वह फिर नहीं आई - भगवतीचरण वर्मा Vah Phir Nahi Aai - Hindi book by - Bhagwati Charan Verma
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नारी विमर्श >> वह फिर नहीं आई

वह फिर नहीं आई

भगवतीचरण वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3087
आईएसबीएन :9788126716616

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नारी जीवन पर आधारित उपन्यास...

vah fir nahin aaee-

नारी सनातन काल से पुरुष की लालसा का केन्द्र है। जीवन के संघर्षों में फँसकर अभागी नारी को संसार को प्रत्येक छल-कपट का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु आधुनिक जीवन-संघर्षों की विषमता में ममता का संबल जीवन नौका के लिए महान आशा है।
भगवती बाबू का यह उपन्यास आकार में छोटा होकर भी अपनी प्रभावशीलता में व्यापक है, जिसकी गूँज देर तक अपने भीतर और बाहर महसूस की जा सकती है।

हम सब खोते रहते हैं, पाते
कुछ नहीं। जिसे हम पाना
कहते हैं वह छल है, धोखा है,
भ्रम है। भ्रम का दूर हो जाना  
ही खो देना कहलाता है....
.....मैंने श्यामला को खो दिया
है। एक भ्रम मेरे जीवन
में आकर निकल गया।

 

एक

 

 

मैं आपको अपना परिचय देना चाहता। परिचय के आदान-प्रदान की अवस्था से मैं बहुत दूर जा पड़ा हूँ; और सच तो यह है कि परिचय आदान-प्रदान इस समय मुझे कुछ अजीब-सा निरर्थक लग रहा है। मैं तो इस समय अपनी कहानी सुनाना चाहता हूँ आपको, बिना इस बात पर सोच-विचारे कि मेरी इस कहानी में आप रुचि लेंगे या नहीं। इस कहानी को सुनने के बाद, हो सकता है, आप मेरे साथ संवेदना प्रकट करें, हो सकता है आप उपेक्षा के साथ मुझ परहँस दें। आपकी संवेदना की मुझे आवश्यकता नहीं; आपकी उपेक्षा पर मैं बुरा न मानूँगा। हंसने-रोने से परे, मैं इस समय अपने से ही बुरी तरह उलझा हुआ हूँ।

आज तीन दिन से लगातार वर्षा हो रही है, और मैं अपने इस सूने-से कमरे में अकेला बैठा सोच रहा हूँ....सोच रहा हूँ.....सोच रहा हूँ। सोचने के सिवा मैं और कुछ कर भी तो नहीं सकता। और मुझे ऐसा लगता है कि यह कमरा, यह इमारत, यह सारी-की-सारी दुनिया.....यह सब मेरे लिए नितान्त अनजाने हैं। और तो और, मैं स्वयं अपने लिए अनजाना लग रहा हूँ।

पानी लगातार बरस रहा है-कभी मूसलाधार और कभी धीमा मानों वह सबकुछ बहा देना चाहता हो। एक घुटती हुई-सी नमी सारे वातावरण में भर गयी है। उस नमी में अस्वस्थता से भरी एक सिहरन है।
शायद यह नमी, यह सिहरन और यह घुटन ठीक उस तरह मेरे अस्तित्व का भाग बन गयी है जिस तरह मेरे प्राणों में लगातार गूँजने वाला मेरे ही अन्दर से उठता हुआ प्रश्न, ‘वह इस समय कहाँ होगी ? वह इस समय किस अवस्था में होगी ?’

मैं उसका नाम जानता हूँ-श्यामला। मैं उसका पता भी जानता हूँ-नयी दिल्ली। लेकिन मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि न उसका नाम श्यामला है, न उसका पता नयी दिल्ली है। मैं कल्पना ही नहीं कर सकता कि उसका कोई नाम हो सकता है या उसका कोई पता हो सकता है। एक गूढ़ रहस्य ! एक अनजानी भावना ! कोमलता और कठोरता का एक विचित्र सम्मिश्रण ! नियति के अनजाने किन्तु विवशता से भरे झोकों-सा अस्तित्व ! घुटन और विस्फोटक का सप्राण एकीकरण ! और भयानक वेग के साथ दौड़ती हुई दुनिया में जहां नित्य ही बहुत-कुछ बिगड़ता है और उससे भी अधिक बहुत-कुछ बनता है, किसी का कोई पता हो सकता है, मुझे इस बात पर भरोसा नहीं। फिर भी परिचय देने के लिए, वह चाहे जितना क्षणिक क्यों न हो, कुछ नाम तो चाहिए; अस्तित्व के लिए, वह चाहे जितना झूठा क्यों न हो, एक स्थान तो चाहिए।
श्यामला ! कुछ अजीब-सा नाम लगा था मुझे उस दिन जिस दिन मैंने उसे प्रथम बार देखा था।

 नाम असाधारण हो, ऐसी बात नहीं; पर यह नाम उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता था। और वह भी तो कुछ अजीब-सी है, यद्यपि मैं उसे असाधारण नहीं कह सकता। मैं जो आपको अपना परिचय नहीं देना चाहता उसका कारण संभवत: यह भी है कि मैं आपको उसका जरा भी परिचय नहीं दे सकता हूँ, जिसके सम्बन्ध में इतने दिनों से लगातार सोच  रहा हूँ और जिसकी कहानी मैं आपको सुनाना चाहता हूँ। वैसे अपनी निजी बातों को दूसरों पर आरोपित करना असभ्यता माना जा सकता है, लेकिन क्या करूँ, मैं विवश हूँ।

पानी बरस रहा है- एक व्यथा, एक करुणा मानो फूट पड़ी है। जी चाहता है इस पानी की झड़ी के साथ मेरे अन्दरवाली समस्त व्यथा और ग्लानि आँसू की झड़ी बनकर फूट पड़ती। लेकिन यह नहीं हो सकता। मैं मनुष्य हूँ, और मनुष्य के नाते मैं कठोर हूँ। मुझमें संयम है, मुझमें घुटन है। इस संयम और घुटन से मुक्त होकर, मनुष्य होने के नाते मैं अघाकर साँस नहीं ले सकता, रोकर जी नहीं हल्का कर सकता। और फिर सोचने लगता हूँ। कि रोने से फायदा ही क्या है ? जिसे खो चुका हूँ उसे पा तो नहीं जाऊँगा। कौन एक बार खोकर पा सका है ? मैंने श्यामला को खो दिया, श्यामला ने किसी और को खो दिया है।

लेकिन मैं शायद अपनी बात ठीक तरह से नहीं कह पा रहा। असली बात यह है कि मैंने अपने आपको खो दिया है-ठीक उसी तरह दिस तरह श्यामला ने मुझे खो दिया। हम सब खोते रहते हैं, पाते कुछ नहीं। जिसे हम पाना कहते हैं वह छल है, धोखा है, भ्रम है : भ्रम का दूर हो जाना ही खो देना कहलाता है। और आज मुझे लग रहा है कि हमारा समस्त अस्तित्व ही इस भ्रम और छलना से अनुप्राणित एवं अनुशासित है। भ्रम दूर होते रहते है, लेकिन वास्तविकता हम नहीं प्राप्त कर पाते-एक भ्रम के बाद दूसरा भ्रम। हम केवल सत्य को ही समझ सकते हैं। लेकिन वह सत्य क्या है ? नहीं समझ में आता.....कुछ भी समझ में नहीं आता। वह सत्य है असफलता और निराशा। इस असफलता और निराशा के ऊपर भी कुछ है, यह मैं नहीं जानता। मेरे सामने तो जो कुछ है वह भ्रम है, और इस भ्रम को हम दूर नहीं करना चाहते, क्योंकि भ्रमों को एक बारगी दूर करने के अर्थ होते हैं मृत्यु। हम सब अपने भ्रमों से बुरा तरह चिपके रहना चाहते हैं। इन भ्रमों का टूटना ही खो देना है।

मैंने श्यामला को खो दिया, एक भ्रम मेरे जीवन में आकर निकल गया। लेकिन उस भ्रम में कितनी मादकता थी, कितना पुलक था ! उस भ्रम को फिर पाने के लिए मैं कितना विकल हूँ, कितना अधीर हूँ ? उस भ्रम के अभाव में मैं स्वयं अपने लिए दु:स्वप्न बन गया हूँ।
पानी बरस रहा है, एक प्रलय-सा उमड़ पड़ा है। इस प्रलय-काल में मेरा अकेलापन मुझे बेतरह अखर रहा है। श्यामला कहाँ है ? यह पता-भर मुझे लग जाये तो मैं....तो मैं.....मैं नहीं जानता। मैं जानता हूँ कि मैं उसे फिर से अपने साथ न ला सकूँगा; मैं उसे खो चुका हूँ। अपने टूटे हुए भ्रमों का हम फिर से निर्माण नहीं कर सकते। भ्रम तो स्वत: बनते रहते हैं और न जाने किस अदृश्य से हमारे सामने आ जाया करते हैं।

मैं जानता हूँ कि श्यामला मेरे जीवन का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भ्रम है। वह भ्रम मेरे जीवन में प्रथम बार आया था नयी दिल्ली के एक बहुत बड़े होटल में, जहाँ एक काम से मुझे प्राय: एक सप्ताह ठहरना पड़ा था। उसका कमरा मेरे बगल में था और होटल के बोर्ड पर उसका नाम लिखा था ‘रानी श्यामला’। पर न रानी श्यामला के पास उसकी निजी कार थी, न रानी श्यामला के कोई व्यक्तिगत नौकर-चाकर थे। उसके गहने, मेरी एक नजर ने भाँप लिया था, नकली थी; उसके कपड़ों में तड़क-भड़क तो थी, लेकिन वे कीमती न थे। इकहरे बदन की लम्बी-सी युवती, हल्का गुलाबी रंग, स्वस्थ और सुडौल।

 

 दो

 

 

दिल्ली भारत वर्ष की राजधानी है। यहाँ से करोड़ों आदमियो का जीवन संचालित होता है। सारे देश का रुपया सिमटकर दिल्ली में आता है,


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