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उत्तर बायां है

विद्यासागर नौटियाल

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :299
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3227
आईएसबीएन :81-7119-824

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यह उपन्यास बेचैन करने वाले यथार्थ और जमीनी सच्चाइयों, आपसी रिश्तों को ध्यान में रखकर लिखा गया है...

Utar Baya Hai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘अपने लोगों की यह कथा जिसे अनेक वर्षों तक मैंने अपने भीतर जिया है...’’ (विद्यासागर नौटियाल)
‘उत्तर बायां है’ हिमाच्छादित बुग्यालों और ऊँचे, विस्तृत चरगाहों में बरसात के दौरान बर्फ के पिघलने के बाद उग आने वाली मखमली घास और असंख्य खूबसूरत फूलों की खुशबू के बीच अपने पशुओं के साथ विचरण करने वाली घूमन्तु जाति गूजर और पर्वतीय क्षेत्र के भेड़पालकों और भैंसवालों के समूहों के आपसी संबंधों और परिधि पर बसर कर रहे लोगों के जीवन का साक्षात्कार है। पर्वत श्रृंग पर बसे भेड़ पालकों के गाँव चाँदी और उसकी घाटी में बसे रैमासी के निवासियों के पेशों, रीतियों और प्रथाओं में पर्याप्त भिन्नता हो जाती है। चाँदी के आकाश में चाँद खुलकर प्रकृट होकर कभी अपनी आभा नहीं फैला पाता। चाँदीवासियों का आदिकाल में यह विश्वास चला आया है कि कुछ दुष्ट ग्रह, जो उनके आकाश में विचरण करते हैं, उनके चाँद को हमेशा अपने दबाव में रखते आये हैं, जैसे राहु पूर्णमासी के चाँद को अपने दबाव में कर लेता है। उन दुष्ट ग्रहों के संचालक रैमसी में निवास करते हैं। दिन-रात अक परिश्रम करने वाले चंदवालों की कमाई को सदियों से निठल्ले रैमासीवाले हड़प करते आये हैं। सदरू, करणू, हुकम के जीवन में खीजी, कन्हैया, देवीप्रसाद, धनसिंह और रथी सेठ जैसे लोग हमेशा संकट पैदा करते आये हैं, और इन निरीह चंदवालों की कीमत पर राजकीय कर्मचारियों, अधिकारियों की मौजमस्ती, बेकसूर लोगों पर सत्ता के अत्याचार, न्यायालयों की हास्यापद भूमिका, भेड़पालकों, ग्रामवासियों, गूजरों के पशुवत् जीवन की झलकियाँ, आयशा, सकीना और हसीना की बेबस जिंदगी के चित्र, हाशिए पर पड़े लोगों के अनवरत संघर्ष, गरीबी, उनके सपने, सभ्य तथा कथित विकसित समुदायों द्वारा उनका बाहरी-भीतरी विनाश ! ‘उत्तर बायां है’ में अपने मर्मांतक वर्णन से विद्यासागर नौटियाल इन घूमन्तू और सीमांत लोगों के जीवन का प्रामामिक तथा जिंदगी से भरपूर संधान करते हैं।
उपन्यास बेचैन करने वाले यथार्थ और जमीनी सच्चाइयों, आपसी रिश्तों को मानवीय गरिमा देने के बीच एक संयत भाषा में आमदोलित होता रहता है और इन ‘उपेक्षितों’ की पीड़ा से ‘मुख्यधारा’ को आत्यन्तिक मार्मिकता से साक्षात्कार कराता है।


‘‘अपने लोगों की यह कथा जिसे अनेक वर्षों तक मैंने अपने भीतर जिया है, बेटी रश्मि सेमवाल की टीस-भरी याद को अर्पित, जो लगातार आश्वस्त रहती थी कि उसका इलाज चल रहा है और रोगमुक्त होकर वह एक बार फिर अपनी पुरानी दिनचर्या शुरू करेगी, जिसके चेहरे की सतत् मुस्कान को मौत भी गायब नहीं कर पाई थी।
दो चट्टानों के बीच
कन्याकुमारी में मेरे देश का सूर्यास्त होता है
और पांडिचेरी में सूर्यास्त
मैं
महाबलिपुरम का विशाल रथ हूं
जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक
अनवरत
दो पाटों के बीच से साबुत चला जा रहा है   
विष्णुचन्द्र शर्मा

जो कि नहीं है उसका ग़म क्या...
आकाश विभाजित है


सदरू हड़बड़ा कर जागा। लेटने के बाद उसे काफी देर तक नींद नहीं आई थी। सोने की कोशिश करता रहा पर नींद ही नहीं आ रही थी। वह एक के बाद एक कई चीजों के बारे में सोचने लगा था। उन चीजों के बारे में वह यों ही नहीं सोच रहा था, वह गहरी चिन्ता में डूब गया था। अब आधी रात में उसकी नींद अचानक टूटी। वह बैठ गया। उसने पंखी उठाई, अपनी ऊनी चादर। दोनों हाथों से उसे थामा जैसे की पंखी एक बच्चा हो। तंबू के अंदर से बैठे ही बैठे ही वह बाहर निकला। बाहर निकल आया तो अपनी पूरी ताकत को मुंह के पास समेटते हुए उसने आवाज़ दी—ओ...ओ, ओ...ओ...ओ..ओ।
कुत्ते कहीं दूर जा चुके थे। गहरे खड्ड के अन्दर से उनकी आवाज़ें आ रही थीं। अब वह क्या करे ? सदरू चिंता में डूब गया। रात के वक़्त अकेले आदमी का डेरे से दूर जाना ठीक नहीं। डेरा छोड़कर जाने में भेड़-बकरियां बेहिफाजत छूट जाएंगी। और वह जाए तो कहां जाए ?
तेज हवा का एक झोंका। सदरू को थपेड़ा लगा। उसे चेतना हुई कि उसने पंखी ओढ़ी नहीं है। उसे दोनों हाथों से थामे उसने पंखी पीठ पर डाली। एक झटके में उसे छाती से आगे लपेटते हुए उसके दोनों छोर बाएं-दाएं कंधों पर पीछे की ओर फैला दिए। फिर से उसने आवाज़ दी—रि खू..ऊ...ऊ...., ला लू...ऊ...ऊ...ऊ...।
जंगल के अंदर भोंकने की आवाज़ अभी भी आ रही थी। पर अब सिर्फ एक कुत्ते की आवाज़ सुनाई दे रही थी। दूसरे की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी। ऊंची, संकरी धार के दोनों ओर फैले पहाड़ों की गहराइयों से बहुत से कुत्ते बोलने लगे थे। दूर-दूर से उनके भोंकने की आवाज़ें घाटी में गूंजने लगी थीं। पर सदरू को लालू की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी। लालू भूरे रंग का कुत्ता है। लोग उसे भोटू कहते हैं। सदरू लालू कहता है। लालू, उस कुत्ते को सदरू का दिया हुआ नाम है। प्यार का नाम। एक प्यारा नाम।

यह पल्लीधार है। धार की इस ऊंचाई पर खड़े ढलुवा पहाड़ की बनावट का सिलसिला बदल गया है। पहाड़ की इस चोटी पर करीब पचास कदम लम्बा और तीस कदम चौड़ा भू-भाग समतल हो गया है। इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया है। इस समतल जमीन के क्यार्की बुग्याल की तरफ के आखिरी छोर पर सदरू रहता है। छः कदम चौड़े और करीब इतने ही कदम लंबे जमीन के टुकड़े पर रहता है। बाकी समतल जमीन पर उसकी भेड़-बकरियां रहती हैं। उसकी अपनी नहीं, वे भेड़-बकिरायां रहती हैं जिनका वह पालसी है। हेरवाला। भेड़-बकरियों के असली मालिकान तो इस वक़्त कपाट बन्द कर, गर्म घरों के अन्दर, अपनी औरतों को बगल में दबाए उनके साथ सो रहे होंगे। सदरू का डेरा एक तंबू के अन्दर है। छः कदम लंबी जमीन के दोनों छोरों पर लकड़ी के दो छोटे-छोटे चार-चार फुट ऊंचे खंबे गाड़े गए। खंबों के ऊपरी सिरे दो-फाड़ के हैं। दो-फाड़ जगहों पर एक सीधी, लंबी लकड़ी के छोर पर टिका दिए गए हैं। खंबों पर टिकी लकड़ी को ऊपर से एक तिरपाल ओढ़ा दिया गया। अकेली लकड़ी के ऊपर फैले तिरपाल के दोनों तरफ के किनारे जमीन की ओर झूलने लगे। उन झूलते हुए किनारों को डोरियों से बांधा गया। जमीन पर छोटी-छोटी, मजबूत खूंटियां गाड़ी गईं। तिरपाल पर बंधी डोरियों को इन खूंटियों से जकड़ दिया गया। तिरपाल तंबू बन गया। एक मजबूत तंबू। पहाड़ की सबसे ऊंची धार पर खड़े किए गए इस तंबू को तेज से तेज हवाएं नहीं उखाड़ सकतीं। चार फुट ऊंचा यह तंबू पालसी का डेरा है। तंबू के बाहर चारों ओर सदरू ने चपते-चपते पत्थरों को धरती में गाड़ दिया है। तरतीबवार। पत्थर धरती पर एक-एक फुट ऊपर उठे हैं। तंबू की चौहद्दी। मौसम सर्दी के शुरू होने पर वे उस डेरे को छोड़कर वहां से जाने लगते हैं, तब तंबू के हटा लिए जाने पर ऐसा लगता है जैसे वहां पर कोई खलियान रहा होगा।

अगल-बगल के हिस्सों को डोरियों-खूंटियों के जरिए धरती पर जकड़ दिए जाने के बाद तिरपाल के दो भाग खुले छूट गए। एक आगे, एक पीछे। सदरू ने इनका भी इलाज किया। इनके माध्यम से तेज हवाओं का इलाज किया। दूर-दूर से चौड़ी, ऊंची पठालें लाई गईं। मकानों की छंवाई के उपयोग में लाए जाने वाले चपते पत्थर। पठालों को खड़े में गाड़कर तिरपाल के खालीपन को भरने की कोशिश की। तंबू के अन्दर, बाहर से खड़ी की गई पठालों से अन्दर, उस तरफ सामान रख दिया गया। सामान की पीठ बाहर खड़ी पठालों पर टिकी हैं। यहां आकर भी हवा हार जाती है। आखिरी भाग, प्रवेश द्वार पर एक चादर का परदा डाल दिया गया। इससे थोड़ी-सी राहत मिलती है। इस तरह हवा और बारिश से बचाव कर लिया जाता है। मोटा-मोटा बचाव। कुदरत के थपेड़ों से हलका-सा बचाव। भेड़ चराने वाले खडवाले को इससे ज्यादा बचाव की जरूरत नहीं पड़ती। आम तौर पर वह अपने आपको कुदरत के साथ हमरूप बनाकर रहता है। ठंड है तो है। बरखा हो रही है तो हो रही है। खडवाला वैसे ही रहने का आदी होता है जैसे उसकी भेडें रहती हैं। भेड़ों की खाल मोटी होती है। खड की खाल मोटी होती है।

पालसी का तंबू। पालसी धार पर रहता है। धार के एकदम ऊपर। पहाड़ों के मस्तक पर मीलों तक फैली हुई बुग्यालों में कहीं भी चले जाएं पालसी का डेरा चोटी पर मिलेगा। धार के ऊपर। एकदम खुले हुए। पेड़ों के इलाके से दूर। पेड़ कहीं नीचे, बहुत नीचे छूट जाते हैं। समुद्रतल से आठ-नौ हजार फुट की ऊंचाई से ऊपर पेड़ नहीं उगते। बहुत छोटी-छोटी झाड़ियां कुछ ऊंचाई पर दिखाई देती हैं। और बाद में, जब इन पहाड़ों पर कुछ और अधिक ऊंचाई पर चले जाएं सिर्फ बुग्यालें दिखाई देती हैं। धरती के सीने पर अन्तहीन लंबाई-चौड़ाई तक फैला हुआ बुग्गीदार घास और रंग-बिरंगे फूलों का एक मोटा गलीचा। बुग्यालों की घास खाकर मवेशियों की तन्दुरुस्ती खिलने लगती है।
गाय-भैंस के दूध की मात्रा बढ़ जाती है। निचले स्थानों पर की गई मट्ठा में उतना मक्खन नहीं बनता जितना बुग्यालों में की गई मट्ठा में मिलता है। गूजर अपनी भैंसों और खडवाले अपनी भेड़-बकरियों को लेकर वहां पहुंच जाते हैं। सावन-भादौं के महीने बुग्याल में आदमी और उसके पालतू पशुओं के रहने-रमने के महीने होते हैं। फूलों के महीने, फूलों के खिलने के महीने।

बुग्यालों की धरती देखकर लगता है वह जादुई धरती है। मध्य जेठ तक वहां ठसाठस बर्फ भरी रहती है। बर्फ की मोटी परतें जमा रहती हैं। उस दौरान जब मैदानी गर्मी से निजात पाने के लिए बहुत से लोग पहाड़ों की ओर भागने लगते हैं, बुग्यालें बर्फ की सफेद चादर से ढंकी रहती हैं। जब बरसात होती है तब वहां के वातावरण में कुछ गर्मी पैदा होने लगती है। तब बरखा का पानी धरती पर गिरता है तो वहां की बर्फ पिघलने लगती है। बर्फ के पिघलते-पिघलते धरती के सीने पर बर्फ की ऐंठन भरी शीत के द्वारा जला दी गई बुग्याल घास की बुग्गियों का रंग बदलने लगता है। अपना कोयला जैसा काला रंग छोड़कर वे गहरा हरा और मखमली रूप धारण करने लगती हैं। उनका वह विकास और बदलाव रोज-ब-रोज महसूस किया जा सकता है। मात्र पन्द्रह दिनों के अन्दर वे पौधे जन्म लेते हैं, अंकुरित होते हैं, बड़े हो जाते हैं और तब अचानक उन पर फूल भी खिल उठते हैं। ऐसी उतावली में और कहीं किसी दूसरी वनस्पति का विकास नहीं होता।

बुग्यालों में सावन अपनी अलग छटा लेकर प्रकट होता है। उस वक़्त वहां की हरियाली और रंगों को देखकर कोई यह अन्दाज नहीं लगा सकता कि पन्द्रह दिन पहले यह धरती पूरी तरह बर्फ की अथाह राशि से ढंकी रही होगी। उन फूलों और नर्म घास की मोटी बुग्गियों का भादौं के आखीर तक वहां अपना साम्राज्य फैला रहता है। यही दो महीने होते हैं जब मनुष्य रूपधारी भेड़पालक और पशुपालक, सैलानी, तीर्थयात्री और शिकारी वहां पहुंचते हैं। भादौं के खत्म होते ही बुग्यालों की ऊंचाई से नीचे उतर आना जरूरी हो जाता है। तब वहां वर्षा नहीं होती, सिर्फ बर्फ गिरने लगती है और उस क्षेत्र में बेहद शीत बढ़ जाता है। बुग्यालों की शीतकाल के दौरान वहां निवास करने वाली प्रजातियों के पशु-पक्षी तब अपनी गुफाओं, छुपने के स्थानों से बाहर निकल आते हैं और स्वच्छंद रूप से वहां विचरण करने लगते हैं। जब तक बुग्यालों में मनुष्य और उसके पालतू पशु मौजूद रहते हैं तब तक उनके डर के मारे वे प्राणी कहीं अगम्य स्थलों पर दुबके पड़े रहते हैं। सावन और भादौं के दौरान बुग्यालों में अनगिनत, बहुरंगी छोटे-बड़े फूल धरती को पूरी तरह से ढंक देते हैं। उनकी आयु कम होती है। वे जल्दी उगते हैं, जल्दी नष्ट हो जाते हैं। लेकिन जितने दिन जीवित रहते हैं वे जीवन्त लगते हैं। जीवन की सफलता के असली प्रतीक। असली जीवन के प्रतीक।

पालसी उस कुदरती, रंगीन गलीचे के क्षेत्र में रहता है। वह निश्चिंत होकर रहना चाहता है। बुग्यालें आम तौर पर पेड़ों की पंक्तियों से काफी दूर और बेहद ऊंचाई पर होती हैं। बाघ जैसे हिंश्र जानवर वहां नहीं जाते। ऐसे इलाके में भेड़-बकरियों का जीवन पूरी तरह सुरक्षित रहता है। पालसी को सबसे ज्यादा चिन्ता अपनी भेड़ों की सुरक्षा की रहती है। लिहाजा वह धार के ऊपर यानी पर्वतों के सबसे ऊंचे शिखरों के ऊपर रहने का आदी हो जाता है। पहाड़ों के निचले इलाकों के मुकाबले धार पर खूब-खूब तेज हवाएं चलती हैं। वहां कोई ओट नहीं होती। पर हवाएं चलती हैं तो चलें, हवा का मुकाबला कर लिया जाएगा। वहां बाघ तो नहीं आएगा। आराम से पांव पसारकर सो तो सकते हैं।

पालसी के डेरे से, आसमान के साफ रहने पर, दूर-दूर तक के नज़ारे दिखायी देते हैं। बहुत दूर के पहाड़ों पर कहीं कोई पशु चर रहा है, वह दिखाई देगा। कोई आदमी है, वह दिखाई देगा। साफ-साफ दिखाई देगा। अपने डेरे पर बैठा पालसी अपने चारों ओर मीलों दूर तक के क्षेत्रों की चौकसी कर लेता है। छोटे-छोटे पौधे, रंग-बिरंगे फूल और बुग्याल की घास के बुग्गे। इनके बीच में वहां जो भी पहुंच जाय वह बखूबी पहचान लिया जाता है। बुग्यालों का हिरण, जिसे बरड़ कहते हैं, अलग से पहचानने में आ जाता है। वह कुलांचे भरता है। सफेद भालू। अपने भरसक आदमी से पर्याप्त दूरी कायम कर रहने वाला एक डरपोक जानवर। उसे सिर्फ बर्फीला क्षेत्र पसन्द आता है। कभी-कभार कस्तूरा मृग घने जंगलों से बाहर निकलकर उधर की ओर आ जाता है और लुकाछिपी करते हुए वहां घूमने लगता है। और इन सबके ऊपर अक्सर एक बेहद खूबसूरत पक्षी हवा में डुबकियां लगाता रहता है। उसका जोड़ा घूमता है। मुनाल पक्षी। बाज़ जितना बड़ा। मोर के रंग से ज्यादा रंगीला, उससे कहीं ज्यादा सजीला। गहरे नीले रंग का पक्षी। उड़ता हुआ आएगा, आदमी के देखते-देखते घनी वनस्पति के बीच कहीं गायब हो जाएगा। यों छुप जाएगा कि यकीन नहीं होता कि अभी-अभी हमने उस जोड़े को हवा में उड़ान भरते हुए, गोता लगाते हुए देखा था। मुनाल मनुष्य से आतंकित और भयभीत रहता है। मनुष्य के सामने इठलाएगा तो अपनी मौत को निमन्त्रण देगा। लोग उसे मारकर उसका मांस खा जाते हैं, खाल को संभालकर अपने पास रख लेते हैं। मुनाल घोंसले बनाता है तो विकट ढंगारों के ऊपर, अगम्य चट्टानों की चोटी पर, जहां मनुष्य नाम का दुष्ट जानवर किसी हालत में पहुंच न सके। पालसी और उसकी भेड़ें उन ढंगरी चट्टानों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। वे उन चट्टानों के ऊपर न पहुंच सकें, ऐसी सुरक्षित जगह चुनकर मुनाल पक्षी अपनी नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए घोंसला बनाता है। उन चट्टानों पर या उनके ढलानों पर बुग्याल घास नहीं उगती। पालसी के कुत्ते तक उन चट्टानों पर नहीं पहुंच सकते। पालसी को पत्थर की नहीं, घास की जरूरत होती है।

गूजर पालसी से एकदम भिन्न होता है, बनावट में भी और स्वभाव में भी। वह बाघ-भालू से नहीं घबराता। वह हट्टा-कट्टा इंसान होता है। गूजर के बेटे के हाथ में एक लाठी होनी चाहिए, वह बाघ को मार गिराएगा। उसमें साहस और बल किसी का भी अभाव नहीं होता। गूजर की भैंसों पर बाघ हमला नहीं कर सकता। वे भैंसें रहती भी झुण्ड में हैं। रात को सोते वक़्त वे ख़ुद ही एक गोल घेरा बना लेती हैं और अपने नवजात और कम उम्र के बच्चों को उस घेरे के बीच में रख लेती हैं। उस मजबूत घेरे को तोड़कर बाघ उन बच्चों तक पहुंच ही नहीं सकता।
गूजर कहीं भी धार पर नहीं रहता। वह पहाड़ की ओट लेकर रहता है। धार से बहुत नीचे, झोंपड़ी बनाकर रहता है। गूजर की झोपड़ी, एक पूरा भवन। ऊंचा, हवादार, सुरक्षित। घने वृक्षों से भरे वन के अन्दर एक खूबसूरत, साफ-सुथरा आवास।
उन बुग्यालों में पहुंच जाने के बाद भैंसे अपने मालिकान गुजरों के डेरों के पास नहीं रहतीं। वे जंगलों में, बुग्यालों में, वीरान चरागाहों में चरते-चरते जहां रात पड़ जाय, वहीं रात्रिवास कर लेती हैं। पालसी एक रात के लिए भी अपनी भेड़ों से जुदा होकर नहीं रह सकता। अपने चरागाहों में पहुंचने के बाद गूजर अपनी भैंसों की ओर से बेखबर हो जाता है। वह अपने घोड़ों को बुग्यालों में चरने की खुली छूट दे देता है। घोड़े जहां चाहें घूम लें, जिधर चाहें चर लें, चरते रहें। जहाँ पसन्द आए या जहां रात पड़ जाय वहां रात गुजार लें। अपनी थोड़ी-सी बकरियों, गायों और उनके बछड़े-बछियाओं को गूजर अपने डेरे के काफी पास, अलग से झोपड़ियां बनाकर उनके अन्दर रखता है। वहाँ उनके कुत्ते पशुओं के उन बच्चों की हिफ़ाजत करने में मुस्तैद हो जाते हैं।

गूजर की भैंस बन्धहीन होकर रहती है। उसे कभी बांधा नहीं जाता। उसका कोई खूंटा नहीं होता। उसके गले में किसी रस्सी से, किसी दावें से बांधे जाने के कोई निशान नहीं होते। वे भैंसे खुले बुग्यालों में दूर-दूर तक फैलकर घास चरती रहती हैं। नीचे के इलाके में रहने वाले स्थानीय ग्रामवासी भी बरसात के दिनों में अपने मवेशियों को लेकर ऊंचाइयों पर स्थित जंगलों में चले आते हैं। इन जंगलों में उनकी पुश्तैनी छानें बनी होती हैं। बरसाती झोपड़ियां। घास-पत्तियों की तलाश में ये सभी लोग अपने पशुओं को साथ लेकर चरागाहों में घूमते रहते हैं। हरेक की इच्छा होती है कि उसके कब्जे के वन-क्षेत्र का विस्तार होता रहे। सभी लोग उन चरागाहों से दूसरों को हटाकर वहां की घास पर अपना कब्जा करना चाहते हैं।

वह घास भैंस के जीवन के लिए जरूरी होती है
उस घास पर गूजर की नज़रें लगी रहती हैं।

वह घास भेड़ के जीवन के लिए जरूरी होती है।
उस घास पर खडवाले की नज़रें लगी रहती हैं।

वह घास पशुओं के जीवन के लिए जरूरी होती है।
उस घास पर किसानों की नज़रें लगी रहती हैं।

वह घास गूजरों, खडवालों, भैंसवालों को बांटती है। उन्हें लड़ाती है।
वही घास गूजरों, खडवालों, भैंसवालों को जोड़ती है। उन्हें मिलाती है।
दो महीने की घास।
जिन्दगी भर की आस।

गूजर हर साल शिवालिक की घाटियों से या उसके पास-पड़ोस के मैदानी इलाक़ों से अपने मवेशियों को लेकर पहाड़ों की ऊंचाइयों पर आते हैं। पिछले करीब एक सौ सालों से वे लगातार पहाड़ों पर आते रहे हैं। उनके परिवारों और पशुओं की संख्या सालोसाल बढ़ती रहती है। स्थानीय ग्रामवासियों के लिए यह विशेष चिन्ता का कारण बना रहता है।
टिहरी गढ़वाल रियासत की आज़ादी से पहले गूजरों को रियासत की बुग्यालों, वनों, चरागाहों के अन्दर पशु चराने के अनुमतिपत्र बहुत कंजूसी के साथ, बेहद सतर्क होकर दिए जाते थे। स्थानीय ग्रामवासियों के अलग-अलग गांवों के अलग-अलग वन-क्षेत्रों में चरान-चुगान के हक-हकूक सरकारी कागजात में दर्ज किए जाते थे। उस दौरान बहुत थोड़े, सीमित गूजर परिवारों को चरान-चुगान के परिमिट जारी किए जाते थे। पशुओं की गिनती करने में भी सख्ती बरती जाती थी। जब भारत आज़ाद हुआ उस वक़्त गूजर, खडवाले और भैंसवाले अपने-अपने चरागाहों, वनों और बुग्यालों में अपने पशुओं को चरा रहे थे। 15 अगस्त, 1947 को टिहरी गढ़वाल रियासत की हुकूमत ने भारत के आज़ाद हो जाने के बाद अपनी स्थिति जाहिर करने के लिए टिहरी शहर के पोलोग्राउण्ड में एक विशेष दरबार आयोजित किया। उस दरबार में घोषणा की गई कि मुल्क हिन्दुस्तान से अंग्रेज चले जाने के बाद टिहरी-गढ़वाल रियासत पूरी तरह स्वाधीन हो गई है। और महाराजा सार्वभौम। मतलब कि रियासत अब भारत का भाग नहीं, उससे एकदम अलग, एक स्वाधीन देश है। प्रजामण्डल ने रियासती हुकूमत की इस गीदड़ धमकी के उत्तर में रियासती प्रजा की आज़ादी के लिए अपना संघर्ष नए सिरे से छेड़ने का ऐलान कर दिया। उस वक़्त खडवालों, भैंसवालों और गूजरों को उस सामन्ती घोषणा या प्रजामण्डल के आंदोलन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वे तब अपने-अपने मवेशियों के साथ अपने चरागाहों की गहरी-गाढ़ी हरियाली और वहां छाए घने कुहरे में डूबे हुए थे। प्रजामण्डल की घोषणा के जारी होते ही राजशाही की ओर से आज़ादी की मांग कर रहे प्रजामण्डल के कार्यकर्ता पर दमन शुरू कर दिया बड़े पैमाने पर उनकी गिरफ्तारियां की जाने लगीं। उन्हें जेल के अलावा पुलिस थानों पर भी क़ैद किया जाने लगा। थाने दुर्व्यवहार और मारपीट के अड्डे बन गए। वहां प्रजामण्डल के बन्दी कार्यकर्ताओं को, उनका मनोबल तोड़ने के लिए, मिट्टी का तेल और रेत मिला खाना दिया जाता था। वे दुर्गन्ध से भरी कोठरियों में ठूंसे जाते। बाद में जेल के अन्दर अदालतें लगाई जातीं। वहां सुनवाई का नाटक होता और उन्हें लम्बी-कठोर क़ैद और भारी जुर्माने की सज़ाएं सुनाई जातीं।

उसी दौरान, आज़ादी मिलते ही, पड़ोसी हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिक दंगों की शुरूआत हो गई। पाकिस्तान में हिन्दुओं और भारत में मुसलमानों का सामूहिक संहार किया जाने लगा। बड़े पैमाने पर लूट-पाट शुरू हो गई। चरागाहों में जो गूजर थे, वे सब मुसलमान थे। टिहरी-गढ़वाल रियासत के बाहर पड़ोसी आज़ाद हिन्दुस्तान के मैदानी भागों में मुसलमानों के कल्तेआम की शुरूआत हो जाने की उड़ती-उड़ती, दिल दहलाने वाली खबरें गूजरों के कानों में भी पहुँचने लगीं।
रफीक, शफीक, हबीब तीन भाई गूजर। छुट्टन के बेटे। छुट्टन की पैदाइश पंचाली बुग्याल में हुई थी। उस वक़्त छुट्टन का दादा दाऊद जिन्दा था। उसके जीवन काल में पशु चराने का परमिट दाऊद के नाम जारी होता था। दाऊद के बाद उसके बाप मूसा के नाम परमिट जारी होने लगा। सालोसाल यह परिवार गर्मियों के मौसम की शुरूआत के साथ अपनी भैंसों और दूसरे जानवरों को लेकर पंवाली कांठे पर पहुंच जाता। वे ऋषीकेश के रास्ते पहाड़ों पर आते। ऋषिकेश से पंवाली पहुंचने में उन्हें पन्द्रह-बीस दिन लग जाते। अब कुनबा बढ़ गया था और भैंसो की संख्या भी बढ़ गई थी। छुट्टन ने जंगलात विभाग के हाकिमान की खुशामदें करके और उनसे मेल-जोल स्थापित करके अपने तीनों बेटों—रफीक, शफीक और हबीब के नाम अलग-अलग परमिट जारी करवाने में सफलता हासिल कर ली। छुट्टन और उसकी बुढ़िया जेबू को लेकर हमेशा तीनों भाइयों में झगड़े होते रहते। गूजर के पास जबसे ज्यादा कमी आदमी की होती थी। तीनों भाई इस कोशिश में रहते कि बुग्याल के पहुंचने के बाद मां-बाप मेरे साथ रहें। बूढ़ा और बुढ़िया बंट जाते। एक परिवार में बूढ़ा रहता और दूसरे के साथ मां। तीसरे परिवार से पन्द्रह-बीस दिनों के बाद कोई-न-कोई नाती अपने दादा-दादी को किसी-न-किसी बहाने बुला लेना जाता। पंवाली, क्वीनी और माट्या। भलंग, हिन्दाव और लस्या पट्टियों के पहाड़ों की ऊंचाइयों पर बीस मील लंबे इलाके में फैली तीन बुग्यालें। स्थानीय गांववासी कहते थे बुग्यालों पर तो छुट्टन ने कब्जा कर लिया है, हम कहां जाएं।
हिन्दुस्तान की आजादी के सिर्फ पन्द्रह दिनों के बाद ऊंचे पर्वतों पर होने वाले मौसम के बदलाव के कारण गूजरों को हमेशा की तरह वहां से उतरकर मैदानों के निचले इलाकों की ओर चले आना था। गुजर अकेला नहीं चलता, उसका कुनबा उसके साथ चलता है, उसके पशु साथ चलते हैं। पंवाली की बुग्यालों में गूजरों को यह सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था कि हिन्दुस्तान से फिरंगी को भगा दिया गया है और कि मुल्क आज़ाद हो गया। पर उसकी समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि आज़ाद हो जाने पर मुसलमानों का कत्लेआम क्यों किया जा रहा है। उनका कसूर क्या है।

रफीक ने अपने छोटे बेटे मसूद को बुलाकर कहा—तू बेटे, मेरे चाचा शफीक के पास क्वीनी चला जा। उससे कहना कि रियासत से बाहर मुसलमानों पर हमले होने की खबरें सुनाई दे रही हैं। इसलिए बेहतर हो कि हम लोग यहां से नीचे साथ-साथ जाएं। हमें यहां से चलने की तैयारी कर लेनी चाहिए। शफीक को कहना वह अपने बेटे जुम्मन को माट्या भेज कर वहां तेरे छोटे चाचा हबीब को भी यह बता बता दे। कल वे पांच-छः लोग यहां पहुंच जाएं। परसों हम घोड़ों को पकड़ने चलेंगे।
रफीक के तीसरे बेटे वहीद ने बीच में टोका—अब्बा, घोड़ों को पकड़ने के लिए मैं भी जाऊंगा।

  

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