठ-बास, बाद को निराला ने इसे साँस कर दिया था।
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की ऋतु है। सभी रोमांटिक कवियों ने एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर वसन्त का वर्णन किया है। इस वर्णन की एक विशेषता यह है कि वसन्त की शोभा को और भी भव्य बना देने के लिए वे पौराणिक गाथाओं से मदन, रति, वनदेवियों आदि की विहारभूमि में अवतरित करते हैं। कुमारसंभव का तीसरा सर्ग इस कला का अनूठा उदाहरण है। किन्तु निराला के लिए धरती में ही ऐसा अनन्त सौन्दर्य है कि उसे और भव्य बनाने के लिए वनदेवियों की आवश्यकता नहीं है।
नारी के सौन्दर्य के बिना वसन्त का उल्लास अधूरा है। निराला की श्रृंगारी रचनाएँ देखकर विरोधी आलोचक कहते थे-ये कैसे छायावादी कवि हैं, जो अपने को ही रहस्यवादी कहते हैं और नारी सौन्दर्य के गीत भी गाते हैं।

निराला वैसे ही रहस्यवादी कवि थे जैसे मलिक मुहम्मद जायसी आदि प्रेमसर्गी सूफी कवि थे या आधुनिककाल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर थे। जायसी और रवीन्द्रनाथ का मन सन्तों और योगियों की नारी-संबंधी वर्जनाओं से मुक्त था। रीतिवादी कवियों के नखशिख वर्णन में चमत्कारप्रियता अधिक, यथार्थ, चित्रण कम; नायिका भेद वाली रचनाओं में अवकाशभोगी वर्ग के लिए उत्तेजना का सामान जितना है, उतना उल्लास का नहीं। निराला की श्रृंगार भावना अधिक नियंत्रित और उदात्त है। उदात्तता—काव्य का ऐसा गुण है जो साधारणतः वीर रस की रचनाओं में तो मिलता है, श्रृंगार अधोमुखी वृत्ति से मानो उसका सहज वैर हो। निराला की रचनाओं में सौन्दर्य के प्रति प्रबल आकर्षण है और वह नियंत्रित रहता है, इसलिए उदात्त है। अधिकांश भक्तों की तरह निराला के लिए आवागमन से मुक्ति एकमात्र मुक्ति नहीं है। वासना की मुक्ति—मुक्ता त्याग में तागी, यामिनी जागी यह पुरुष और नारी दोनों की मुक्ति है, इस भौतिक संसार में।

अनेक किशोर-मन, दमित, इच्छाओं वाले रूमानी कवियों की तरह निराला निरावृत्त नारी-सौंदर्य के सपने नहीं देखते। मानवीय काम-चेतना की सहज स्वस्थ अभिव्यक्ति उनकी श्रृंगारी रचनाओं की विशेषता है। उनकी श्रृंगार-भावना उन कवियों की तृष्णा से भी भिन्न है जो नारी के रूप पर तभी रीझते हैं जब वह अदृश्य, अस्पृश्य, अज्ञात-उनके-कल्पना लोक की परी बन जाती है। निराला के लिए स्त्री इस धरती पर रहने और विहार करने वाली अस्थि-मांस की स्त्री ही है।
रीतिवादी और रोमांटिक कवियों से भिन्न निराला की रचनाओं में नारी के अनेक रूप हैं, वह प्रेयसी है, वधू, विधवा है, श्रमिक नारी भी-वह तोड़ती पत्थर, अट्टालिकाओं के बीच, सड़क के किनारे, गर्मी की धूप और लू सहती हुई, पत्थर तोड़ने वाली एक भारतीय श्रमिक नारी।
गर्मी, जाड़ा, बरसात-कोई ऋतु हो, रीतिवादी कवि के लिए उसमें उद्दीपन का सामान मौजूद रहता है। सामान्य छायावादी कवि ग्रीष्म के तापत्रास से भागता है। ग्रीष्म निराला की अप्रिय ऋतु किन्तु उसका सामना करते हैं-


यह सान्ध्य समय,
प्रलय का दृश्य भरता अंबर,

पीताभ, अग्निमय, ज्यों दुर्जय,
निर्धूम निरभ्र, दिगन्त प्रसर,
कर भस्मीभूत समस्त विश्व को एक शेष,
उड़ रही धूल, नीचे अदृश्य हो रहा देश।


(वनबेला)

छायावादी काव्य में ग्रीष्म की संध्या का इससे अच्छा और यथार्थ चित्रण दूसरा नहीं है। धूल के नीचे अदृश्य होने वाले देश की सार्थक प्रतीक-व्यंजना अलग।
 
जितना ही ग्रीष्म का ताप भीषण है, उतना ही प्रबल वर्षा का आकर्षण। लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो भरा दौंगार उन्हीं पर गिरा। निराला ने वसन्त से भी अधिक गीत और मुक्तक वर्षा पर लिखे हैं। इन रचनाओं में वर्षा के प्रति ऐसा अदम्य आवेग प्रकट हुआ है जो जेठ बैसाख की लू सहने वाले के लिए बहुत स्वाभाविक है। आकाश में घटाएँ, मूसलाधार वर्षा, नदी-नालों में बाढ़-देख-देख नाचता हृदय, बहने को महा विकल-बेकल, ऐसा उद्गेग।

कालिदास से लेकर रवीन्द्रनाथ तक, वर्षा काल में प्रेयसी का स्मरण, भारतीय काव्य परम्परा का अंग बन गया है। निराला का मन मेघदूत के काव्यलोक से बाहर रहता है। वर्षा गीतों में प्रेयसी को याद करके आँसू बहाने के लिये उन्हें अवकाश नहीं। बहुत थोड़े गीतों में वह नारी-सौंदर्य की बात भी सोचते हैं और ऐसे गीतों में विरह की करुणा नहीं, संयोग की लालसा है-आज भेंट होगी-हाँ होगी निस्संदेह...आज मिटेगी व्याकुल श्यामा के अधरों की प्यास।

वर्षा ऋतु का जैसा भावपूर्ण चित्रण, भारतीय काव्य में है, वैसा अंग्रेजी काव्य में संभव नहीं था। इटली में रहने वाले अंग्रेज कवि भी बादलों को मँड़राते भर देखते हैं, फुहार आयी कि वह कमरे के भीतर हुए। वर्षा से निराला की आत्मीयता मानसिक ही नहीं, दैहिक है। जिस धरती से छोटे-छोटे पौधे बादल को अपनी ओर बुलाते हैं, उसमें और निराला के मानस में एक प्रकार का तादात्म्य है। आकाश में घटाएँ उठने से लेकर बहुत दिनों बाद खुला आसमान निराला वर्षा का हर रूप देखते हैं, उसका चित्रण करते हैं।

वर्षा सृजन का प्रतीक है, निराला के लिए ध्वंस का भी। जैसे राग के साथ विराग, वैसे ही सृजन के साथ ध्वंस। निराला उल्लास और विषाद के ही कवि नहीं, संघर्ष और क्रान्ति के भी कवि हैं। इस क्रान्ति का लक्ष्य है, स्वाधीन शोषण मुक्त समाज। भारत में तरह-तरह के क्रान्तिकारी हुए हैं किन्तु भारत में क्रान्ति नहीं हुई, अंग्रेजी कानून के मातहत विभाजित राष्ट्र को आजादी मिली। प्रेमचंद और निराला का ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि उन्होंने समझा कि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की धुरी है-किसान क्रान्ति, साम्राज्यवाद के मुख्य समर्थक सामन्तों के खिलाफ जमीन पर अधिकार करने के लिए किसानों का संघर्ष। आजाद होने के लगभग पच्चीस वर्ष बाद देश में तरह-तरह के भूमि आन्दोलन हो रहे हैं, उसमें निराला के क्रान्तिकारी दृष्टिकोण की सच्चाई मालूम होती है। सन् 24 में निराला ने लिखा था-


जीर्ण बाहु, है जीर्ण शरीर
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर !
चूस लिया है उसका सार,
हाड़ मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार।

इस स्थिति में अभी लौलिक परिवर्तन नहीं हुआ।
निराला के राजनीतिक दृष्टिकोण की क्रान्तिकारी विशेषता दूसरे महायुद्ध के दौरान और उसकी समाप्ति पर लिखी अनेक कविताओं में दिखाई देती है। मिल मालिकों, जमींदारों और अंग्रेजों के ‘हृदय परिवर्तन’ द्वारा मिलने वाली आजादी के प्रति निराला और कांग्रेसी नेताओं के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर था और वह अन्तर इन कविताओं में देखा जा सकता है।
अनेक छायावादी कवियों के गंभीर लेखन के विपरीत निराला की रचनाओं में हास्य और व्यंग्य की मात्रा काफी है।

 इस तरह की रचनाओं में कुकुरमुत्ता का स्थान अन्यतम है। छायावादी के विरोधियों, जनता को धोखा देने वाले राजनीतिज्ञों, देश की प्रगति रोकने वाले तरह-तरह के निहित स्वार्थों पर निराला व्यंग्य करते ही थे किन्तु ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी रचनाओं में वह कुछ छायावादी मान्यताओं पर भी व्यंग्य करते हैं जो उन्हें प्रिय थी यद्यपि उन्हें संशय की निगाह से वह पहले भी देखते थे। कुकुरमुत्ता ब्रह्म के समान अनेक रूप धारण करता है; वही विष्णु का सुदर्शन चक्र है, यशोदा की मथानी है, सुबह का सूरज और शाम का चाँद है। भास-कालिदास ने उसमें गोते लगाये हैं और हाफिज-रवीन्द्रनाथ किनारे खड़े देखते रहे हैं। कुकुरमुत्ता अगर ब्रह्म के समान व्यापक न होता तो उसमें कोई गोते कैसे लगायेगा, उसके किनारे खड़े होकर टुकुर-टुकुर ताकेगा कैसे ? कुकुरमुत्ता के प्रच्छन्न व्यंग्य स्वयं निराला की ब्रह्म संबंधी विचारधारा पर है।



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