हिन्दी साहित्य की भूमिका - हजारी प्रसाद द्विवेदी Hindi Sahitya Ki Bhoomika - Hindi book by - Hazari Prasad Dwivedi
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हिन्दी साहित्य की भूमिका

हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :246
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3166
आईएसबीएन :81-267-0579-5

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हिन्दी साहित्य के उदभव का वृत्तान्त का वर्णन...

Hindi Sahitya Ki Bhoomika

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की इस पुस्तक का प्रणयन उन व्याख्यानों के आधार पर हुआ है जो उन्होंने ‘विश्व-भारती’ के अहिंदी-भाषी साहित्यकों को हिन्दी साहित्य का परिचय कराने के उद्देश्य से दिये थे। मूल व्याख्यानों में से बहुत ऐसे अंश छोड़ दिये गये हैं, जो हिन्दी भाषी साहित्यिकों के लिए अनावश्यक थे। विद्वान लेखक का आग्रह है कि हिन्दी साहित्य को सम्पूर्ण भारती साहित्य से विच्छिन्न करके न देखा जाए। मूल पुस्तक में बार-बार संस्कृत, पालि, प्राकृत और अप्रभ्रंश के साहित्य की चर्चा आई है, इसलिए संक्षेप में वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्यों का परिचय परिशिष्ट जोड़कर करा दिया गया है। रीतिकाव्य की विवेचना के प्रसंग में कवि-प्रसिद्धियों और स्त्री-अंग के उपमानों की चर्चा आई है। मध्यकाल की कविता के साथ संस्कृत कविता की तुलना के लिए आवश्यक समझकर द्विवेदीजी ने परिशिष्ट में इन दो विषयों पर भी अध्याय जोड़ दिये हैं।
हिन्दी साहित्य का परिचय कराने में इस प्रकार यह ग्रंथ लोकप्रिय एवं प्रामाणिक बन पड़ा है।

निवेदन


‘विश्वभारती’ के अहिंदी भाषी साहित्यिकों को हिंदी साहित्य का परिचय कराने के बहाने इस पुस्तक का आरंभ हुआ था। बाद में कुछ नए अध्याय जोड़कर इसे पूर्व रूप देने की चेष्टा की गई है। मूल व्याख्यानों में से बहुत से अंश छोड़ दिए गए हैं, जो हिंदी भाषी साहित्यिकों के लिए अनावश्यक थे। फिर भी इस बात का यथासंभव ध्यान रखा गया है कि प्रवाह में बाधा न पड़े। इसके लिए कभी- कभी कोई-कोई बात दो जगह भी आ जाने दी गई है। ऐसा प्रयत्न किया गया है कि हिंदी साहित्य को संपूर्ण भारतीय साहित्य से विच्छिन्न करने न देखा जाए। मूल पुस्तक में बार-बार संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश के साहित्य की चर्चा आई है, इसीलिए कई लंबे परिशिष्ट जोड़कर संक्षेप में वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्यों का परिचय करा देने की चेष्टा की गई है। रीतिकाव्य की विवेचना के प्रसंग में (पृ. 102 पर) कवि- प्रसिद्धियाँ और स्त्री-अंग के उपमानों की चर्चा आई है। मध्यकाल की कविता के साथ संस्कृत कविता की तुलना के लिए आवश्यक समझकर परिशिष्ट में इन दो विषयों पर भी अध्याय जोड़ दिए गए हैं।
 
बौद्ध साहित्यवाले अध्याय में प्रो. विटरनित्स, पं. विधुशेखर शास्त्री और श्री वेणीमाधव बाडुआ के लेखों से बहुत सहायता मिली है। पुस्तक जब प्रेस में थी तब श्री भदंत आनंद कौशल्यायन ने भी इसके एक अंश की आलोचना करके लेखक की सहायता की है। शांतिनिकेतन के पालि और संस्कृत के अध्याय पंडितप्रवर श्री नित्यानंद विनोद गोस्वामी ने इसे देख लिया था और आवश्यक सुधार सुझाए थे। इन बातों के लिए लेखक सभी का अत्यंत कृतज्ञ है।

संत-साहित्य के संबंध में लिखते समय आचार्य श्री क्षितिमोहन सेन महाशय से अनेक स्थानों पर बहुत सहायता मिली है। लेखक के ऊपर स्नेह इतना अधिक रहा है कि इस स्थान पर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने में भी उसे बहुत संकोच हो रहा है। अनेक विद्वानों की लिखी हुई अनेक पुस्तकों से अनेक सहायता मिली है। पुस्तक में ही यथा स्थान उनका उल्लेख कर दिया गया है। वस्तुतः इस पुस्तक में जो कुछ भी अच्छा है, वह अन्य विद्वानों की चीज है, लेखक का काम संग्रह करना ही अधिक रहा है। सबके प्रति वह अपनी कृतज्ञता निवेदन करता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी

द्वितीय संस्करण की भूमिका


हिंदी साहित्य की भूमिका के पुनर्मद्रण तो अनेक बार हुए हैं, पर उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुए थे। इस बीच हिंदी में शोध कार्य की काफी प्रगति हुई है और मेरे विचारों में भी कुछ परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए भूमिका को एक बार फिर नए सिरे से देखने की आवश्यकता हुई। अप्रभंश के संबंध में नई जानकारियाँ जोड़ दी गई हैं और भक्ति साहित्य की चर्चा में भी कहीं-कहीं परिवर्तन किए गए हैं। प्रयत्न किया गया है कि यथासंभव नई जानकारियाँ आ जाएँ, परंतु पुस्तक का कलेवर भी बहुत न बढ़े। आशा है, पाठकों को इस सामान्य परिवर्तन परिवर्धन से संतोष होगा।

हजारी प्रसाद द्विवेदी

नए संस्करण की भूमिका


हिन्दी साहित्य की भूमिका पुस्तक रूप में प्रकाशित मेरी दूसरी रचना है। पहली सूर साहित्य नामक पुस्तक थी। हिंदी ग्रंथ रत्नाकार के अत्यंत उदारमना संस्थापक स्व. श्री नाथूराम प्रेमी ने भूमिका का प्रथम बार प्रकाशन किया था। हिंदी संसार ने एक नए लेखक की इस पुस्तक का दिल खोलकर स्वागत किया। प्रेमी जी के जीवन काल में ही इसकी कई आवृत्तियाँ निकलीं। हिंदी ग्रंथ रत्नाकार उन दिनों यह छापा करता था कि पुस्तक की कौन सी आवृत्ति छप रही है। बाद में यह प्रथा बंद कर दी गई। इसलिए यह पता नहीं चलता कि आखिरी मुद्रण कौन सी आवृत्ति है। फिर भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि पुस्तक की कई आवृत्तियाँ होती रहीं। इसलिए, पाठकों ने इसे अंगीकार किया, इस बात में कोई संदेह नहीं है। मैं इस अवसर पर सभी कृपालु और सहृदय पाठकों के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
 
प्रस्तुत पुस्तक का पुनर्मुद्रण सुप्रसिद्ध प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की ओर से हो रहा है। कुछ अशुद्धियों को सुधार देने के अतिरिक्त इसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया है। सहृदय पाठकों ने जिस रूप में इसे मान दिया है, उसी रूप में इसका प्रकाशन होना ही मुझे उचित जान पड़ता है। हिंदी साहित्य को एक विशाल परंपरा के अंग के रूप में देखने का प्रयास स्वीकार योग्य माना गया, इससे बढ़कर प्रसन्नता क्या हो सकती है !
इस बार भी राजकमल प्रकाशन की प्रबंध निदेशिका श्रीमती शीला संधू ने इसके नए सिरे से प्रकाशन में बहुत रुचि ली है। शीला बहन बहुत परिमार्जित और सुसंस्कृत रुचि से संपन्न हैं। उन्होंने इसके प्रकाशन में जो रुचि और उत्साह दिखाया है, उसके लिए उन्हें धन्यवाद देना मोटी औपचारिकता होगी। हिंदी में स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन में उनका योगदान बहुत प्रशंसनीय है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्यः
भारतीय चिंता का स्वाभाविक विकास
1


आज से लगभग हजार वर्ष पहले हिंदी साहित्य बनना शुरू हुआ था। इन हजार वर्षों में भारतवर्ष का हिंदी भाषी जन समुदाय क्या सोच-समझ रहा था, इस बात की जानकारी का एकमात्र साधन हिंदी साहित्य ही है। कम से कम भारतवर्ष के आधे हिस्से की सहस्रवर्ष-व्यापी आशा-आकांक्षाओं का मूर्तिमान् प्रतीक यह हिंदी साहित्य अपने आपमें एक ऐसी शक्तिशाली वस्तु है कि उसकी उपेक्षा भारतीय विचार धारा के समझने में घातक सिद्ध होगी। पर नाना कारणों से सचमुच ही यह उपेक्षा होती चली आई है। प्रधान कारण यह है कि इस साहित्य के जन्म के साथ-ही-साथ भारतीय इतिहास में एक अभूतपूर्व राजनीतिक और धार्मिक घटना हो गई। भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिम सीमांत से विजयदृत्त इस्लाम का प्रवेश हुआ, जो देखते-देखते इस महादेश के इस कोने से उस कोने तक फैल गया। इस्लाम जैसे सुसंगठित धार्मिक और सामाजिक मतवाद से इस देश का कभी पाला नहीं पड़ा था, इसीलिए नवागत समाज की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक गतिविधि इस देश के ऐतिहासिक का सारा ध्यान खींच लेती है। यह बात स्वाभाविक तो है, पर उचित नहीं है।

दुर्भाग्यवश हिंदी साहित्य के अध्ययन और लोक चक्षु गोचर करने का भार जिन विद्वानों ने अपने ऊपर लिया है, वे भी हिंदी साहित्य का संबंध हिंदू जाति के साथ ही अधिक बतलाते हैं और इस प्रकार अनजान आदमी को दो ढंग से सोचने का मौका देते हैं: एक यह कि हिंदी साहित्य एक हतदर्प पराजित जाति की संपत्ति है, इसलिए उसका महत्त्व उस जाति के राजनीतिक उत्थान-पतन के साथ अंगांगि भाव से संबद्ध है, और दूसरा यह कि ऐसा न भी हो, तो भी वह एक निरंतर पतनशील जाति की चिंताओं का मूर्त प्रतीक है, जो अपने आपमें कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता। मैं इन दोनों बातों का प्रतिवाद करता हूँ और अगर ये बातें मान भी ली जाएँ तो भी यह कहने का साहस करता हूँ कि फिर भी इस साहित्य का अध्ययन करना नितांत आवश्यक है, क्योंकि दस सौ वर्षों तक दस करोड़ कुचले हुए मनुष्यों की बात भी मानवता की प्रगति के अनुसंधान के लिए केवल अनुपेक्षणीय ही नहीं, बल्कि अवश्य ज्ञातव्य वस्तु है। ऐसा करते मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं रहा हूँ, लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।

अपनी बात को ठीक-ठीक समझाने के लिए मुझे और भी हजार वर्ष पीछे लौट जाना पड़ेगा। आज के हिंद समाज में आज से दो हजार वर्ष पहले से लेकर हजार वर्ष पहले तक के हजार वर्षों में ग्रंथ लिखे गए, उनकी प्रामाणिकता में बाद में चलकर कभी कोई संदेह नहीं किया गया और उन्हें ही यथार्थ में हिन्दू धर्म का मेरुदंड कह सकते हैं। मनु और ज्ञातवल्क्य की स्मृतियाँ सूर्यादि पाँचों सिद्धांत ग्रंथ, चरक और सुश्रुत की संहिताएँ न्यायादि छहों दर्शन सूत्र प्रसिद्ध महाभाष्य आदि कोई भी प्रामाणिक माना जानेवाला ग्रंथ क्यों न हो, उसकी रचना संकलन या रूप प्राप्ति सन् ईस्वी के दो ढाई सौ वर्ष इधर उधर की ही है। उसके बाद की चार पाँच शताब्दियों तक इन निर्दिष्ट आदर्श का बहुत प्रचार होता रहा और इसी प्रचार काल में संस्कृत साहित्य के अनमोल रत्नों का प्रादुर्भाव हुआ। अश्वघोष, कालिदास, भद्रबाहु, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, कुमारिल, शंकर, दिड्नाग, नागार्जुन आदि बड़े-बड़े आचार्यों ने इन शताब्दियों में उत्पन्न होकर भारतीय विचारधारा को अभिनव समृद्धि से समृद्ध किया। वेद अब भी आदर के साथ मान्य समझे जाते थे, पर साधारण जनता में उनकी महिमा नाम गोत्र में ही प्रतिष्ठित रही।

अगर आप भारतवर्ष के मानचित्र में उस अंश को देखें, जिसकी साहित्यिक भाषा हिंदी मानी जाती है तो आप देखेंगे कि यह विशाल क्षेत्र एक तरफ तो उत्तर में भारतीय सीमा को छुए हुए हैं, जहाँ से आगे बढ़ने पर एकदम भिन्न जाति की भाषा और संस्कृति से संबंध होता है और दूसरी तरफ पूर्व की ओर भी भारतवर्ष की पूर्व सीमाओं को बनाने वाले प्रदेशों से सटा हुआ है। पश्चिम और दक्षिण में भी वह एक ही संस्कृत पर भिन्न प्रकृति के प्रदेशों से सटा हुआ है। भारतवर्ष का ऐसा कोई भी प्रांत नहीं है, जो इस प्रकार चौमुखी प्रकृति और संस्कृति से घिरा हुआ हो। इस घिराव के कारण उसे निरंतर भिन्न- भिन्न संस्कृतियों और भिन्न-भिन्न विचारों के संघर्ष में आना पड़ा है। पर जो बात और भी ध्यानपूर्वक लक्ष्य करने की है वह यह है कि यह ‘मध्यदेश’ वैदिक युग से लेकर आज तक अतिशय रक्षणशीलता और पवित्र्याभिमानी रहा है। एक तरफ तो भिन्न विचारों और संस्कृतियों के निरंतर संघर्ष ने और दूसरी तरफ रक्षणशीलता और श्रेष्ठत्त्वाभिमान ने इसकी प्रकृति में इन दो बातों को बद्धमूल कर दिया है-एक अपने प्राचीन आचारों से चिपटे रहना पर विचार में निरंतर परिवर्तन होते रहना, और दूसरे धर्मों, मतों, संप्रदायों और संस्कृतियों के प्रति सहनशील होना। अब देखा जाए कि हिंदी साहित्य के जन्म होने के पहले कौन-कौन से आचार-विचार या अन्य उपादन इस प्रदेश के समाज को रूप दे रहे थे।

इस बात के निश्चित प्रमाण हैं कि सन् ईसवी की सातवीं शताब्दी में युक्तप्रांत, बिहार, बंगाल, आसाम, और नेपाल में बौद्ध धर्म काफी प्रबल था। यह उन दिनों की बात है, जब इस्लाम घर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का जन्म ही हुआ था। बौद्ध धर्म के प्रभावशाली होने का सबूत चीनी यात्री हुएंत्सांग के यात्रा-विवरण में मिलता है। यह भी निश्चित है कि वह बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित था, क्योंकि उत्तरी बौद्ध धर्म यदि हीनयानीय शाखा का भी था तो भी महायान शाखा के प्रभाव से अछूता नहीं था। सातवीं शताब्दी के बाद उस धर्म का क्या हुआ, इसका ठीक विवरण हमें नहीं मिलता, पर वह एकाएक गुम तो नहीं हुआ होगा। उस युग के दर्शनग्रंथों काव्यों, नाटकों आदि से स्पष्ट ही जान पड़ता है कि ईसा की पहली सहस्राब्दी में वह इन प्रांतों में एकदम लुप्त नहीं हो गया था। इधर हाल में जो सब प्रमाण संगृहीत किए जा सके हैं, उनसे इतना निःसंकोच कहा जा सकता है कि मुसलमानी आक्रमण के आरंभिक युगों में भारतवर्ष से इस धर्म की एकदम समाप्ति नहीं हो गई थी। हम आगे चलकर देखेंगे कि इन प्रदेशों के धर्ममत, विचारधारा और साहित्य पर इस धर्म ने जो प्रभाव छोड़ा है, वह अमिट है।

लेकिन जब मैं ऐसा कहता हूँ तो प्रभाव शब्द का जो अर्थ समझता हूँ उसको ध्यान में रखना चाहिए। मैं यही नहीं कहता कि हिंदी भाषी प्रदेश का जन समुदाय उन दिनों बौद्ध था। वस्तुतः सारा समाज किसी भी दिन बौद्ध था या नहीं, यह प्रश्न काफी विवादास्पद है। कारण यह है कि बौद्ध धर्म संन्यासियों का धर्म था, लोक के सामाजिक जीवन पर उसका प्रभुत्व कम ही था। जिस प्रकार आज के नागा संप्रदाय को देखकर कोई विदेशी यात्री कह सकता है कि भारतवर्ष में नागा संप्रदाय खूब प्रबल है, परंतु यह बात सच होते हुए भी इसकी सचाई के साथ सामाजिक जीवन का गहरा संबंध नहीं है। इसी प्रकार चीनी यात्री के यात्रा विवरण का भी विचार होना चाहिए।



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