यह अन्दर की बात है - हुल्लड़ मुरादाबादी Yah Andar ki Baat Hai - Hindi book by - Hullad Muradabadi
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यह अन्दर की बात है

हुल्लड़ मुरादाबादी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 319
आईएसबीएन :00-000-00

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हास्य व्यंग्य कविताओं का संकलन।

Yeh Andar ki Baat Hai - A hindi Book by - Hullad Muradabadi यह अन्दर की बात है - हुल्लड़ मुरादाबादी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

एक कवि सम्मेलन में जब हमने
गम्भीर गीत गुनगुनाया
तो मंच पर बैठी हुई
एक खूबसूरत कवियत्री का स्वर आया
बहुत हो चुका
अब अपनी औकात पर आ जाइये
कोई हास्य रस की कविता सुनाइये
हमने कहा कैसे सुनाये
हँसी जब अपनी जिन्दगी में नहीं है
तो उसे अपनी कविता में कहां से लायें?
आप बुरा ना मानें तो एक सलाह है हमारी
आप सत्य की तलाश छोड़ दें
वरना भटक जायेंगे
एक दिन ईसा की तरह
आप भी सूली पर लटक जायेंगे।

 

यशस्वी उपन्यासकार, महाकवि एवं सिद्ध संपादक श्रद्धेय डॉ. धर्मवीर भारती की पुण्यतिथि को समर्पित उनके जन्म-दिवस पच्चीस दिसम्बर पर

 

-हुल्लड़ मुरादाबादी

 

भूमिका

 

 

कवि अपनी हास्य-व्यंग्य कविताओं का संकलन प्रस्तुत करते हुए असीम प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। पिछले कुछ वर्षों में संत्रास, घुटन तथा कुंठा जनजीवन की उपलब्धियाँ हो गई हैं। बेरोजगारी के गम से घुटता हुआ तथा महँगाई की मार से सिसकता हुआ यह मानव समाज एकाएक गूँगा हो गया है। जीवन को जीने की स्वतंत्र अभिव्यक्ति जाने कहाँ खो गई है। स्वस्थ उल्लास आत्मा के किसी कोने में मुँह छिपाए पड़ा है। हमारे मन का विनोद परतों में दब गया है। हास्य कवि इन पीड़ा के पाँवों को सहलाता रहा है। उसका कार्य मुख्यत: यह रहा है कि ग़म की इस राख के नीचे दबी हुई हँसी फुलझड़ियों को बाहर लाकर इस प्रकार बिखेरे कि वह लोगों के होठों पर मंद मुस्कान बनकर वातावरण में एक नया उल्लासमय संगीत भर दे, वैसे यह ग़म गलत करने का कोई सस्ता नुस्खा भी नहीं है। बस, केवल आपके चिंताजन्य नैराश्य के क्षणों को आनन्ददायक गुदगुदी की ओर प्रेरित करना ही उसका उद्देश्य है। ठहाके की कीमत तो उनसे पूछिए जो आहों का कारोबार करते हैं। सभा-गोष्ठियों और यहाँ तक कि करीबी दोस्तों के बीच में भी कृत्रिम गंभीरता का लबादा ओढ़कर बैठे रहते हैं। इनका चेहरा मरघट की मनहूसियत का चलता-फिरता विज्ञापन हो गया है। जो कुछ कवि भोगता है उसे शब्द देना आसान है पर नैराश्य अंधकार में घिरे हुए मानव को चंद मिनट भी गुदगुदाना हमारे वश की बात नहीं। शिष्ट हास्य को जन्म देना तलवार की धार पर चलना है। जब आज के जीवन में हँसना मुश्किल है तो किसी को हँसी के लिए विवश कर देना तो और भी मुश्किल है। इसीलिए मैं शिष्ट हास्य की परंपरा को स्थापित करने के योगदान को एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानता हूँ। मज़ाक करना मज़ाक नहीं है। अत: विषय कोई भी हो पर रचना अश्लील न हो पाए। अश्लील रचना फूहड़ हास्य को जन्म देती है। वह हँसाने का प्रयत्न नहीं हास्यास्पद स्थिति है। श्लील और अश्लील की लंबी- चौड़ी परिभाषा में न जाकर केवल एक बात कहना चाहूँगा और वह यह कि जिस रचना को कवि अपने परिवार में निस्संकोच सुना सके वह अश्लील नहीं हो सकती। परिवार से मेरा तात्पर्य भारतीय संस्कृति के उन आदर्शवाद मान्यता वाले उस सामाजिक वर्ग से है जो युगों-युगों से प्रचलित हमारी परंपराओं पर खरा उतरता हो। नौटंकी करना, भड़ैती के स्तर पर उतर आना हास्य कवि की नहीं सर्कस के जोकर की स्थिति है। हालाँकि किसी वर्ग विशेष के लिए वह भी मनोरंजन का साधन हो सकती है। पर कवि कहलाने वाले प्राणी तालियों की गड़गड़ाहट का मोह छोड़कर एक स्वस्थ परंपरा का निर्माण करना चाहिए। इसमें दो राय नहीं हो सकती।
आधुनिक सिनेमा समाज के कुछ इसी प्रकार के भड़ैती परंपरा को आगे बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। सस्ते फिल्मी फैशन से प्रभावित हमारे यह नौजवान नायक और नायिकाओं का बिना पारिश्रमिक प्रचार कर रहे हैं। इन सब बातों का प्रभाव कवि सम्मेलन कहे जाने वाले आयोजनों पर भी पड़ा है क्योंकि फिल्म ही आजकल एकमात्र सर्व साधारण के लिए सुलभ एवं सस्ता मनोरंजन है। जब वह मनोरंजन निम्न स्तर के घटिया प्रदर्शन पर उतर आए और पैसा बटोरने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ले तो संस्कृति और संस्कार का तो ईश्वर ही मालिक है।
पहले जिन स्थानों पर नौटंकी, कव्वाली, नाटक तथा कुश्ती आदि मनोरंजन के कार्यक्रम होते थे उनका स्थान अब कवि सम्मेलन और मुशायरों ने ले लिया है। परिष्कृत रुचि के लोग उनमें जाना पसंद नहीं करते और जो जाते हैं उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है। ऐसी स्थिति में पलायनवाद की नीति अपनाने और केवल आलोचना से ही समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। कुछ अधिकारी काव्यकारों को इस समस्या पर निष्पक्ष रूप से सोचना-समझना चाहिए।
इस संकलन में कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जिसमें कहीं-कहीं कुछ प्रचलित तथा अप्रचलित चुटकुलों का प्रयोग बहुत समझदारी के साथ किया गया है। वास्तव में चुटकुले को मैं अनाथ बच्चे की तरह मानता हूँ। उसे पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर, नए वस्त्र पहनाकर, काम-धंधे से लगाकर मैंने समाज में इज्जत से जीने योग्य बना दिया है। उन्हें ढूँढा है इसलिए पाया है, सजाया है और आप तक पहुँचाया है। इन्हें ठुकराइए नहीं गले से लगाइए। अब कुछ व्यंग्य रचनाओं के बारे में भी निवेदन कर दूँ। वास्तव में वैषम्य की वेदना को केवल हँसकर नहीं टाला जा सकता। हास्य टॉनिक का कार्य करता है और व्यंग्य इंजैक्शन का।
इन रचनाओं में कवि ने सामाजिक युग बोध को शब्द देते हुए व्यक्ति द्वारा भोगी हुई पीड़ा के मार्मिक चित्रण का प्रयास किया है।
मंगल की कामना से प्रेरित और उसकी (युग) जन्य दु:स्थिति से पोषित यह व्यंग्य जन समाज विशेषत: भारतीय समाज को भीतर ही भीतर कचोटेगा ऐसी मैं आशा करता हूँ। कवि ने स्वयं इन असमानताओं को झेला है। गेहूँ और रसोई गैस की राशन की लाइनों में खड़े होकर यह महसूस किया है कि हमारे कर्णधार जनता के प्रति वर्ग वैषम्य को दूर करके उन्हें अनुशासनबद्ध की ओर प्रेरित कर रहे हैं। जीवन में भोगा हुआ कटु यथार्थ, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचारी नाले में बहता हुआ मेरे देश का भविष्य, वर्गगत विसंगतियाँ, विशाल अट्टालिकाओं की गरीबी पर बर्बर अट्टास, दिन-ब-दिन सुरसा के मुँह के समान बढ़ती हुई महँगाई, सूरज निकलते ही हमारे सामने खड़ा हुआ मजबूरियों का अँधेरा यह सब हमें व्यंग्य लेखन की ओर प्रेरित करता है। यही विसंगतियाँ व्यंग्य कविताओं के रूप में प्रस्फुटित हुई हैं। इतिहास से हमें पता चलता है कि इस तथा कथित शस्शयामला धरती पर दूध की नदियाँ बहती थीं, बहती होंगी।
अब से कुछ वर्षों बाद घी, दूध, मिट्टी का तेल, रसोई गैस, डीजल तथा सीमेंट केवल पुरातत्त्व विभाग में ही देखने को मिल सकेंगे।
कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। राम जाने कब दोहराएगा।
कौन जीता तेरी जुल्फ के सर होने तक। अंत में एक बात और। एन्साइक्लोपीडिया बिट्रेनिका के अनुसार हास्य के अभाव में व्यंग्य गाली का रूप धारण कर लेता है। मेरा इस संबंध में यह विचार है कि हास्य मिश्रित व्यंग्य एक ओर तो भ्रष्ट राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक मुखौटों का पर्दाफाश करता है तथा दूसरी ओर उपदेशात्मक प्रभाव को कम करने के लिए हँसी-हँसी में बहुत बड़ी बात कह जाता है। बहुत से आलोचकों ने जनता के रिसते हुए घावों के उपचार के लिए काव्यात्मक अनुभूतियों में व्यंग्य को ही एकमात्र अस्त्र माना है। जबकि सोद्देश्य हास्ययुक्त व्यंग्य रचना तो मरहम का कार्य करती है। उपचारकों को चाहिए कि पहले मरीज को हास्य की मीठी गोली खिलाकर उसके बाद व्यंग्य का नश्तर चलाकर सामाजिक चेतना की नब़्ज को पकड़ने की कोशिश करें। वह व्यंग्य जिसमें हास्य नदारद हो कुछ इने-गिने तथा कथित बौद्धिक कहलाने वाले चंद लोगों के पल्ले भले ही पड़ जाए पर स्वतंत्र रूप से सोचने वाले सामान्य जनता के गले नहीं उतरता। बौद्धिक व्यंग्यकारों के आक्रोश भरे ज़हर बुझे कटाक्ष करते हुए यह व्यंग्य बाण उसी मन: स्थिति वाले उसी स्तर की ऊँचाई पर सोचने वाले पर तो प्रभाव डाल सकते हैं आम आदमी पर नहीं। हमारा कवि वर्ग बात तो मध्यम वर्गीय समाज की करता है लेकिन वह सामान्य लोगों में बोलीजाने वाली भाषा वहाँ के लोकजीवन में रमी हुई मुहावरेदार उक्तियों की काफी हद तक अवहेलना कर जाता है। वह कबीर की नहीं केशव की भाषा में बात करता है। मंच या गोष्ठियों में तथा पत्र-पत्रिकाओं में अपने शब्द ज्ञान पांडित्य का खोखला प्रदर्शन करता है। वह ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय की भावना को नजर अंदाज कर देता है। उन शब्दकोशी शब्दों में शरीर तो है आत्मा नहीं है। वह प्रेरणा नहीं है जो सामान्य जनमानस के हृदय में पैठकर उसे नई दृष्टि दे सके। आज हमने साहित्य को केवल चंद लोगों की बपौती बनाकर रख दिया है। विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े नामधारी प्रोफेसर, कुछ पत्र-पत्रिकाओं के आधुनिक महंत, साहित्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ये लोग कविता रूपी संयत तथा शालीन कुलवधू को अपने इशारों पर नचा रहे हैं। माँ सरस्वती की वीणा के तारों पर पश्चिमी साहित्य के संगीत की स्वर लहरी गुंजाने में लगे हुए हैं। ऐसा लगता है इस तथाकथित साहित्य के पाठक भी यही हैं, रचयिता भी यही।
कुछ तथाकथित साहित्यकार अपने वातानुकूलित बंगलों में बैठकर झोंपड़ी की गर्मी का चित्रण उस भाषा में कर रहे हैं, जिसको ये या तो स्वयं समझ सकते हैं या अल्लामियाँ। साहित्य अकादमियों, भारतीय ज्ञानपीठ तथा इसी प्रकार के अन्य पुरस्कारों को प्राप्त करने के लिए क्यू में लगे यह विज्ञापनी कवि तथा लेखक साहित्य रूपी मणि पर साँप के समान बैठे हैं। कुछ सिरफिरे आलोचकों को शिकायत है कि हास्य कवि भड़ैती करते हैं। विदूषक हो गए हैं। हास्यास्पद हो गए हैं। तस्वीर का एक ही पक्ष देखनेवाले आलोचकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि बिना कवि सम्मेलनों को ठीक प्रकार से सुने कविसम्मेलनीय परंपरा के मंच कवियों को गाली देने से ही काम नहीं चलेगा। इस विषय पर उन्हें निष्पक्ष रूप से सोचना चाहिए। मंच कवियों ने सहृदय श्रोताओं का प्यार पाया है। मन की भाषा समझने वाले आत्मा की आवाज का संगीत पहचानने वाले इनकी रचनाओं में सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के दर्शन करते रहे हैं।

 

-हुल्लड़ मुरादाबादी



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