निराला आत्महन्ता आस्था - दूधनाथ सिंह Nirala : Aatmahanta Aastha - Hindi book by - Doodhnath Singh
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निराला आत्महन्ता आस्था

दूधनाथ सिंह

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :280
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3223
आईएसबीएन :00-0000-00-0

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निराला : आत्महन्ता आस्था - दरअसल एक नये कवि कथाकार द्वारा एक दूसरे कवि का आत्मीय विश्लेषण है

nirala aatmahanta aastha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निराला : आत्महन्ता आस्था-दरअसल एक नये कवि कथाकार द्वारा एक दूसरे कवि का आत्मीय विश्लेषण है। इसका एक नाम यह भी हो सकता था--‘‘एक लेखक की निजी नोटबुक में एक दूसरा लेखक।’ यह पुस्तक लेखक के उन्हीं ‘नोट्स’ का क्रमबद्ध रूपान्तरण है। उसके निजी आनन्द की अभिव्यक्ति है। लेकिन आनन्द की यह अभिव्यक्ति लेखक के श्रद्धा-विगलित क्षणों की उपज न होकर, उसके दिमाग की तार्किक रस-सिद्धि का परिणाम है, उसके सधे हुए सुर की झंकार है। अतः उसमें एक तर्कपूर्ण निजी शास्त्रीयता भी हैः इसी लिए वह मात्र प्रशस्ति-वाचन या निन्दा नहीं हैः बल्कि निराला की काव्य-ऊर्जा तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक नया और निजी द्वार है, जिससे जागरुक पाठक और नये आलोचक एक नयी जगह से उस सिंह के दर्शन कर सकें।

जब आप इस नये द्वार से प्रवेश करेंगे—तभी समझ सकेंगे कि क्यों निराला दूसरे छायावादी कवियों से विरोधी दिशा के कवि हैं। कैसे उनकी रचनात्मक ऊर्जा रवीन्द्रनाथ से बड़ी है। क्यों उनको बने बनाये काव्य-सिद्धान्तों में ‘फिट-इन’ नहीं किया जा सकता ? क्यों उनकी रचनात्मकता का अध्ययन करने के लिए काल-क्रम का आधार बेमानी ठहराता है ? तब आप उस अँधेरी गुफा में बैठी, उन जलती आँखों के सान्द्र प्रकाश का साक्षात्कार कर पायेंगे।
इसी साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत है यह पुस्तक—निराला : आत्महन्ता आस्था

निराला के सम्पूर्ण काव्य की तर्क-संगत और उचित व्याख्या उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के भीतर-निरन्तर समान रूप से क्रियाशील-रचना-प्रक्रिया के अनेक स्तरों के उद्घाटन के रूप में ही सम्भव है।
इसी स्थापना-भूमि पर हिन्दी के सशक्त नये कवि-कथाकार, दूधनाथ सिह ने महाकवि निराला के विविध, अनुभव सम्पन्न रचनात्मक काव्य-व्यक्तित्व का यह सर्वथा नया और महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए, भारतीय साहित्य में उनके स्थान और उनकी काव्य-ऊर्जा को अत्यन्त सूक्षमता से रेखांकित किया गया है।

आत्महन्ता आस्था


सबसे पहले तो इस पुस्तक के उपर्युक्त नामकरण के बारे में। शायद कुछ लोगों को भ्रम हो कि मैंने अपनी पुस्तक में निराला को आत्महन्ता सिद्ध करने की कोशिश की है। ऐसा कुछ नहीं है। दरअसल कला और रचना को लेकर मेरी एक व्यक्तिगत धारणा है : मुझे लगता है कि एक बार पूरी तौर पर रचना के प्रति अपने समर्पण के बाद, व्यक्ति कोई भी दूसरी जिम्मेदारी सच्चे मायनों में और मुकम्मल तौर पर नहीं निभा सकता। वह कोशिश कर सकता है : वह एक सन्तुलन बनाये रख सकता है : लेकिन अक्सर वह अपने को इसमें सफल पाता है इसके लिए उसे दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता। कला-रचना के प्रति एकान्त समर्पण की अन्तिम परिणति यही होती है। यह जीभ पर अपने ही खून का स्वाद लगने की तरह है : यह लगातार अनवर, निरन्तर अपने को ही खाते रहना है; इस आत्म-बुभुक्षा के सच्चे और मौलिक रचनाकार की कहीं कोई मुक्ति नहीं है। इसी से वह सृजन के सघन क्षणों को रचना में मूर्त करता है।

दरअसल सच्चा रचनाकार घनी-सुनहली अयालों वाला एक सिंह होता है, जिसकी जीभ पर उसके स्वयं के भीतर निहित रचनात्मकता का खून लगा होता है। अपनी सिंह वृत्ति के कारण कभी भी इस खून का स्वाद नहीं भूला और हर वक्त शिकार की ताक में सजग रहता है—चारों ओर से अपनी नज़रें समेटे, एकाग्रचित्त, आत्म-मुख, एकाकी और कोलाहलपूर्ण शान्ति में जूझने और झपटने को तैयार। इसी तरह की एकाग्रचित्ता और आत्ममुखता में सिंह को मचान पर बैठे हुए शिकारी का ध्यान नहीं रहता। यहीं से एक भयंकर अपमान, यन्त्रणा और दुखान्त की सृष्टि होती है, जिससे वह अपनी सारी गर्जनाओं के बाद भी मुक्त नहीं हो पाता और मर जाता है।

महान और मौलिक कलाकारों का यही बिम्ब बार-बार मेरे दिमाग में बनता है। कला के प्रति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण उसे बाहरी दुनिया से बेखबर कर देता है। वह इन दोनों दुनियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। वह कोशिश करता है, जैसे सिंह भी कभी-कभी मचान की ओर झपटता है (और निराला ने भी शायद बहुत कोशिश की होगी।) लेकिन उसकी सघन आत्म-मुखता इसमें बाधक होती है। इस तरह यह एकान्त-समर्पण एक प्रकार का आत्म-भोज होता है : कला-रचना के प्रति यह अनन्त आस्था एक प्रकार के आत्म-हनन का पर्याय होती है, जिससे किसी मौलिक रचनाकार की मुक्ति नहीं है। जो जितना ही अपने को खाता जाता है—बाहर उतना ही रचता जाता है। लेकिन दुनियाबी तौर पर वह धीरे-धीरे विनिष्ट, समाप्त, तिरोहित तो होता ही चलता है। महान और मौलिक सर्जना के लिए यह आत्म-बलि शायद अनिवार्य है। इन्हीं अर्थों में मैंने निराला के सम्पूर्ण रचना-जीवन को ‘आत्महन्ता आस्था’ की संज्ञा दी है। मेरी इस धारणा को समझ कर ही इस पुस्तक के साथ न्याय किया जा सकता है।

मैं नहीं जानता कि निराला की रचनाओं के प्रति मैं क्योंकर, धीरे-धीरे आकर्षित होता गया। लेकिन पिछले 12 वर्षों से लगातार मैं उन्हें डूब कर पढ़ता रहा। मेरा विचार उनके ऊपर कभी कोई पुस्तक लिखने का नहीं था। कविताएँ पढ़ते वक्त मैं सिर्फ अपने ‘एन्जॉयमेन्ट’ के लिए ‘नोट्स’ लेता गया। पहले तो किताबों के हाशिये पर, फिर एक नोट-बुक में। धीरे-धीरे लगभग वह पूरी ही भर गयी। उसमें मैं मात्र अपने आनन्द के मूक क्षणों को लिपिबद्ध कर लेता था। एक लेखक होने के नाते मैंने उसमें सच्चे और मौलिक लेखक की नियति को पहचाना। अपने खुद को जानने-समझने में मुझे मदद मिली। सच यह कि निराला की जीवनी से भी अधिक-मौलिक और शाश्वत कला-रचना के प्रतीक ‘निराला’ को उनकी रचनाओं से ही समझा जा सकता है। अगर उनका जाना हुआ जीवन हमारी आँखों से  तिरोहित भी हो जाय, तब भी गुफा के अन्धेरे में बैठी हुई उनकी सिंह-वृत्ति, जलती हुई आँखों से एकटक बाहर की ओर घूरती है।

यह पुस्तक मेरे उन्हीं ‘नोट्स’ का क्रमबद्ध रूपान्तरण है; अपने निजी आनन्द की अभिव्यक्ति है। लेकिन एक बात यहाँ साफ कह देनी जरूरी है : आनन्द की मेरी यह अभिव्यक्ति श्रद्धा-विगलित क्षणों की उपज न होकर, मेरे दिमाग की तार्किक रस-सिद्धि का परिणाम है, मेरे सधे हुए सुर की अभिव्यक्ति है। अतः उसमें एक तर्कपूर्ण निजी शास्त्रीयता भी है। इसीलिए यह मात्र प्रशस्तिवाचन या निन्दा नहीं है, बल्कि निराला की रचनाओं तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक निजी और नया द्वार भी है, जिससे पाठक नये सिरे से, एक नयी जगह से, उस सिंह का दर्शन कर सकें। इसीलिए इस पूरी पुस्तक में एक तार्किक और सघन तह-दर-तह शिल्प भी है। इसी रूप में यह एक नया मूल्यांकन है।

निराला की रचनाओं पर सही कोणों से अभी बहुत कम काम हुआ है। लेकिन वह तभी सम्भव होगा, जब विद्वत्वर्ग उनकी रचना के अध्ययन के लिए नयी शास्त्रीयता की तलाश करे। यह पुस्तक उसी नयी शास्त्रीयता की तलाश की ओर एक कदम है। यह तलाश वैसे कठिन बहुत है—लेकिन असम्भव नहीं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर निराला की रचनात्मकता के प्रति न्याय सम्भव नहीं होगा। केवल एक नीरस, गुमराह करने वाली, अरुचि पैदा करने वाली, पिष्ट-पेषणता होगी, जिससे कोई फायदा न होगा। इस पिष्ट-पेषणता, श्रद्धा-आवेगिलता और निर्बुद्धि का उदाहरण निराला पर लिखी गयी अनेक पुस्तके हैं, जिनकी चर्चा यहाँ बेकार है। वैसे निराला की रचनात्मकता का गहरा और सम्यक् अध्ययन करने वालों में डॉ. रामविलास शर्मा का नाम उल्लेखनीय है।

हाँ, अपने ‘नोट्स’ को क्रमबद्ध करने और उन्हें प्रकाशित करवाने में जिन लोगों की मुख्य प्रेरणा (डॉ. रघुवंश श्री वाचस्पति पाठक, डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी और नीलाभ) रही, उनके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ, क्योंकि यदि उन्होंने मुझे इसकी प्रेरणा न दी होती तो मैं अपने आलस्य में इस किताब को अपनी निजी नोट-बुक तक ही सीमित रखता। बस।

 13 अगस्त, 1972
इलाहाबाद।

-दूधनाथ सिंह

सही अध्ययन दृष्टि : स्थापना



मैंने ‘मैं’ —शैली अपनाई
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पड़ी हृदय में मेरे


निराला की मृत्यु (15 अक्टूबर, 1991) के लगभग साढ़े सात वर्ष बाद प्रकाशित उनके अन्तिम काव्य-संग्रह, ‘सांध्य-काकली’ (जनवरी, 1969) के साथ ही उनकी सम्पूर्ण काव्य रचनाओं का प्रकाश-क्रम एक प्रकार से पूरा हो गया है। अभी भी संभव है, इधर-उधर पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ कविताएँ या उनके मित्रों के पास पड़ी कुछ रचनाएँ संकलनों के आने से रह गयी हों, लेकिन उनकी संख्या ज्यादा नहीं मालूम पड़ती। ‘मतवाला’ के प्रारंभिक अंकों में प्रकाशित कुछ कविताएँ उनके किसी भी संग्रह में उपलब्ध नहीं हैं। इसी प्रकार ‘प्रभा’ (कानपुर) में जून, 1920 में छपी उनकी पहली कविता  ‘मातृभूमि’ भी किसी संग्रह में उपलब्ध नहीं है। कलकत्ते से प्रकाशित उनके प्रथम कविता-संग्रह ‘अनामिका’ (पृष्ठ संख्या 40, कविताओं की संख्या—कुल 9 : (1) ‘अध्यात्म फल’ (2) ‘माया’, (3) ‘जलद’, (4) ‘अधिवास’, (5) ‘तुम और मैं’, (6) ‘जुही की कली’, (7) ‘पंचवटी प्रसंग’, (8) ‘सच्चा प्यार’, और (9) ‘लज्जित’। आकार—गुटका; प्रकाशक—नवजादिक लाल, 23 शंकर घोष लेन, कलकत्ता।) की दो कविताएँ—‘सच्चा प्यार’ और लज्जित’ भी उनके काव्य-संग्रह ‘परिमल’ में सम्मिलित होने से रह गयी हैं। शेष सात कविताएँ ‘परिमल’ में शामिल कर ली गयी हैं। इसी प्रकार उनका एक गीत मीरजापुर से प्रकाशित होनेवाली एक पत्रिका में छपा है, जो उनका किसी भी संग्रह में संकलित नहीं है। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला अक्सर कविताएँ अपने काव्य-प्रेमियों और श्रद्धालुओं को दे दिया करते थे। इस तरह मुझे लगता है कि पुस्तकाकार प्रकाशित कविताओं से अलग उनकी कुछ कविताएँ रह गयी हैं हालाँकि मूल्याँकन की दृष्टि से इससे कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ता।1

श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा सम्पादित ‘अपरा’ (संग्रहों से चुनी हुई कविताओं का संकलन) को छोड़कर निराला  के कुल कविता-संग्रहों की संख्या—13 ठहरती है। प्रकाशन क्रम के अनुसार उनके संग्रह इस प्रकार है—(1) ‘अनामिका’, (2) ‘परिमल’, (3) ‘अनामिका’, (सर्वथा नया संग्रह, जिसमें प्रथम संग्रह ‘अनामिका’ की कोई रचना सम्मिलित नहीं है।) (4) ‘गीतिका’,
1. अब संग्रहों में प्रकाशित होने से रह गयी उनकी 36 कविताओं का एक संकलन ‘असंकलित कविताएँ’ शीर्षक से ‘राजकमल प्रकाशन’, दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है। तथा इस संग्रह में भी प्रकाशित होने से रह गयी 7 मौलिक और 3 अनूदित कविताएँ ‘निराला रचनावली’ में प्रकाशित हो गयी हैं।
(5) ‘तुलसीदास, (6) ‘कुकुरमुत्ता’, (7) ‘अणिमा’, (8) ‘बेला’, (9) ‘नये पत्ते’, (10) ‘आराधना’, (11) ‘अर्चना’, (12) ‘गीत गुंज’ तथा (13) ‘सांध्य काकली’। इन सारे संग्रहों में कुल मिलाकर उनकी प्रकाशित मौलिक कविताओं की संख्या 686 ठहरती है।2 इसके अतिरिक्त 10 अनूदित कविताएँ (5 रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ और पाँच स्वामी विवेकानन्द की) भी हैं जिनमें 7 ‘भारती-भण्डार, इलाहाबाद’ से प्रकाशित ‘अनामिका’ में संग्रहीत हैं और दो ‘नये पत्ते’ तथा एक ‘अणिमा’ में।

इस प्रकार सभी संग्रहों को लेकर निराला के रचना-वर्ष लगभग 40-50 वर्षों के व्यास में फैले हुए हैं। 1916 से लेकर 1961 तक इन्हीं वर्षों की भारतीय सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्थितियों तथा निराला के निजी जीवन की विडम्बनाओं के बीच उनकी रचना –प्रक्रिया का विकास हुआ है। अपने युग के प्रमुख कवियों में निराला ही ऐसे कवि हैं, जिनके निजी जीवन और तत्कालीन भारतीय स्थितियों के बीच घहराता हुआ संघात कभी भी बन्द नहीं हुआ है। यह निरन्तर बना रहने वाला संघात ही वह तथ्य है, जिसके सन्दर्भ में उनके कवि की मानसिक बनावट का अध्ययन उचित होगा। इसी से वह सर्वान्तिक, सर्वग्रासी अव्यवस्था जन्म लेती है। जो अनेक आवर्तों, लहरों और अनेक स्तरों पर उनकी काव्य-रचना-प्रक्रिया के विकसित, सम्भ्रमित और प्रतिफलित होने के लिए जिम्मेदार हैं।

उनके समकालीन दूसरे महत्त्वपूर्ण कवि, चाहे वे प्रसाद हों या पन्त या महादेवी, इस संघात को कविता में उतना अर्थवान नहीं बनाते—या यों कहें कि अपने निजी जीवन और काव्य-रचना के बीच दुहरा सामंजस्य स्थापित करने की लगातार कोशिश ये सभी कवि करते रहते हैं। इस तरह का सामंजस्य और समझौता निराला ने अपने कवि जीवन में स्थापित करने का शायद कभी प्रयत्न नहीं किया। फलतः संघात की यह पीड़ा ही अनेक स्तरों और अनेक रूपों में उनकी कविताओं का मूल और बुनियादी स्वर है।

उनका सारा जीवन सांसारिक दृष्टि से असफल, अव्यवस्थित, विश्रृंखलित, अतिशय अव्यावहारिक और दुखद रहा है। आर्थिक विपन्नता इसमें प्रमुख रही है। इस सांसारिक दुखद नियति के आगे हार-जीत के द्वन्द्वपूर्ण मनःस्थिति और उसका अन्तस्ताप ही निराला की रचनात्मकता की मुख्य दिशा बन गयी है। रचना के आन्तरिक क्षणों के फैलाव में गम्भीर-अध्ययन चिन्तन-मनन से निकले हुए निष्कर्षों को बार-बार यह अन्तस्ताप तीखा बनाता है। संसार के महान कलाकरों के जीवन में जितनी विडम्बनाएँ आयी हैं, निराला उसी तरह की, बल्कि उससे भी गहरी, आक्रामक और सांघातिक विडम्बनाओं के शिकार रहे हैं। वैसे कोई भी रचनाकार जीवन के इस तरह के गर्हित, सन्तापकारी रूपों द्वारा ग्रस लेने के लिए अपने को खुला नहीं छोड़ देता और न ही इसे एक सिद्धान्त के रूप में अपने कलाकार-जीवन में ग्रहण करता है। निराला ने भी वरदान  समझ कर नहीं, बल्कि एक विवश, कटु यथार्थ की तरह ही इन विडम्बनाओं को वाणी दी है। इसीलिए जहाँ इस तरह की स्थितियाँ साधारण मनुष्य के जीवन को एक अकर्मण्यता, असहायता और पराङ्मुखता की ओर अग्रसर करती है, वहीं एक सच्चा और मौलिक रचनाकार इसे अनुभव-संचय और उदात्त-भाव का साधन बनाता है। निराला के साथ भी यही और ऐसा ही हुआ है। जब वे कहते हैं :
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2. निराला रचनावली’ के हिसाब से अब उनकी कुल मौलिक 736 और अनूदित 17 होती हैं।

(1) मरा हुआ हूँ हजार मरण
पाई तव चरण-शरण

(2) दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज जो नहीं कही

(3) व्यर्थ प्रार्थना जैसे अब है
पंजर-पिंजर कर से।

(4) जनता के हृदय जिया
जीवन-विष विषम लिया

(5) बाहर मैं कर दिया गया हूँ
भीतर पर भर दिया गया हूँ


तो रचना और काव्य के मुखर अर्थ से मौन की उसी सनातन भाषा तक पहुंचने का संकेत देते हैं, जो अन्ततः सारी महान और सार्वभौमिक कविता का लक्ष्य है और जहाँ पहुँचकर कविता, या कोई भी रचना, एक सार्वभौमिक वास्तविकता और मनुष्य की आदिम नियति का गूढ़तम संकेत बन जाती है।

लेकिन निराला की काव्य-रचना के विकास को समझने और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले उनकी रचना-प्रक्रिया की आंतरिक संगति और उसकी यथार्थताओं से परिचित होना बहुत जरूरी है। इस निबन्ध के प्रारम्भ में निराला की प्रकाशित कविताओं के आँकड़े प्रस्तुत करने के पीछे मेरा उद्देश्य यही है। उनके सारे काव्य-संग्रहों में संकलित कविताओं की विषय-वस्तु, शिल्प और उनकी भाषिक-संरचना का अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हँ कि निराला की काव्य-रचना-प्रक्रिया के विकास को काल-क्रम के आधार पर समझा और विश्लेषित नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना, बल्कि एक प्रकार से बहुत बड़ी भूल होगी। इसकी जगह उनकी रचना-प्रक्रिया को, रचना-प्रक्रिया के अनेक स्तरों के हर समय, साथ-साथ क्रियाशील रहने के रूप में यदि देखा जाय तो उनकी कविता और उनके काव्य-व्यक्तित्व को समझने में ज्यादा सुविधा होगी। अपने समकालीनों में निराला ही एक ऐसे कवि हैं, जिनके विराट, सर्वग्रासी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व में काव्य-रचना-प्रक्रिया के अनेक स्तर हर समय साथ-साथ क्रियाशील रहे हैं। छायावादी काव्य-सिद्धांत तो निराला के कालजयी कवि-व्यक्तित्व के एक ही पहलू में समा जाते हैं। उनकी काव्य रचना का बहुत बड़ा भाग ऐसा है, जो किसी भी काव्य-सिद्धान्त के घेरे में नहीं अँटता। या तो वे अतिशय नवीन और विद्रोही दिखते हैं, या अतिशय पुरातन। उनके काव्य-संग्रहों के प्रकाशन-समय के आधार पर उनके काव्य-विकास को रेखांकित करना पूर्णतया असम्भव है।

उनके पहले संग्रह से लेकर अन्तिम संग्रह तक, प्रत्येक में रचना प्रक्रिया के अनेक क्रियाशील स्तरों का प्रतिफलन समान रूप से साथ-साथ दिखायी देता है। चाहे वह खिन्नता, उदासी, अवसाद, सुख निराशा और मृत्यु-भय का अन्तःसंगीत हो; या लम्बी कथात्मक या आत्म-चरितात्मक कविताएँ हों; ऋतु गीत हों या प्रार्थनाएँ हों—उनके प्रत्येक संग्रह में सभी तरह की रचनाएँ समान रूप से मिल जाती हैं।

निराला का काव्य-व्यक्तित्व इतना विराट, गहन, गम्भीर और कुछ ऐसा सीमाहीन लगता है, जिसके अन्दर बाहरी विचार और सिद्धान्त और अध्ययन-रेखाएँ तिरोहित हो जाती है और फिर जो कुछ भी रच कर बाहर आता है, वह सिर्फ ‘निराला’ होते हैं। सामयिकता उनके व्यक्तित्व में घुल कर एक निजी और मौलिक रूप धारण करती है। रचना-प्रक्रिया के ये कई-कई आवर्त लगातार हर समय उनके काव्य-व्यक्तित्व को आन्दोलित करते रहते हैं और अनेक रंगों, ध्वनियों और अर्थों से भरी अनेक छवियों वाली कविताएँ लगातार वे रचते चलते हैं। काल-क्रम के आधार पर एक ही समय के आस-पास रची गयी भिन-भिन्न ढंग की इन कविताओं में कोई तारतम्य और संगति बिठाना विचित्र लगता है।

इसीलिए संभवतः निराला ने अपने काव्य-संग्रहों के प्रकाशन के समय कविताओं का चयन (अगर इसे चयन कहा जा सकता है तो) करते समय कविताओं को कहीं भी विषय-वस्तु शिल्प या भाषिक-संरचना की एक रूपता के आधार पर विभाजित करने की ओर ध्यान भी नहीं दिया है, बल्कि अपने कवि-व्यक्तित्व के अनेक रचना-स्तरों को ज्यों-का-त्यों सुरक्षित रखा है। यहाँ तक कि ‘गीतिका’ में भी, जो संगीत और गायन-पक्ष को विशेष दृष्टि में रख कर लिखे गये गीतों का संग्रह है, इस तरह के अनेक रचना-स्तर गीतों के बन्द में सुरक्षित हैं। ‘तुलसीदास’ और ‘कुकुरमुत्ता’, इन दो को छोड़ कर शेष सारे संग्रहों से मैं इस तरह की अनेक-रंगी, अनेक रचना-स्तरों की कविताएँ उदाहरण के रूप में रख सकता हूँ।

संसार की किसी भी भाषा में ऐसे कवि बहुत कम होंगे, जो रचना-स्तरों के अनेक रूपों को साथ-साथ वहन कर सकें और लगातार अनेक मुखी अर्थों वाली कविताएँ रचने में समर्थ हों। इसका प्रमुख कारण यही था कि निराला ने जीवन को एक ही साथ अनेक स्तरों पर जिया। शायद जीवन और काव्य-रचना में एक ही साथ संघर्ष और संघात इतने सारे ‘फ्रण्ट’ खोलने, लगातार लड़ते रहने और रचते रहने की मानसिक और शारीरिक थकान को समझने के बाद ही उनके मानसिक असन्तुलन को समझा जा सकता है और तब यह कोई ऐसी अजूबा स्थिति नहीं लगती; क्योंकि शरीर और मस्तिक की एक सीमा तो होती ही है और निराला ने अपने असीम शारीरिक और मानसिक क्षमता के साथ इस सीमा का, चाहे जाने या अनजाने, लगातार उल्लंघन किया। ऐसा करना एक तरह की मानसिक समझौता परस्ती को प्रश्रय देना था जो निराला जैसे गहन सम्वेदनशील, अहंकारी उदात्त, अव्यवहारिक, भावुक और निपट मानवीय व्यक्ति के लिए असम्भव था।
जिस ‘नरक-यात्रा’ की चर्चा डॉ. रामविलास शर्मा के जीवन के विषय के एक समय-विशेष में करते हैं, दरअसल वह नरक-यात्रा तो उनके जीवन में सर्वत्र फैली हुई है। उसके अनेक आवर्त हैं, अनेक आरोह-अवरोह हैं। उसमें ऐसी खिड़कियाँ भी हैं, जहाँ से ‘फागुन की आभा’ और ‘बादलों की छवि’ रह-रह कर झलक मारती है। उस नरक को ही निराला अपराजेय मन से रचना के असाधारण सौन्दर्य तक ले जाते हैं। जीवन और जगत के इसी गहरे अनुभव से सिंचित रचना का वह असाधारण सौन्दर्य ही इन पंक्तियों में अभिव्यक्त हुआ है :

मैं रहूँगा न गृह के भीतर
जीवन में रे मृत्यु के विवर


मृत्यु के इसी विवर से, इसी नरकीय यन्त्रणा से मुक्ति के प्रयास में, शुद्ध किरण की खोज में विमल आलिंगन कर वायु का स्रोत जानने के लिए वे बार-बार नरक की इस खिड़की से झाँकते हुए अपनी स्तब्धता का जिक्र करते हैं :


असात्चल रवि, जल छलछल छवि
स्तब्ध विश्व कवि, जीवन उन्मन।


धीरे-धीरे यह नरक-यात्रा एक विशाल, अनन्त रचना-यात्रा के रूप में परिवर्तित होती चलती है। उनकी इस रचना यात्रा की एकतानता और अनेक मुखता से अलग उन्हें उनके रचना-वर्षों के विशिष्ट खण्डों में बाँट कर उनकी कविताओं की व्याख्या के प्रति सही अध्ययन-दृष्टि नहीं अपनायी जा सकती।

रचना-स्तरों के अनेक क्रियाशील रूप उनके प्रथम कविता-संग्रह ‘अनामिका’ की 9 कविताओं में ही मिल जाते हैं। विषय-वस्तु, शिल्प और भाषिक-संरचना—किसी भी दृष्टि से उनमें समान रूप से कोई एकरूपता नहीं है। ‘जलद’ कविता जहाँ प्रारम्भ से ही वर्षा-ऋतु के प्रति उनकी गहरी रुझान का पहला परिचय देती है, वहीं छन्द-संयोजन और भाषिक-संरचना की दृष्टि से बिलकुल सरल है। यहाँ तक कि उसमें अँग्रेजी शब्दों का खुला प्रयोग निराला ने किया है। ‘ग्रेड’ और ‘डिगरी’ जैसे आकाव्यात्मक शब्दों का प्रयोग निराला ने किया है। ‘तलाश्रित’, ‘ऊर्ध्वंग’ से लेकर ‘होशियारों, ‘बकाया’, ‘बैठाल’ जैसे शब्दों का प्रयोग या प्रयोग का घाल-मेल इस प्रारम्भिक कविता में निराला ने किया है।
प्रारम्भ से ही निराला हिन्दी कविता के लिए एक नयी भाषा की खोज में जाने-अनजाने रत दिखाई देते हैं। शायद कालिदास और रवीन्द्रनाथ की भाषा में ‘श-ण-ल-व’ का विरोध करते हुए जहाँ अपनी भाषा को उन्होंने हिन्दी की मूल प्रकृति के निकट कहा है, वे प्रारम्भ से ही उसी भाषा, छन्द और कथन-भंगिमा की खोज में लगे हैं। अपनी कविताओं का विरोध होते देखकर उन्होंने इस नासमझी के प्रति दुखी होकर यह कहा कि ‘ऐसा इसलिए हो रहा है कि मैंने सदा हिन्दी का मुँह देखा है।’

अपनी प्रकृति, सार्वजनीन मौलिकता और रचना-दृष्टि के प्रति वे इतने सचेत और सजग हैं कि प्रतिद्वन्द्वी और चुनौती देने वालों में उन्हें कालिदास और रवीन्द्रनाथ ही लगते हैं। ‘जलद’ कविता की भाषा-संरचना की इस तात्विक विशिष्टता के अलावा इस कविता में ‘बादल’ के जिस रूप को उन्होंने चित्रित किया है—उसी का अनेक-मुखी विकास ही आगे चल कर उनके ‘बादल-राग’ और वर्षा सम्बन्धी अन्य कविताओं में हुआ है। यहाँ भी ‘धरती माँ को हरा वसन पहनाने वाले के रूप में अन्ततः उन्होंने ‘जलद’ को देखा और आगे चलकर उसे फिर ‘ये मेरे अपने सपने’ और ‘ऐ जीवन के पारावार’ कह कर सम्बोधित करते हैं। इसी तरह ‘आध्यात्म फल’, ‘तुम और मैं, तथा ‘माया’ कविताओं की सम्वेदना दार्शनिक जमीन का स्पर्श करते हुए भी विभिन्न भाषिक संरचना के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। ‘आध्यात्म फल’ की भाषा और कथन भंगिमा एक गहरे व्यंग्य की अनुभूति लिये हुए, जब कि ‘माया’ और ‘तुम और मैं’ संस्कृत की ध्वनि-लहरियों से युक्त एक नयी-भाषिक-संरचना का आभास, देती हैं। ‘अधिवास’ अपनी ही आध्यात्मिक सिद्धि और ‘परमपद लाभ’ (अपने एक प्रारम्भिक पत्र में पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी को लिखते हुए निराला ने अपना पूरा परिचय देते हुए लिखा है, ‘जीवन का उद्देश्य बचपन से ही परमपद लाभ’।) की आकाक्षाओं वाली काव्य-रचना से पृथक जन-सामान्य के संस्पर्श की एक शक्तिशाली उद्घोषणा है। कविता को उसकी अभिजात सम्वेदना से मुक्त करके उसे एक नयी ज़मीन देने को निराला अपनी निजी काव्यात्मक उपलब्धि मानते हुए कहते हैं :


मैंने ‘मैं’ – शैली अपनाई
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पड़ी हृदय में मेरे
झट उमड़ वेदना आई


हृदय में पड़ी दुख की छाया उन्हें बार-बार अपनी ही रचनात्मक समृद्धि को ध्वस्त करके सम्वेदना और भाषिक-संरचना, दोनों धरातलों पर अपने ‘दुखी भाई’ के निकट जाने को प्रेरित करती है। निराला के काव्य में आया हुआ सर्वसाधारण के प्रति यह अगाध प्रेम तथा कथित प्रगतिवाद की देन नहीं है। यह कविता उनके प्रारम्भिक दौर की कविता है, जब हिन्दी में प्रगतिवाद का कहीं नामोंनिशान भी नहीं था। सम्वेदना की अनेक परतें सदा उनकी रचना के साथ-साथ खुलती रही हैं। कविताओं को उनके परम्परागत आभिजात्य से मुक्ति दिलाने का प्रयास लगातार निराला अपनी रचनाओं के द्वारा शुरू से ही करते हुए दिखाई देते हैं। इसीलिए जहाँ एक ओर ‘जुही की कली’ लिखकर वे भाषा और सम्वेदना के दूसरे ही स्वरारोह की सृष्टि करते हैं, वहीं ‘अपने दुखी भाई’ को देखकर वे ‘मैं’ की सर्वथा नयी, अप्रयुक्त शैली और रचना-दृष्टि सगर्व अपनाते हैं। साधारण जन के दुख से उनके हृदय में पड़ी इसी दुख की छाया का विकास आगे चल कर ‘विधवा’ , ‘भिक्षुक’, ‘तोड़ती पत्थर’, ‘दीन’, ‘खजोहरा’, ‘रानी और कानी’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘महगू मँहगा रहा’ और ‘मानव जहाँ बैल-घोड़ा है’ जैसी कविताओं में हुआ है। दुख की इस पड़ी हुई छाया की ही अन्तिम परिणति इन पंक्तियों में होती है:


जनता के हृदय जिया
जीवन-विष विषम लिया


‘जूही की कली’ एक दूसरी तरह की सौन्दर्य-रचना का प्रतिमान स्थापित करती है। यहाँ वह खिन्नता का स्वर नहीं है, जो निराला में प्रारंभ से ही अपने प्रखर रूप में पाया जाता है। अपने ढंग से यह कविता रवीन्द्रनाथ की कविताओं की चुनौतियों से उपजी हुई है। इसकी सारी भाषिक-संरचना अत्यन्त गूढ़ है। एक सम्पूर्ण मानवीय व्यापार का प्राकृतिक पर आरोपण है। यद्यपि छन्द-प्रयोग की दृष्टि से यह स्वच्छन्द-छन्द की कविता है, लेकिन उसका पूरा भावावेग गीतात्मकता से पूर्ण है।



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