मातृछवि - महाश्वेता देवी Matruchavi - Hindi book by - Mahashweta Devi
लोगों की राय

नारी विमर्श >> मातृछवि

मातृछवि

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :224
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3221
आईएसबीएन :00-0000-00-0

Like this Hindi book 17 पाठकों को प्रिय

267 पाठक हैं

प्रस्तुत कृति में उनकी रची आठ अनोखी मातृ-छवियाँ प्रस्तुत हैं...

Matrachhavi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महाश्वेता देवी का नाम आज हिन्दी पाठकों में एक महान यथार्थवादी लेखिका के रुप में खूब ही लोकप्रिय है। संथालों व आदिवासियों के जीवन, उनके रीति-रिवाजों और उनके शोषण को महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यासों का विषय बनाया और पाताल में धँसी, सिसकती एक जिन्दगी को प्रकाश में लाने में सफल हुईं।

प्रस्तुत कृति में उनकी रची आठ अनोखी मातृ-छवियाँ प्रस्तुत हैं जो सभी एक से एक बढ़ कर चौंकाने वाली और नितान्त अछूती पृष्ठभूमि पर रची गई हैं। आठ छवियाँ हैं-आठ किस्म की माताओं की। कहीं जाह्लवी माँ है, कहीं ऐसी एक माँ जो सुबह-शाम ही माँ होती हैं, बाकी समय वह देवी रहती हैं, कहीं यशोमती माँ है, कहीं धाय-माँ है जो अपने दूध से पालती है। सभी माँएँ दुखियारी हैं, सभी कुर्बानियाँ करने में अद्वितीय।
मातृछवि के इतने विभिन्न रुप एक साथ और कहीं, किसी भाषा में भी पढ़ने को नहीं मिलेंगे।

मातृछवि


सुबह और ही तरह ही की थी। जगाई मण्डल की रातें बीच-बीच में, कुछ समय बीतते न बीतते, कौशल्या ले लेती है। कौशल्या यानी उसकी माँ। कुछेक बरसों के बाद जगाई मण्डल के मस्तिष्क में सब कुछ गड्मड हो जाता है। बीच-बीच में ऐसा वक़्त आता है। उस गड्मड की स्थित में, दिमाग़ चकराने की हालत में, जगाई की रातें कौशल्या ले लेती है। एक ऐसा वक़्त था कि दिन और रात, रात और दिन माँ ले लेती थी। उसके बाद हर रात लेने लगी। आजकल कई बरसों के अन्तराल पर रातें ले लेती हैं। कौशल्या एक भयंकर एकाधिकार मालिकाना की जोतदार थी। अपने लड़के जगाई की पसंद की ज़मीन दखल करने की इच्छा उसने तेंतीस साल के दरमियान भी नहीं छोड़ी थी। तेंतीस वर्ष पूर्व, आजादी के साल ही माँ की मृत्यु हुई है। जगाई को इसमें सन्देह हैं कि माँ मर गयी है। तेंतीस वर्ष पहले ही माँ ज़िन्दगी-मौत की बाड़ लाँघ उस आबाद धान और जगाई के जीवन में मिलकर एकाकार हो गयी है। वरना वह रात में माँ को प्रकाश से जगमगाते हुए क्यों देखता ?

लड़का कहता है, ‘‘यह सब सपना है।’’
‘सपना !’’
‘नहीं तो और क्या ?’’
उसके बाद कहता है, ‘मैंने क्या दादी का वृत्तान्त नहीं सुना है ? जानते हैं हम लोग रक्त-मांस के आदमी नहीं, चिड़ियाख़ाने के जानवर हैं। जब जिसको जहाँ भी खुशी होती है, आकर खड़ा होता है और स्वर में मिसरी घोलकर पूछता है : कौशल्या के लड़के हो ? कौशल्या के पोते हो ? मीठी बात का तीर मारकर चला जाता है और हम लोग जिस तरह गुठली चूस रहे हैं, उस तरह चूँसते ही रह जाएँगे। और वे हैं कि दादी माँ को देखते हैं !’
‘सच कह रहा हूँ, साफ़-साफ़ तुम्हारी दादी माँ को देखता हूँ।’

‘फिर बुआ क्यों नहीं देखती ? चाचा जी क्यों नहीं देखते ? वे उन लगों की भी तो माँ थीं।’
जगाई आहिस्ता से कहता है, ‘‘यह सब तेरी अबूझ बातें हैं रे लखा। तेरी बुआ तब इत्ती-सी थी और चाचा छह साल का। वे लोग क्या माँ के साथ जाते थे ? तेरे मझले चाचा होते तो बेधड़क बता देते। वह तो मर गया।’
‘आप देखते हैं ?’
‘हाँ रे, साफ़-साफ़ देखता हूँ।’
‘क्या देखते हैं ?’

‘इतनी-इतनी जो दुकाने हैं, वह सब कुछ नहीं है। माँ के पेट से खून टपक रहा है, गोली लगी है न। संगीन से पेट चीरा जा रहा है। माँ एक हाथ से पेट दबा और दूसरे में हँसिया थामे दौड़ी आ रही है। समूची धरती पर अँधेरा रेंग रहा है और माँ के खून से लथपथ बाल उड़ रहे हैं। माँ कह रही है : ले गया, ले गया, जगाई रे, सब कुछ ले भागा।’

‘यह आपकी गढ़ी हुई बात है—सब ले गया !’

जगाई को आए दिन चराचरव्यापी गहरे अँधेरे के बीच सुनदरवन और काकद्वीप के तमाम गाँव और धान के खेतों को दस्यु के हाथों से बचाने की चेष्टा में रात कौशल्या की प्रकाश से जगमगाती मूर्ति, आसमान को ढँके उसके खून से सने बिखरे बाल, एक हाथ से दबाया हुआ खून से लथपथ, बुलेच-बेयनेट से दीर्ण पूर्ण गर्भ और दूसरे हाथ में हँसिया सँभाले माँ का दौड़ते हुए आना दिखायी पड़ता है। सूखी आवाज में कहती है : ‘जयचाँद कॉमरेड को गुरखा मिलिटरी ले जा रहा था। जयचाँद कर रहा था : चाहे मरूँ या जिन्दा रहूँ कौशल्या बहन, मगर दुश्मन को लाश मत देना। उसी में...,

‘खाक समझ में आया है आपके। दादी ने यह नहीं कहा था। वह वीर थीं। स्पष्ट रूप से समझ गयी थीं कि दादा और आपको साँपुई बाबू वगैरह तीन बीघा दलदली भूमि से बेदखल कर देंगे। इजारे पर ज़मीन रखकर आप लोग मर जाइएगा, नाम कोई रेकार्ड नहीं करेगा। मजदूर के तौर पर खटने को नहीं बुलायेंगे। इसीलिए वे कहती हैं : सब ले गया। जयचाँद दास के बारे में क्यों कहेंगी ? जयचाँद नगर क्या नहीं बना है ? उसका नाम उजागर नहीं हुआ है ? दादी का नाम लेना सिर्फ़ ढोंग और मज़ाक है।’’
‘क्या कहा तूने ?’
‘मज़ाक।’
‘वह क्या है ?’
‘यह हम लोगों का लजब है। दादी के नाम पर लोग मज़ाक उड़ाते हैं। दादी माँ का बेटा भूँखों मर रहा है, यह देखकर किसी ने एक बीघा ज़मीन दी है ? कोई मुझे नौकरी देता है ? सब सालों को पहचानता हूँ मैं।’

लखिन्दर यह सब बात कहता है तो जगाई की ज़बान बन्द हो जाती है। उसकी औरत इसी वक़्त साँपुई के घर में धान पीट-फटककर ग़ुस्से से उबलती हुई वापस आती है। कहती है : ‘भिखमंगा समझ रखा है।  खलिहान लीपूंगी-पोतूंगी, धान फटकूंगी और तुम हिसाब करके अट्ठाइस कौड़ी दोगी, आधे कट्ठे का चावल दोगी। उस पर कहती है : दामाद आया है, मछली काटकर चुनती जा, मछली का तेल, पाटा लेती जा। मैंने कहा : लखा है, लखा का बाप है, जब तक नदी है लखा की माँ मछली की कंगालिन नहीं है। लड़की मेरी ओर इशारा करती हुई गोल मुँह दामाद से नखरे के साथ कहती है : देखो, देखो, तो तिभागा की कौशल्या के बेटे की औरत को देखो।’

‘माँ, तुमने क्या कहा ?’
‘मैंने कहा : हाँ, आँख खोलकर देख लो। कौशल्या के नाम पर कोई कम कीर्तन नहीं करते हो, सो देख लो कि झण्डा पार्टी में शामिल होकर, गद्दी और पंचायत पर दख़ल जमाकर कौशल्या की बहू को तुम्हारे सास-ससुर कितने सुख से रखे हुए हैं। सच कह रही हूँ, सामर्थ्य होती हो उस मरदूद के मुँह पर झाड़ू लगाकर कहीं दूसरी जगह चली जाती। धान-जुड़ी में नहीं रहती।’

यहाँ तक कि सब ठीक-ठाक रहता है। उसके बाद चिल्ला उठती है, ‘तुम बैठे-बैठे सुन रहे हो ? अमरित की खोज में नहीं निकलना है ?’

अमरित या अमृत माइलो के दलिया को कहा जाता है जिसे सैकरिन देकर बनाया जाता है। वोट की लड़ाई जीतने, बड़े आदमी बनने की परिकल्पना का यह चोर बाज़ारी का कारोबार है। जोत और बाँध के मालिकों के लिए स्वर्ग-सुख। वाम मोर्चे की ज़बरदस्त चौकी सुन्दरवन में यदि चौदह लाख एकहत्तर हजार तीन सौ तेंतीस बेरोज़गार हैं, खेत मजदूरों की संख्या यदि सात लाख छप्पन हजार दो सौ छप्पन है और कुल ज़मीन यदि सात लाख छप्पन हजार आठ सौ एकहत्तर एकड़ है—तो यह मानी हुई बात है कि लोग-बाग चावल और सब्जी खरीद नहीं सकेंगे। जमीने के वे मालिक जिनके पास काफ़ी कुछ है और रहता है, वे चावल चालान कर देते हैं। यही वज़ह है कि जगाई जैसे लोगों को माइलो में दलिया, मकई के सत्तू और आटे पर गुज़ारा करना पड़ता है। थोड़ा-सा खरीदो, नमकीन पानी से सिझाओ। उसके बीद सैकरिन की टिकिया डालकर उसे मीठा बनाकर अमरित खाओ।

जगाई अमरित की खोज में निकलता है। बाजार भी साँपुई बाबू का है। तैंतीस बरसों के दरमियान बाबू लोगों की तेज़ी से तरक्की हुई है, किसी तरह की कोई गिरावट नहीं आयी है। मँझले लड़के ललित को अमरित की खोज में भेजकर जगाई सुबल सखा के घर जाता है। सुबल सखा की उम्र चौंसठ वर्ष है। 1947 ई. में धानजुड़ी में पुलिस और मिलिटरी दोनों के पथ-प्रदर्शक साँपुई वगैरह की कचहरी के नायक भक्तगण और कांग्रेस के कण्ठीधारी नेता अभय की हत्या कर जिन लोगों ने लाश फेंक दी थी, उनके बीच सुबल सखा भी एक सरगना था, इस बात का वह अन्दाज़ नहीं लगाया जा सकता। काम मिलता है तो खटकता है वरना हाटगंज जाकर गट्ठर-गठरी ढोता है। सुबल का लड़का पहले होमगार्ड था, अब पुलिस है।
सुबल न तो अपने लड़के का अन्न खाता है न ही उसका चेहरा देखना चाहता है। कहता है, ‘हमेशा से यही तजुर्बा रहा है कि पुलिस मेरी दुश्मन है, अपनी आँखों से देखा है कि पुलिस मेरी दुश्मन है। पुलिस की लाठी की मार से मेरा पंजर टूट गया, अस्पताल में जाकर भर्ती होना पड़ा, जेल की खिचड़ी खानी पड़ी। और तू जाकर उसी पुलिस में भर्ती हो गया ?’

सुबल बड़ा ही दुःसाहसी आदमी है। लड़के को विश्वास है कि बाप उसे नौकरी से हटाने के लिए ज़िन्दा है। वह कहता है, ‘इतना कुछ मुझे पुलिस होने के कारण ही मिल रहा है। फिर लेते क्यों नहीं हैं ?’’
इस पर सुबल कहता है, ‘तू जाकर पुलिस में भर्ती क्यों हुआ है ? कबीर मल्लिक हुआ है ?’
वह कहता है, ‘बीमारी का सारा खर्च गौरमेन्ट देगी। आप उसे क्यों नहीं लीजिएगा ?’
इस पर सुबल कहता है, ‘‘मैं पुलिस का अनाज या दवा कुछ भी नहीं लूँगा। तुम सूअर के पट्ठे पुलिस में जाकर भर्ती क्यों हुए ?’
अपने बेटे को वह ‘सूअर का पट्ठा’ कहता है। उसके ग़ुस्से का कारण है, प्रथम संविद सरकार बनने के तेरह वर्ष पहले की बात—विष्णु बाबू, सजनी राय जैसे बुजुर्ग मंत्रियों को लेकर कुछ लोग धानजुड़ी आये थे। कितनी खुशामद भरी बातें कर रहे थे वे। ‘कहो सुबल, कैसे हो कॉमरेड। योगीन कहाँ है—शहीद कौशल्या का पति ? हाय-हाय, मर गया ? सुख के दिन आये, कांग्रेस का दुःशासन हमने नष्ट कर दिया—थुड़ी, तुम लोगों ने नष्ट किया। यह सब देखने को योगीन नहीं रहा ?’

उस समय अपने स्वर में बेहद तीखापन, पीड़ा और क्रोध उड़ेलकर सुबल ने कहा था, आपने यह क्या कहा बाबू ? कौशल्या भाभी को मरे बीस साल हो गये। सो बीसवें साल की शुरुआत में सजनी बाबू, विष्णु बाबू आते-जाते थे, खोज-ख़बर लेते थे। अब बहुत दिनों से आँख उठाकर हमारी ओर ताकते भी नहीं। किस चीज का तिभागा, हम अपना सर्वस्व खोकर भिखमंगे बन गये, इसकी खोज-ख़बर लेते हो ? योगेन क्या एक ही दिन में मरा था ? दिन-दिन जमीन हाथ से निकलती गयी, सबको हड़प साँपुई बाबू। उसके बाद हाय कौशल्या करते-करते कलकत्ते के अस्पताल में...अभी आप लोगों का दबदबा है, आप लोग जाकर देखिये।

सजनी और विष्णु बाबू चुन्नटदार धोती और कुरता बचाते हुए सुबल को पुचकार कर अपने दल में लाने की कोशिश करते हैं। उस समय सुबल ने कहा था, ‘जिस साँपुई का बाप पुलिस-मिलिटरी लाकर इतना कारनामा कर गया, उसका बेटा जब आप लोगों का अपना आदमी हो गया है तो फिर सुबल को पुचकारने से क्या होगा बाबू ?’’
‘नहीं-नहीं, सब होगा सुबल। यह तिभागा का अंचल है। यह अंचल कौशल्या, राईमणि, दुर्गामणि आदि सैकड़ों शहीदों के खून से रँगा हुआ है। तुम लोग उन दिनों के संघर्षरत सैनिक हो—तुम लोगों के तमाम दुखों का निवारण किया जायेगा। यही तो ! शहीद बटुक पाल का लड़का राखाल पाल यहाँ का स्थानीय नेता है। यही तुम लोगों की तमाम शिकायतें सुनेगा।’



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book