कहि न जाय का कहिए - भगवतीचरण वर्मा Kahi na Jay ka Kahiye - Hindi book by - Bhagwati Charan Verma
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कहि न जाय का कहिए

भगवतीचरण वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3168
आईएसबीएन :81-267-0171-4

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इस पुस्तक में भगवतीचरण वर्मा के आत्मकथा का वर्णन हुआ है...

Kahi Na Jaye Ka Kahiye

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘‘मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा। यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जदा सकता। और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए महत्त्व नहीं है। लेकिन अपना नाम सैकड़ो-हजारों बर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस लापरवाही वाली अकड़ के बावजूद, मन के किसी कोने में जब तब उचक-उचक पड़ती है।
‘‘तो मैं भगवतीचरण वर्मा, पुत्र श्री देवीटरण जाति कायस्थ, रहनेवाला फिलहाल लखनऊ का, अपनी आत्मकथा कह रहा हूँ। कुछ हिचकिचाहट होती है, कुछ हँसी आती है-बेर-बेर एक पंक्ति गुनगुना लेता हूँ-‘कहि न जाय का चाहिए।’ तो यह आत्मकथा मैं दूसरों पर अपने को आरोपित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह दूसरों का मनोरंजन करने के लिए कह रहा हूँ।’’
लेकिन दुर्भाग्य से यह आत्मकथा पूरी न हो सकी। अगर पूरी हो गई होती तो निश्चित ही यह हिन्दी में एक महत्त्वपूर्ण आत्मकथा होती। ‘चित्रलेखा’, ‘भूले-बिसरे चित्र’, ‘रेखा’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाई’ जैसे उपन्यासों के रचनाकार भगवती बाबू ही कह सकते थे कि अपनी आत्मकथा वह दूसरों के मनोरंजन के लिए कह रहे हैं।
इस अधूरी आत्मकथा को किसी हद तक पूरा करने के लिए उनका तीन किश्तों में लिखा एक आत्मकथ्य ‘ददुआ हम पै बिपदा तीन’ भी इस पुस्तक में दिया जा रहा है। इसमें पाठकों को अपने प्रिय लेखक को समझने के लिए और व्यापक आधार मिलेगा।
हरेक व्यक्ति के जन्म से गुण मिलता है जिसके सहारे वह भवसागर में अपनी जीवनी-नैया को खे सके। तो मैं न तो बिरला-टाटा की कोटि का उग्योगपति बन सकता हूँ (वैसे करोड़पति बनने की अभिलाषा मुझमें सदैव रही है और सच बात तो यह है कि यह अभिलाषा मेरे अन्दर अब भी है।), न मैं नेपोलियन या सिकन्दर की भाँति विश्वविजेता बन सकता हूँ, जोकि मन में यह तेवर अब भी जब तब जाग उठते हैं। न मैं महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु की कोटि का राजनीतिक नेता बन सकता हूँ, जोकि मिनिस्टर बनने की बड़ी अभिलाषा रही है मन में। अपना एक निजी शानदार प्रेम खोलने की कोशिश कर चुका हूँ, पार्लियामेंट का सदस्य बनने के लिए बड़े-बड़े नेताओं के सामने अपनी नाक भी थोड़ी-बहुत रगड़ चुका हूँ, यह जानते हुए कि वह आदमी निहायत घटिया किस्म के हैं। लेकिन मुझे हमेशा यही अनुभव हुआ कि वह अपने बूते की बात नहीं है। केवल साहित्य के नाम पर मैं अपनी रोजी-रोटी कमा सकता हूँ। ईमानदारी की बात तो यह है कि इस बार दूसरों के सम्बन्ध में मनगढ़ंत कहानी कहने के स्थान पर मैं स्वयं अपनी सच्ची कहानी कहने बैठ गया हूँ।

1


वैज्ञानिकों का कहना है कि इस असीम और अनन्त ब्रह्मांड में अनगिनत सौरमंडल हैं—और मेरा तो कुछ ऐसा अनुभव रहा है कि वैज्ञानिकों की बात गलत नहीं होती। तो इन अनगिनत सौरमंडलों में हमारी पृथ्वी को धारण किए हुए हमारा भी एक सौर-मण्डल है। वैसे विज्ञान तो न जाने क्या-क्या कहता है। कुछ अपनी समझ में आता है लेकिन अधिकांश अपनी समझ से बाहर है। और समझ में आनेवाली जो बात है वह कुल इतनी कि हमारी पृथ्वी इस असीम और अनन्त ब्रह्मांड में एक निहायत छोटी-सी और नगण्य संज्ञा के रूप में समझी जानी चाहिए। और इस पृथ्वी में एक देश है जिसे इन दिनों भारत, इंडिया या हिन्दुस्तान के नाम से जाना जाता है। आज से पचीस-तीस वर्ष पहले यानी सन 1947 के पहले तक इस देश का नाम महज इंडिया था। वैसे देसी लोग इसे हिन्दुस्तान कहते थे और इस देश का आकार इसके वर्तमान आकार से कम-से-कम सवा गुना तो था ही।

यह भारत इन दिनों एक स्वतंत्र देश है, लेकिन सन 1947 के पहले यह देश अंग्रेजों की गुलामी में था। तो जब अंग्रेजों की गुलामी में यह देश था तब अपने शासन की सुविधा के लिए अंग्रेजों ने इस देश को अनेक छोटी-सी इकाइयों में विभाजित कर दिया था और इन इकाइयों को उसने सूबों का नाम दे दिया था। इन सूबों में एक का नाम था ‘यूनाइटेड प्रविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध’। नाम जरा लम्बा था इसलिए इसका एक छोटा-सा प्यारा नाम रख दिया था उन्होंने—यू. पी.।
वैसे प्राचीन काल में भूमि के इस खंड को लोग आर्यावर्त्त के नाम से जानते थे क्योंकि यही भूखण्ड गंगा-जमुना की हरी-भरी घाटी होने के नाते आर्य-सभ्यता का एक केन्द्र समझा जाता था। यहाँ ऋषियों के न जाने कितने आश्रम थे। कर्मकांड का जोर था। तीर्थों की भरमार थी। लेकिन वह सब तो अतीत की बातें हैं। तब मुसलमानों ने हिन्दूकुश पर्वतों को पार करके इस देश में प्रवेश किया तब यहाँ पर हिन्दू धर्म प्रचलित होने के कारण उन्होनें इस देश को हिन्दुस्तान का नाम दे दिया। बाद में तो समस्त देश का नाम ही हिन्दुस्तान पड़ गया क्योंकि समस्त देश में हिन्दू धर्म फैला हुआ था।

तो जब अंग्रेज का शासन हटा तब देश का नाम तो बदला ही, इन सूबों के नाम बदलने की बात भी उठी। ‘सूबा’ शब्द में साम्राज्यवाद की बू आती थी तो इस शब्द के स्थान पर प्रदेश शब्द चुना गया। और, इस सूबे का नया नामकरण हुआ।
इस प्रदेश के मुख्यमंत्री बने पंडित गोविंद वल्लभ पन्त। बड़े शानदार आदमी थे वे। बड़े कर्मठ, बड़े बुद्धिमान। भारी-भरकम शरीर। उससे भी अधिक भारी-भरकम बुद्धी और व्यक्तित्व, समस्त प्रदेश पर छाए हुए थे। ऐसा दिखता है कि यू.पी. नाम उन्हें बड़ा प्यारा था। लोगों का कहना है यू.पी. शब्द अंग्रेजी में अंडर पंत का घोतक भी माना जा सकता है। तो उन्होंने जुगत भिड़ाई कि इस प्रदेश का नाम यू.पी ही बना रहे। देश का मानचित्र देखा गया। यह प्रदेश देश के ठीक उत्तर में है। काम बन गया। यानी इस प्रदेश का नाम उत्तर प्रदेश रख दिया गया जो अंग्रेजी में यू.पी. ही है। इस पुराने संयुक्त प्रान्त और वर्तमान उत्तर प्रदेश में एक जिला है उन्नाव—प्रदेश के करीब-करीब बीचोंबीच गंगा के उत्तर में। इस जिले में एक कस्बा है शफीपुर जो एक तहसील भी है। तो उसी शफीपुर में तीस अगस्त उन्नीस सौ तीन के दिन अपराह्न तीन या चार बजे के बीच मेरा जन्म हुआ। मैं कह सकता हूँ कि मैंने जन्म लिया। लेकिन यह कहने में एक प्रश्न खड़ा हो जाएगा कि क्या मेरे जन्म में मेरा भी कोई हाथ था।

सन् 1903 का हिन्दुस्तान अंग्रेजों की गुलामी में बेतरह जकड़ा हुआ। सूबा संयुक्त प्रान्त—भयानक रूढ़ियों से ग्रस्त। जिला उन्नाव—इस सूबे का निहायत पिछड़ा हुआ क्षेत्र और कस्बा शफीपुर ? इस कस्बे के संबंध में मैं कुछ न कहूँगा। बात यह है कि अपनी याद में तो इस कस्बे के दर्शन किए नहीं और न आगे चलकर कोई सम्भावना है। लेकिन मेरी जन्मभूमि होने के नाते यह कस्बा मेरे लिए वन्दनीय समझा जाना चाहिए। और असल बात यह है कि मैं जो कुछ भी हूँ, बुद्धि में, ज्ञान में, भावना में, तर्क में, तो उसे देखते हुए मैंने जन्म लेने के लिए अपनी इच्छा से तो यह स्थान चुना न होगा। मुझे जबर्दस्ती यहाँ भेजा गया होगा। लेकिन मुझे किसने भेजा, क्यों भेजा, किसलिए भेजा—इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं।
जन्म स्थान की ही बात क्यों ? जिस धर्म के अन्तर्गत मेरा उदय हुआ, जिस समाज को मैंने कलंकित किया, जिस जाति का मैंने मस्तक ऊँचा किया, जिस कुल और परिवार को मैंने गौरवान्वित किया, जिन माता-पिता को मैंने पुलकित किया, उन सबसे मेरा कोई पुराना रिश्ता रहा होगा, इस बात का भी कोई भरोसा नहीं। ऐसी हालत में मुझे इस निर्णय पर पहुँचना पड़ता है कि मैंने अपनी इच्छा से तो जन्म नहीं लिया। बल्कि मुझे जबर्दस्ती जन्म मिला इस दुनिया की तमाम मुसीबतें उठाने के लिए।

अब प्रश्न यह उठता है कि अगर मुझे जन्म मिला है तो किससे मिला है ?
अपने देश का सबसे अधिक लोकप्रिय दर्शन है वेदान्त। लोगों की नस-नस में यह वेदान्त का दर्शन भरा पड़ा है। और वेदान्त का दर्शन कहता है—अहम् ब्रह्मास्मि ! यानी मैं ब्रह्म हूँ। यही नहीं, यह दर्शन तो यहाँ तक कह डालता है—‘एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति’। यानी कि एकमात्र ब्रह्म ही सब जगह है और कुछ भी नहीं है। तब इस दर्शन के दो सूत्रों को मिलाकर तत्व निकलता है—मैं ब्रह्म हूँ और मेरे अलावा किसी दूसरे के होने का सवाल ही नहीं उठता।

यह वेदान्त का दर्शन बड़ा प्यारा है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ कह देने से सारा झगड़ा खत्म। किसी तरह का भय नहीं। न कोई दुविधा। न कोई आशंका। करो मेरे भाई खुलकर तुम जो कुछ करना चाहते हो। तुम्हीं ब्रह्म हो, ब्रह्म कभी गलत काम नहीं करता।
तो मैंने वेदान्त के इस दर्शन को अपने जीवन में उतारने की बड़ी कोशिश की है। लेकिन जिन्दगी के हरेक कदम पर जो मैं पिटा हूँ, हरेक बाजी में मैंने जो मात खाई है, उससे मुझे इस दर्शन के एक नवीन सूत्र को खोज निकालने के लिए विवश होना पड़ा, अपने अनुभवों के आधार पर। यह नवीन सूत्र है नियतिवाद का। लेकिन अपने इस नियतिवाद के दर्शन की व्याख्या करने का यह अवसर नहीं। जिसे मेरे नियतिवाद को समझना है वह मेरा पूरा साहित्य पढ़े।

इसीलिए मैं निवेदन कर रहा हूँ कि भारत वर्ष के उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर नाम के कस्बे में 30 अगस्त सन 1903 में मुझे जन्म मिला।
वह रविवार का दिन था। समय अपराह्न तीन-चार बजे के बीच का रहा होगा। बात यह है कि उन दिनों घड़ियों का चलन नहीं के बराबर था और शफीपुर के ऐसे पिछड़े हुए कस्बे में दो–चार दीवार की घड़ियाँ रही हों, तो हों। कभी अपना अलग-अलग समय बताया करती होंगी। इसलिए अपने पैदा होने का समय मैं अन्दाजे से ही बता रहा हूँ।

मेरे पिता श्री देवीचरण वकील थे। वह कानपुर नगर के रहने वाले थे और उनका एक अच्छा-खासा पक्का मकान था कानपुर में। कानपुर जिले में उनकी कुछ जमींदारी भी थी। वकालत भी उन्होंने कानपुर में ही आरम्भ की थी। लेकिन उनके बच्चे जिन्दा नहीं रहते थे। मुझसे पहले उनकी दो सन्तानें हुई थीं और काल-कवलित हो चुकी थीं। किसी साधु या फकीर ने उनसे कहा था कि कानपुर नगर के बाहर उनकी जो सन्ताने होंगी उसके जीवित बचे रहने का योग होगा। तो मैं जीवित रह सकूँ इसलिए मेरे जन्म के तीन-चार महीने पहले वह शफीपुर चले गए थे वकालत करने। पता नहीं उन्होंने शफीपुर ही क्यों चुना—लेकिन शफीपुर तहसील थी, अदालत भी थी। और मुकदमेबाजी भी अच्छी-खासी होती थी। वकील वहाँ इने-गिने थे।

वह सन 1903 का शफीपुर ! शायद दस-पाँच पक्के मकान रहे हों वहाँ पर। वह भी दो-चार इमारतें सरकार की, सरकारी दफ्तरों के लिए। और चार-छः पक्के मकान वहाँ के जमींदारों और महाजनों के। मेरे पिता ने अपने रहने के लिए जो किराए का मकान लिया था वह कच्चा था। उसमें साँप-बिच्छू आए दिन निकला करते थे। मेरी माता का कहना था—भगवान उनकी आत्मा को शांति दें—करीब छः-सात वर्ष पहले पिच्चानवे वर्ष की अवस्था में वह इस दुनिया से मुक्ति पा गईं—कि जब मैं दो महीने का था तो वह मुझे कोठरी के फर्श पर लिटाकर रसोईघर चली गईं। खाना-वाना बनाकर जब वह वापस लौटीं, तब उन्होंने देखा कि मैं सो रहा था और एक नागराज मेरे ऊपर अपना फन फैलाए बैठे थे। मेरी माता के आते ही जैसे मुझे उनके संरक्षण में छोड़कर वहाँ से चुपचाप खिसक गए।

मैं अपनी माता को किसी हालत में गलत नहीं कह सकता। लेकिन मैं इतना अवश्य मानता हूँ कि उनमें कल्पना की प्रचुरता थी और अतिशयोक्ति में वह सिद्धहस्त थीं। मेरी पैतृक परंपरा में किस्सागोई का गुण मुझे आज तक ढूँढ़े नहीं मिला। हाँ, अपनी माता के परिवार में किस्सागोई की कला और कल्पना के दर्शन प्रचुर रूप से मुझे हुए हैं। मेरे मामा एक-से-एक सनकी, लतीफेबाज, लम्बी उड़ानें भरनेवाले थे। तो मुझे तो लगता है कि कला मुझे मिली है अपनी माता की कुल-परम्परा से—वैसे मुझे अपनी पैतृक परम्परा का पूरा-पूरा ज्ञान भी तो नहीं है।

ऐसी हालत में मैं यही कह सकता हूँ कि कोई साँप रेंगता हुआ मेरे पास से निकल गया होगा और माताराम ने इस घटना पर अपना रंग चढ़ा दिया होगा। इस घटना का वर्णन करने में मेरा उद्देश्य केवल यह बतलाना था कि एक अच्छे-खासे नगर में एक शानदार पक्के मकान में रहनेवाले मेरे पिता सिर्फ शफीपुर में रहे कि एक निहायत पिछड़े हुए इलाके के एक कच्चे मकान में मेरा जन्म हो।

लेकिन इसमें मुझे अपने पिता से कोई शिकायत नहीं है। एक तरह का संतोष ही है कि सामन्तवादी परम्परा से जबर्दस्ती अलग हटकर सर्वहारा की परम्परा में मुझे जन्म मिला। मेरे जन्म के छः महीने बाद—यानी मेरा जन्म करा के मेरे पिता मुझे और मेरी माता को साथ लेकर कानपुर वापस आ गए। भला कानपुर में सुख-सुविधापूर्वक रहनेवाला आदमी शफीपुर के एक कच्चे घर में कैसे रहता ! तो मुझे तो ऐसा लगता है कि सिर्फ मेरे जन्म के लिए मेरे पिता शफीपुर गए थे ताकि शफीपुर मेरा जन्म-स्थान कहला सके।

परम्परा के अनुसार मेरी जन्मपत्री भी बनी थी। मेरी दिवंगत माता ने मुझे बताया था कि उस जन्मपत्री में पिता की मृत्यु का योग था। यानी ज्येष्ठ नक्षत्र के प्रथम चरण में मेरा जन्म हुआ था। कहा जाता है कि महाकवि तुलसीदास की जन्मपत्री में भी यही योग था जिसके कारण उनके पिता ने उनका मुख तक नहीं देखा और उन्हें घर के बाहर छुड़वा दिया। घर से निकाले जाने के कारण बेचारे महाकवि को अपने बाल्यकाल में अनगिनत दुख उठाने पड़े। लेकिन मेरे पिता निहायत शरीफ आदमी थे। उन्होंने मेरे साथ इस तरह की कोई हरकत नहीं की और अपनी जान पर खेल गए क्योंकि जब मैं पाँच वर्ष का भी पूरा नहीं हुआ था, वह अचानक प्लेग के शिकार हुए और दुनिया से सिधार गए। पता नहीं महाकवि तुलसीदास के पिता महाकवि को घर से निकालकर स्वयं जीवित बचे रहे या नहीं, इतिहास में तो उनके नाम का जिक्र है नहीं। लेकिन मेरा ऐसा खयाल है कि वह जीवित नहीं बचे होंगे—यह नक्षत्र दोष बड़ा जबर्दस्त होता है—ज्योतिषियों का ही कुछ ऐसा कहना है। इन ऊट-पटाँग बातों पर मेरा तनिक भी विश्वास नहीं। ये मैं निवेदन किये देता हूँ, ये बातें लिख इसलिए रहा हूँ कि इन्हें लिखने में मुझे मजा आ रहा है।

तो तुलसीदास के पिता ने जो तुलसीदास को त्याग दिया तो तुलसीदास संत बन गए और मुझे जो मेरे पिता ने नहीं त्यागा तो मैं जिन्दगी भर इस संत परम्परा से कोसों दूर रहा हूँ। एक तरह से मुझे नास्तिकता की सीमा तक पहुँचने वाला अविश्वासी कहा जा सकता है। वैसे अपने बचपन में मैं बड़ा भक्त था। रामायण का मैं सस्वर पाठ करता था, हनुमानचालीसा और संकट मोचन मुझे कंठस्थ थे। लेकिन धीरे-धीरे सब-कुछ छूटता गया। रही नक्षत्रों की बात, तो मैं इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मेरे ग्रह-नक्षत्र तुलसीदास के ग्रह-नक्षत्रों से कमजोर किसी हालत में नहीं रहे होंगे। बेचारे महाकवि के न आल-औलाद, न परिवार—मुझे तो सब-कुछ प्राप्त हुआ है। रही चार सौ वर्षों तक महान साहित्यकार ही नहीं देवता बनकर पूजने की बात, तो वहाँ मुझे उनसे तनिक भी ईर्ष्या नहीं है। मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा। यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए तनिक भी महत्त्व का नहीं है। लेकिन अपना नाम सैकड़ों-हजारों वर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस लापरवाहीवाली अकड़ के बावजूद, मन के किसी कोने में जब तक उचक-उचक पड़ती है।

तो मैं भगवतीचरण वर्मा, पुत्र श्रीदेवीचरण, जाति कायस्थ, रहनेवाला फिलहाल लखनऊ का अपनी आत्मकथा कह रहा हूँ। कुछ हिचकिचाहट होती है, कुछ हँसी आती है—बेर-बेर एक पंक्ति गुनगुना लेता हूँ—‘कहि न जाय का कहिए !’ तो यह आत्मकथा मैं दूसरों पर अपने को आरोपित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह दूसरों का मनोरंजन करने के लिए कह रहा हूँ। बात यह है कि मुझे कहानी कहने की कला मिली है। यह कहानी कहने की कला मुझे उसी से मिली है जिसने मुझे जन्म दिया है। हरेक व्यक्ति को जन्म से ही कुछ गुण मिलता है जिसके सहारे वह भवसागर में अपनी जीवन-नैया को खे सकें। तो मैं न तो बिरला-टाटा की कोटि का उद्योगपति बन सकता हूं, (वैसे करोड़पति बनने की अभिलाषा मुझमें सदैव रही है और सच बात तो यह है कि यह अभिलाषा मेरे अन्दर अब भी है) न मैं नेपोलियन या सिकन्दर की भाँति विश्वविजेता बन सकता हूँ, जोकि मन में यह तेवर अब भी जब-तब जाग उठते हैं। न मैं महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू की कोटि का राजनीतिज्ञ नेता बन सकता हूँ। जोकि मिनिस्टर बनने की बड़ी अभिलाषा रही है मन में। अपना एक निजी शानदार प्रेस खोलने की कोशिश कर चुका हूं, पार्लियामेंट का सदस्य बनने के लिए बड़े-बड़े नेताओं के सामने अपनी नाक भी थोड़ी-बहुत रगड़ चुका हूँ, यह जानते हुए कि वे आदमी निहायत घटिया किस्म के हैं। लेकिन मुझे हमेशा यही अनुभव हुआ कि वह अपने बूते की बात नहीं है। केवल साहित्य के नाम पर मैं अपनी रोजी-रोटी कमा सकता हूँ। ईमानदारी की बात तो यह है कि इस बार दूसरों के सम्बन्ध में मनगढंत कहानी कहने के स्थान पर मैं स्वयं अपनी सच्ची कहानी कहने बैठ गया हूँ।

वैसे अपनी कहना बड़ा मुश्किल काम है क्योंकि अपनी कहानी कहते समय सत्य को दबाने की और झूठ को उभारने की प्रवृत्ति मनुष्य में अक्सर आ जाया करती है। तुम जो नहीं हो वह अपने को दिखाने की कोशिश करने लगते हो, तुम जो हो उस पर परदा डाल देते हो। हरेक को अपने से बेहद प्यार होता है न !

मैं जानता हूँ कि मैं सन्त नहीं हूँ, मनीषी नहीं हूँ। लिहाजा मैं मानवीय कमजोरियों से ऊपर भी नहीं हूँ। यह जितने किस्से-कहानी मैंने लिखे हैं उनमें कुशलतापूर्वक झूठ बोलने की कला ही तो है। अब हुआ यह कि इन किस्से-कहानियों में झूठ बोलते-बोलते मैं झूठ से इतना ऊब गया हूँ कि अपनी जिन्दगी में झूठ बोलने में मुझे बेहद संकोच होने लगा है। फिर नियति को कोटि-कोटि धन्यवाद कि जिन्दा रहने के लिए, यानी अपनी आजीविका के लिए छल-प्रपंच और कपट की मुझे आवश्यकता ही नहीं पड़ी; दूसरों से दबने और उनके आगे झुकने के बिना ही मेरा काम चलता रहा।

मुझे ऐसा लगता है कि मैं कुछ कहता रहा हूँ। अपनी कहानी कहते समय मनुष्य में बहकने की स्वाभाविक प्रवृत्ति आ जाया करती है। तो अब अपनी बहक रोककर मुझे केवल इतना निवेदन करना है कि इस बार मैं एक सच्ची कहानी से लोगों का मनोरंजन करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। अपनी आजीविका के लिए, स्पष्ट रूप से पुस्तक द्वारा अपनी रॉयल्टी वसूल करने के लिए पाठकों का मनोरंजन करना, मैं इसे न अनैतिक समझता हूँ और न हेय समझता हूँ।

तो मैं भगवतीचरण वर्मा एलान कर रहा हूँ कि मैं साहित्य के क्षेत्र में एक अति कठिन प्रयोग कर रहा हूँ। सत्य बड़ा कुरुप होता है, लेकिन कला सौन्दर्य की प्रतीक होती है। कुरूप सत्य को सुन्दरता का जामा पहनाकर अपने पाठकों का मनोरंजन कर सकना—निश्चय ही यह बड़े जीवट का काम है।

अनायास ही जीवट की बात उठ खड़ी हुई है तो मुझे अपने ऊपर हँसी आ जाती है। मेरे अन्दर साहस का अभाव तो नहीं है, लेकिन मेरे अन्दर वाला साहस हमेशा से कुछ दबा-दबा-सा रहा है। और अपने क्रोध को खून के घूँट की तरह पी जाने की मुझे आदत-सी पड़ गई है। मार-पीट, धर-पकड़ और गाली-गलौज इनसे मैं हमेशा कतराता रहता हूँ। इसका एक कारण मेरा जिस्म भी रहा होगा। मेरी ऊँचाई कोई पाँच फिट साढ़े तीन इंच, वैसे उम्र के साथ शरीर कुछ भर-सा गया है। लेकिन बचपन में मैं निहायत दुबला-पतला, मरियल-सा था। इस सबके बावजूद बुद्धि से भरपूर। ऊँचा-नीचा देखने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति। इस धर-पकड़ और मार-पीट में अपना ही अहित होगा और गाली-गलौज मेरे संस्कार नहीं है, तो इनसे जहाँ तक हो सके कतरा जाने की आदत पड़ गई है। वैसे लोग मुझे नितान्त कायर भी नहीं कह सकते, मुझे निकट से जानने वाले लोगों को और स्वयं मुझको भी कभी-कभी मेरी ऊट-पटाँग हरकतों पर बेतहाशा आश्चर्य होने लगता है।

यह जीवट और हिम्मत, मेरी पारिवारिक परम्परा में इनके दर्शन उस काल से हो जाते हैं जिस काल का मुझे थोड़ा-बहुत पता चल पाया है। मैं समझता हूँ कि मेरे पूर्वजों को अपनी पारम्परिक परम्परा पर कोई गर्व नहीं रहा होगा क्योंकि मेरे परिवार में वंश-वृक्ष रखने की कोई प्रथा ही नहीं थी। वंश-वृक्ष तो वह लोग रखते हैं जो जमे हुए, आस्थावान और संयमी प्राणी होते हैं, या फिर जो सामन्तवादी परम्परा के लोग होते हैं, लेकिन मेरे पूर्वज ऐसा लगता है निहायत उखड़े हुए लोग रहे होंगे। सामन्तवादी परम्परा से कोसों दूर। अपने परबाबा का तो थोड़ा-सा ज्ञान है मुझे। भगवान जाने वह ज्ञान सोलहों आना ठीक भी है क्योंकि वह ज्ञान मुझे अपने पिता की बुआ से मिला जो हमारे साथ ही रहती थीं और जिनकी मृत्यु सन 1923-24 में, दिन और महीना मुझे ठीक तौर से याद नहीं, प्रायः पिच्चासी वर्ष की अवस्था में हुई थी, और जिनका अन्त्येष्टि संस्कार मुझको ही करना पड़ा था। उनके पति सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहेब के साथ लापता हो गए थे। अपनी पत्नी को मेरे बाबा के घर में छोड़कर, और फिर कभी वह वापस नहीं लौटे। उन्हें मैं बड़ी बुआ कहता था। मेरी बड़ी बुआ अपने जीवन भर सधवा रहीं। काँच की चूड़ियाँ पहनती थीं। बेतहाशा लड़ती-झगड़ती थीं। उस बड़ी बुआ ने अपने भाई की मृत्यु देखी, अपने भतीजों की मृत्यु देखी। दुनिया में जितने दुःख थे उन्हें भोगकर वह इस दुनिया से गईं।
मेरे परबाबा के कितने भाई-बहन थे, उन्होंने इस पर कभी प्रकाश नहीं डाला। परबाबा के सगे-सम्बन्धियों के विषय में वह मौन रहीं। हाँ मेरे परबाबा के एक भाई थे जिनका जिक्र वह जरूर करती थीं। मेरे परबाबा का नाम राजा रामसिंह था। राजा रामसिंह के पुत्र थे—मेरे बाबा, और पुत्री थीं, मेरी बड़ी बुआ।

उन्नाव जिले में एक कस्बा है बांगरमऊ और बांगरमऊ से कुछ दूर एक गाँव है राजेपुर। तो उसी राजेपुर गाँव के रहनेवाले थे मेरे परबाबा। जाति के कायस्थ, लेकिन नाम के आगे सिंह लगाने की पारिवारिक परम्परा। सिर्फ इतना ही मालूम हो सका है मुझे। मेरे परबाबा के पूर्वज जमींदार थे। मुदर्रिस थे। कानूनगो थे, पटवारी थे—कायस्थों में प्रायः यही पेशे होते थे—इसका पता भी मुझे नहीं लग सका। लेकिन चूँकि नाम के आगे सिंह लगाने की परम्परा थी इसलिए मैं समझता हूँ कि उन लोगों में अपने को ठाकुर समझने की प्रवृत्ति अवश्य रही होगी।

यह सब बातें सन 1830 के पहले की हैं जब अवध अंग्रेजों की गुलामी में नहीं था और वहाँ अवध के नवाबों का शाशन था। अंग्रेजों की राजधानी तो उन दिनों आगरा में थी जहाँ बैठकर वे मुगल सल्तनत के स्थान पर हिन्दुस्तान पर ब्रिटिश सल्तनत स्थापित करने का सपना साकार करने के प्रयत्न में थे। मेरे परबाबा के छोटे भाई थे धौकलसिंह और मेरा अनुमान है कि यह धौकलसिंह किस कदर मन-चले और उखड़े हुए किस्म के आदमी थे। मेरी बड़ी बुआ ने उनके अस्तित्व के सम्बन्ध में तो मुझे कुछ बताया नहीं। लेकिन मेरा अनुमान यह है कि उनका अस्तित्व कुछ लगड़ा रहा होगा। हट्टे-कट्टे नौजवान पढ़े-लिखे बुद्धिमान। उनका विवाह हुआ नहीं था, तो वह एक ठकुराइन के फेर में पड़ गए और उस ठकुराइन को लेकर राजेपुर से भाग खड़े हुए। नवाबों की अमलदारी से निकलकर वह सीधे आगरा पहुँचे, अंग्रेजों की राजधानी में।




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