इस उम्र में - श्रीलाल शुक्ल Is Umra Main - Hindi book by - Srilal Shukla
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हास्य-व्यंग्य >> इस उम्र में

इस उम्र में

श्रीलाल शुक्ल

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3160
आईएसबीएन :81-267-0804-2

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हिन्दी साहित्य के शिखर रचनाकार श्रीलाल शुक्ल की नई कहानियों का संग्रह है ‘इस उम्र में’!

Es Umra Main

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी साहित्य के शिखर रचनाकार श्रीलाल शुक्ल की नई कहानियों का संग्रह है ‘इस उम्र में’! यह एक अप्रतिम लेखक के अपने सामाजिक यथार्थ पर अचूक पकड़ और उसे बयान करने की उसकी अद्भुत कला का साक्ष्य है। इसकी कहानियाँ हिन्दी कहानी की रुढ़ियों, फार्मूलों, रवायतों से दूर खड़ी हैं और रचना के संसार में नई निर्मितयाँ तैयार कर रही हैं।
‘इस उम्र में’ की कहानियाँ तीक्ष्ण अन्वीक्षण क्षमता से सम्पवन्य होकर भारतीय समाज की गहन मीमांसा करती हैं। इनमें मौजूदा समयमें प्रकट हो रहे नये बदलावों की संवेदनात्मक आहटें हैं। यहाँ तक कि कई समसामयिक घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और रुझान भी दर्ज हैं। न केवल इतना, श्रीलाल शुक्ल ने सामाजिक संरचना में तेजी से उभर रहीं नई शक्तियों के प्रतिशोध और परिवर्तन को भी पहचान कर उसे प्रकट किया है।
‘इस उम्र में’ की कहानियों में कई बार पुरानी वास्विकता को नई जीवनदृष्टि से उलट-पुलट दिया जाता है तो कई बार नई पीड़ाओं, दुखों और क्रूरताओं को पुरानी धारणाओं के प्रहसनात्मक विखंडन के जरिए उजागर किया गया है। श्रीलाल शुक्ल यहाँ अभिव्यक्ति के नये-पुराने रुपों में ऐसी बेमुरौव्वत तोड़-फोड़ करते हैं, फिर उनका ऐसा अजीव मिलाप कराते हैं कि समाज का चेहरा उजागर हो जाता है और हिन्दी का चेहरा बदल जाता है।
ये कहानियाँ अपनी कतहन शैली के लिए भी लम्बे समय तक याद की जाएँगी। वातावरण तथा चरित्रों की जैसी सघन पड़ताल और बात कहने के लिए जैसी तिर्यक भाषा ‘इस उम्र में’ की रचनाओं में सतत मौजूद है, वह हिन्दी कहानी में विरल है।
‘इस उम्र में’ की कहानियाँ सुविख्यात कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की अनेक कृतियों की तरह गहरी हलचल पैदा करने की सामर्थ्य रखती हैं। वे इस बात का सुराग भी देती हैं कि क्यों श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं के प्रति लोगों में हमेशा एक उत्सुकता, इज्ज्त और अधीर प्रतीक्षा बनी रहती है।

प्रस्तावना


‘इस उम्र में’ मेरी ग्यारह कहानियों का संग्रह है। इसमें तीन ऐसी भी हैं जिन्हें मैंने कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। अन्तिम कथा में कथा के अर्थ का इशारा भी कर दिया गया है।
संग्रह की सभी कहानियाँ मेरे पिछले संग्रह ‘सुरक्षा तथा अन्य कहानियाँ’ के बाद की हैं। अपवाद में केवल ‘ज़िन्दगी’ है। यह कहानी मैंने अपने ‘लेखनोच्छ्वास’ के दिनों में 1963 के आसपास लिखी थी और भैरवप्रसाद गुप्तजी ने इसे ‘नई कहानियाँ’ में स्थान दिया था। कुछ वर्ष बाद-अचानक-कहानी खो गई। राजकमल प्रकाशन ‘नई कहानियाँ’ के पुराने अंकों में इसे नहीं खोज पाए। इसका बांग्ला अनुवाद भी एक पत्रिका में छपा था जो कुछ समय बाद बन्द हो गई। उसकी प्रति मेरे पास थी पर उसमें यह कहानी ग़ायब मिली। उसे काटकर मैं विशेष रूप से सुरक्षित रखना चाहता था। इसी कारण वह खो गई।
अभी पिछले वर्ष यतीन्द्र मिश्र के अनुरोध पर कुँवरनारायणजी अपने कागज-पत्तर देख रहे थे। उनमें मेरे कुछ पुराने क़ाग़ज मिले। ज़िन्दगी भी उन्हीं में थी। यही एक पुनर्जीवित कहानी है जो पुरानी होते हुए भी इस अपेक्षाकृत नए संग्रह में शामिल है।
समकालीन हिन्दी कहानी की गहमागहमी में और उसके दावेदारों के बीच घोषित-गर्जित और विशेषत: लक्षित होने की अक्षमता के बावजूद मैं इसी कारण अपने को सक्रिय रखे हुए हूँ कि जब रूढ़ियाँ और पुराने ढाँचों को तोड़ने और नए सरोकारों की ढोल पीटनेवाले खुद अपनी ही बनाई हुई रूढ़ियों की जकड़ में फँस रहे हों, तब हाशिए में फेंकी गई अनेक जीवन्त, किन्तु उपेक्षित स्थितियों से भी साक्षात्कार की ज़रूरत कुछ लोग महसूस कर रहे होंगे। और तब शायद उस क्षण मेरे इन प्रयासों की भी कुछ सार्थकता समझी जाएगी या मुझे उम्मीद है, जा रही होगी।
श्रीलाल शुक्ल

इस उम्र में


व्यंग्य के नाम पर, या सच तो यह है कि किसी भी विधा के नाम पर पत्र-पत्रिकाओं के लिए जल्दबाज़ी में आएँ-बाएँ-शाएँ लिखने का जो चलन है, उसके अन्तर्गत कुछ दिन पहले मैंने एक निबन्ध लिखा था। वह एक पाक्षिक पत्रिका में ‘हास्य-व्यंग्य’ के स्तम्भ के लिए था। हल्केपन के बावजूद उसे लिखते-लिखते मैं गम्भीर हो गया था। (बक़ौल फ़िराक़ जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए।’) यानी, इस निबन्ध से ‘शाएँ’ ग़ायब हो गई थी, सिर्फ ‘आएँ-बाएँ’ बची थी।
‘आएँ-बाएँ’ की प्रेरणा शहर के एक बहुत बड़े दार्शनिक ने दी थी जो उतने ही बड़े कवि और कथाकार भी थे; वास्तव में प्रेरणा उन्होंने नहीं, उनकी मौत ने दी थी। वे एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गए थे। एक सप्ताह तक अस्पताल और घर की सेवा-अपसेवा के बीच झूलते हुए उनकी मृत्यु हो गई।

उनके बेटे को पता था कि वे ऊँचे दर्जे के विद्वान हैं, पर उनके प्रशंसकों और मित्रों के नाम का उसे पता न था। इसलिए उसने एक अख़बार के दफ्तर को छोड़कर-जो उतना ही गुमनाम था जितना कि अख़बार के लिए दिवंगत दार्शनिक गुमनाम थे-दो-चार गिने-चुने रिश्तेदारों को ही उनके न रहने की ख़बर दी और वही आठ-दस लोग मिलकर उनका दाह-संस्कार कर आए। बाद में उनके देहान्त की ख़बर फैली और तब अख़बारों में विद्वानों के प्रति समाज की उपेक्षा पर जमकर लिखा गया, यह और बात है कि उनकी मृत्यु और उसके अवसादपूर्ण कारणों पर तब भी ज़्यादा नहीं लिखा गया।
स्थिति अवसादपूर्ण थी, इसमें शक नहीं; पर मुझ जैसे लेखक को, जो अपने यथार्थ-बोध और भावुकता-विरोध के लिए विख्यात है, इससे क्या लेना-देना ? मुझे ‘आएँ-बाएँ’ यानी हास्य-व्यंग्य के लिए यह बहुत वाजिब विषय जान पड़ा और मैंने एक दिन चार बजे शाम तक छत के ऊपर बने हुए अपने अध्ययन-कक्ष में एक टिप्पणी लिख डाली।

जो मैंने लिखा, वह भविष्य में मरनेवालों को सम्बोधित था। उसका सारांश था, ऊँचे नेताओं, व्यवसायियों, उद्योगपतियों और अफ़सरों के मरने पर उनकी शवयात्रा में जनसंख्या की कमी नहीं रहती। उनके पीछे अनगिनत संस्थाएँ और प्रतिष्ठान भीड़ मुहैया कर देते हैं, या खुद भीड़ बन जाते हैं। पर मामूली लोगों-जिनमें लेखक, कलाकार, नट, विट, गायक आदि शामिल हैं- को यह सुविधा नहीं मिलती। उनकी शवयात्रा में चलनेवाले गिने-चुने ही होते हैं। अत: अगर आप चाहते हैं कि आपकी शवयात्रा धूमधाम से सम्पन्न हो तो आपको मरने से काफ़ी पहले एक विशेष प्रकार का जनसम्पर्क चलाना पड़ेगा। वरना अख़बार टी.वी.रेडियों आदि का तो ज़िक्र ही क्या, आपका पड़ोसी तक आपका-यानी आपके मरने का नोटिस न लेगा और बाद में कहता सुना जाएगा, बड़े अफ़सोस की बात है। पर क्या बताएँ, मुझे पता ही नहीं चला।’’
‘‘यह भी याद रखना चाहिए कि भरी-पूरी शवयात्रा के लिए बहुत बासी जनसम्पर्क काम न देगा; लोग भूल जाते हैं या मरकर एक अजनबी पीढ़ी छोड़ जाते हैं। जनसम्पर्क का अभियान अपने मरने से कोई दो साल पहले चला सकें तो अधिक गुणकारी होगा।’’

जनसम्पर्क के मैंने कुछ नुस्खे भी सुझाए थे-‘‘दूसरों की शवयात्राओं में ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा लेना शुरू कर दें, किसी आध्यात्मिक, धार्मिक या साम्प्रदायिक संगठन की सदस्यता ले लें, किसी शिक्षा-संस्था के प्रबन्ध मंडल में घुस जाएँ (ताकि कई अध्यापक और कुछ विद्यार्थी ऐन मौक़े पर उपलब्ध रहें) अपनी जाति के किसी ऐसे उद्धार-कार्यक्रम में खप जाएँ जो हर जाति में हर वक्त चलते ही रहते हैं...आदि-आदि।’’
सारांश यह कि मुर्दा हालत में अगर आपको भीड़ की दरकार है जो ज़िन्दा हालत में भी आपको भीड़ से रब्तोज़ब्त रखनी पड़ेगी।
ऐसा लिख चुकने पर, एक बड़े लेखक के साथ जैसा कि होना चाहिए, मैं अपने से कुछ असन्तुष्ट और साथ ही कुछ हद तक आत्ममुग्ध होकर छत पर टहलता रहा। बाद में मुँडेर के पास आकर खड़ा हो गया और अपने मकान के सामने से निकलनेवाली अति व्यस्त और काफ़ी अस्त-व्यस्त सड़क को देखता रहा। तभी सड़क के किसी गड्ढे में किसी गाड़ी के गिरने और उभरने की ‘भड़-भड़ भड़ा’म सुनाई दी और गाड़ी के ब्रेक की चिहुँक भी। उसी के साथ हल्की धूप में एक साया-सा उतराया और ग़ायब हो गया। फाटक पर मेरा नौकर खड़ा था, उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई और सड़क की ओर दौड़ा। एक दुर्घटना हो गई थी।

एक बूढ़ा आदमी किसी तेज़ रफ्तार टेम्पो की चपेट में आ गया था। सात सवारियोंवाली इस तिपहिया गाड़ी ने उसे बगली धक्का मारकर उछाला और वह पक्की सड़क से विस्थापित होकर, हवा में तैरसा-सा मेरे घर की चहारदीवारी के पास आ गिरा। तत्काल वे सभी दृश्य-श्रव्य, जो सड़क-दुर्घटनाओं से जुड़े होते हैं, एक साथ दिखाई-सुनाई देने लगे। बूढ़े के आसपास भीड़ जमा हो गई। टेम्पो का ड्राइवर जो दो चार सेकंड के लिए रुका था, पहले ही गाड़ी भगाता हुआ आँख-ओझल हो गया था।

‘‘क्या हुआ ? क्या हुआ ?’’ मैं छत से पुकार रहा था पर दौड़कर नीचे नहीं आ पाया। एक तो भागदौड़ का तरीका मुझे धीरोदात्त आचरण के विपरीत जान पड़ता है, दूसरे-सच तो यह है-मुझे दुर्घटनाओं से घबराहट होती है’ घायल आदमी को मैं देख नहीं सकता। ख़ून देखते ही मेरा सर चकराने लगता है, जो ऐसे दृश्यों को आसानी से झेल लेता है वह एक तरह से मानव की आदिम संस्कृति में वापस लौटता है। यह प्रवृत्ति उन उदात्त संस्कारों के विरुद्ध है जो शताब्दियों की सभ्यता ने हम जैसों में परिपुष्ट किए हैं। पर तभी एक विचित्र घटना हुई जिसने मुझे तेज़ी से नीचे आने के लिए मजबूर कर दिया।
मैंने देखा कि कुछ लोगों ने इसी बीच बहुत सँभालकर बूढ़े को अपने हाथों में ले लिया है और जब मैं उम्मीद कर रहा था कि वे किसी गाड़ी में लिटाकर अस्पताल ले जाएँगे, वे उसे उठाकर मेरे फाटक के सामने लाए; उसके बाद उन्होंने बड़ी कोमलता से उसे फाटक के ठीक आगे लिटा दिया। यह देखकर नीचे से मेरे नौकर ने और छत से मैंने विरोध की आवाज़ उठाई और मैं तेज़ी से फाटक पर पास पहुँच गया। तब तक वे लोग बूढ़े को फाटक के पास छोड़कर ग़ायब हो गये थे। ‘आसपास दस-ग्यारह छोकरे, कुछ औरतें और बूढ़े भर रह गए थे। मुझसे हमदर्दी जताई जाने लगी, कोई अपने आपसे कह रहा था, ऐसा नहीं करना चाहिए था ?’ यह एक चालू और निरर्थक वक्तव्य है जिसे सुनने के लिए कहीं भी आपको लम्बी यात्रा करने की ज़रूरत नहीं है।

बूढ़े के जिस्म में कोई हरकत नहीं हो रही थी, पता नहीं कि बेहोश था या मुर्दा। पर भयानक होते हुए भी यह दृश्य मुझे उतना भयानक नहीं दिखा क्योंकि उसकी देह पर कोई घाव नहीं था न कहीं ख़ून ही दिखाई दे रहा था। इतना ज़रूर है कि उसकी पतलून के सामने का हिस्सा गीला था, पर घबराहट मुझे ख़ून से होती हैं, पानी से नहीं।
‘‘आप लोग यहीं रुकें, मैं पुलिस को फ़ोन करके आता हूँ,’’ मैंने कहा और कई क़दमों को एक में समेटता हुआ अपने सुपरिचित बैठकख़ाने में आ गया। कुछ सुकून मिला और जाने-बूझे माहौल में पुलिस को फ़ोन करते वक्त मुझे ज़्यादा उलझन नहीं हुई।

कौन कहता है कि पुलिस का कोई भरोसा नहीं ? मैंने पुलिस कंट्रोल रूम में फ़ोन किया और पाँच मिनट के भीतर ही पुलिस का सचल दस्ता मेरे दरवाज़े पर हाज़िर था। यह और बात है कि जब तक वे आ नहीं गए और नौकर ने मुझे उनके आने की सूचना नहीं दे दी, मैं घर के अन्दर ही बना रहा-बाहर निकलता भी तो क्या कर लेता ?

पुलिस के आने से मुझे दोहरी खुशी हुई; एक तो यह कि बूढ़े के बारे में मेरी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई दूसरे इसलिए कि बची-खुची भीड़ और मुहल्लेवालों की नज़र में निश्चय ही मेरी साख बढ़ी। उन्होंने देख लिया कि मेरे टेलीफ़ोन घुमाते ही कैसे पूरा पुलिस दस्ता-एक नायब दरोग़ा, एक हेड कांस्टेबल और तीन सिपाही-मेरे दरवाज़े पर हैं। बूढ़ा अब भी किसी ज़िस्मानी हरकत के बिना फाटक के सामने पड़ा था। पुलिस की मौजूदगी का असर देखिए कि जो उसे मेरे फाटक पर छोड़ गए थे, उनके ख़िलाफ़ मेरे मन में अब पहले जैसी कडुवाहट नहीं बची थी। बूढ़े के लिए चिन्ता ज़रूर थी पर यह चिन्ता भी शायद इस अहसास की उपज थी कि पूरे घटना-चक्र में मुझे अब एक महत्व की भूमिका निभानी है। तभी मैंने हेड कांस्टेबल से कहा, ‘‘कृपया पूछताछ में वक़्त न बर्बाद करें। पूछताछ बाद में भी हो सकती है; पहले इसे अस्पताल ले जाएँ। क्या पता, बच ही जाए !’’

वास्तव में पुलिस ने आते ही-बूढ़े की ओर तो बाद में देखा-एकदम से पूछताछ शुरू कर दी थी। कोई जानता है कि यह कौन है ? इसका क्या नाम है ? दुर्घटना कैसे हुई ? तुममें से कोई मौके पर था ? टेम्पो का नम्बर ? किसी एक को भी नम्बर याद नहीं ? तब तुम साले यहाँ क्या कर रहे थे ? टेम्पो ने फाटक पर आकर कैसे टक्कर मारी ? उधर मारी ? उस जगह ? तो लाश फाटक पर कैसे आ गई ? वे कौन हरामी के पिल्ले थे जो इसे फाटक पर खींच लाए ?
प्रश्नोत्तर काल में घटना की बेहूदगियां जैसे-जैसे खुलती जातीं, उसी अनुपात से पुलिसवालों की गालियाँ भी तीखी होती जा रही थीं। हैरत की बात कि उन पर मेरी बात से ठंडे पानी का छींटा पड़ा। पता नहीं क्यों, वे मुझसे पुलिस की तरह नहीं, सभ्य पुरुषों की तरह बात कर रहे थे। इसका कारण मैं बाद में सोच पाया : शायद इसलिए कि मैं खूब साफ-सुथरा खादी का कुर्ता और पायजामा पहने था ! उनकी निगाह में मेरा अपरिचय इज़्ज़त का हक़दार था : क्या पता कोई अज्ञात नायक हो ? या कोई प्रभामंडित महान खलनायक ?

नायब दारोग़ा ने पहली बार मुँह खोला, ‘‘फिक्र न करें, बच जाएगा।’’
बूढ़े के मुँह पर पहले ही पानी के छींटे मारे जा चुके थे। कोई नतीजा नहीं निकला था। अब नायब दारोग़ा से शह जैसी पाकर हेड कांस्टेबल बूढ़े के निश्चल शरीर के पास आया। उसने बूट की नोक उसकी पसलियों में गड़ाई और कहा, ‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’
कोई जवाब नहीं। तब पैर छोड़कर उसने हाथ का सहारा लिया, बूढ़े की नाड़ी पकड़ी, कहा, ‘‘मरा नहीं है।’’ सिपाहियों से उसने कहा, ‘‘ले चलो...रामनगर अस्पताल...।’’
सिपाहियों ने अभ्यस्त मुद्रा से भीड़ में खड़े हुए दो रिक्शावालों को चुना, ‘‘उनसे कहा, इसे उठाकर जीप पर रखो..सीट पर नहीं, नीचे..अबे नीचे, फ़र्श पर...।’’
जैसे वे अपने गाँव का घर, बटाई पर लिया खेत, खलिहान, नीम का पेड़ छोड़कर शहर यही सुनने, यही करने आए थे; उन्होंने यह सुना, यही किया।

अभी कुछ आशाप्रद भी होना बाक़ी था। हेड कांस्टेबल ने फ़र्श पर पड़े हुए बूढ़े को झिड़ककर कहा, ‘‘बैठ जा ! इसका भी कोई असर नहीं हुआ। तब उसने बूढ़े को गर्दन का सहारा देकर बैठाया, कहा, ‘‘बैठ, बैठा रह !’’ इस बार उसकी पलकों में कुछ हरकत हुई, मुँह से हल्की-सी कराह निकली। पर वह हेड कांस्टेबल के हुक्म की तामील नहीं कर पाया; ढीले जिस्म से फ़र्श पर पसर गया।
‘‘रामनगर के अस्पताल मत ले जाइए; वहाँ की आपात सेवाओं का भरोसा नहीं। मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में ले जाएँ। वहाँ...।’’
नायब दारोग़ा का धीरज जवाब देने लगा होगा; उसने मेरी बात बीच में काट दी, कहा, ‘‘आप अपना काम कर चुके, अब हमें अपना काम करने दें।’’
दूसरे दिन सूर्योदय के पहले ‘जीर्णाजीर्ण’ पर विचार करते हुए शय्यात्याग, उष:पान, चाय-पान, मल-मूत्र विसर्जन, दन्तधावन, आसन-प्राणायाम-व्यायाम, समाचार-मन्थन, प्रातराश उर्फ़ सूक्ष्माहार। इन क्रियाओं के बाद मेरे असली कर्म की शुरूआत होनी थी : मरणहीन गद्य की रचना; साहित्य-साधना।

पर मन में कुछ कुरेद रहा था, लग रहा था कि आज कुछ और करना है। क्या अस्पताल जाकर उस बूढ़े की हालत का पता लगाना ही इस अनमनेपन का अभीष्ट है ? हो सकता है। तब फिर क्या मेरा अस्पताल जाना ज़रूरी नहीं है ? हैं भी और नहीं भी है। इसलिए कि अगर वह ज़िन्दा हो और उसकी कुछ ज़रूरतें हों तो अपने साधन और सामर्थ्य को नज़रअन्दाज़ किए बिना उनकी पूर्ति की जा सके। उधर ‘नहीं भी’ के पीछे भी कई तरक थे। एक घटना थी, ख़त्म हुई। अब मुझे उससे हिलने रहने की क्या ज़रूरत ? फिर, बिलावजह एक अजनबी आदमी का हालचाल लेने के लिए अस्पतालों के वैरपूर्ण वातावरण में चक्कर काटना क्या नाटकीय न लगेगा।

पर ‘नाटकीय’ ने ही फैसला कर दिया। मैं नाटकीयता के ख़िलाफ़ हूँ; पर कोई मेरे किसी कार्य को नाटकीय समझे या अख़बारों में उसे नाटकीय बनाकर प्रस्तुत करे, तो क्या नाटकीयता के आरोप से भयभीत होकर मुझे उससे विरत हो जाना चाहिए। ख़ासतौर से तब जबकि मैं शुद्ध मानवीय भावना से प्रेरित होकर कुछ करने का जा रहा हूँ।
मैं जानता था कि पुलिस बूढ़े को मेडिकल कॉलेज नहीं ले जाएगी। इसलिए मैं रामनगर अस्पताल गया। वहाँ काफ़ी देर मेरे मरीज़ का पता नहीं चला। जिसका कोई नाम नहीं, उसका पता कैसा ? फिर, कल सारे डॉक्टर हड़ताल पर थे। (किसी दूसरे अस्पताल में किसी मरीज़ ने किसी डॉक्टर को झापड़ मार दिया था। किसी ने उसकी मदद नहीं की थी, न जवाबी तौर पर कोई मरीज़ को पीटने के लिए आगे बढ़ा था। प्रशासन तटस्थ रहा था, क़ानून तोड़ा गया तो क़ानून ख़ुद अपना रास्ता तय करेगा के सिद्धान्त के अन्तर्गत। यह हड़ताल उसी गतिरोध के ख़िलाफ़ सिर्फ़ प्रतीकात्मक रूप में एक दिन के लिए थी।) आज डॉक्टरों की हड़ताल नहीं थी, फिर भी रामनगर में हड़ताल का ख़ुमारी बाक़ी था, अधिकांश डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं आए थे।

मैं पूछता रहा, एक बूढ़ा इमर्जेंसी में लाया गया था-दुर्घटना का मामला था। उसे पुलिस लाई थी। अब कैसा है ? कहाँ है ? किसी वार्ड में ? या शवगृह में।
बड़ी दौड़-धूप और पूछताछ के बाद एक नर्स ने बताया, ‘‘न वह किसी वार्ड में है न शव गृह में।’’
नर्स ने कहा, ‘‘वे उसे कल यहाँ इमर्जेंसी में लाए थे। मैंने कहा कि सारे डॉक्टर हड़ताल पर हैं, मरीज़ को भर्ती नहीं किया जा सकता। पुलिसवाले बोले ठीक है। इसके बाद वे खुद मरीज़ को स्ट्रेचर पर लादकर अन्दर लाए, इमर्जेंसी वार्ड में एक बेड पर उसे डाल दिया। दारोग़ा ने मुझसे कहा, ‘‘सॉरी सिस्टर, हम कुछ नहीं कर सकते, जो करना है तुम ख़ुद करो। एक मोटर ने उसे उछालकर सड़क के किनारे फेंक दिया था। पता नहीं कि कितनी चोट आई है पर इतना तय है कि अभी उसकी साँस चल रही है।’ मैं कुछ बोलती, इसके पहले ही वे गाड़ी स्टार्ट करके चल दिए। मैं उनके मरीज़ का नाम और पता भी नहीं पूछ सकी।’’

मैंने नर्स को समझाया कि वह पूछ लेती तब भी कोई नतीजा न निकलता।
‘‘मैंने मरीज़ को अपने हिसाब से जाँचा-परखा। लगा कि कोई खास चोट नहीं है, सदमा-भर है। पर बिना डॉक्टरी जाँच-पड़ताल के ऐसी राय बना लेना भी ख़तरे का काम है। हो सकता है कि उसके दिमाग़ में अन्दरूनी चोट आई हो, भीतर ही भीतर ख़ून बहा हो ! वैसे डॉक्टर होते, तब भी यह जानने में दिक़्क़त आती। यहाँ न कोई न्यूरालॉजिस्ट है, न न्यूरोसर्जन, कैट्स स्कैन की मशीन भी नहीं..।
‘‘धीरे-धीरे उसने कराहना शुरू किया। आधी रात होते-होते वह पूरी तौर से होश में था। उसने चाय माँगी, मैं ख़ुद चाय पी रही थी। कहीं और से चाय मिलनी मुश्किल थी। मैंने अपने प्याले से ही कुछ घूँट निकालकर उसे दिए; उसने पिया, कहा, ‘‘थैंक्यू’’ और सो गया।
‘‘मैं भी सो गई। बहुत सवेरे देखा, उसकी चारपाई ख़ाली थी। वह जा चुका था।’’
नर्स ने आँखें फैलाकर कहा, ‘‘उसने बड़े जोखिम का काम किया है।’’


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