पार - वीरेन्द्र जैन Paar - Hindi book by - Virendra Jain
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पार

वीरेन्द्र जैन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 3135
आईएसबीएन :81-7055-346-6

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श्रीकांत वर्मा स्मृति के पुरस्कार से पुरस्कृत यह उपन्यास बहुत ही दार्शनिक उपन्यास है...

Paar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार’ निर्णायक मंडल के सदस्यों सर्वश्री डॉ. नामवर सिंह मनोहरश्याम जोशी, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विष्णु खरे और सुश्री कृष्णा सोबती की दृष्टि में-वीरेन्द्र जैन के उपन्यास ‘पार’ समकालीन कथा लेखन के दोर में परिवेश की समग्र पहचान और लोकजीवन की अनुगूंज को शब्द देनेवाला एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। इसमें बुंदेलखण्ड अंचल के लोकजीवन की भाषा का अचूक प्रयोग इस उपन्यास की विशिष्ट उपलब्धि है।

–पुरस्कार की घोषणा से


 यह एक रोचक और निराशाजनक तथ्य है कि शाताब्दी के इस अंतिम दशक में हिंदी में बहुत कम युवा कथाकार दिखते हैं जो राष्ट्रीय स्तर के उपन्यासकार बन सकें। वीरेन्द्र जैन एक महत्वपूर्ण संभावताओं से भरे उपन्यासकार हैं जिन्हें मंद गति से हम निरन्तर आगे विकसित होते देख रहे हैं।

 -ज्ञानरंजन   


मुझे नई पीड़ी से बड़ी उम्मीद हैं। युवा रचनाकारों में उत्साह है। वीरेन्द्र जैन जैसा लेखक अगर करे तो बहुत कर सकता है। उसके पास सामग्री, पकड़ और भाषा है।

-मनोहरश्याम जोशी


जहाँ तक वर्तमान दशक की नई पीढ़ी के उपन्यासकारों की बात है, मेरी समझ से वीरेन्द्र जैन में ही भविष्य में श्रेष्ठ उपन्यासकार बनने की संभावनाएँ दिखाई पड़ी हैं।


-प्रो. गोपाल राय


वीरेन्द्र जैन की ‘डूब’ का अगला हिस्सा ‘पार’ कथा का उत्तर आधुनिक स्कूल को मजबूत करता है।


-सुधीश पचौरी


‘पार’ के साथ भाषा की समस्या हो सकती है, जो मुझे तो बुंदेलखंडी होने के चलते नहीं हुई, अन्यथा यह एक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण।


-प्रो. श्यामाचरण दुबे


‘डूब’ और ‘पार’ में जो सबसे बड़ी बात है वह यह कि इसमें जो सवाल उठाया गया है और गंभीरता से उठाया गया है, वह महत्वपूर्ण है।


-श्रीलाल शुक्ला


पार

मुइया राउतनी रही, न जनी।
मुइया इस खेरे की रही, न उस खेरे की।
मुइया माई रही, न मुखिया माई।
मुइया अपने मन की रही, न अपने जन की।
अपने लिलार की इबारत को नहीं मेट पाई मुइया।
देह ने दगा दी मुइया को।
देह के आगे हारी मुइया अब सब दिन उस कुघड़ी को कोसती है, जब उससे वह चूक हुई थी।
चूक ऐसी कि मेटी न जाए, सीख ऐसी कि भेंटी न जाए।
कई बसकारे बीते, तब की बात है। मुइया माँ बनी थी। मौढ़ा जना था मुइया ने। मुखिया ने ऐलान किया था-मुइया के मौढ़ा का नाम बजेगा-गुनिया !
गुनिया यानी अगला मुखिया।

सुनकर फूली न समाई थी मुइया। मैं बचुआ जनमते ही हो गई मुखिया-माई।
हरदम अपने बचुआ को निहारती। लाड़ लड़ाती, लाड़ बरसाती।
अगला मुखिया होगा मोरा बचुआ। मोरा लाड़ला।
अभिमान से, ठसक से, फूली न समाती मुइया। खेरे में न अटती मुइया। अपने आस-पास दिग्-दिगंत तक चित्त न धरती मुइया।
दो बसकारे राजी-खुशी बीत गए। फिर आई मुइया पर विपद आपद। मौढ़ा ने मुइया का दूध जुठारना छोड़ दिया। स्तन से मुँह लगाना छोड़ दिया। लाख जतन किए पर हेर के न दे। मुँह फेर-फेर ले। जमाने भर का अल्ल-बल्ल खाए, पर माई का दूध आँखों को भी न सुहाए।
मुइया की जान आई सांसत में। आपद को तो उसने खुद ही टेर लगाई थी। लाड़ में एक दो रोज छिरिया का थन गुनिया के मुँह में धर दिया। गुनिया उसे उसी तरह चूस गया जैसे माई के स्तन को चूसता था। तीसरे रोज गुनिया की एक ही जिद-छिरिया का थन दो मुँह में, माई का नहीं। डाँटा, डपटा, भूखा निर्जला रखा। सब व्यर्थ। गुनिया की एक ही रट, एक ही टेर, एक ही गुहार-छिरिया के थन से छलकाओ फुहार।
बेटा भूखा हो तो माई के मुँह तक कौर कैसे जाए !

एक दिन, दो दिन, तीन दिन-मुइया कलेजे पर पत्थर रखे रही। कोई उपाय तजबीजती रही। इस बीच गुनिया ने भूख मिटान की नई तरकीब खोज ली। टपरा में जो गिरा मिला, भखोस लिया। टपरा के बाहर जो नजर आया, गले के नीचे उतार दिया। सत्रह तरह के कंद मूल, व्यंजनों का स्वाद पा जाने के बाद माई का दूध सुहाने का सवाल ही नहीं रहा।
मुइया की जान आफत में। कहते बने, न सहते बने। मुखिया का हुकुम था-पाँच बसकारे तक गुनिया को माई का दूध पिलाया जाए। यहाँ दो बसकारे बाद ही गुनिया छरक गया।
करते-कराते औरों को भी खबर लग गई। खूब भद्द पिटी मुइया की। मुखिया ने कोई दंड नहीं दिया, प्रायश्चित करने को नहीं कहा, इसी को गनीमत मान कर मुइया का गम कम हुआ।
पर गनीमत कहाँ थी उसमें। जिस-तिस तरह बसकारा बीता। ठंडे दिन, ठंडी रातें आईं। हवा के झोंकों से देह किटकिटाई-कि मुइया की देह ताप माँगने लगी।
मुइया दुविधा में !
मुइया घोर संकट में।

मुइया विकट उलझन में !
मुइया निपट अकेलेपन में !
देह की मंशा पूरी करती है तो मुखिया-माई का आसन डोल उठेगा। मुखिया के, खेरे के कोप का भोग बनेगी। बिरादरी बाहर कर दी जाएगी।
यह सब भी मंजूर। देह को ताप मिले तो।
संकट यह कि ऐसा करेगा कौन ? देह का ताप हरेगा कौन ?
कौन है इस खेरे में ऐसा जन, जो उपतकर तपाए मुइया का तन-मन।
ताप की चाह की मारी मुइया की देह जुड़ा-जुडा जाती है। हाड़-हाड़ काँपता है। अपना जन साथ दे तो चुपके से कोई उपाय भी करे। जड़ी-बूटी खाकर जनने से बचने और देह को ताप देने का जतन करे मुइया। जैसा वे करती हैं जिनका जन सिधार गया है, कि जिन्हें किसी ने फिर से अपनी जनी नहीं बनाया।
अपना जन साथ देगा भला ! उसे देह की कौन कमी है ! बाँका जवान है। खेरे की कितनी तो जनीं, कुँवारीं तक आँखन के दोई गटा फाड़कर हेरती फिरती हैं सब दिन उसको !
मुइया क्या करे !
देह की मंशा पूरी कैसे करे ?

देह को ताप कैसे पहुँचाए ?
देह को कब तक दबाए ?
अभी तो उमर पड़ी है सामने।
यह कैसी मुसीबत में डाल दिया मुखिया ने ! कब का, किस कुसूर का बदला चुकाया मुखिया ने !
मोरी मंशा, मोई उमर, मोरी मति, मोई गति पर काहे विचार न किया मुखिया ने !
मुखिया-माई बना कर मोए अपनी ही देह की हरजाई बना दिया मुखिया ने !
ऐलान कर दिया कि मोई कोख से पहले ही जने बचुआ का नाम बजेगा गुनिया-
गुनिया की माई को बच्चा जनने पर पाबंदी है, यह याद नहीं रहा मुखिया को।
मोए लिलार पे एक ही बच्चा जनने की इबारत कब बाँच ली मुखिया ने !
और बाँच ली, जाँच ली, तो फिर वह झूठ क्यों साबित हो रही है !
नासमझी मुखिया की और दुर्गति मोरी।
बहुत दिनों तक अपने से लड़ती रही मुइया। बहुत लड़ी। अपने को बहुत रोका, बहुत मनाया। अंत में अपने से हार गई मुइया।
जीत गई मुइया की देह।

देह की मंशा।
देह की मुराद।
जीत गया मुइया का विनाश।
जीरोन को छोड़ आई मुइया। अपने जन को छोड़ आई। अपने छौने से बचुआ को बिसूर आई। मुखिया- माई का आसन तज आई।
मुइया किसी की जनी रही, न माई।
देह हो गई मुइया।
देह की हो गई मुइया।
देह की खातिर सब त्यागा। देह से ही अब बचा उसका नाता। देह धर्म निभाने को अपना जन, अपना जन-जाया बेटा, अपना खेरा, अपनी बिरादरी उनसे जुड़े समाजी धर्म को भुला दिया मुइया ने।
उनका अपनापन, सगापन सम्मान सत्कार कोई नहीं रोक सका मुइया को।
किसी की कोई गुहार, पुकार, मनुहार, सुनाई नहीं पड़ी मुइया को।
मुइया को एक ही आवाज हर कहीं से सुनाई दे रही थी-अपनी देह की आवाज। अपनी देह की पुकार। अपनी देह का हाहाकार !

उसी को सुनने, उसी का शमन करने, उसी मृग- मरीचिका सी आवाज की दिशा में निकल पड़ी मुइया।
बीरानों में, बेगानों में, बियावानों में।
अर्सा पहले मूसर खेरे के कुछ जन, कई मवेशी लेकर आए थे जीरोन खेरे की कई जनीं की आँखें जुड़ा गई थीं। कइयों ने विचारा था-यदि दूसरे खेरे के जन, कि जनी से नातेदारी जोड़ने का रिवाज होता तो इसे यहीं रख लेते। या फिर इसी के संग अपनी मौढ़ी का ढोल बजवा कर विदा करते।
उस मुखिया पर गई नजर हटने का नाम ही न लेती थी।

नीचट काला रंग। ऐसा कि सिर से पाँव तक कहीं राई-रत्ती भी रंग बदरंग न था। मसल भीगी भर थीं। नथुनों के नीचे रोम जैसे हलके बालभर उभरे थे। एक बार भी हजामत न बना चेहरा। ठोडी सफाचट। अंग-अंग में चमक इतनी कि आँखें चौंधिया जाए हेरने वाले की। कहीं भी जल ढालो, रपट कर जमीन से आ लगे। हाथ धरो तो फिसल-फिसल जाए। अंग-अंग में लचक इतनी कि बेड़नी गश खा जाए।
उसके संग थे कई और जन। कुछ संगाती उम्र में मुखिया से बड़े कुछ अधबूढ़े और कुछ हम उम्र। साथ में थे कई ढोर-डाँगर। दुधारू गाएँ, जबर भैंसे, दो बैल और गल्लन छिरियाँ-बकरियाँ।
उनके आने पर पंगत हुई थी। पंचैट जुटी थी। मुखिया ने उनके बाली उमर के मुखिया को देखकर पहले शोक जताया था, उनके बुजुर्ग मुखिया के सिधार जाने का। फिर बिरादरी से भेंटा था।

मूसर के बाँके मुखिया को अपने करीब आसन दिया था। उनके खेरे की खबर-दबर ली थी। जानना चाहा था कि उनके खेरे में कितने जन हैं, कितनी जनीं, कितने मौढ़ी-मौढ़ा। कितने टपरा। कितने ढोर-डाँगर। कितनी छिरियाँ-बकरियाँ। कितनी खेती बाड़ी के लायक जमीन। कितनी हार-डाँग। कितने कुआँ बावड़ी। कितने ताल तलैयाँ।
और यह भी कि इधर हमरे खेरे में पधारना क्यों कर हुआ ? यहीं आए हो या ढोर डाँगर लेकर कहीं और जाने को निकले हो ?
तब मूसर खेरे के मुखिया ने बखानी थी पूरी राम कहानी।
‘‘कुछ बरस से हमरे खेरे के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं मुखियाजू। गौंड़ बब्बा खफा हैं कि जाने कोई ऊँच-नीच हो गई खेरे के किसी जन से या जनीं से। किसी देवता को पथरा समझ कर तोड़ दिया, कि फोड़ दिया, कि फेंक दिया, कि थान बदल दिया उनका, कि हग- मूत दिया उन पर, कि देख कर भी अनदेखा कर दिया उनको, कि मान गिरा दिया उनका खबर नहीं।

‘‘किसी और खेरे वाले ने जप-तप करवा दिया, कि रिद्धि-सिद्धि कर दी, कि खेरे को कील दिया, कि शाप दे दिया, कि मेटने का कौल भर लिया, खबर नहीं।
‘‘पहली गाज तो ये गिरी कि हमरे मुखिया सिधार गए। अबेला में ही गौंड़ बब्बा को प्यारे हो गए। हमरी शिक्षा-दीक्षा अभी पूरी भी न हुई थी। ऊँच-नीच, नियम धरम, पक्ष-पाबंदी सिखा-बता भी न पाए थे कि उनका बुलावा आ गया। वे तर गए। हमें अधर में छोड़ गए।
‘‘फिर लिलार का लिखा हुआ यह कि भंड़यन ने, डाकुअन ने हमरी नाक में दम कर दिया। आए दिन डाकू कंधा पे बंदूक टाँगे आने लगे। खेरे में धमाचौकड़ी मचाने लगे। हर बार जो भी कोई गिरोह आता, हमरी एक दो जनीं, कि मौढ़ियन को हाँक ले जाता। न हम कभी उनका कुछ बिगाड़ पाए, न उन्हें रोक पाए, न हटक पाए।
‘‘पहले की गई जनीं तो महीना, दो महीना पीछे लौटे आती रहीं, पर बाद में जाना तो कइयों का हुआ, लौटना एक का भी न हुआ।

‘‘अब खेरे की दशा यह है कि जनीं तो बची हैं मुट्ठी भर और जन हैं गल्लन। मौढ़ी-मौढ़न की भी यही दशा है। मौढ़ा हैं मुतकेरे और डोर बँधने की उमर की मौढ़ी हैं तनक-सी।
‘‘अब संकट यह कि खेरे में एका कैसे रहे। सारे काम कैसे निबटें। पकाना-खाना, गोढ़ना-कूटना, बीनना- छानना, छाबना-बटोरना, सब अल्ल-पल्ल हुआ रहता है। ‘‘सो मुखियाजू, हमरी यह विनती है कि हमरे संग आई ये गैया भैंसें, छिरियाँ बकरियाँ तुम राख लो और अपने खेरे की कुछ जनीं हमरे संग पठै दो। तुमरे खेरे में तो न जनीं कम हैं, न मौढ़ीं। तुम्हें मवेशी मिल जाएँगे और हमरा काम सध जाएगा। न जाना चाहें जनीं तो कुछ डोर बँधने की उमर वाली मौढ़ियन को हमरे संग पठै दो।’’

मुखिया ने दत्तचित होकर मूसर खेरे के मुखिया की कथा सुनी। उसकी मंशा सुनी। फिर बखानी अपनी राय-बात। फैसला।
‘‘एक जमाना था जब मवेशी के बदले मौढ़ी कि मौढ़ी के बदले मवेशी लेते-देते रहे हमरी बिरादरी में। पर कब ? जब इक्का-दुक्का डेरा डालकर रहते रहे, तब। अब यह मुमकिन नहीं। अब नहीं लेखते हम अपनी मौ़ढ़ी को मवेशी बिरोबर। अब इक्का-दुक्का नहीं, हम इकट्ठे रहते हैं खेरा बसा कर। ये खेरा हमरा कुनबा है। कुनबे की परवरिश देख-रेख, मान-मर्यादा का ख्याल रखना हमरा पहला धरम है। अब हम आदमियों की नाईं जीने का ढंग सीख रहे हैं। आदमी बनना है तो उनके नेक नियम-धरम अपनाने होंगे कि नहीं !
‘‘तुमरी जरूरत हम न पूर सकेंगे। दूसरे खेरे में जनी कि मौढ़ी पठैने का चलन नहीं हमरे खेरे में। फिर तुमरे संग पठैने का तो सीधा मतलब है पनी जनी को पने हाथों खाई-खंदक में धकेलना। सैकड़ों बरस पीछे की जिंदगानी जीने को लाचार करना। है कि नहीं ? उस जीवन में, जिसमें एक ही जनी के कई- कई जन होते रहे।
‘‘आँहाँ ! जो नई हो सकत अब ! हमरी आँखन छित्तां नईं हो सकत !
‘‘रही मुतकेरी दीखने की बात।’’

‘‘सो कब कौन पार से लुढ़क जाए। कब किसे जनाउर
टोर खाए। कब कौन सी हारी-बिमारी में सिधार जाए। कौन बच्चा जनने के काबिल न बने। किसका बच्चा जने से मन उचट जाए। कौन डाँग का काम तज के टुकनिया-बीजना बनाने की मंशा जाहिर कर बैठे। कौन अपने जन से मुक्ति पाने की गुहार लगाए-कौन देखने गया है। तब ऐसे जन को दूसरी जनी की दरकार होगी कि नहीं।
‘‘आगे जैसा बखत आएगा, वैसा चलन चलाएगा तब का मुखिया।
‘‘तुम अभी बाली उमर के हो। असमय के मुखिया। ज्ञान में अधूरे। तुमरी जरूरत बाजिब है। अपनी उमर के मुताबिक तुमने तजबीज भी बुरी नहीं सोची। पर हम तुमरी जरूरत पूरी न कर पाएँगे।
‘‘अब तुमरे छितां है ये हमरा खेरा। तुम अपनी आँखों देख चुके हो कि कितनी तो जमीन है हमरे पास खेती-किसानी वाली। कितनी घनी डाँग है हमरे खेरे के आसपास। इतना सब समेटने-करने में तो हमरे खेरे की जनीं कम पड़ जाती हैं। ऐसे में अपनी किसी जनी को खेरे से पठैने की बात हम सोचें भी कैसे ?
‘‘हाँ, तुममें से जो जन यहाँ रह जाना चाहें, उनका सत्कार होगा यहाँ। यहाँ के नियम-धरम का पालन करें। हमरे संग हमरे होकर रहें।

‘‘हमरी मानो तो तुम सब जन दूसरे खेरन में रह- मिल जाओ। जवान-जहान हो कोई भी खेरा पलक- पाँवड़े बिछा कर तुम्हें कुबूल लेगा।’’
जीरोन खेरे के मुखिया की नेक सलाह के बदले मूसर खेरे के बाँके मुखिया ने मुखिया का जश बखाना। फिर भी जाते-जाते वह ऐसा कुबोल बोल गया कि वह बोल मुखिया सहित पूरे खेरे के दिल में खुभ गया।
बाँका मुखिया मसखरी-सी करता हुआ बोला, ‘‘हम आदमी की नाईं आए सो तुम नट गए मुखिया ! भंड़यन की, कि राउतन की नाईं आए होते तब देखते तुम कितनी ज्ञान-ध्यान की बातें बखान पाते। तब तो अपनी मंशा पूरी करके ही लौटते यहाँ से। तब मवेशी भी साथ न लाने पड़ते, हाँ यहाँ से जितनी जनीं और जितने मवेशी चाहते, हाँक ले जाते !’’
उसके कुबोल सुनकर मुखिया को ताब आ गया था छिन भर को। छिन पीछे अपने पर काबू पाया मुखिया ने। पाउना समझ कर भूल जाना चाहा उसके कुबोल को। लेकिन उसका धमकाना, चेताना मौंगे-मौंगे कैसे सुन लेता मुखिया।
सो वापस जाते मूसर खेरे के वासियों को चुनौती दे ही दी मुखिया ने-

‘‘वह भी करके देख लेना। आदमी की नाईं आए थे सो आदमी की नाईं लौट भी पा रहे हो। और घाईं आए होते तो हम भी राउत हैं ! हैं भी तुमसे जबर, ज्यादा। कभी आकर देख लेना। कंटक ही न काट दें तो कौल गौंड़ बब्बा को, पूरो जीरोन तुमरे पाँवों में धर के डाँग में बिला जाने में छिन भर नईं लगाएँ हम, हाँ।’’
आदर-सत्कार के साथ शुरू हुई बात बैर-कलह पर जाकर थमी। जमूसर की डाँग के छोटे से खेरे से आया वह दलखाली हाथ, केवल कलह कमा कर लौट गया।
मूसर खेरे वालों के जाने के दिन से ही जीरोन के मुखिया के लिलार पर चिंता की अमिट लकीरें नजर आने लगी थीं।
दुविधाग्रस्त हो गया था मुखिया।
शल्य लग गई थी मुखिया को।

मुखिया को रातोदिन की एक ही चिंता, एक ही फिक्र एक ही रट।
बड़ा बूढ़ा न रहे सिर पर तो ऐसी दुर्गति होती है खेरे की ! कहीं मैं भी अधबीच सिधार गया तो मुढ़ी पटक-पटक कर रोएँगे सब जन।’
उसी दिन से मुखिया ने मन-ही-मन यह तय कर लिया था कि अब जिस भी पहली जनी की औलाद बेटा होगा, उसे गुनिया घोषित कर देगा।
बहुत दिन इंतजार करना पड़ा मुखिया को। यह फैसला किए पीछे जिस जनी की खबर मिली उसी ने मौढ़ी जनमी। किसी ने मौढ़ा जना भी तो वह जनमते ही सिधार गया। एक ही दिन-छिन में जीवन-मरण के कारज पूरे कर गया।
मुखिया की मंशा पूरी की मुइया ने। मुखिया की दुविधा हरी मुइया ने।
खेरे की खातिर मुखिया ने ऐलान कर दिया-मुइया का मौढ़ा बजेगा गुनिया !
मुखिया ऐसा न करता अगर उसके मन में शंका न होती। सुपने में भी न करता।

मुखिया को इल्म था कि मुइया की यह पहली संतान है। एक ही बच्चा जने पीछे पाबंदी कभी किसी मुखिया ने नहीं लगाई। मुखिया को संदेह था कि मुइया से ‘सत’ निभेगा नहीं। देह न कुबूलेगी पाबंदी।
मुखिया चाहता था कि किसी ऐसी जनी के मौढ़ा जनमे, जिसके पहले भी कई एक और बच्चा जनमते ही मुखिया-माई का आसन छिन जाएगा।
फिर बच्चा जनमने बाद जिएगा कि धरती छूते ही सिधार लेगा, कौन जाने सो नाहक मुखिया-माई का आसन क्यों तजूँ ? बिरादरी के खेरे के कोप का भोग क्यों बनूँ ?
पर मुखिया को उन दिनों चैन कहाँ था। सब्र कहाँ था। मुखिया सोचता था-जैसे मैं बिरादरी की, खेरे की फिक्र में फिक्रमंद हूँ, मुइया भी इस फिक्र में हिस्सा बँटाएगी। खेरे की खातिर देह को राख कर लेगी।
पर मुइया को खेरे से, बिरादरी से, अपने जन से, अपने बेटे से ज्यादा जरूरी लगा अपनी देह की फिक्र करना।
सो देह की खातिर सब कुछ एक साथ त्याग कर अलग-थलग हो गई मुइया।
इस भरोसे पर खेरा छोड़ आई मुइया कि मूसर खेरे के जो जन कभी जीरोन में आए थे, उन्हें आज भी दरकार होगी जनी की।

वे मुझे कुबूल लेंगे।
वहीं सिराएगी अब मोरी ताप की मारी देह।
देह का ताप वहीं दूर होगा।
तिल-तिल कर मरने से बच जाऊँगी मैं।
पल-पल को चैन से जी पाऊँगी मैं।
वहीं हरेगा कोई देह का दरद।
तब टीस न मचेगी।
हाड़ न किटकिटाएँगे।
देह के कष्ट दूर होंगे।
देह की मंशा पूरी होगी।
देह फिर-फिर हरियाएगी।
मोरे जन को काहे का टोटा। मैं रही, न रही एक सी। अब आस-औलादा तो मैं दे नहीं सकती थी। कहीं दे न दूँ इसीलिए तो दस कदम दूर छिटका रहता था मुझसे।
मैं खेरे में रही आई होती तो देह से हारती ही हारती। अपने जन को भी ले डूबती।
अब तो मैं अकेली ही डूबी न। वह वहाँ शौक से कर ले दूसरी जनी। उसे दे आस-औलाद। उस पर तो कोई पाबंदी नहीं।

 


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