महासमर - प्रत्यक्ष - नरेन्द्र कोहली Mahasamar - Pratyaksh - Hindi book by - Narendra Kohli
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महासमर - प्रत्यक्ष

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :456
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3198
आईएसबीएन :978-81-8143-940

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‘महासमर’ का यह सातवाँ खंड है, जिसमें युद्ध के उद्योग और फिर युद्ध के प्रथम चरण अर्थात भीष्म पर्व की कथा है।

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Pratyaksh - A hindi book by Narendra Kohli

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नरेन्द्र कोहली के महाभारत की कथा पर आश्रित उपन्यास ‘महासमर’ का यह सातवाँ खंड है, जिसमें युद्ध के उद्योग और फिर युद्ध के प्रथम चरण अर्थात भीष्म पर्व की कथा है। कथा तो यही है कि पांडवों ने अपने सारे मित्रों से सहायता माँगी। कृष्ण से भी। पर नरेन्द्र कोहली का प्रश्न है कि जो कृष्ण जो आज तक युधिष्ठिर से कह रहे थे कि वे कुछ न करें बस अनुमति दे दें तो यादव ही दुर्योंधन का वध कर पांडवों का राज्य उन्हें प्राप्त करवा देंगे, वे कृष्ण उद्योग की भूमि उपलव्य से उठकर द्वारका क्यों चले गए ? पांडवों को उनसे सहायता माँगने के लिए द्वारका क्यों जाना पड़ा ? कृष्ण ने पापी दुर्योधन को अपने परम मित्र अर्जुन के समकक्ष कैसे मान लिया ? प्रश्न यह भी है कि जो कृतवर्मा, कृष्ण का समधी था, जिसने कौरवों की राज सभा से कृष्ण को सुरक्षित बाहर निकाल लाने के लिए अपनी जान लड़ा दी, वह दुर्योधन के पक्ष से युद्ध करने क्यों चला गया ? ऐसा क्या हो गया कि यादवों के सर्वप्रिय नेता कृष्ण जब पांडवों की ओर से युद्ध में सम्मलित होने आए तो उनके साथ न उनके भाई थे, न पुत्र ? कोई नहीं था कृष्ण के साथ। यादवों में इतने अकेले कैसे हो गए कृष्ण ?

जिस युधिष्ठिर के राज्य के लिए यह युद्ध होना था, वह युधिष्ठिर ही युद्ध के पक्ष में नहीं था। जिस अर्जुन के बल पर पांडवों को यह युद्ध लड़ना था, वह अर्जुन अपना गांडीव त्याग हताश होकर बैठ गया था। उसे युद्ध नहीं करना था। जिन यादवों का सबसे बड़ा सहारा था, उन यादवों में से कोई नहीं आया लड़ने, तो महाभारत का युद्ध कौन लड़ रहा था ? कृष्ण ? अकेले कृष्ण ? जिन के हाथ में अपना कोई शस्त्र भी नहीं था ?

अर्जुन शिखंडी को समाने रख भीष्म का वध करता है अथवा पहले चरण में वह भीष्म को शिखंडी से बचाता रहा है और फिर अपने जीवन और युग से हताश भीष्म को एक क्षत्रीय की गौरवपूर्ण मृत्यु देने के लिए उनसे सहयोग करता है ? कर्ण का रोष क्या था और क्या था कर्ण का धर्म ? कर्ण का चरित्र ? इस खंड में कुंती और कर्ण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ हा। और कुंती ने प्रत्यक्ष किया है कर्ण की महानता को। बताया है उसे कि वह क्या कर रहा है, क्या करता रहा है। बहुत कुछ प्रत्यक्ष हुआ है, महासमर के इस सातवें खंड प्रत्यक्ष में।....किंतु सब से अधिक प्रत्यक्ष हुए हैं नायकों के नायक श्रीकृष्ण। लगता है कि एक बार कृष्ण प्रकट हो जाएँ तो अन्य प्रत्येक पात्र उनके सम्मुख वामन हो जाता है। और इसी खंड में है कृष्ण की गीता...भगवद्गीता..। एक उपन्यास में गीता, जो गीता भी है और उपन्यास भी। इस खंड को पढ़ने के पश्चात निश्चित रूप से आप अनुभव करेंगे कि आप कृष्ण को बहुत जानते थे, पर फिर भी इतना तो नहीं ही जानते थे।..

 

प्रत्यक्ष

 

अर्जुन के कक्ष में प्रवेश करते ही दौपदी उत्साहपूर्ण उसकी ओर बढ़ी, ‘‘ओह फाल्गुन !’’
अर्जुन के मन की सहस्रों आशंकाएँ इस एक संबोधन से मिट गईं।....नहीं, पांचाली उससे रुष्ट नहीं थी। यदि रुष्ट होती तो वह उसे किसी भी और नाम से पुकार सकती थी, किंतु ‘फाल्गुन’ कहकर कभी संबोधित नहीं करती। वह अत्यधिक औपचारिक होकर उसके प्रति असाधारण सम्मान प्रदर्शित नहीं करती। उस पर इस प्रकार की अनौपचारिक सहज और प्रिय मुस्कान न लुटाती। इसमें तो उसके हृदय का नैसर्गिक और मादक उल्लास रहा था।
‘‘कैसी हो प्रिये ?’’
‘‘मैं ! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। सच पूछो तो प्रसन्नता के मारे एकदम बिल्कुल बौराई हूँ।’’ ‘‘क्यों ? क्यों ??’’ अर्जुन भी सहज भाव से हँसा।

‘‘एक तो अभी तक जैसे मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा कि हमारा वनवास ही नहीं अज्ञातवास भी समाप्त हो गया है।....और दूसरे मेरे लिए यह कल्पना करना भी कठिन हो रहा है कि हमारा पुत्र इतना बड़ा हो गया है कि उसका विवाह हो सकता है। अभी तो मैं सास के रूप में माता कुंती को ही देखती हूं। अपनी तो उस रूप में मैं कल्पना भी नहीं कर पाती।’’
‘‘क्यों ? किसी समय की वधू ही तो अवसर आने पर सास बनती है।’’
‘‘हाँ ! किंतु मेरे मन में सास की छवि एक वृद्धा के रूप में है और मेरा मन अभी स्वयं को वृद्धा मानने को प्रस्तुत ही नहीं।’’ द्रौपदी झेंपी-सी मुस्करा रही थी।

‘‘मेरा विचार है कि जब हमारा विवाह हुआ था तो माता भी ऐसी कोई वृद्धा नहीं थीं।’’ अर्जुन ने कहा।
‘‘किंतु मैं तो उस समय एक किशोरी मात्र ही थी।’’ द्रौपदी बोली, ‘‘मैंने सर्वप्रथम उन्हें एक पौढ़ा के रूप में देखा और आज तक मेरा मन उन्हें प्रौढ़ा ही मानता है। मेरी अवस्था उनकी तब की अवस्था से अधिक भी हो जाए, तो मैं स्वयं को उस प्रकार प्रौढ़ा नहीं मान पाउँगी।’’

‘‘सत्य है।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘हम पहली बार जिसको जिस रूप में देखते हैं, उसे उस रूप में ही स्वीकार कर लेते हैं और उसमें परिवर्तन करना कठिन होता है। मैंने तुम्हें एक किशोरी के रूप में देखा था, तो तुम मेरे लिए किशोरी ही रहोगी। मुझे तुम्हारे इस आनन में सदा वही चेहरा झाँकता दिखाई देगा।’’
‘‘तो मैं तुम्हारे लिए कभी पौढ़ा नहीं हूँगी ? कभी वृद्धा नहीं हूँगी ?’’ द्रौपदी ने पूछा।
‘‘लगता तो यही है।’’ अर्जुन ने उत्तर दिया, ‘‘मेरा मन तुम्हारे जिस रूप पर रीझा था, वह कैसे विस्मृत हो सकता है। वैसे जब हमारा विवाह हुआ था, न हमारी अवस्था इतनी कम थी, न माता की। अभिमन्यु अभी केवल सोलह वर्षों का है। तुम्हारी अवस्था भी उतनी नहीं है। तुम अपनी युवावस्था में ही सास बनने जा रही हो। इतनी युवा सास पाना उत्तरा के लिए भी सौभाग्य का विषय है ।’’

‘‘लगता है आज अपने कक्ष से ही चाटुकारिता की योजना बना कर चले थे।’’ द्रौपदी ने उसे ललित दृष्टि से देखा।
‘‘नहीं ! अपने कक्ष से तो मन में एक पाप ले कर चला था। तुम अनुमति दो तो तुमसे कहकर अपने मन का बोझ कुछ हल्का कर लूँ।’’

‘‘पाप ?’’ द्रौपदी चकित थी, ‘‘तुम्हारे मन में पाप, ‘फाल्गुन ?’’
‘‘हाँ ! मेरे मन में पाप था।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘मैं सोच रहा था कि हमारे पुत्रों में सबसे पहले अभिमन्यु का विवाह हो रहा है। वह न तो अपने भाइयों में सबसे बड़ा है और न ही तुम उसकी जननी हो। क्या तुम्हें यह बात माता कुंती के समान कोंचती नहीं होगी कि बड़े होते भी किसी द्रौपदेय का विवाह नहीं हो रहा.....।’’
द्रौपदी ने अर्जुन की बात सुनी और चुप रह गई। वह ’तुम्हारा पुत्र’ न कहकर ‘द्रौपदेय’ तथा सुभद्रा का पुत्र न कहकर, ‘ सौभद्र’ कह रहा था। वह उसे देखती रही और मन ही मन विचार करती रही।
‘‘क्या सोच रही हो ?’’ अर्जुन ने पूछा।

‘‘सोच रही हूँ कि यदि तुम्हारे मन में यह था तो सचमुच पाप ही था; और यदि इस विचार के साथ लगा पापबोध भी था तो यह कारण नहीं था।’’ द्रौपदी मुस्कराई, ‘‘अब सोचती हूँ कि माता कुंती के ही समान मेरे मन में परिवेदन का विचार क्यों नहीं आया ? माता हमारे विवाह के समय जो कुछ सोचा था, वह उनका स्वार्थ नहीं, धर्म ही था। तो मैंने क्यो नहीं सोचा ?’’ द्रौपदी रुकी, ‘‘मैंने कदाचित् इसलिए नहीं सोचा, क्योंकि विराट् ने उत्तरा का विवाह तुमसे करने का प्रस्ताव करने रखा था। तुमने उसे अपनी पुत्रवधू माना तो मेरे वक्ष पर से पहाड़-सी चिंता हट गई। अब अपनी इस अवस्था में मैं एक नई सपत्नी को नहीं झेल सकती; और उत्तरा जैसी बच्ची को अपनी सपत्नी के रूप में देखने की तो कल्पना भी असहय है मुझे। फिर से तुमने अपनी पुत्रवधू के विषय में सोचा तो निश्चित ही तुम्हारे मन में अपने औरस पुत्रों में बड़े का ध्यान आएगा। श्रुतकर्मा छोटा है, अभिमन्यु बड़ा है। तुमने ठीक ही सोचा फाल्गुन। मैं आपत्ति करती तो यह कर सकती थी कि तुमने उलूपी के पुत्र इरावान अथवा चित्रांगना के पुत्र बभ्रुवाहन के विवाह के विषय में क्यों नहीं सोचा ?’’

‘‘सोचा था।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘किंतु वे लोग अपने मातामहों के उत्तराधिकारी हैं। संभवतः वे विराट को स्वीकार्य नहीं होते। वे हमारे निकट भी नहीं हैं- न मेरे निकट, न तुम्हारे, न सुभद्रा के। उनके लिए उत्तरा का हाथ माँगना क्या उचित होता ?’’
‘‘जब तुमने इतना सोचा है फाल्गुन ! तो यह भी सोच सकते थे कि अभिमन्यु के अविवाहित रहते, श्रुतकर्मा का विवाह कर मैं कैसे प्रसन्न हो सकती थी। परिवेदन के पक्ष में मैं भी नहीं हूँ।’’ द्रौपदी ने कहा।

‘‘यह तो सोच ही सकती थीं कि प्रतिविंध्य के अविवाहित रहते अभिमन्यु का विवाह हो रहा है।’’ अर्जुन ने उस पर एक गंभीर, किंतु उदारता भी है मुझमें।’’ द्रौपदी ने कहा, ‘‘सुभ्रदा से जब ईर्ष्य़ा की थी। तो की थी। जब उसे अपनी बहन मान लिया तो उसके गर्भ से जन्मे अपने पुत्र से क्या ईर्ष्या। वह मेरे प्रिय फाल्गुन का औरस पुत्र है। सपत्नी के माध्यम से सही। सखा कृष्ण का भागिनेय है। अभिमन्यु। ....और प्रिय ! अपने पुत्रों को इस प्रकार बाँट कर देखती तो उन्हें सुभद्रा के पास छोड़ कर तुम लोगों के साथ वन कैसे चली जाती। सुभद्रा की उदारता का कोई प्रतिदान नहीं है मेरे पास। उसने अपने अभिमन्यु के साथ मेरे भी पांचों पुत्रों को समान प्रेम से पाला है तेरह वर्ष। अपने मातुल और मातामह के पास नहीं रहे वे। अपनी माता के पास रहे। मैंने तो फिर पाँच पुत्रों को जन्म दे दिया है। सुभद्रा का तो एक ही पुत्र था छोटा-सा। संतान पालने का ऐसा कौन-सा अनुभव था उसको कि मेरे पांच पुत्रों को भी इतनी ममता दे सकती। पर कृष्ण की सहोदरा है। वह। उसके मन में भी अथाह प्रेम है। कृपण नहीं है वह। तो उसके प्रति अथवा उसके पुत्र के प्रति मैं अपने मन में ईर्ष्या भाव कैसे ला सकता हूँ। कृतघ्न नहीं हूँ मैं। वैसे....’’ वह मौन हो गई।

‘‘वैसे भी क्या ?’’ अर्जुन ने पूछा।
‘‘जन्म उसे चाहे सुभद्रा ने दिया है, किंतु संतान तो वह ही है। मेरी संपत्ति है। उसे मैं सुभद्रा को ही क्यों दे डालू।.....तुम चाहे कहो और समझो फाल्गुन ! किंतु विवाह तो मेरे ही पुत्र का हो रहा है।’’ द्रौपदी वस्तुतः प्रसन्न दिखाई दे रही थी।
‘‘यह भी नहीं पूछोगी कि मत्स्यराज के प्रस्ताव पर मैंने क्यों अभिमन्यु के ही विषय में सोचा ?’’
‘‘बताना चाहते हो तो बताओ।’’ द्रौपदी बोली, ‘‘मैंने अपने आप ही कल्पना कर ली थी।’’

‘‘कल्पना तो तुमने अच्छी ही की, किंतु मेरे मन में वह नहीं था।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘जब मत्स्यराज ने उत्तरा के विवाह का प्रस्ताव रखा तो यह तो मेरे मन में स्पष्ट ही था कि मुझे उससे विवाह नहीं करना है। वस्तुतः मुझे और विवाह ही नहीं करना था। इस दृष्टि से मुझे तत्काल उस प्रस्ताव को स्वीकार कर देना चाहिए था; किंतु मत्स्यराज जैसे राजा के प्रस्ताव का तिरस्कार मुझे प्रिय नहीं था। वैसे भी हम चाहते थे कि उनके वंश से हमारा घनिष्ठ संबंध हो। संबंध का ऐसा अवसर हम चूकना नहीं चाहते थे। और तुम जानती हो कि मुझे अपनी वह शिष्या आत्मजा के समान प्रिय हो गई थी। मैं उसे स्वयं से दूर भी नहीं करना चाहता था और उसके लिए अच्छे से अच्छे वर की कामना भी करता था। उसकी अवस्था, उसका रंग-रूप तथा उसकी देहयष्टि इत्यादि को देखते हुए मुझे पांडवों के पुत्रों में से अभिमन्यु ही उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त वर लगा था। अपने औरस पुत्र की बात मेरे मन में नहीं थी। फिर वह सुभद्रा का सबसे बड़ा पुत्र है, इसलिए हम परिवेदन जैसे पाप से भी बच जाते हैं।’’
‘‘जब इतना सोचा है तो यह भी सोचा होगा कि अभिमन्यु और उत्तरा की अवस्था अभी ब्रह्मचर्य की है। अभी उनकी विवाह की अवस्था नहीं आई है। तो आर्य मर्यादा का उल्लंघन तो हम कर नहीं रहे हैं।’’ द्रौपदी ने कहा।
‘‘यह आपात्काल है देवि। इसलिए इसे आपद्धर्म ही मानो ।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘युद्घ सिर पर है। अभी इन बच्चों की अवस्था युद्ध की नहीं है; किंतु ये युद्ध करेंगे। तो ऐसे में यदि वे अपनी अवस्था से पहले गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं तो कोई बहुत आपत्तिजनक बात नहीं है।’’

अर्जुन को विदा कर द्रौपदी ने तत्काल ही अपनी दासी को भीम के पास दौड़ा दिया, ‘‘जा, जा कर मध्यम पांडव से कह कि मैंने उन्हें स्मरण किया है। मैं तत्काल मिलना चाहती हूँ। यदि वे न आए तो मैं उनके कक्ष की ओर आ रही हूँ। फिर न कहें कि वे किसी मंत्रणा में व्यस्त हैं।’’
दासी ने रानी को विकलता देखी तो मुस्कराना चाह कर भी नहीं मुस्कराई। उपप्लव्य में आज कल परिस्थियाँ ही ऐसी थीं। एक ओर विवाह की धूम थी और दूसरी ओर युद्ध का वातावरण। पता नहीं युद्ध पहले होगा अथवा विवाह।
भीम ने आने में देर नहीं की।
‘‘क्या बात है प्रिये !’’ उसे द्रौपदी का आनन उल्लसित दिखाई नहीं पड़ रहा था।
‘‘मेरे मन में एक बात आई है।’’ द्रौपदी बोली, ‘‘अभिमन्यु के विवाह के अवसर पर संबंधियों और कुटुंबियों को तो आमंत्रित किया जाएगा न ?’’

‘‘हाँ प्रिये ! क्यों नहीं। बिना अतिथियों के भी विवाह हुआ है क्या ?’’
‘‘क्या इस बार भी राजसूय यज्ञ के अवसर के ही समान तुम लोग हस्तिनापुर से अपने शत्रुओं को आमंत्रित करोगे और उनकी प्रसन्नता के लिए मेरे पिता और भाइयों की अवमानना करोगे ?’’
भीम गंभीर ही नहीं, कुछ चिंतित भी दिखाई दिया, ‘‘तुम्हारी यह आशंका महत्त्वपूर्ण है।’’
‘‘क्या इस बार भी ऐसा ही होगा ?’’ द्रौपदी ने कुछ आग्रहपूर्वक पूछा।
‘‘कह नहीं सकता कि धर्मराज के मन में क्या है, किंतु मेरा विचार है कि हम दुर्योधन से अपना भ्रातृत्व बहुत निभा चुके। वह हमारा कभी नहीं बना, न ही बन सकता है। मुझे तो पितामह पर भी संदेह है कि वे कभी दुर्योंधन का साथ छोड़ेंगे।
जो हमारे नहीं हैं उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम अपनों की अवज्ञा बहुत कर चुके।’’ उसने द्रौपदी की ओर देखा, ‘‘मैं धर्मराज से आग्रह करूँगा कि वे जहाँ चाहें निमंत्रण भेजें, किंतु अपने शत्रुओं को आमंत्रित न करें और अपने मित्रों की अवहेलना भी न करें।’’ ‘‘सत्य कह रहे हो मध्यम पांडव ?’’

‘‘युद्ध की स्थितियाँ बन रही हैं। हम पंचालों की सहायता के बिना तो युद्ध कर ही नहीं सकते ।’’ भीम ने कहा, ‘‘अपने स्नेह अथवा संबंधों के कारण न सही, तो अपने स्वार्थ के कारण ही सही हमें पंचाली को पूर्ण सम्मान देकर आग्रहपूर्वक निमंत्रण करना होगा। यह तो धर्मराज की विचित्र लीला है कि जो हमारा मस्तक काट लेना चाहता होगा। यह उसे तो वे आदरपूर्वक बुलाएँगे और हमारे लिए अपने प्राण देने को तत्पर बैठे हैं, उनकी ओर देखेंगे भी नहीं।’’
‘‘सत्य कह रहे हो तो मध्यम ?’’ द्रौपदी ने दूसरी बार पूछा।

‘‘सत्य कह रहा हूँ।’’ भीम ने दृढ़ता से कहा, ‘‘इस विवाह में हस्तिनापुरवालों के लिए कोई स्थान नहीं है। वस्तुतः विवाह के निमंत्रण के छदम में हम युद्ध-निमंत्रण भेज रहे हैं। हम वर-यात्रा की नहीं, सेना की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हस्तिनापुर से सैनिक सहायता हम किस आधार पर माँगेंगे और किसके विरुद्ध माँगेंगे ? सैनिक सहायता तो हमें कांपिल्य से ही नहीं मिलेगी। पितामह और आचार्य हमारी दुर्योंधन के विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे। उनके विरुद्ध तो महाराज द्रुपद, धृष्टद्युम्न और महारथी शिखंडी ही हमारी सहायता करेंगे। महाराज द्रुपद आएंगे, तो समझ लो कि उनके विरोध के कारण हस्तिनापुर से कोई भी इस विवाह में सम्मिलित नहीं होगा।’’ भीम के चेहरे पर द्रौपदी को प्रसन्न कर लेने के पश्चात् प्रकट होने वाले सुख की मुस्कान थी, ‘‘स्थिति स्पष्ट हुई ?’’
‘‘हाँ ! स्पष्ट हुई।’’ भीम ने भी द्रौपदी के चेहरे पर ऐसे आनन्द के चिह्न कम ही देखे थे।
भीम चला गया।

द्रौपदी अपने पलंग पर लेट गई। आज उसका मन लौट कर पुरानी बातों को स्मरण कर रहा था। उसे वे पीड़ादायक दिन स्मरण आ रहे थे, जब द्रोण ने कांपिल्य पर आक्रमण कर, उन लोगों को अपमानित किया था। वे पांडव ही उनके पिता को बाँध कर ले गए थे। द्रोण ने उनके आधे राज्य का अपहरण किया था। कांपिल्य का राजवंशी दुखी, पीड़ित और अपमानित था। प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही थी और तब उन लोगों ने एक संकल्प किया था। प्रतिशोध का संकल्प। दौपदी ने यज्ञ की अग्नि में से पुनः जन्म लिया था। धृष्टद्युम्न अपने शास्त्रों सहित यज्ञ की अग्नि में से पुनः जन्म लिया था। आज वह क्षण आ गया था, जब वे अपने प्रतिशोध के बारे में सोच सकते थे। पांडव आज उसके थे। उनको उसके पिता और भाइयों की आवश्यकता थी। आज पांडवों का अपना और कोई नहीं था, कोई था, तो बस कांपिल्य का राजवंश, कृष्णा के पिता और भाई। द्रौपदी के नेत्रों में जैसे रक्त की पिपासा जागी। उसके अधरों पर एक हिंस्र मुस्कान थी।


2

 


प्रातः जब सांब लक्ष्मणा उन्हें प्रणाम करने के लिए आए तो कृष्ण की दृष्टि से यह छिपा नहीं रह सका कि लक्ष्मणा के चेहरे पर सदा के समान वह सहज उल्लास नहीं था।
वे लोग लौटने लगे तो कृष्ण ने सांब को रोक लिया, ‘‘क्या बात है पुत्र ! लक्ष्मणा प्रसन्न नहीं दिखती ? तुम लोगों में परस्पर कोई कहा-सुनी हुई है क्या ?’’
‘‘वह,....पिताजी ! .....’’ सांब कुछ अटपटाया और फिर सँभलकर बोला, ‘‘इन दिनों उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है।’’
‘‘यही तो पूछ रहा हूं कि क्या हुआ है ? क्या कष्ट है उसको ?’’
सांब चुपचाप खड़ा उनकी ओर देखता रहा, जैसे सत्य बोल न सकता हो और झूठ बोलना न चाहता हो।
‘‘बैठो।’’ कृष्ण बोले, ‘‘इसका अर्थ कि कोई साधारण-सी बात नहीं है। कुछ ऐसा है कि उस विषय में मुझे बताते हुए भी तुम्हें संकोच हो रहा है।’’ वे क्षण भर रुके, ‘‘हमारे परिवार में दुराव की परंपरा नहीं है पुत्र ! बात चाहे कितनी भी अप्रिय क्यों न हो।’’
‘‘नहीं ! ऐसी तो कोई बात नहीं है पिताजी !’’ सांब बोला, ‘‘वह प्रसन्न नहीं है। नहीं।....यह बात भी नहीं है। वस्तुतः वह चिंतित और आशंकित है।’’

‘‘क्या चिन्ता है ?’’ कृष्ण ने उसकी आँखों में देखा, ‘‘कैसी आशंका है ?’’ इस बार भी सांब तत्काल कुछ नहीं बोला। उसके द्वंद्व ने उसे रोके रखा और कृष्ण धैर्यपूर्वक उसकी ओर देखते रहे।
‘‘पांडवों का वनवास और अज्ञातवास पूर्ण हो गया है।’’ अंततः वह बोला, ‘‘और उसे चिंता है कि वे लोग अपना राज्य वापस माँगेंगे।....’’

‘‘तो इसमें चिंता की क्या बात है ?’’ कृष्ण बोले, ‘‘इसके कारण लक्ष्मणा अपनी किसी संपत्ति से वंचित नहीं होगी। पांडव अपना अधिकार ही तो माँगेंगे। उन्हें अपना राज्य न माँगना होता तो वे लोग वनवास और अज्ञातवास जैसी कठोर प्रतिज्ञाएँ क्यों पूर्ण करते है।’’
‘‘वह तो ठीक है।’’ सांब ने उत्तर दिया, ‘‘किंतु उसकी मान्यता है कि उसके पिता, पांडवों से अपने राज्य की रक्षा करना चाहेंगे।.....’’
‘‘दुर्योंधन के राज्य को पांडवों से किसी प्रकार का कोई भय नहीं है।’’ कृष्ण बोले, ‘‘वह अपने राज्य की रक्षा करेंगा अथवा पांडवों को राज्य पचा जाना चाहेगा ?’’

‘‘वह इस ढ़ंग से नहीं सोचती।’’ सांब ने कहा, ‘‘वह अपने पिता के ही समान यह मानती है कि जो राज्य एक बार उसके पिता को मिल गया, वह उसका हो गया; चाहे वह किसी भी प्रकार मिला हो। अब उसकी रक्षा करना उसका धर्म है। इसलिए यदि पांडव उसके पिता से इंद्रप्रस्थ का राज्य वापस माँगेंगे, तो अनिवार्यतः युद्ध होगा।’’
‘‘पांडवों द्वारा अपना राज्य माँगे जाने पर युद्ध नहीं होगा।’’ कृष्ण बोले, ‘‘युद्ध होगा, दुर्योधन द्वारा द्यूत के अवसर पर की गई प्रतिज्ञा पूरी न करने पर।’’
‘‘एक ही बात है।’’
कृष्ण ने उसे आश्चर्य से देखा, ‘‘एक ही बात है ? यह एक ही बात है ?’’


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