अपरा - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला Apra - Hindi book by - Suryakant Tripathi Nirala
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अपरा

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3090
आईएसबीएन :81-267-0552-3

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निराला जी की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ...

Apara

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अपरा पहली बार सन् 1946 में प्रकाशित हुई थी, इसमें महाकवि निराला की उस समय तक प्रकाशित उनके सभी संग्रहों में से चुनी हुई कविताएँ संकलित हैं। चयन स्वयं निराला ने किया था, इसलिए इसकी महत्ता स्वतःसिद्ध है। यहाँ संकलित कविताओं से निराला के कवि-रूप का समग्र परिचय प्राप्त किया जा सकता है, इस अर्थ में यह संकलन गागर में सागर ही है।

भारती-वन्दना

गीत


भारति, जय विजयकरे !
कनक-शस्य-कमलधरे  !
लंका पदतल  शतदल
गर्जितोर्मि सागर- जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ- भरे।
    तरु-तृण-वन-लता-वसन,
अञ्चल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल – कण
धवल-धार  हार   गले।
मुकुट  शुभ्र  हिम- तुषार,
प्राण    प्रणव    ओंकार,
ध्वनित   दिशाएँ    उदार,
शतमुख – शतरव - मुखरे !
1920 ई.

बादल राग

तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-
यह तेरी रण-तरी,
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नव जीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !
फिर फिर
बार-बार गर्जन,
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
अशनि-पात से शायित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगनस्पर्शी स्पर्द्धा-धीर।
हँसते हैं छोटे पौधे लघु-भार-
शस्य अपार,
हिल-हिल,
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन,
सदा पंक पर ही होता
जल विप्लव-प्लावन
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।
रुद्ध कोश, है क्षुब्ध तोष,
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक-अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्रगर्जन से बादल !
त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं !
जीर्ण-बाहु है शीर्ण-शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर !
चूस लिया है उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार !
1920 ई.

जुही की कली


विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागभरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न-
अमल-कोमल-तनु-तरुणी-जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में।
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फिर क्या ? पवन
उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पारकर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली-खिली-साथ।
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह ?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा माँगी नहीं,
निद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही-
किम्वा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये
कौन कहे ?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की,
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती-
चकित चितवन निज चारों ओर पेर,
हेर प्यारे को सेज पास,
नम्रमुख हँसी, खिली
खेल रंग प्यारे संग।
1916 ई.

जागो फिर एक बार


(1)


जागो फिर एक बार !
प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार !
आँखें अलियों-सी
किस मधु की गलियों में फँसी,
बन्द कर पाँखें
पी रही हैं मधु मौन
या सोई कमल-कोरकों में-
बन्द हो रहा गुञ्जार-
जागो फिर एक बार !
अस्ताचल ढले रवि,
शशि-छवि विभावरी में
चित्रित हुई है देख
यामिनी-गन्धा जगी,
एक टक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,
आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी
घेर रही चन्द्र को चाव से,
शिशिर-भार-व्याकुल कुल
खिले फूल झुके हुए,
आया कलियों में मधुर
मद-उर यौवन-उभार,
जागो फिर एक बार !
पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,
सेज पर विरह-विदग्धा वधू
याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की,
मूँद रही पलकें चारु,
नयन-जल ढल गये,
लघुतर कर व्यथा-भार-
जागो फिर एक बार !
सहृदय समीर जैसे
पोंछो प्रिय, नयन-नीर
शयन-शिथिल-बाहें
भर स्वप्निल आवेश में,
आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,
सब सुप्ति सुखोन्माद हो;
छूट-छूट अलस
फैल जाने दो पीठ पर
कल्पना से कोमल
ऋजु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।
तन-मन थक जाएँ,
मृदु सुरभि-सी समीर में
बुद्धि बुद्धि में हो लीन,
मन में मन, जी जी में,
एक अनुभव बहता रहे
अभय आत्माओं में,
कब से मैं रही पुकार-
जागो फिर एक बार !
उगे अरुणाचल में रवि
आई भारती-रति कवि-कण्ठ में
क्षण-क्षण में परिवर्तित
होते रहे प्रकृति-पट,
गया दिन, आई रात,
गई रात, खुला दिन,
ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,
वर्ष कितने ही हजार-
जागो फिर एक बार !
1918 ई.

(2)


जागो फिर एक बार !
 समर में अमर कर प्राण,
गान गाये महासिन्धु-से
सिन्धु-नद-तीरवासी !
सैन्धव तुरंगों पर
चतुरंग चमू संग;
‘‘सवा-सवा लाख पर
एक को चढ़ाऊँगा,
गोविन्द सिंह निज
नाम जब कहाऊँगा।’’
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति
दुर्जय संग्राम-राग,
फाग का खेला रण
बारहों महीनों में ?
शेरों की माँद में,
आया है आज स्यार-
जागो फिर एक बार !
सत् श्री अकाल,
भाल-अनल धक-धक कर जला,
भस्म हो गया था काल-
तीनों गुण-ताप त्रय,
अभय हो गये थे तुम,
मृत्युञ्जय व्योमकेश के समान,
अमृत-सन्तान ! तीव्र
भेदकर सप्तावरण-मरण-लोक,
शोकहारी ! पहुँचे थे वहाँ,
जहाँ आसन है सहस्रार-
सिंह की गोद से
छीनता रे शिशु कौन ?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण ? रे अजान !
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष-
दुर्बल वह-
छिनती सन्तान जब
जन्म पर अपने अभिशप्त
तप्त आँसू बहाती है;-
किन्तु क्या,
योग्य जन जीता है,
पश्चिम की उक्ति नहीं-
गीता है, गीता है-
स्मरण करो बार-बार-
जागो फिर एक बार !
पशु नहीं वीर तुम,
समर-शूर क्रूर नहीं,
कालचक्र में हो दबे
आज तुम राजकुँवर !-समर-सरताज !
पर, क्या है,
सब माया है-माया है,
मुक्त हो सदा ही तुम,
बाधा-विहीन बन्ध छन्द ज्यों,
डूबे आनन्द में सच्चिदानन्द-रूप।
महामन्त्र ऋषियों का
अणुओं-परमाणुओं में फूँका हुआ-
‘‘तुम हो महान्, तुम सदा हो महान्,
है नश्वर यह दीन भाव,
कायरता, कामपरता,
ब्रह्म हो तुम,
पद-रज-भर भी है नहीं,
पूरा यह विश्व-भार’’-
जागो फिर एक बार !

1921 ई.

शरण में जन जननि

गीत

अनगिनित आ गये शरण में जन, जननि-
सुरभि- सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि !
स्नेह से पंक- उर हुए पंकज मधुर,
ऊर्ध्व-दृग गगन में देखते मुक्ति-मणि !
बीत रे गई निशि, देश लख हँसी दिशि,
अखिल के कण्ठ की उठी आनन्द ध्वनि !

1929 ई.

पावन करो नयन

गीत


पावन करो नयन !
रश्मि, नभ- नील- पर,
ससत शत रूप धर,
विश्व- छवि में उतर,
लघु- कर करो चयन !
प्रतनु, सरदिन्दु वर,
पद्म- जल- बिन्दु पर,
स्वप्न- जागृति सुघर,
दुख- निशि करो शयन !

1930 ई.

सन्ध्या-सुन्दरी


 दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी
धीरे धीरे धीरे,
तिमिराञ्चल में चञ्चचलता का नहीं कहीं आभास
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,-
किन्तु गम्भीर, नहीं है उनमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से,
हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।

असलता की-सी लता
किन्तु कोमलता की वह कली
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर-पथ से चली।

नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘‘चुप चुप चुप’’
है गूंज रहा सब कहीं,-
व्योममण्डल में-जगती-तल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमर कमलिनी-दल में-
सौन्दर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्ष:स्थल में-
धीर वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
उत्ताल-तरंगाघात-प्रलय-घन-गर्जन-जलधि-प्रबल में-
क्षिति में-जल में –नभ में –अनिल-अनल में-
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा ‘‘चुप चुप चुप’’
है गूँज रहा सब कहीं,-
और क्या है ? कुछ नहीं।

मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को सस्नेह
प्याला वह एक पिलाती,
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह कितने मीठे सपने;

अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती वह लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।

1921 ई.

यामिनी जागी
गीत


(प्रिय) यामिनी जागी ।
अलस पंकज-दृग अरुण-मुख-
तरुण-अनुरागी।

खुले केश अशेष शोभा भर रहे,
पृष्ठ-ग्रीवा-बाहु-उर पर तर रहे;
बादलों में घिर अपर दिनकर रहे,
ज्योति की तन्वी, तड़ित-
द्युति ने क्षमा माँगी।

हेर उर-पट फेर मुख के बाल,
लख चतुर्दिक चली मन्द मराल,
गेह में प्रिय-स्नेह की जय माल,
वासना की मुक्ति, मुक्ता
त्याग में तागी।

1927 ई.

वसन्त आया


गीत


सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।
1928 ई.


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